श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
[ 21/137-141 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
[बायाँ स्तम्भ]
अतृप्तिके कारण प्रबल आवेग और उत्कण्ठावशतः सामान्य परिमाणमें भी श्रीकृष्णके माधुर्यका आस्वादन नहीं कर पा रहे हैं, ऐसा कहकर खेद और आक्षेप कर रहे हैं॥137॥
श्रीकृष्णके अङ्ग-मधुर, श्रीकृष्णका मुख-मधुरतर, श्रीकृष्णका हास्य-मधुरतम :- कृष्णाङ्ग-लावण्यपूर, मधुर हैते सुमधुर, ताते सेइ मुख सुधाकर। मधुर हैते सुमधुर, ताहा हइते सुमधुर, ताँर येइ स्मित ज्योत्स्ना-भर॥138॥
अनुवाद—श्रीकृष्णका कलेवर तो लावण्यका धाम है और वह मधुरसे भी सुमधुर है। उनका मुखचन्द्र तो उससे भी अधिक मधुरसे भी सुमधुर है। और उनके मुखचन्द्रपर उससे भी अति सुमधुर उनकी मन्द-मुस्कान है जो चाँदनीके समान है॥138॥
अनुभाष्य—'ताँर'—श्रीकृष्णमुखचन्द्रका; 'स्मित ज्योत्स्ना-भर'—श्रीकृष्णके मुखपर मन्द-मुस्कान जैसे गोपियोंको आह्लाद प्रदान करनेवाली चन्द्रिकाका पूर्ण आलोक (प्रकाश) है॥138॥
समस्त त्रिभुवन ही-उस हास्यचन्द्रिकाके आलोकमें स्नान किया हुआ :- मधुर हैते सुमधुर, ताहा हैते सुमधुर, ताहा हैते अति सुमधुर। आपनार एककणे, व्यापे सब त्रिभुवने, दशदिक् व्यापे यार पूर॥139॥
अनुवाद—वह मन्द-मुस्कान मधुरसे भी सुमधुर, उससे भी सुमधुर, उससे भी अति सुमधुर है। अपने केवलमात्र एक ही कणसे सम्पूर्ण त्रिभुवनोंमें व्याप्त होकर दसों-दिशाओंको अपने आलोकसे प्रकाशित कर देती है॥139॥
अनुभाष्य—यद्यपि श्रीमुखके एक ओर वह मुस्कान दिखलायी देती है, तथापि गोलोक, परव्योम और
[दायाँ स्तम्भ]
देवीधाम उससे व्याप्त होकर दसों दिशाओंमें प्रकाश भर जाता है॥139॥
श्रीकृष्णके क्रीड़ाविग्रहकी वेणु-माधुरीसे त्रिभुवन उन्मत्त :- स्मित-किरण-सुकर्पूर, पैशे अधर-मधुरे, सेइ मधु माताय त्रिभुवने। वंशीछिद्र आकाशे, तार गुण शब्दे पैशे, ध्वनिरूपे पाञा परिणामे॥140॥
अनुवाद—वह मन्द-हास्य-किरण उत्तम कर्पूरकी भाँति है जो अधरोंकी मधुरतामें प्रवेश कर जाती है। फिर वह मधुरता वंशीके छिद्रोंसे ध्वनिके रूपमें परिणत होकर आकाशके व्याप्त हो जाती है॥140॥
अनुभाष्य—'स्मितकिरण-सुकर्पूर'—मन्द हास्य-किरण रूपी कर्पूरसे। 'पैशे'—प्रवेश करती है॥140॥
श्रीकृष्णकी वंशी-ब्रह्माण्ड, परव्योम और गोलोकके समस्त शुद्धसत्त्वकी, विशेषतः शृङ्गार-रसके आश्रित जनोंकी उन्मादिनी :- से ध्वनि चौदिके धाय, अण्ड भेदि' वैकुण्ठे याय, बले पैशे जगतेर काणे। सबा मातोयाल करि', बलात्कारे आने धरि', विशेषतः युवतीर गणे॥141॥
अनुवाद—वह वंशीध्वनि चारों दिशाओंमें प्रसारित होने लगती है। यद्यपि श्रीकृष्ण इस ब्रह्माण्डमें वंशीवादन कर रहे होते हैं, तथापि उनकी वंशीध्वनि ब्रह्माण्डको भेद करके वैकुण्ठमें प्रवेश करके बलपूर्वक सभी लोगोंके कानोंमें प्रवेश कर जाती है और उन्हें मत्त कर देती है। विशेषतः वह ध्वनि गोलोक-वृन्दावनमें प्रवेश करके व्रजाङ्गनाओंके मनको आकर्षित करके उन्हें जबरदस्ती वहाँ ले जाती है जहाँ श्रीकृष्ण वंशीवादन कर रहे हैं॥141॥
अनुभाष्य—'अण्ड भेदि''—ब्रह्माण्डरूपी प्राकृत-राज्यको भेद करके अप्राकृत वैकुण्ठमें जाती है और बलपूर्वक गोपीजन-जगत्के अर्थात् गोपियोंके कानोंमें प्रवेश करती है॥141॥
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इक्कीसवाँ अध्याय 21/142-145 ] वेणु-माधुरीका प्रभाव :- ध्वनि-बड़ उद्धत, पतिव्रतार भाङ्गे व्रत, पति-कोल हैते टानि' आने। वैकुण्ठेर लक्ष्मीगणे, येइ करे आकर्षणे, तार आगे केबा गोपीगणे ॥ 142 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी वेणुकी ध्वनि बहुत अभिमानी है, वह पतिव्रता-स्त्रियों तकके व्रतको भङ्ग करा देती है। वह ध्वनि उन्हें पतियोंकी गोदसे भी खींचकर ले आती है। उसमें इतना सामर्थ्य है कि वह वैकुण्ठकी लक्ष्मियों तकको भी आकर्षित कर लेती है, तब गोपियोंके विषयमें क्या कहें? ॥ 142 ॥ नीवि खसाय पति-आगे, गृहधर्म कराय त्यागे, बले धरि' आने कृष्णस्थाने। लोकधर्म, लज्जा, भय, सब ज्ञान लुप्त हय, ऐछे नाचाय सब नारीगणे ॥ 143 ॥ अनुवाद—वंशीकी ध्वनि पतियोंके सामने ही गोपियोंके नाड़ेको ढीला कर देती है, गोपियोंके गृह-धर्मका त्याग कराकर उन्हें बलपूर्वक पकड़कर उस स्थानपर ले आती है, जहाँपर श्रीकृष्ण विराजमान होते हैं। उन गोपियोंका लोकधर्म, लज्जा, भयादिका सब ज्ञान लुप्त हो जाता है। श्रीकृष्णकी वंशीध्वनि समस्त नारियोंको अपने इशारोंपर नचाती है॥ 143 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'नीवि'—लहँगेको कमरसे बाँधने वाली डोरी॥ 143 ॥ श्रीकृष्णके अतिरिक्त सभी शब्दोंको स्तम्भित करनेवाली :- काणेर भितर वासा करे, आपने ताँहा सदा स्फुरे, अन्य शब्द ना देय प्रवेशिते। आन कथा ना सुने काण, आन बुझिते बोलय आन, एइ कृष्णेर वंशीर चरिते॥ 144 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥ 144 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'काणेर भितर वासा करे'—'हम गोपियाँ हैं, हमारे कानके भीतर वंशीध्वनि वास करती है अर्थात् सदा कानमें लगी ही रहती है॥' 144 ॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णकी वंशीध्वनि गोपियोंके कानोंमें आवास बनाकर स्वयं ही ध्वनिकी स्फूर्तिसे गोपियोंको उन्मत्त प्राय बनाकर रखती है, तब गोपियोंके कानमें अन्य कोई शब्द प्रवेश नहीं कर पाता और उनका मन कहीं और होनेके कारण वे ठीक-ठीक उत्तर नहीं दे पातीं। श्रीकृष्णकी वंशीध्वनिका ऐसा प्रभाव है कि वह गोपियोंके मनको सम्पूर्ण रूपसे श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य विषयोंसे दूर कर देती है॥ 144 ॥ इक्कीसवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। महाप्रभुका बाह्य दशामें आना, अमानी और मानद-धर्म :- पुनः कहे बाह्यज्ञाने, आन कहिते कहिलुँ आने, कृष्ण-कृपा तोमार उपरे। मोर चित्त-भ्रम करि', निजेश्वर्य-माधुरी, मोर मुखे शुनाय तोमारे ॥ 145 ॥ अनुवाद—कुछ बाह्यज्ञान होनेपर महाप्रभु पुनः कहने लगे—मैं क्या कहते-कहते क्या कह गया? हे सनातन! तुमपर श्रीकृष्णकी कृपा है, इसलिये उन्होंने ही मेरे चित्तको भ्रमित कराके, अपने ऐश्वर्य और माधुर्यकी कथाको मेरे मुखके माध्यमसे तुम्हें सुनाया है॥ 145 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—इस प्रेमके आवेशमें श्रीकृष्णतत्त्व बोलते-बोलते बाह्यज्ञान शून्य होकर महाप्रभुने जिस रससन्दर्भको प्रकाशित किया, यह स्थान उसका वर्णन-स्थल नहीं है। इसलिये वे कह रहे हैं,—"मैं एक विषयमें बोलते हुए अन्य विषयको बोलने लगा, श्रीकृष्णने कृपा करके मेरे चित्तमें भ्रम उत्पन्न कराके अपनी ऐश्वर्य-माधुरी तुम्हें श्रवण करायी है॥ 145 ॥ इक्कीसवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। । 323
[ 21/146-149 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला गोपीभावमें आविष्ट महाप्रभुकी श्रीकृष्णमाधुर्यमें ग्रस्त अपने चित्तकी वश्यता और सौभाग्यको बतलाना :- आमि त' बाउल, आन कहिते आन कहि। कृष्णेर माधुर्यस्रोते आमि याइ बहि' ॥ 146 ॥ अनुवाद—मैं तो पागल (उन्मत्त) हूँ, एक प्रसङ्ग कहते-कहते अन्य प्रसङ्ग कहने लग गया हूँ। ऐसा इसलिये हुआ क्योंकि मैं तो श्रीकृष्णके माधुर्य-स्रोतमें बहता जा रहा हूँ॥" 146 ॥ महाप्रभुका क्षणकालके लिये मौनभाव :- तबे महाप्रभु क्षणेक मौन करि' रहे। मने एक करि' पुनः सनातने कहे॥ 147 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभु एक क्षण तक मौन रहे। मनको स्थिर करके पुनः वे श्रीसनातन गोस्वामीसे कहने लगे॥ 147 ॥ श्रीकृष्णमाधुर्य-श्रवण करनेवालेका श्रीकृष्णप्रेमरूपी सुखमें निमज्जित होना :- कृष्णेर माधुरी आर महाप्रभुर मुखे। इहा येइ सुने, सेइ भासे प्रेमसुखे॥ 148 ॥ अनुवाद—इस अध्यायमें वर्णित श्रीकृष्णकी माधुरी, और उसपर वह महाप्रभुके श्रीमुखसे निःसृत हुई है, इसलिये इसे जो भी श्रवण करता है, वह प्रेमानन्दमें निमज्जित हो जाता है॥ 148॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 149 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे सम्बन्धतत्त्वविचारे श्रीकृष्णैश्वर्यमाधुर्यवर्णनं नाम एकविंशः परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 149 ॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें सम्बन्धतत्त्वविचारमें श्रीकृष्णैश्वर्यमाधुर्यवर्णन-नामक इक्कीसवें अध्यायका अनुवाद समाप्त। 324 ।
