श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1768, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 21/137-141 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
[बायाँ स्तम्भ]
अतृप्तिके कारण प्रबल आवेग और उत्कण्ठावशतः सामान्य परिमाणमें भी श्रीकृष्णके माधुर्यका आस्वादन नहीं कर पा रहे हैं, ऐसा कहकर खेद और आक्षेप कर रहे हैं॥137॥
श्रीकृष्णके अङ्ग-मधुर, श्रीकृष्णका मुख-मधुरतर, श्रीकृष्णका हास्य-मधुरतम :- कृष्णाङ्ग-लावण्यपूर, मधुर हैते सुमधुर, ताते सेइ मुख सुधाकर। मधुर हैते सुमधुर, ताहा हइते सुमधुर, ताँर येइ स्मित ज्योत्स्ना-भर॥138॥
अनुवाद—श्रीकृष्णका कलेवर तो लावण्यका धाम है और वह मधुरसे भी सुमधुर है। उनका मुखचन्द्र तो उससे भी अधिक मधुरसे भी सुमधुर है। और उनके मुखचन्द्रपर उससे भी अति सुमधुर उनकी मन्द-मुस्कान है जो चाँदनीके समान है॥138॥
अनुभाष्य—'ताँर'—श्रीकृष्णमुखचन्द्रका; 'स्मित ज्योत्स्ना-भर'—श्रीकृष्णके मुखपर मन्द-मुस्कान जैसे गोपियोंको आह्लाद प्रदान करनेवाली चन्द्रिकाका पूर्ण आलोक (प्रकाश) है॥138॥
समस्त त्रिभुवन ही-उस हास्यचन्द्रिकाके आलोकमें स्नान किया हुआ :- मधुर हैते सुमधुर, ताहा हैते सुमधुर, ताहा हैते अति सुमधुर। आपनार एककणे, व्यापे सब त्रिभुवने, दशदिक् व्यापे यार पूर॥139॥
अनुवाद—वह मन्द-मुस्कान मधुरसे भी सुमधुर, उससे भी सुमधुर, उससे भी अति सुमधुर है। अपने केवलमात्र एक ही कणसे सम्पूर्ण त्रिभुवनोंमें व्याप्त होकर दसों-दिशाओंको अपने आलोकसे प्रकाशित कर देती है॥139॥
अनुभाष्य—यद्यपि श्रीमुखके एक ओर वह मुस्कान दिखलायी देती है, तथापि गोलोक, परव्योम और
[दायाँ स्तम्भ]
देवीधाम उससे व्याप्त होकर दसों दिशाओंमें प्रकाश भर जाता है॥139॥
श्रीकृष्णके क्रीड़ाविग्रहकी वेणु-माधुरीसे त्रिभुवन उन्मत्त :- स्मित-किरण-सुकर्पूर, पैशे अधर-मधुरे, सेइ मधु माताय त्रिभुवने। वंशीछिद्र आकाशे, तार गुण शब्दे पैशे, ध्वनिरूपे पाञा परिणामे॥140॥
अनुवाद—वह मन्द-हास्य-किरण उत्तम कर्पूरकी भाँति है जो अधरोंकी मधुरतामें प्रवेश कर जाती है। फिर वह मधुरता वंशीके छिद्रोंसे ध्वनिके रूपमें परिणत होकर आकाशके व्याप्त हो जाती है॥140॥
अनुभाष्य—'स्मितकिरण-सुकर्पूर'—मन्द हास्य-किरण रूपी कर्पूरसे। 'पैशे'—प्रवेश करती है॥140॥
श्रीकृष्णकी वंशी-ब्रह्माण्ड, परव्योम और गोलोकके समस्त शुद्धसत्त्वकी, विशेषतः शृङ्गार-रसके आश्रित जनोंकी उन्मादिनी :- से ध्वनि चौदिके धाय, अण्ड भेदि' वैकुण्ठे याय, बले पैशे जगतेर काणे। सबा मातोयाल करि', बलात्कारे आने धरि', विशेषतः युवतीर गणे॥141॥
अनुवाद—वह वंशीध्वनि चारों दिशाओंमें प्रसारित होने लगती है। यद्यपि श्रीकृष्ण इस ब्रह्माण्डमें वंशीवादन कर रहे होते हैं, तथापि उनकी वंशीध्वनि ब्रह्माण्डको भेद करके वैकुण्ठमें प्रवेश करके बलपूर्वक सभी लोगोंके कानोंमें प्रवेश कर जाती है और उन्हें मत्त कर देती है। विशेषतः वह ध्वनि गोलोक-वृन्दावनमें प्रवेश करके व्रजाङ्गनाओंके मनको आकर्षित करके उन्हें जबरदस्ती वहाँ ले जाती है जहाँ श्रीकृष्ण वंशीवादन कर रहे हैं॥141॥
अनुभाष्य—'अण्ड भेदि''—ब्रह्माण्डरूपी प्राकृत-राज्यको भेद करके अप्राकृत वैकुण्ठमें जाती है और बलपूर्वक गोपीजन-जगत्के अर्थात् गोपियोंके कानोंमें प्रवेश करती है॥141॥
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