श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1767, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंइक्कीसवाँ अध्याय 21/135-137 ] मानो समुद्रमेंसे उठा चन्द्र है और उनकी अति मधुर मुस्कान मानो उस चन्द्रकी किरण है-इन तीनोंमें मन लग गया ॥ 135 ॥ अनुभाष्य-साधारणतः प्रथम दृष्टिमें ही श्रीकृष्णके अङ्गरूपी माधुर्य-समुद्रका दर्शन, विशेष द्वितीय-दृष्टिमें अङ्ग-सिन्धुमें स्थित सुमधुर मुखचन्द्र और विशेषतः तृतीय दर्शनमें मधुरसे भी अति मधुर मृदुहास्यरूपी मुखचन्द्रकी किरण-इन तीनोंका माधुर्य महाप्रभुके श्लोकके पाठ करनेके समय क्रमशः उदित होने लगा एवं महाप्रभुके द्वारा अपने हाथोंको हिलाने रूपी विकार दिखलायी दिया ॥ 135 ॥ गोपियोंके लिये श्रीकृष्णके अङ्ग, श्रीकृष्णका मुख और श्रीकृष्णकी हास्य-माधुरीका तारतम्य :- श्रीकृष्णकर्णामृत (92) में बिल्वमङ्गलवाक्य- मधुरं मधुरं वपुरस्य विभो- मधुरं मधुरं वदनं मधुरम्। मधुगन्धि-मृदुस्मितमेतदहो मधुरं मधुरं मधुरं मधुरम् ॥ 136 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 136 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-इन श्रीकृष्णका शरीर मधुर है, इनका मुख भी मधुर है और इनका मधु-सुगन्धयुक्त मृदुहास्य और भी मधुर है; अहो ! इनका सब कुछ ही मधुर है ॥ 136 ॥ अनुभाष्य- अस्य विभोः (कृष्णस्य) वपुः (मूर्तिः अङ्गं वा) मधुरं मधुरं (तादृश-स्वस्वरूपेतर-सर्वविग्रहाणां रूपतारतम्येन अतिमधुरम्); [कृष्णस्य] वदनं (च) मधुरं मधुरं मधुरं (कृष्णाङ्ग-तारतम्येन अतितरं मधुरम्); अहो, एतत् मधुगन्धि (मधुसुरभियुक्तं) मृदु-स्मितं (मन्दहास्यं च) मधुरं मधुरं मधुरं मधुरं (कृष्णदेह-कृष्णमुख-तारतम्येन अतितमं मधुरम्)। श्लोक-भावानुवाद-इन श्रीकृष्णका शरीर और उसके अङ्ग मधुरसे मधुर हैं अर्थात् अपनेसे अतिरिक्त सभी विग्रहोंसे रूपके तारतम्यसे अति मधुर हैं। इनका मुख मधुरसे मधुरसे भी मधुर है अर्थात् श्रीकृष्णके समस्त अङ्गोंके तारतम्यसे अतितर मधुर है। और अहो ! इनका मधु-सुगन्धयुक्त मृदुहास्य मधुरसे मधुरसे मधुरसे भी मधुर है अर्थात् श्रीकृष्णके देह और श्रीकृष्णके मुखके तारतम्यसे भी अतितम मधुर है। अहो ! इनका सब कुछ ही मधुर है ॥ 136 ॥ गोपीभावमें निमग्न महाप्रभुकी श्रीकृष्णके माधुर्यके आस्वादनमें नित्य बढ़नेवाली अतृप्ति :- सनातन, कृष्णमाधुर्य-अमृतेर सिन्धु। मोर मन-सन्निपाति, सब पिते करे मति, दुर्देव, वैद्य ना देय एक बिन्दु ॥ 137 ॥ ध्रु॥ अनुवाद-हे सनातन ! श्रीकृष्णका माधुर्य अमृतका सिन्धु है। मेरा मन सन्निपात रोगसे ग्रस्त होनेके कारण उस सिन्धुका पूर्णरूपसे पान करनेकी इच्छा करता है। किन्तु मेरा ऐसा दुर्भाग्य है कि वैद्य मुझे उसकी एक बूँद भी पान नहीं करने देता ॥ 137 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-धातु (कफ, वात और पित्त) में त्रिदोषके उत्पन्न होनेपर उसे 'सन्निपात' कहते हैं। मेरा मन जबसे श्रीकृष्णके अङ्गके माधुर्य, श्रीकृष्णके मुखके माधुर्य और श्रीकृष्णकी मुस्कानके माधुर्य-इन तीनोंका आघात खाकर पीड़ित हो गया है, तबसे मेरा मन सन्निपात-रोगसे ही पीड़ित हुआ है, इसमें सन्देह नहीं है। वह उस-उस सौन्दर्य रससमुद्रके प्रति पिपासु होकर दौड़ रहा है। साधारण सन्निपात-रोगका वैद्य जिस प्रकार रोगीको एक बूँद भी जलका पान नहीं करने देता, उसी प्रकार मेरे इस रोगके वैद्य श्रीकृष्णके अतिरिक्त और कोई नहीं होनेपर भी वे अपने सौन्दर्यामृत- समुद्रकी एक बूँदको भी मुझे पान नहीं करने देते-यही दुःख (दुर्भाग्य) है ॥ 137 ॥ अनुभाष्य-विप्रलम्भ-रसमें गोपीभावमें विभावित महाप्रभुकी श्रीकृष्ण-माधुर्य-आस्वादनकी प्यास इतनी तीव्र है कि वे अपार श्रीकृष्ण माधुर्यका आस्वादन करके भी अप्राकृत परम-चमत्कारमय उत्तरोत्तर वर्द्धनशील । 321