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श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला 326 ।
बाइसवाँ अध्याय कथासार-इस बाइसवें अध्यायमें श्रीमन्महाप्रभुने अभिधेय-तत्त्वका वर्णन किया है। महाप्रभुने सर्वप्रथम जीवका तत्त्व, बादमें भक्तिकी श्रेष्ठता और केवल-ज्ञानयोगादिकी अकर्मण्यता एवं भक्ति ही समस्त जीवोंका कर्त्तव्य है, इन सबकी व्याख्या की तथा ज्ञानियोंका मुक्त होनेका अभिमान वृथा है, उसे भी दिखलाया। भुक्ति-मुक्ति-सिद्धिकी कामनाओंका परित्याग करके शुद्ध भक्तियोगसे अभीष्ट अथवा प्रयोजनादि सब कुछ सिद्ध होता है। यद्यपि किसी व्यक्तिके भजनकालमें वे सब कामनाएँ अज्ञानतावशतः कुछ जुड़ी रहती हैं, तथापि श्रीकृष्ण उन्हें दूर करके उस व्यक्तिको शुद्धभक्ति प्रदान करते हैं। महाजनोंकी कृपाके बिना भक्तिका उदय नहीं होता, इसलिये साधुसङ्ग ही आवश्यक कर्त्तव्य है। श्रद्धा ही अनन्यभक्तिमें अधिकार प्रदान करती है। इसके बाद महाप्रभुने उसका और अनन्यभक्तोंके वर्गोंके भेद एवं वैष्णवोंके सभी स्वभावोंका वर्णन किया। स्त्रीसङ्ग और अभक्त-सङ्ग ही असत्सङ्ग है। इन दोनोंका परित्याग करके, वर्णाश्रमकी आसक्तिको छोड़कर श्रीकृष्णके शरणागत होना चाहिये। शरणागतिके छः लक्षणोंकी भी व्याख्या हुई है। साधनभक्ति-वैधी और रागानुगाके भेदसे दो प्रकारकी है। वैधीभक्तिके चौंसठ अङ्ग ही प्रधान हैं; उनमेंसे अन्तिम पाँच अङ्ग ही अत्यन्त बलवान हैं। भक्तिके एक अङ्ग अथवा अनेक अङ्गोंके साधनसे भी फल प्राप्त होता है। ज्ञान-वैराग्य-योगादि कभी भी भक्तिके अङ्ग नहीं है; अहिंसा, यम, नियमादिके लिये कोई पृथक् चेष्टा नहीं करनी पड़ती; वे भक्तिके साथ-साथ ही रहते हैं। रागानुगा भक्ति-रागात्मिका-भक्तिकी ही अनुगामिनी है। ब्रजवासियोंकी रागात्मिका भक्ति ही मुख्य है। रागात्मिका भक्तिके लक्षण बतलाकर महाप्रभुने उसके बाद रागानुगा-भक्तिके साधन-लक्षणोंको बतलाया। -(अमृतप्रवाह भाष्य) कलियुग पावनावतारी प्रेमदाता महाप्रभुको प्रणाम :- वन्दे श्रीकृष्णचैतन्यदेवं तं करुणार्णवम्। कलावप्यतिगूढेयं भक्तिर्येन प्रकाशिता ॥ 1 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिनके द्वारा कलिकालमें भी अतिगूढ़ भक्ति प्रकाशित हुई है, उन करुणाके सागर श्रीकृष्णचैतन्यदेवकी मैं वन्दना करता हूँ॥ 1 ॥ अनुभाष्य- कलौ (धर्मरहिते तर्काश्रितविवादमये युगे) अपि येन (महाप्रभुणा) अतिगूढ़ा (धर्मबहुले सत्यत्रेताद्वापरयुगे सद्धर्मज्ञैरप्यज्ञाता) इयं भक्तिः (हेतुरहिता कृष्णसेवा) प्रकाशिता (साधारण्ये प्रचारिता), तं करुणार्णवं (जीवदयासागरं) श्रीकृष्णचैतन्यदेवम् अहं वन्दे। श्लोक-भावानुवाद-धर्मरहित तर्कप्रधान विवादमय कलियुगमें भी जिन्होंने अतिगूढ़ अर्थात् जो धर्मप्रधान सत्य-त्रेता-द्वापर युगमें केवल सद्धर्मको जाननेवालोंको ही ज्ञात थी, ऐसी अहैतुकी श्रीकृष्णसेवा लक्षणमयी भक्तिका साधारण जीवोंमें प्रचार किया, उन जीवोंके प्रति दयाके सागर श्रीकृष्णचैतन्यदेवकी मैं वन्दना करता हूँ॥ 1 ॥ जय जय श्रीकृष्णचैतन्य नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ 2 ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, श्रीनित्यानन्द । 327
[ 22/2-7 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, सभी गौरभक्तोंकी जय हो॥२॥ समस्त वेदशास्त्रोंमें श्रीकृष्ण ही 'सम्बन्ध'रूपमें निरूपित :- 'एइ त' कहिलुँ सम्बन्ध-तत्त्वेर विचार। वेदशास्त्रे उपदेशे, कृष्ण—एक सार॥३॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,–“अब तक मैंने तुम्हें सम्बन्ध-तत्त्वके विचारको बतलाया है। वेदशास्त्रोंका यही उपदेश है कि श्रीकृष्ण ही एकमात्र सार हैं॥३॥ श्रीसनातन-शिक्षा—(२) अभिधेय (श्रीकृष्णभक्ति)-वर्णन; अभिधेय ही सम्बन्ध और प्रयोजन-प्रदाता :- एबे कहि, शुन, अभिधेय-लक्षण। याहा हैते पाइ—कृष्ण, कृष्णप्रेमधन॥४॥ अनुवाद—हे सनातन, अब मैं उस अभिधेय-लक्षणके विषयमें बतलाता हूँ, जिससे श्रीकृष्ण और श्रीकृष्णप्रेमधनकी प्राप्ति होती है॥४॥ श्रीकृष्णभक्ति ही अभिधेय :- कृष्णभक्ति—अभिधेय, सर्वशास्त्रे कय। अतएव मुनिगण करियाछे निश्चय॥५॥ अनुवाद—सभी शास्त्र श्रीकृष्णभक्तिको ही अभिधेय (लक्ष्य प्राप्तिका उपाय) बतलाते हैं। इसलिये सभी मुनियोंने भी यही निर्धारित किया है॥५॥ श्रुति-स्मृति-पुराण-पञ्चरात्रमें श्रीकृष्णभक्तिको ही विधिके अनुरूप 'अभिधेय' कहा है :- मुनिवाक्य— श्रुतिर्माता पृष्टा दिशति भवदाराधनविधिं यथा मातुर्वाणी स्मृतिरपि तथा वक्ति भगिनी। पुराणाद्या ये वा सहजनिवहास्ते तदनुगा अतः सत्यं ज्ञातं मुरहर भवानेव शरणम्॥६॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—माता-स्वरूप श्रुतिसे जिज्ञासा करनेपर वे आपकी आराधनाकी विधिका उपदेश देती हैं, स्मृति भी बहन-स्वरूप होकर उसी प्रकार उपदेश देती हैं; पुराणादि भी भाईके रूपमें श्रुतिमाताके अनुगत होकर वही कहते हैं। इसलिये हे मुरहर (मुरारि)! आप ही एकमात्र शरण हैं, इसे मैंने सत्यरूपमें जान लिया है॥६॥ अनुभाष्य— माता (मातृवत् हिताभिलाषिणी जीवपालयित्री) श्रुतिः पृष्टा (जिज्ञासिता सती) भवदाराधनविधिं (कृष्णसेवां) दिशति (आज्ञापयति); यथा मातुः (श्रुतेः) वाणी (कथा), तथा भगिनी (श्रुतिमातृ-लाल्या) स्मृतिः अपि वक्ति (प्रकाशयति, कृष्णभक्तिं कथयति); पुराणाद्याः (पुराणागमादयः) ये वा सहजनिवहाः (सहोदराः), ते (अपि) तदनुगाः (मातृभगिन्योः अनुगामिनः सन्तः कृष्णभक्त्युपदेशपराः); अतः हे मुरहर (मुरारे,) भवान् एव [मम] शरणम् [इति] सत्यं [मया] ज्ञातम्। श्लोक-भावानुवाद—हिताभिलाषिणी माताके समान जीवोंका पालन करनेवाली श्रुति जिज्ञासा करनेपर श्रीकृष्णसेवाकी ही आज्ञा देती हैं। श्रुति-माताके द्वारा लालित स्मृतिरूपी बहन भी माताकी वाणीकी भाँति श्रीकृष्णभक्तिकी बात कहती हैं। पुराण-आगमादि भी भ्राताकी भाँति माता और बहनके अनुगामी होकर श्रीकृष्णभक्तिका ही उपदेश देते हैं। इसलिये हे मुरारि! आप ही मेरी शरण हैं, इसे मैंने सत्यरूपमें जान लिया है॥६॥ श्रीकृष्ण और स्वरूपशक्ति एकात्मा होनेपर भी विलासके लिये परस्पर आलिङ्गित :- अद्वयज्ञान-तत्त्व कृष्ण—स्वयं भगवान्। 'स्वरूप-शक्ति'-रूपे ताँर हय अवस्थान॥७॥ अनुवाद—अद्वयज्ञान-तत्त्व श्रीकृष्ण ही स्वयं भगवान् हैं। अद्वय अर्थात् श्रीकृष्ण और उनकी शक्तिमें भेद नहीं होनेके कारण श्रीकृष्ण अपनेसे अभिन्न स्वरूप-शक्तिके रूपमें भी अवस्थान करते हैं॥७॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्ण-अद्वयज्ञान-तत्त्व हैं। शक्ति और 328 ।
बाइसवाँ अध्याय 22/7-15 ] शक्तिमान्-अभेद-तत्त्व हैं। 'शक्ति'-शब्दसे भूलकर भी किसीको जीवके स्वरूपका आवृत करनेवाली मायाशक्तिको नहीं समझना चाहिये। जो शक्ति श्रीकृष्ण-स्वरूपकी सेवामें ही केवलमात्र नियुक्त है, वह स्वरूपशक्ति उस मायाशक्तिसे पृथक् है। स्वरूपशक्ति और स्वरूपशक्तिमान् श्रीकृष्ण अभिन्न रूपमें अवस्थित हैं॥7॥ असंख्य वैकुण्ठोंमें स्वांश विष्णुरूपमें और ब्रह्माण्डोंमें जीवरूपमें लीला-विलास :- स्वांश-विभिन्नांश-रूपे हञा विस्तार। अनन्त वैकुण्ठ-ब्रह्माण्डे करेन विहार॥8॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण स्वांश और विभिन्नांश रूपमें अपना विस्तार करके असंख्य वैकुण्ठों एवं ब्रह्माण्डोंमें विहार करते हैं॥8॥ स्वांश-विलास चतुर्व्यूह और अवतारगण-श्रीकृष्णस्वरूप या शक्तिमान् हैं; जीव-विभिन्नांश या शक्तितत्त्व हैं :- स्वांश-विस्तार-चतुर्व्यूह, अवतारगण। विभिन्नांश जीव-ताँर शक्तिते गणन॥9॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण स्वांशका विस्तार चतुर्व्यूह और अवतारोंके रूपमें करते हैं। विभिन्नांश जीवोंकी गणना श्रीकृष्णकी शक्तिके रूपमें होती है॥9॥ दो प्रकारके जीव :- सेइ विभिन्नांश जीव-दुइ त' प्रकार। एक-'नित्यमुक्त', एक- 'नित्य-संसार' ॥10॥ अनुवाद-वे विभिन्नांश जीव दो प्रकारके हैं। एक-'नित्यमुक्त' और दूसरे 'नित्य-संसार' अर्थात् नित्यबद्ध हैं॥10॥ (1) नित्यमुक्तका चरित्र :- 'नित्यमुक्त'-नित्य कृष्णचरणे उन्मुख। 'कृष्ण-पारिषद' नाम, भुञ्जे सेवा-सुख॥11॥ अनुवाद-'नित्यमुक्त' जीव सदा श्रीकृष्णके उन्मुख रहकर उनके श्रीचरणोंकी सेवा करते हैं, वे श्रीकृष्णके परिकर कहलाते हैं और वे सेवारूपी सुखका आस्वादन करते हैं॥11॥ (2) नित्यबद्ध जीवका चरित्र :- 'नित्यबद्ध' - कृष्ण हैते नित्य-बहिर्मुख। 'नित्यसंसार', भुञ्जे नरकादि-दुःख॥12॥ अनुवाद-'नित्यबद्ध' जीव श्रीकृष्णसे अनादिकालसे बहिर्मुख हैं। इसलिये वे 'नित्यसंसार' अर्थात् भोक्ताभिमानसे सदा संसारमें ही बद्ध हैं और अपने कर्मोंके फलस्वरूप नरकादि दुःखोंका भोग करते हैं॥12॥ श्रीकृष्ण-विमुखताका फल अथवा दण्ड :- सेइ दोषे माया-पिशाची दण्ड करे तारे। आध्यात्मिकादि तापत्रय तारे जारि' मारे॥13॥ काम-क्रोधेर दास हञा तार लाथि खाय। भ्रमिते भ्रमिते यदि साधु-वैद्य पाय॥14॥ उद्धारका उपाय :- ताँर उपदेश-मन्त्रे पिशाची पलाय। कृष्णभक्ति पाय, तबे कृष्ण-निकट याय॥15॥ अनुवाद-श्रीकृष्णसे बहिर्मुखतारूपी दोषके कारण माया-पिशाची बद्धजीवोंको दण्डित करती है। वह उन्हें आध्यात्मिकादि (देह और मनके द्वारा प्रदत्त, दूसरे प्राणियोंके द्वारा प्रदत्त और दैविक प्रकोपके द्वारा प्रदत्त) तीन प्रकारके तापोंमें झुलसाकर कष्ट प्रदान करती है। बद्धजीव कामका दास बनकर और जब काम पूर्तिमें बाधा आती है, तब उससे उत्पन्न क्रोधका दास बनकर मायाकी ठोकरें खाता है। इस प्रकार ठोकरें खाते-खाते यदि उसे साधुरूपी वैद्यकी प्राप्ति होती है, तब साधुके उपदेशरूपी मन्त्रके द्वारा माया-पिशाची दूर भाग जाती है और वह जीव श्रीकृष्णभक्तिको प्राप्त करता है। भक्तिके प्रभावसे तब वह श्रीकृष्णके निकट पहुँच जाता है॥13-15॥ । 329
[ 22/8-18 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अमृतप्रवाह भाष्य—'स्वांश-रूपे'—अर्थात् चतुर्व्यूह हुई) और मेरी लज्जाकी भी उपशान्ति नहीं हुई। हे और उनके अवतारोंके रूपमें। स्वांश-अवस्थामें यदुपते! अन्तमें मैं उन्हें परित्याग करके सद्बुद्धि प्राप्त श्रीकृष्णका स्व-स्वरूपत्व सर्वत्र लक्षित होता है। करके आपके अभयचरणोंमें शरणागत हुआ हूँ, आप जीव—उनके विभिन्नांश रूप हैं। जीव भी श्रीकृष्णकी अब मुझे अपने दासके रूपमें नियुक्त करो॥16॥ शक्तिरूपमें गिने जाते हैं। जीव दो प्रकारके हैं—नित्यमुक्त अनुभाष्य— और नित्यसंसार (बद्ध)। नित्यमुक्त जीवोंने कभी भी कामादीनां (कामक्रोधलोभमोहमदमात्सर्यादीनां) दुर्निदेशाः (दुष्टाः मायाके सम्बन्धका आस्वादन नहीं किया। वे श्रीकृष्णके आदेशाः) कतिधा (प्रकाराः) मया कति न पालिताः (अपि चिन्मय धाममें श्रीकृष्णचरणोंके उन्मुख रहकर तु पालिता एव); तेषां (कामादिरिपूणां) मयि करुणा (दया) 'श्रीकृष्ण-पार्षद'-नामसे जाने जाते हैं और श्रीकृष्णसेवा- न, त्रपा (ममापि लज्जा) न, उपशान्तिः (मम तद्विसर्जनेच्छापि) सुख ही उनका भोग है। नित्यबद्ध सभी जीव श्रीकृष्णसे न च जाता। अथ (अनन्तरं) हे यदुपते, साम्प्रतम् (इदानीं) नित्य बहिर्मुख रहकर संसारमें स्वर्ग-नरकादि सुख- तान् (कामादीन्) उत्सृज्य (रिपु-पारवश्यं त्यक्त्वा) लब्धबुद्धिः दुःखका भोग करते हैं। श्रीकृष्ण-बहिर्मुखता दोषके लिये (अभिज्ञः सन्) अभयम् (अकुतोभयं) त्वां शरणम् आयातः माया-पिशाची उन्हें स्थूल और सूक्ष्म आवरणमें बाँधकर (प्राप्तः); माम् आत्मदास्ये (निजकैङ्कर्ये) नियुङ्क्ष्व (नियोजय)। दण्ड प्रदान करती है अर्थात् आध्यात्मिकादि तीन श्लोक-भावानुवाद—काम-क्रोध-लोभ-मोह-मद- प्रकारके ताप उन्हें बहुत ही जर्जरित करते हैं। वे मात्सर्य आदिके कितने दुष्ट आदेशोंका मैंने कितनी काम-क्रोधादि छः तरङ्गोंके वशीभूत होकर मायारूपी प्रकारसे पालन किया है, तो भी वे मेरे प्रति दया नहीं पिशाचीकी लातें खाते रहते हैं—यही जीवोंका रोग है। करते और [निर्लज्जकी भाँति उनकी सेवा करते हुए] संसारमें इस प्रकार ऊपर-नीचे (स्वर्ग-नरकमें) भ्रमण न ही मेरी लज्जा त्याग करनेकी इच्छा होती है। हे करते-करते जीव यदि कभी साधुरूपी वैद्यको प्राप्त यदुपते! अन्तमें अब मैं उन कामादि शत्रुओंकी करता है, तब उनके उपदेशरूपी मन्त्रसे माया-पिशाची वश्यताको त्यागकर सद्बुद्धि प्राप्त करके आपके भाग जाती है और जीव भी श्रीकृष्णभक्ति प्राप्त करके अभयचरणोंकी शरणमें आया हूँ, कृपा मुझे अपने श्रीकृष्णके निकट पहुँच जाता है॥8-15॥ दासके रूपमें नियुक्त कीजिये॥16॥
शरणागतकी प्रार्थना :- भक्ति ही निरपेक्ष अभिधेय और
भक्तिरसामृतसिन्धु (3/2/25)— कर्मज्ञानयोगादि भक्ति-सापेक्ष :-
कामादीनां कति न कतिधा पालिता दुर्निदेशा- कृष्णभक्ति हय अभिधेय-प्रधान। स्तेषां जाता मयि न करुणा न त्रपा नोपशान्तिः। भक्तिमुख-निरीक्षक कर्म-योग-ज्ञान॥17॥ उत्सृज्यैतानथ यदुपते साम्प्रतं लब्धबुद्धि- भक्तिके आश्रयके बिना कर्मज्ञानयोगादिकी निष्फलता :- स्त्वामायातः शरणमभयं मां नियुङ्क्ष्वात्मदास्ये॥16॥ एइ सब साधनेर अति तुच्छ बल। कृष्णभक्ति बिना ताहा दिते नारे फल॥18॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥16॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे भगवन्, कामादिके कितने ही अनुवाद—श्रीकृष्णभक्ति ही प्रधान अभिधेय है। प्रकारके दुष्ट आदेशोंका ही मैंने (कितनी प्रकारसे) कर्म-योग-ज्ञान संसारसे मुक्तिके उपाय हैं, परन्तु फल पालन किया है। तथापि मेरे प्रति उनकी करुणा (नहीं देनेमें ये सब भक्तिपर निर्भर करते हैं। इस सब साधनोंका बल अति तुच्छ है और भक्तिके बिना ये
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बाईसवाँ अध्याय 22/17-20 ] स्वतन्त्ररूपसे फल देनेमें असमर्थ हैं॥17-18॥ अमृतप्रवाह भाष्य—शास्त्रोंमें अनेक स्थानोंपर कर्मको, अनेक स्थानोंपर योगको और अनेक स्थानोंपर ज्ञानको ‘अभिधेय’ कहकर वर्णन किया गया है; तथापि सर्वत्र भक्तिको ही सर्वप्रधान ‘नित्य अभिधेय’ कहा गया है। इसका तात्पर्य यह है कि श्रीकृष्णभक्ति ही परमपुरुषार्थ (प्रेम)को प्राप्त करनेका एकमात्र प्रधान अर्थात् 'साक्षात्' अभिधेय है; कर्म, योग और ज्ञानको जो अभिधेय रूपमें कहा है, वह—'गौण' है; क्योंकि, भक्तिके मुखकी अपेक्षा करके ही वे जो कुछ भी फलादि प्रदान कर सकते हैं। भक्तिके आश्रयके बिना कर्म, योग और ज्ञान कोई भी फल नहीं दे सकते। भक्तिका आश्रय प्राप्त करनेपर ही कर्म और हठ-योग भुक्ति-फल एवं ज्ञान और राजयोग मुक्ति और सिद्धि-फल दे सकते हैं॥17-18॥ भक्तिविहीन शुष्कज्ञान या निष्काम कर्म भी व्यर्थ :— श्रीमद्भागवत (1/5/12)में— नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाव-वर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम्। कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वरे ना चार्पितं कर्म यदप्यकारणम्॥19॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥19॥ अमृतप्रवाह भाष्य—नैष्कर्म्यरूपी निर्मलज्ञान ही जब अच्युत भक्तिसे वर्जित होनेपर शोभा नहीं पाता, तब सदैव अभद्र (अशुभ) स्वभाववाले कर्म ईश्वरमें अर्पित नहीं होनेपर निष्काम होनेपर भी किस प्रकार शोभा पा सकते हैं?॥19॥ अनुभाष्य—श्रीव्यासदेवके द्वारा बहुत तप-अनुष्ठान और सभी शास्त्रोंका प्रणयन आदि करनेपर भी उनका चित्त प्रसन्न नहीं हुआ और वे सरस्वती नदीके तटपर अप्रसन्न चित्तसे मन-ही-मनमें अनेक प्रकारके तर्क-वितर्क और खेद कर रहे थे, तब उनके अन्तर्यामी गुरुदेव श्रीनारद गोस्वामी वहाँ आकर उपस्थित हुए। व्यासदेवने उनसे अपनी आत्माकी प्रसन्नताके अभावके कारणकी जिज्ञासा की, तब श्रीनारद कर्म और ज्ञान आदि सभी मार्गोंकी अपेक्षा शुद्ध हरिभक्तिके माहात्म्यका वर्णन कर रहे हैं— अच्युतभाववर्जितम् (अच्युते कृष्णे भाववर्जितम् अनुकूलानुशीलनविहीनं चेत्) निरञ्जनं (निरुपाधिकं निर्मलमिति यावत्) नैष्कर्म्य (फलभोगराहित्यम् अपि) ज्ञानम् अलम् (अत्यर्थं) न शोभते (सम्यक् मोक्षाय न कल्पते); पुनः तथा शश्वत् (सर्वसमये साधनकाले प्राप्तिकाले च अतएव) अभद्रं (दुःखात्मकं) यत् च अकारणं कर्म (प्रवृत्तिपरं काम्य यद्यपि निवृत्तिपरम् अकाम्यं तच्चापि कर्म) ईश्वरे (विष्णौ) न अर्पितं (नोद्दिष्टं सत्) कुतः [शोभते? नैव हीति भावः]। श्लोक-भावानुवाद—श्रीकृष्णके अनुकूल अनुशीलनसे विहीन फलभोगरहित निर्मलज्ञान ही जब शोभा नहीं पाता, तब जो सदैव (अर्थात् साधनकाल और फलप्राप्तिकाल, दोनोंमें) दुःख प्रदान करनेवाला है, वह कर्म विष्णुमें अर्पित नहीं होनेपर निष्काम होनेपर भी किस प्रकार शोभा पा सकता है? अर्थात् नहीं पा सकता—यह भाव है॥ ॥19॥ श्रीकृष्णको अर्पित किये बिना समस्त प्रकारके कर्मकाण्ड—संसारजनक :— श्रीमद्भागवत (2/4/17)में— तपस्विनो दानपरा यशस्विनो मनस्विनो मन्त्रविदः सुमङ्गलाः। क्षेमं न विन्दन्ति बिना यदर्पणं तस्मै सुभद्रश्रवसे नमो नमः॥20॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥20॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सभी तपस्वी, सभी दान-परायण व्यक्ति, सभी यशस्वी व्यक्ति, मनस्वी व्यक्ति, वेदोंके मन्त्रोंको जाननेवाले सभी व्यक्ति, उनके द्वारा किये गये वे कर्म सुमङ्गल होनेपर भी, जिन्हें अर्पण नहीं करनेसे कुछ भी मङ्गल प्राप्त नहीं कर सकते, उन सुभद्रश्रवा । 331
[ 22/20-22 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (मङ्गलकीर्तिवाले) भगवान्को पुनः पुनः नमस्कार करता हूँ॥ 20 ॥ अनुभाष्य—परीक्षितके द्वारा मायाधीश श्रीहरिकी सृष्टि आदि लीलाके सम्बन्धमें जिज्ञासा करनेपर, श्रीशुकदेव श्रीहरि और उनकी सेवाके माहात्म्यका वर्णन कर रहे हैं— तपस्विनः (तपोनिरताः ज्ञानिनः) दानपराः (वदान्याः) यशस्विनः (कीर्त्तिमन्तः) मनस्विनः (योगिनः) मन्त्रविदः (निगमागमविदः) सुमङ्गलाः (सदाचाराः) यदर्पणं (यस्मिन् श्रीहरौ पूर्वोक्त- तपादिना स्व-स्व-प्राप्यफलसमर्पणं) बिना (ऋते) क्षेमं (कल्याणं) न विन्दन्ति (न प्राप्नुवन्ति), तस्मै सुभद्रश्रवसे (मङ्गलकीर्त्तिविग्रहाय भगवते श्रीहरये) नमो नमः। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 20 ॥ भक्तिविहीन ज्ञान मुक्तिप्रद नहीं; मुक्ति-भक्तिकी दासी :- केवल ज्ञान 'मुक्ति' दिते नारे भक्ति बिना। कृष्णोन्मुखे सेइ मुक्ति हय ज्ञान बिना॥ 21 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 21 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-“ज्ञानतः सुलभा मुक्तिः”-इस शास्त्रवचनसे जाना जाता है कि ज्ञान ही मुक्ति दे सकता है, किन्तु उसमें एक गूढ़ बात यह है कि भक्तिके आश्रयसे ही ज्ञान मुक्ति दिया करता है। पक्षान्तरमें, श्रीकृष्णोन्मुखी भक्तिके उदित होनेपर किसी भी प्रकारकी ज्ञानकी चेष्टा नहीं करनेपर भी मुक्ति स्वयं ही उपस्थित होती है॥ 21 ॥ अनुभाष्य-केवल-ज्ञान अर्थात् भक्तिरहित सम्विद् वृत्तिका अनुभव जीवको जड़-बन्धनसे मुक्त नहीं करा सकता। ब्रह्मको जाननेके लिये जीव कितना ही (संसारकी सभी वस्तुओंको नकारते हुए) यह ब्रह्म नहीं है, यह ब्रह्म नहीं है क्यों न करे, उसमें श्रीकृष्ण-स्वरूपकी अज्ञानताके कारण अहंग्रहोपासना (जिसकी मैं उपासना कर रहा हूँ, मैं वही हूँ, यह बुद्धि) ही प्रबल हो जाती है और वह अधःपतित हो जाता है। ज्ञानानुशीलन नहीं करनेपर भी श्रीकृष्णकी सेवामें तत्पर होनेपर वह जीव ज्ञानके फल जड़-बन्धनसे मुक्ति प्राप्त करके श्रीकृष्णके स्वरूपके अनुभवको प्राप्त करता है। श्रीकृष्णकर्णामृतमें- “भक्तिस्त्वयि स्थिरतरा भगवन् यदि स्याद्देवेन न फलति दिव्य-किशोरमूर्त्तिः। मुक्तिः स्वयं मुकुलिताञ्जलिः सेवतेऽस्मान् धर्मार्थकामगतयः समय-प्रतीक्षाः॥” [अर्थात् “हे भगवन्! आपमें यदि हमारी अचला भक्ति रहे, तब आपकी अप्राकृत किशोरमूर्ति स्वतः ही हमारे हृदयमें उदित होती है। उस समय मुक्ति स्वयं हाथ जोड़कर हमारी सेवामें रत होती है और धर्म, अर्थ और काम भी सेवाके लिये आदेशके समयकी प्रतीक्षा करते हैं।”]॥ 21 ॥ भक्तिमार्गमें ही एकमात्र नित्य कल्याण, उसके अतिरिक्त शुष्क ज्ञानसे वृथा परिश्रम ही सार (फल) :- श्रीमद्भागवत (10/14/4)में— श्रेयःसृतिं भक्तिमुदस्य ते विभो क्लिश्यन्ति ये केवलबोधलब्धये। तेषामसौ क्लेशल एव शिष्यते नान्यद् यथा स्थूलतुषावघातिनाम्॥ 22 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 22 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे विभो! आपमें भक्ति ही कल्याणका पथ है, उसे परित्याग करके जो सब व्यक्ति केवल ज्ञान प्राप्तिके लिये अर्थात् 'मैं ब्रह्म' हूँ, इसको ही स्थिर रूपमें जाननेके लिये अनेक प्रकारके कष्ट स्वीकार करते हैं, खाली भूसीको पीसनेवालोंको जिस प्रकार चावल नहीं मिलते, उसी प्रकार, उन्हें अन्तमें क्लेशमात्र ही प्राप्त होता है॥ 22 ॥ अनुभाष्य-बछड़ोंको हरण करनेके फलस्वरूप श्रीकृष्णके द्वारा ब्रह्माके अभिमानके चूर्ण होनेपर ब्रह्मा श्रीकृष्णके एकान्त शरणागत होकर स्तव कर रहे हैं- हे विभो (भगवन्), ये (जनाः आरोहवादि-तर्कपन्थिनः) श्रेयःसृतिं (श्रेयसां अभ्युदयापवर्गलक्षणानां सृतिं सरणं मार्गभूतां) ते (तव) भक्तिं (शुद्धभजनम्) उदस्य (त्यक्त्वा) केवलबोधलब्धये 332 |
बाइसवाँ अध्याय 22/22-28 ] (भक्तिरहितज्ञानमात्र-प्राप्तये) क्लिश्यन्ति (वैराग्यतपः-क्लेशादिकं स्वीकुर्वन्ति), तेषां (निर्भेद-ब्रह्मवादि-शुष्क-ज्ञानिनां) यथा स्थूलतुषावघातिनां (शस्यानन्तःकणहीनान् स्थूल-धान्याभासान् तुषान् अवघ्नतां यथा व्यर्थश्रमः एव भवति, तथा) असौ (शास्त्राभ्यास-षट्क-साधनादिजनितः) क्लेशालः (क्लेशः व्यर्थश्रमः) एव शिष्यते (अवशिष्यते) न अन्यत् (तेषां न किञ्चित् तदितरं फलम्—तेषां ज्ञानप्राप्तिरपि दुर्लभा एवेत्यर्थः) । श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 22 ॥ भगवान्के शरणागतकी ही मायासे मुक्ति :- श्रीमद्भगवद्गीता (7/14)में— दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥ 23 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 23 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यह माया मेरी ही शक्ति है, इसलिये दुर्बल जीवके लिये स्वभावतः ही इसका अतिक्रम करना अति कठिन है। जो मेरे भगवत्- स्वरूपकी शरणागति स्वीकार करते हैं, केवल वे ही इस माया समुद्रसे पार हो सकते हैं ॥ 23 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 20/121 संख्या देखें ॥ 23 ॥ जीवके संसार-बन्धनका कारण :- ‘कृष्ण-नित्यदास’—जीव, ताहा भुलि’ गेल। एइ दोषे माया तार गिलाय बान्धिल ॥ 24 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 24 ॥ अनुभाष्य—'जीव श्रीकृष्णका नित्यदास है'—इस सत्यको भूलनेके कारण ही मायाने जीवको अनेक प्रकारसे लुब्ध और विमोहित करके तीन गुणोंकी बेड़ीसे उसके गलेको बाँध रखा है। इस कारण बद्धजीवका भोगवासनारूपी मायिक-बेड़ीके बन्धनसे छूट पाना कठिन है ॥ 24 ॥ उद्धार और प्रयोजनकी प्राप्तिका एकमात्र उपाय :- ताते कृष्ण भजे, करे गुरुर सेवन। मायाजाल छुटे, पाय कृष्णेर चरण ॥ 25 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 25 ॥ अनुभाष्य—गुरुसेवा और श्रीकृष्णभजनके बलसे ही बद्धजीव मायाजालसे मुक्त होकर श्रीकृष्णके चरणकमलोंको प्राप्त करता है ॥ 25 ॥ भक्तिविहीन वर्णाश्रमधर्मके पालनसे नरककी प्राप्ति :- चारि वर्णाश्रमी यदि कृष्ण नाहि भजे। स्वकर्म करिते से रौरवे पड़ि’ मजे ॥ 26 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 26 ॥ अनुभाष्य—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र अपने- अपने वर्ण धर्मका भली-भाँति पालन करनेपर भी, अथवा ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी अपने- अपने आश्रमधर्मका भली-भाँति पालन करनेपर भी यदि वे श्रीकृष्णभजन नहीं करते, तब वे लौकिक अभिमानके कारण उच्च अवस्था प्राप्त करनेपर भी अन्तमें पुण्यके क्षय होनेपर रौरव नामक नरकमें अवश्य ही पतित होते हैं। अप्राकृत भक्तिके अनुशीलनके अतिरिक्त विषयी वर्णाश्रमीका कोई भी मङ्गल नहीं हो सकता ॥ 26 ॥ दैववर्णाश्रम-धर्मकी उत्पत्ति :- श्रीमद्भागवत (11/5/2-3)में— मुखबाहूरुपादेभ्यः पुरुषस्याश्रमैः सह। चत्वारो जज्ञिरे वर्णा गुणैर्विप्रादयः पृथक् ॥ 27 ॥ भक्तिके प्रतिकूल आसुरी-वर्णाश्रमीको नरककी प्राप्ति :- य एषां पुरुषं साक्षादात्मप्रभवमीश्वरम्। न भजन्त्यवजानन्ति स्थानाद्भ्रष्टाः पतन्त्यधः ॥ 28 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 27-28 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—ब्रह्माके मुखसे 'ब्राह्मण', भुजासे 'क्षत्रिय', जङ्घासे 'वैश्य' और पैरोंसे 'शूद्र'—ये चार वर्ण पृथक् पृथक् आश्रमोंके साथ और अपने वर्णगत गुणोंके साथ उत्पन्न हुए थे। इन चारों वर्णाश्रमियोंमेंसे जो अपने प्रभु भगवान् विष्णुका साक्षात् भजन नहीं करके, अपने-अपने वर्णाश्रमके अहङ्कारके कारण उनके भजनमें । 333
[ 22/27-30 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अवज्ञा करते हैं, वे अपने स्थानसे भ्रष्ट होकर अधःपतित हो जाते हैं॥27-28॥ अनुभाष्य-श्रीनारद श्रीवसुदेवको श्रीभागवत धर्मका वर्णन करते हुए विदेहराज निमि और नवयोगेन्द्र-संवादका वर्णन कर रहे हैं; 'हरिभजन विमुख गोदास (इन्द्रियोंके दास)की क्या गति होती है?'-महाराज निमिके इस प्रश्नके उत्तरमें नवयोगेन्द्रोंमेंसे एक चमस ऋषि निम्नलिखित दो श्लोकोंमें भक्तिके अनुकूल दैव-वर्णाश्रम-सृष्टि और उसके व्यभिचारीकी दुरावस्थाका वर्णन कर रहे हैं- पुरुषस्य (भगवतः वैराजस्य ब्रह्मणः) मुखबाहूरुपादेभ्यः गुणैः (सत्त्वरजस्तमोगुणैः) आश्रमैः (ब्रह्मचारिगृहस्थवानप्रस्थ- भिक्षुकाक्रमचतुष्टयैः) सह पृथक् विप्रादयः (ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्राः) चत्वारः वर्णाः जज्ञिरे। एषां (विप्रक्षत्रियवैश्यशूद्राणां ब्रह्मचारिगृहस्थवानप्रस्थयतीनां मध्ये) ये (जनाः) साक्षात् आत्मप्रभवम् (आत्मनः प्रभवः जन्म प्राकट्यं वा, यस्मात् तम्) ईश्वरम् [अज्ञात्वा कृतघ्नाः सन्तः] न भजन्ति, अवजानन्ति (ज्ञात्वापि वर्णाश्रम- मर्यादा-मदभरेण कृष्णभजनस्यावश्यकता नास्तीति मन्यमानाः द्विषन्ति), [ते हरि-गुरु-वैष्णव-सेवा-विहीनाः] स्थानात् (स्व-स्व-वर्णाश्रमात्) भ्रष्टाः (सन्तः) अधःपतन्ति (निरयं यान्ति); [यतः प्राकृतवर्णाश्रमधर्मः अनित्यः कालक्षुब्धश्च तात्कालिक-फलोपयोगी असच्छब्द-वाच्यश्च]। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। [जो प्राकृतवर्णाश्रमधर्म है, वह केवल अनित्य और क्षणिक-फलकी प्राप्तिके लिये उपयोगी है, अतः उसे असत्-धर्म ही कहा जायेगा।]॥ 27-28॥ भक्ति-रहित मुक्ताभिमानी ज्ञानी भी अशुद्ध-मनोधर्मी, शुद्धभक्त ही निर्मल आत्मधर्मी :- ज्ञानी जीवन्मुक्तदशा पाइनु करि' माने। वस्तुतः बुद्धि 'शुद्ध' नहे कृष्णभक्ति बिने॥29॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें॥29॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मायावादादि मतावलम्बी व्यक्ति आपने आपको 'ज्ञानी' कहते हैं, किन्तु वास्तवमें श्रीकृष्णभक्तिके बिना बुद्धि शुद्ध नहीं होती॥ 29 ॥ अनुभाष्य-यद्यपि ज्ञानी मान सकते हैं, - 'मैं जीवनकालमें ही संसार-बन्धनसे मुक्त हो गया हूँ', तथापि श्रीकृष्णभक्तिके अतिरिक्त अहंग्रहोपासनासे बुद्धि शुद्ध नहीं हो सकती। क्योंकि मुक्तिकामी व्यक्ति जीवित अवस्थामें अपने आपको बद्ध जानकर उससे मुक्त और मुक्त-अवस्था जानकर उसके अतिरिक्त दृश्य वस्तुओंमें बद्ध मानता है, इसलिये वह ऐसे अनित्य भावसमूहके हाथोंसे मुक्त नहीं हो पाता॥ 29 ॥ श्रीकृष्णभक्तिरहित शुष्कज्ञानीको अधोगतिकी प्राप्ति :- श्रीमद्भागवत (10/2/32) में- येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिनस्त्वय्य- स्तभावादविशुद्धबुद्धयः। आरुह्य कृच्छ्रे पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रयः॥30॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 30 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे कमलनयन, जो 'मैं विमुक्त हो गया हूँ, ऐसा कहकर अभिमान करते हैं, वे आपमें भक्तिरहित होनेके कारण अशुद्ध बुद्धिवाले हैं। वे बहुत कष्ट करके मायासे अतीत परमपद ब्रह्म तक आरोहण करके भी भगवद्भक्तिके अनादरके कारण अधःपतित होते हैं॥ 30॥ अनुभाष्य-कंसके कारागारमें बद्ध देवकीके गर्भमें आविर्भूत होनेपर ब्रह्मादि देवता 'गर्भस्तोत्र'-नामसे प्रसिद्ध स्तवसे भगवान्की स्तुति कर रहे हैं- हे अरविन्दाक्ष, (पद्मपलाशलोचन,) अन्ये (अभक्ताः जनाः) ये विमुक्तमानिनः (विमुक्ताः-ज्ञानिनः वयमिति मन्यमानाः) त्वयि (भगवति) अस्तभावात् (अस्तः निरस्तः अतएव असन् यः भावः तस्मात्, भक्तेरभावात् तदनुशीलनराहित्यात्) अविशुद्धबुद्धयः (न विशुद्धा बुद्धिः येषां ते तथा, मुक्तिपिशाचीं बहुमन्यमानाः ज्ञानजनित-कैतव-कल्मषकषाय-दुष्टमतयः इत्यर्थः) कृच्छ्र स्वामिचरणाः, मोक्षपीठादव्यवहितप्रदेशम्) आरुह्य (अधिरुह्य) अनादृतयुष्मदङ्घ्रयः (न आदृतौ युष्मदङ्घ्री यैः ते, तव पादपद्मानित्यसेवयाः अनादरेण अपराधवशात् कृष्णकृपारज्जुविच्छिन्नाः 334 ।
बाइसवाँ अध्याय 22/30-32 ]
सन्तः) ततः (परमोच्चज्ञानाख्य-पीठाप्रान्तात्) अधः पतन्ति (अज्ञानान्धकारे संसार-तमिस्रे निमज्जन्ति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ ३० ॥ श्रीकृष्ण-दर्शनमें मायाका दर्शन नहीं, माया-दर्शनमें श्रीकृष्णका दर्शन नहीं :— कृष्ण—सूर्यसम, माया हय अन्धकार। याँहा कृष्ण, ताँहा नाहि मायार अधिकार ॥ ३१ ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण सूर्यके समान हैं और माया अन्धकार सदृश है। जहाँपर श्रीकृष्ण हैं, वहाँ मायाका अधिकार नहीं हो सकता ॥ ३१ ॥ अनुभाष्य—भागवतमें चतुःश्लोकीमें लिखा हुआ है— “ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि। तद्विद्यादात्मनो मायां यथा भासः यथा तमः॥” [अर्थात् “वास्तव प्रयोजन तत्त्वके अतिरिक्त जो कुछ भी प्रतीत होता है अथवा सत्तायुक्त होनेपर भी मेरे अधिष्ठानमें जिसकी प्रतीति नहीं है, उसे ही मेरी माया समझो।”] प्रकाशके रहनेपर जिस प्रकार अन्धकार नहीं रहता, उसी प्रकार जीव श्रीकृष्णोन्मुख होनेपर मायिक वासनाओंके हाथसे मुक्त हो जाता है। श्रीकृष्णभक्तके अतिरिक्त ज्ञानी, कर्मी और अन्याभिलाषी व्यक्तिको माया ग्रास करती है ॥ ३१ ॥
दुर्बुद्धि व्यक्ति 'मैं', 'मेरा' इस प्रकारकी बहुतसी बातोंके जालको प्रकाशित करते हैं ॥ ३२ ॥ अनुभाष्य—यहाँपर पाठान्तरमें (भाः 2/7/47) श्लोक उद्धृत हुआ है— “शश्वत् प्रशान्तमभयं प्रतिबोधमात्रं शुद्धं समं सदसतः परमात्मतत्त्वम्। शब्दो न यत्र पुरुकारकवान् क्रियार्थो माया परैत्यभिमुखे च विलज्जमाना। तद्वै पदं भगवतः परमस्य पुंसो ब्रह्मेति यद्विदुरजस्रसुखं विशोकम्॥” अर्थात् “मुनिगण जिस वस्तुको 'बृहत् निर्विकल्प-ब्रह्म' कहकर जानते हैं, वही परम-पुरुष भगवान्का प्रथम प्रतीति-स्वरूप है। यह ब्रह्म निरन्तर-सुख-युक्त, शोकरहित, नित्य-प्रशान्त, भेदशून्य, अभय, ज्ञानैकरस, शुद्ध, विषयकरण-सङ्गशून्य, परमात्म-तत्त्व, उत्पत्ति आदि चार प्रकारके क्रियाफलोंका प्रकाशक है। कर्मकाण्डीय-शब्द-कार्य उनका बोध करानेवाला नहीं हो सकता और माया उनके सामने जानेमें लज्जा अनुभव करती है और उनसे दूर भाग जाती है।” देवर्षि नारदके द्वारा लोकपितामह ब्रह्माको तपस्यामें प्रवृत्त देखकर उनके अतिरिक्त भी जो एक स्वतन्त्र सर्वेश्वरेश्वर नियन्त्रण करनेवाला है, उसके विषयमें जिज्ञासा करनेपर ब्रह्मा उन परमात्मा श्रीहरिकी लीला और मायाके द्वारा सृष्टि आदिका वर्णन कर रहे हैं— यस्य (भगवतः) ईक्षापथे (नेत्रगोचरे) स्थातुं विलज्जमानया (मत्कपटोऽसौ प्रभुर्जानातीति लज्जायुक्तया) अमुया (मायया) विमोहिताः (मुग्धाः) दुर्धियः (अविद्यावृत्तज्ञानाः असद्वियः जीवाः एव केवलं) 'मम' 'अहम्' इति [एतत्] विकत्थन्ते (आत्मानं श्लाघ्यन्ते) [तस्मै नमः इति पूर्वेणान्वयः]।
दासी मायाको अपने प्रभुके सामने खड़े होनेमें लज्जा, दूसरी ओर, प्रभुसे विमुख लोगोंको विपरीत बुद्धि देकर कारागारमें बन्द करनेवाली :— श्रीमद्भागवत (2/5/13)में— विलज्जमानया यस्य स्थातुमीक्षापथेऽमुया। विमोहिता विकत्थन्ते ममाहमिति दुर्धियः ॥ ३२ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ ३२ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णके सामने आनेपर माया लज्जित होती है। उस मायाके द्वारा विमोहित होकर श्लोक-भावानुवाद—श्रीकृष्णके सामने आनेपर माया यह सोचकर कि मेरे प्रभु मेरी कपटता जानते हैं, इसलिये लज्जित होती है। उस मायाके द्वारा विमोहित होकर विपरीत बुद्धिग्रस्त व्यक्ति 'मैं', 'मेरा' इस प्रकार कहकर अपनी प्रशंसा करते हैं ॥ ३२ ॥
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[ 22/33–36 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला आत्मनिवेदनकारी सम्बन्धज्ञान-प्राप्त साधककी अनर्थ-निवृत्ति :- 'कृष्ण, तोमार हङ' यदि बले एकबार। मायाबन्ध हैते कृष्ण तारे करे पार ॥ 33 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 33 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो सब समय केवल मुखसे अभ्यासवशतः “कृष्ण मैं तुम्हारा हूँ”—यह बात बार-बार बोलते हैं, उनकी यह बात सहृदय (सरल) नहीं हैं; किन्तु जो एकबार भी सहृदय (काय-मन और वचनसे) “हे कृष्ण, मैं—आपका दास हूँ”—यह बात कहते हैं, उन्हें श्रीकृष्ण मायाके बन्धनसे पार करते हैं ॥ 33 ॥ परमदयालु श्रीकृष्णकी आश्वासन देनेवाली वाणी :- हरिभक्तिविलास (11/337)में उद्धृत श्लोक, रामायणके लङ्काकाण्ड (18/33)में विभीषणके साथ मिलनके सम्बन्धमें श्रीरामचन्द्रने सुग्रीवसे कहा— सकृदेव प्रपन्नो यस्तवास्मीति च याचते। अभयं सर्वदा तस्मै ददाम्येतद्व्रतं मम ॥ 34 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 34 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मेरा यह व्रत है कि यदि कोई वास्तवमें शरणागत होकर एकबार भी “मैं तुम्हारा हूँ” यह कहकर मुझसे अभयकी याचना करता है, तब मैं उसे सदैव अभय प्रदान करता हूँ ॥ 34 ॥ अनुभाष्य— यः (जनः) प्रपन्नः (शरणागतः सन्) तवास्मि (त्वया सह नित्यदास्यसूत्रे आबद्धः भवामि) इति सकृदेव (बारमेकं) च याचते (काकुयुक्तं प्रार्थयते), अहं (दाशरथिः भगवान्) तस्मै सर्वदा अभयं ददामि,—एतत् (एव) मम व्रतं (प्रतिज्ञातम्)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 34 ॥ सकाम अशान्त पुरुषोंको निरन्तर भजनके फलसे शान्तिकी प्राप्ति :- मुक्ति-भुक्ति-सिद्धिकामी 'सुबुद्धि' यदि हय। गाढ़-भक्तियोगे तबे कृष्णेरे भजय ॥ 35 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 35 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—दुर्वासना और दुःसङ्गके कारण जीवकी मुक्ति, भुक्ति और सिद्धि-कामनाएँ उदित होती हैं। यदि किसी सत्सङ्गसे सुबुद्धि उदित होती है, तब वह जीव मुक्ति-भुक्ति-सिद्धिके लोभका परित्याग करके गाढ़ शुद्धभक्तियोगके द्वारा श्रीकृष्णका भजन करता है ॥ 35 ॥ बुद्धिमान् व्यक्तिके लिये श्रीकृष्णभजन करना ही उचित :- श्रीमद्भागवत (2/3/10)में— अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः। तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम् ॥ 36 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 36 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पहले कोई 'अकाम' अर्थात् सर्वकामनाओंसे रहित हो अथवा 'सर्वकाम' अर्थात् सब प्रकारकी कामनाओंसे युक्त हो अथवा मोक्षकी कामना करनेवाला ही क्यों न हो, उदार-बुद्धि होने मात्रसे ही मनुष्य तीव्र शुद्धभक्तियोगसे परमपुरुष श्रीकृष्णका भजन करेंगे ॥ 36 ॥ अनुभाष्य—“जो अल्प समयमें ही मरनेवाला है, ऐसे मनुष्यका क्या कर्त्तव्य है?”—परीक्षितके इस प्रश्नके उत्तरमें श्रीशुकदेव जीवके लिये अहैतुकी शुद्धकृष्णभक्तिको ही एकमात्र नित्यधर्म कहकर दुर्बलचित्त कामी व्यक्तियोंके लिये भी श्रीहरिका भजन करना ही कर्त्तव्य है, यह कह रहे हैं— सर्वकामः (उक्तानुक्तसर्वकामना-युक्तः) मोक्षकामः (मुमुक्षुः) अकामः (एकान्त शुद्धभक्तः) वा, उदारधीः (सुधीः पुरुषः) तीव्रेण (दृढ़ेन स्वभावतः एव अप्रतिहतेन) भक्तियोगेन परं (मायाधीशं) पुरुषं (पुरुषोत्तमं) यजेत (सेवेत)। श्लोक-भावानुवाद—कही गयी अथवा न कही गयी सभी प्रकारकी कामनाओंसे युक्त अथवा मोक्षकामी अथवा अकाम अर्थात् एकान्त शुद्धभक्त, इनमेंसे कोई भी क्यों न हो, बुद्धिमान् व्यक्तिको दृढ़तापूर्वक निरन्तर 336
बाइसवाँ अध्याय 22/36-41 ] भक्तियोगके द्वारा मायाधीश पुरुषोत्तमकी सेवा करनी चाहिये॥ 36 ॥ श्रीकृष्णकी अहैतुकी दयाका परिचय :- अन्यकामी यदि करे कृष्णेर भजन। ना मागिलेह कृष्ण तारे देन स्व-चरण॥ 37 ॥ कृष्ण कहे,-"आमा भजे, मागे विषय-सुख। अमृत छाड़ि' विष मागे, - एइ बड़ मूर्ख ॥ 38 ॥ आमि-विज्ञ, एइ मूर्खे 'विषय' केने दिब? स्वचरणामृत दिया 'विषय' भुलाइब ॥ "39 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 37-39 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मुक्ति, भुक्ति और सिद्धिकी कामना करनेवाले शुद्धभक्तिकी कामना करनेवाले नहीं हैं। किसी सौभाग्यसे यदि वे शुद्ध श्रीकृष्णभजनमें लग जाँय, तो साधनभक्तिका फल जो श्रीकृष्णप्रेम है, यद्यपि तब उनका उद्देश्य नहीं भी हो, तथापि श्रीकृष्ण कृपा करके उन्हें वह प्रदान करते हैं। श्रीकृष्ण यह बात कह रहे हैं,-"इस समय भजनमें लगे हुए इस व्यक्तिके हृदयमें विषय-सुखकी कामना थी और बादमें वह कुछ स्वभावगत हो गई है। अब इसमें प्रेमरूपी अमृतको छोड़कर विषयरूपी विषकी वासना है, इसलिये यह व्यक्ति बड़ा ही मूर्ख है। यद्यपि यह व्यक्ति अज्ञानतावश सद्-विषयकी प्रार्थना नहीं कर पा रहा है, किन्तु मैं-विद्वान और सब कुछ जाननेवाला हूँ, इसके लिये जो सत् और असत् है, उसे जानता हूँ, इसलिये मैं अपना चरणामृत देकर इसकी विषयरूपी विषकी प्यासको भुलवा दूँगा॥ "37-39 ॥ सकाम उपासककी भी श्रीकृष्ण-कृपासे शुद्धभक्तिकी कामना अथवा निष्कामता :- श्रीमद्भागवत (5/19/26)में- सत्यं दिशत्यर्थितमर्थितो नृणां नैवार्थदो यत् पुनरर्थिता यतः। स्वयं विधत्ते भजतामनिच्छता- मिच्छापिधानं निजपादपल्लवम्॥ 40॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 40 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्ण प्रार्थना किये जानेपर मनुष्योंकी प्रार्थनाको पूर्ण करते हैं, यह बात सत्य है। किन्तु जिस अर्थसे (भोगकी वस्तुसे) बार-बार भोगके लिये प्रार्थना उदित होती है, श्रीकृष्ण उस अर्थको नहीं देते। अन्यकामी होकर जो एकमात्र उनके पादपल्लवको प्राप्त करनेकी इच्छा नहीं करनेपर भी उनका भजन करते हैं, श्रीकृष्ण उन्हें स्वयं ही अन्य-कामनाओंको शान्त कर देनेवाले अपने चरणकमलोंको दिया करते हैं॥ 40 ॥ अनुभाष्य-देवता भी मानव-जन्मकी सभी जन्मोंकी अपेक्षा श्रेष्ठता और प्रयोजनीयता एवं मनुष्योंमें अवतरित श्रीहरि और अहैतुकी शुद्ध हरिभक्तिके माहात्म्यका गान करते हैं, उसीको श्रीशुकदेव महाराज परीक्षितको बतला रहे हैं- [सः हरिः कामिभिः] अर्थितः (प्रार्थितः सन्) नृणां (कामिनां पुंसाम्) अर्थितं (प्रार्थितम् अभीष्टं द्रव्यं) दिशति (ददाति इति) सत्यम्, [तथापि सः प्रभुः प्रायशः तेषाम्] अर्थदः (परमार्थप्रदः) न [भवत्येव]; यत् (यस्मात्) यतः (दत्तादनन्तरं सकामैः पुरुषैः) पुनः अपि अर्थिता (कामपूरण- प्रार्थना) भवति। [तु] अनिच्छतां (निष्कामानां) भजतां (सेवकानाम्) इच्छापिधानं (इच्छानां वासनानां पिधानम् आच्छादकं सर्वकामपरिपूरकं) स्वयम् एव विधत्ते (सम्पादयति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 40 ॥ किसी-किसी सकाम उपासककी शुद्धभक्तिके अतिरिक्त असत् कामनाके रहनेपर भी निरन्तर सेवानन्दके प्रभावसे ऐसे अशुभका नाश होता है, तो भी सकामभाव निष्कामभावका कारण नहीं :- काम लागि' कृष्णे भजे, पाय कृष्ण-रसे। काम छाड़ि' 'दास' हैते हय अभिलाषे॥ 41 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 41 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-सामान्य कामनाओंके उद्देश्यसे यदि कोई श्रीकृष्णभजनके मार्गको खोजते हुए साधुसङ्गमें शुद्ध श्रीकृष्णभजनको अपना ले, तब उसकी पहले । 337
[ 22/41–44 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
चाही गयी कामनाएँ दूर हो जाती हैं और उसे श्रीकृष्णरस प्राप्त होता है। श्रीकृष्णभजन ऐसी एक पवित्र वस्तु है कि श्रीकृष्णभजनमें प्रवृत्त व्यक्ति पहले चाही गयी कामनाओंको त्याग करके श्रीकृष्णदास बननेकी अभिलाषा करता है॥41॥
अनुभाष्य-अनन्त श्रीकृष्णविमुख जीव उपायरहित होकर संसारमें उच्च-नीच योनियोंमें भ्रमण कर रहे हैं। उनमेंसे किसीकी कोई सुकृति उदित होनेपर, वह व्यक्ति महत् व्यक्तिके चरणोंकी सेवाके प्रभावसे संसारसे पार हो जाता है। नदीमें लकड़ीके बहुतसे टुकड़े तैरते हुए जाते हैं; प्रवाहकी ठोकरोंसे कोई एक लकड़ीका टुकड़ा तटपर आकर लगता है, अन्य लकड़ीके टुकड़े जलके प्रवाहमें आगे बढ़ते ही जाते हैं॥43॥
सकाम ध्रुवकी श्रीहरिके दर्शन होनेपर प्रार्थना :- हरिभक्तिसुधोदयमें ध्रुव-चरित्र (7/28)में- स्थानाभिलाषी तपसि स्थितोऽहं त्वां प्राप्तवान् देवमुनीन्द्रगुह्यम्। काचं विचिन्वन्नपि दिव्यरत्नं स्वामिन् कृतार्थोऽस्मि वरं न याचे ॥42॥
श्रीमद्भागवत (10/38/5)- मैवं ममाधमस्यापि स्यादेवाच्युतदर्शनम्। ह्रियमाणः कालनद्या क्वचित्तरति कश्चन ॥44॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥42॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥44॥
अमृतप्रवाह भाष्य-ध्रुवको जब श्रीकृष्णने वर देनेकी इच्छा की, तब ध्रुवने कहा, - हे स्वामी, मैं (विश्वके स्वामी) पदकी अभिलाषासे आपकी तपस्यामें रत हुआ था, किन्तु अब देवताओं और मुनियोंके लिये भी दुर्लभ आपको प्राप्त करके मैं कृतार्थ हो गया हूँ। सामान्य काँचको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते मुझे दिव्यरत्न मिल गया है। मैं कृतार्थ हो गया हूँ, अब किसी अन्य वरकी याचना नहीं करता हूँ॥42॥
अमृतप्रवाह भाष्य-'मैं अत्यन्त अधम होनेके कारण भगवान्का दर्शन प्राप्त नहीं कर पाऊँगा'-मेरी ऐसी आशङ्का झूठी है। कालरूपी नदीके वेगमें बहते-बहते कदाचित् कोई-कोई नदीके पार भी लग जाता है॥44॥
अनुभाष्य-देवर्षि नारदके द्वारा कंसवधादि कार्योंके विषयमें बतलानेके बाद प्रस्थान करनेपर, महात्मा अक्रूर राम-कृष्णको लानेके लिये गोकुल-यात्रा करते हुए मार्गमें अपने श्रीकृष्णदर्शनके सौभाग्यका विचार कर रहे हैं-
अनुभाष्य- स्थानाभिलाषी (स्थानं पदम् अभिलषितुं शीलमस्य तथाभूतः) अहं तपसि स्थितः; हे प्रभो, काचं विचिन्वन् (अन्वेषणं कुर्वन्) दिव्यरत्नम् (इव) देवमुनीन्द्रगुह्यं (देवानां मुनीन्द्राणामपि गुह्यं दुर्लभं) त्वां प्राप्तवान्; हे स्वामिन्, अहं कृतार्थः अस्मि, [अतः अन्यं] वरं न याचे (ना प्रार्थये)।
[एतदुत्तमश्लोकदर्शनं मम दुर्लभम् एवं मन्ये; यद्वा,] मैवम्; अधमस्य (नीचस्यापि) मम अच्युतदर्शनं स्यात् एव; (यतः) कालनद्या ह्रियमाणः कश्चन क्वचित् तरति। अयं भावः-यथा नद्यां ह्रियमाणानां तृणादीनां किञ्चित् कदाचित् तरति, तथा कर्मवशेन कालेन ह्रियमाणानां क्वचित् जीवानामापि मध्ये कश्चित् तरेदिति सम्भवतीत्यर्थः।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥42॥
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। इसका भाव यह है-जिस प्रकार नदीमें बहते तिनकोंमेंसे कोई तिनका किनारे लग जाता है, उसी प्रकार कर्मके वशीभूत कालके प्रवाहमें बहते हुए जीवोंमेंसे कोई कभी तर जाता है, ऐसा सम्भव है॥44॥
सुकृतिमान् जीवका वर्णन :- संसार भ्रमिते कोन भाग्ये केह तरे। नदीर प्रवाहे येन काष्ठ लागे तीरे ॥43॥
अनुवाद-अनुभाष्य देखें॥43॥
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बाइसवाँ अध्याय 22/45-48 ] भक्ति उन्मुखी सुकृतिके फलसे बद्धजीवको सिद्धिकी प्राप्ति :- कोन भाग्ये कारो संसार क्षयोन्मुख हय। साधुसङ्गे तरे, कृष्णे रति उपजाय ॥ 45 ॥ अनुवाद—किसी सौभाग्यसे जब जीवका संसारसे तरनेका समय आता है, तब उसका संसार क्षय होने लगता है और उसे साधुसङ्ग प्राप्त होता है। साधुसङ्गसे उसकी श्रीकृष्णमें रति उत्पन्न हो जाती है॥ 45 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यहाँपर 'भाग्य'-शब्दका अर्थ क्या केवल घटनामात्र है अथवा और कुछ है? भक्तिशास्त्र 'सुकृति'को ही 'भाग्य' कहते हैं। सुकृति तीन प्रकारकी है—भक्ति-उन्मुखी सुकृति, भोग-उन्मुखी सुकृति और मोक्ष-उन्मुखी सुकृति। जो सब कार्य संसारमें शुद्धभक्तिको उत्पन्न करनेवालेके रूपमें स्थिर किये गये हैं, वे सब कार्य भक्ति-उन्मुखी सुकृतिको उत्पन्न करते हैं। जिन सब कार्योंका फल—विषयभोग है, वे सब कार्य ही भोग-उन्मुखी सुकृति प्रदान करनेवाले हैं। जिन सब कार्योंका फल मोक्ष है, वे सब कार्य ही मोक्ष-उन्मुखी सुकृति उत्पन्न करनेवाले हैं। संसारके क्षय होनेपर स्वरूपधर्म श्रीकृष्णभक्तिका उद्घाटन करनेवाली सुकृति जब पुष्ट होकर फलोन्मुखी होती है, तभी भक्त साधुसङ्गमें संसारसे उद्धार प्राप्त करता है और श्रीकृष्णमें उसकी रति उत्पन्न होती है॥ 45 ॥ सुकृतिके फलसे साधुसङ्ग, उसके फलसे भजनमें प्रवृत्ति और अनर्थनिवृत्तिके क्रमसे साधनकी सिद्धि अथवा साध्य श्रीकृष्णप्रेमकी प्राप्ति :- श्रीमद्भागवत (10/51/53)में— भवापवर्गो भ्रवतो यदा भवे- ज्जनस्य तर्ह्यच्युत सत्समागमः। सत्सङ्गमो यर्हि तदैव सद्गतौ परावरेशे त्वयि जायते रतिः॥ 46 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 46 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे अच्युत, संसारमें भ्रमण करते-करते जब भवसागरसे पार होनेका फल उपस्थित होता है, तब यदि जीवको सत्सङ्गकी प्राप्ति होती है, तभी उसकी सद्गति और परमेश्वर-स्वरूप आपमें रति उत्पन्न होती है॥ 46 ॥ अनुभाष्य—कालयवन-दैत्यके पदके आघातसे निद्रासे उठे मुचुकुन्दके दृष्टिपातसे उनको देवताओंसे पूर्वमें प्राप्त वरके प्रभावसे कालयवनके भस्म होनेपर श्रीकृष्ण मुचुकुन्दको वर देनेके लिये उद्यत हुए, तब मुचुकुन्द श्रीकृष्णका स्तव कर रहे हैं— हे अच्युत, भ्रमतः (संसरतः) जनस्य यदा (भगवदनु- कम्पया) भवापवर्गः (भवस्य संसारस्य अपवर्गः अन्तः नाशः) भवेत्, (प्रातःकालः स्यादित्यर्थः), [तदा] सत्समागमः (साधुसङ्गः) भवेत्, यर्हि (यदा) सत्सङ्गमः हि भवेत्, [तदा] एव सद्गतौ (सर्वोत्तम-जनप्राप्ये नित्यपरमपदे) परावरेशे (भगवति कृष्णे) त्वयि रतिः (भक्तिः) जायते [ततो संसारात् मुच्यते इति भावः]॥ श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 46 ॥ श्रीकृष्णकी कृपासे ही गुरुकी कृपाकी प्राप्ति :- कृष्ण यदि कृपा करे कोन भाग्यवाने। गुरु-अन्तर्यामि-रूपे शिखाय आपने॥ 47 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 47 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पूर्वोक्त भक्ति-उन्मुखी-सुकृतिशाली व्यक्तिके निकट यदि कोई महात्मा पुरुष उपस्थित भी न हों, तथापि श्रीकृष्ण अन्तर्यामी-गुरुके रूपमें उसे शुद्धभक्तिकी शिक्षा प्रदान करते हैं॥ 47 ॥ श्रीमद्भागवत (11/29/6) में :- नैवोपयन्त्यपचितिं कवयस्तवेश ब्रह्मायुषापि कृतमृद्धमुदः स्मरन्तः। योऽन्तर्बहिस्तनुभृतामशुभं विधुन्व- न्नाचार्यचैत्यवपुषा स्वगतिं व्यनक्ति॥ 48 ॥ अनुवाद—हे ईश (भगवन्) ! ब्रह्माके समान आयु-प्राप्त । 339
[ 22/48-52 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला कवि (विद्वान) भी आपकी स्मृतिजनित आनन्दके द्वारा आपके प्रति कृतज्ञता स्वीकार करनेमें समर्थ नहीं हो पाते, क्योंकि आप अपार कृपावशतः देहधारी जीवके समस्त अशुभोंके नाश और स्वगति प्रकाश करनेके लिये बाहरसे आचार्यरूपमें एवं भीतरसे अन्तर्यामीरूपमें अवस्थित हैं॥48॥ अनुभाष्य-आदिलीला 1/48 संख्या देखें॥48॥ दीक्षाके बाद सम्बन्धज्ञान और अभिधेयके फलसे अनर्थनिवृत्ति, रुचि, आसक्ति और प्राप्य-प्रयोजनकी प्राप्ति :- साधुसङ्गे कृष्णभक्त्ये श्रद्धा यदि हय। भक्तिफल 'प्रेम' हय, संसार याय क्षय॥49॥ अनुवाद-साधुसङ्गके प्रभावसे जब श्रीकृष्णभक्तिमें श्रद्धा होती है, तभी भक्तिके फल 'प्रेम'की प्राप्ति होती है और संसार क्षय हो जाता है॥49॥ श्रद्धावान् भक्तियोगी अतिभोगी अथवा अतित्यागी नहीं :- श्रीमद्भागवत (11/20/8)- यदृच्छया मत्कथादौ जातश्रद्धस्तु यः पुमान्। न निर्विण्णो नातिसक्तो भक्तियोगोऽस्य सिद्धिदः॥50॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥50॥ अमृतप्रवाह भाष्य-किसी भाग्यके उदित होनेपर जो पुरुष मेरी कथाके प्रति श्रद्धावान् होता है और वह अत्यन्त वैरागी अथवा फल्गुवैरागी भी नहीं होता एवं संसारमें अति आसक्त भी नहीं होता, उसीको ही भक्तियोग प्रेमभक्तिरूपी सिद्धि प्रदान किया करता है॥50॥ अनुभाष्य-श्रीउद्धवको तीन प्रकारके योगोंकी बात बतलाते हुए भगवान् श्रीकृष्ण भक्तियोगके अधिकारीका निर्णय कर रहे हैं- यदृच्छया (केनापि भाग्योदयेन) यः पुमान् मत्कथादौ (भगवत्कथा-श्रवण-कीर्तनादौ) तु जातश्रद्धः, [अथच] निर्विण्णः (अतिविरक्तः फल्गुवैराग्याश्रितः) न, अतिसक्तः (संसारे अत्यभिनिविष्टः) च न, अस्य (श्रद्धालोर्जनस्य एव) भक्तियोगः सिद्धिदः (अभीष्टप्रदः भवति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥50॥ गुरु और वैष्णव अथवा साधुकी कृपासे ही अनर्थनिवृत्ति और शुद्धभक्तिकी प्राप्ति :- महत्-कृपा बिना कोन कर्मे 'भक्ति' नय। कृष्णभक्ति दूरे रहु, संसार नहे क्षय॥51॥ अनुवाद-महत् अर्थात् शुद्ध श्रीकृष्णभक्तकी कृपाके बिना किसी भी प्रकारका कोई भी कार्य करनेपर किसीमें 'भक्ति' उत्पन्न नहीं हो सकती, श्रीकृष्ण भक्तिकी बातको तो छोड़ो, किसीके संसारका भी क्षय नहीं हो सकता॥51॥ अनुभाष्य-कर्मकाण्डीय किसी प्राकृत सुकृतिके द्वारा अप्राकृत श्रीकृष्णभक्ति नहीं होती। एकमात्र श्रीकृष्णभक्तकी कृपाके अतिरिक्त अप्राकृत श्रीकृष्णभक्तिके उदित होनेकी सम्भावना नहीं है। श्रीकृष्णभक्तिकी बात तो दूर है, प्राकृतबुद्धिरूपी संसार तक भी नष्ट नहीं होता। श्रीकृष्णभक्तके अतिरिक्त अन्य किसी भी जीवमें महानताकी सम्भावना नहीं होती। श्रीकृष्णभक्त ही एकमात्र अप्राकृत हैं। प्राकृत-दर्शनसे कोई-कोई उन्हें 'प्राकृत' समझते हैं। परन्तु वास्तवमें समस्त प्राकृत वस्तुओंको परित्याग करनेवाले श्रीकृष्णभक्तको ही अतुलनीय श्रेष्ठ और जीवोंके एकमात्र प्रार्थनीय हितैषी जानना चाहिये। उनकी कृपाका भिक्षु बननेसे ही जीवके प्राकृत भोग दूर हो जाते हैं और अप्राकृत श्रीकृष्ण सेवाधिकार प्राप्त होता है॥51॥ शुद्धभक्तके आनुगत्यके बिना श्रीकृष्णप्राप्ति सुदुर्लभ :- श्रीमद्भागवत (5/12/12)में- रहूगणैतत् तपसा न याति न चेज्यया निर्वपणाद् गृहाद्वा। न च्छन्दसा नैव जलाग्निसूर्यै- र्बिना महत्पादरजोऽभिषेकम्॥52॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥52॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे रहूगण, महाजनोंके चरणोंकी 340 ।
बाइसवाँ अध्याय 22/52–54 ]
रजमें अभिषिक्त हुए बिना भगवान्की भक्ति तपस्याके द्वारा, वैदिक अर्चनादिके द्वारा, संन्यास-पालनके द्वारा, गृहस्थ-धर्मके पालनके द्वारा, वेदपाठके द्वारा अथवा जल-अग्नि-सूर्य [आदिकी उपासना] के द्वारा कभी भी प्राप्त नहीं होती ॥ 52 ॥ अनुभाष्य—सिन्धुसौवीरके राजा रहूगणके द्वारा ब्राह्मणकुलमें जन्में अवधूत भरतके मुखसे तत्त्वज्ञानका श्रवण करते समय उन्हें प्रणाम करके दुर्बोध अध्यात्म- योगकी सुबोधरूपमें व्याख्या करनेकी प्रार्थना करनेपर, ब्राह्मणवेषी महाभागवत परमहंस भरत रहूगणको पहले अविद्या और उसके विनाशक शुद्धज्ञानमयविग्रह भगवान् वासुदेवकी कथा सुनाकर बादमें भगवद्-प्राप्तिके उपायका वर्णन कर रहे हैं— हे रहूगण, महत्पादरजोऽभिषेकं (शुद्धकृष्णभक्तपदरेणुना अभिषेकनं) बिना (ऋते) एतत् (अप्राकृतं वासुदेवात्मक-भगवत्तत्त्वं) तपसा (वानप्रस्थधर्मेण) न, इज्यया (वैदिककर्मणा देवार्चनेनेत्यर्थः) च न, निर्वपणात् (योषित्सङ्गराहित्यात् संन्यासात् इत्यर्थः) न, गृहात् (योषित्सङ्गमूलकगृहमेध-यज्ञ-चालनात्) वा न, छन्दसा (वेदाभ्यासेन) न, जलाग्निसूर्यैः (तत्तदुपासितैः) न याति (न प्राप्नोति) एव। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 52 ॥
महत् अथवा शुद्ध वैष्णवकी कृपासे ही अनर्थनाश और उसके फलस्वरूप विष्णुपदकी प्राप्ति :— श्रीमद्भागवत (7/5/32)में— नैषां मतिस्तावदुरुक्रमाङ्घ्रिं स्पृशत्यनर्थापगमो यदर्थः। महीयसां पादरजोऽभिषेकं निष्किञ्चनानां न वृणीत यावत् ॥ 53 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 53 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जब तक मनुष्योंकी मति निष्किञ्चन भगवद्भक्तोंकी पदधूलिके द्वारा अभिषिक्त नहीं होती, तब तक वह अनर्थनाशक श्रीकृष्णचरणकमलोंका स्पर्श नहीं कर पाती ॥ 53 ॥
अनुभाष्य—देवर्षि नारद धर्मराज युधिष्ठिरको प्रह्लादके उपाख्यानका वर्णन कर रहे हैं। हिरण्यकशिपुके प्रश्नके उत्तरमें महाभागवत प्रह्लादने विष्णुकी नवधा भक्तिको ही एकमात्र सर्वश्रेष्ठ पाण्डित्य और शिक्षारूपमें वर्णन किया। इस बातसे क्रु षण्ड-अमर्ककी तीव्र भर्त्सना की। तब षण्ड-अमर्कने प्रह्लादकी स्वाभाविकी मतिको ही उनकी विष्णुभक्तिका कारण बतलाकर अपने ऊपर लगाये दोषका निवारण किया। तब हिरण्यकशिपुने प्रह्लादसे उनकी ऐसी वैष्णवी मतिका कारण बतलानेके लिये कहा। किन्तु प्रह्लाद उसके सम्बन्धमें कुछ भी नहीं कहकर विष्णुभक्ति- विरोधी गृहव्रती लोगोंके बन्धन और मोक्षका उपाय बतला रहे हैं— निष्किञ्चनानां (निरस्तसकलविषयाभिमानानां) महीयसां (महत्तमानां वैष्णवानां) पादरजोऽभिषेकं (पदरजसा अभिषेकनं लेपनं) यावत् न वृणीत (कुर्वीत), तावत् [श्रुतिवाक्यतो ज्ञातोऽपि] एषां (गृहव्रतानां) मतिः (प्रवृत्तिः) उरुक्रमाङ्घ्रिम् (उरुक्रमस्य पदं) न स्पृशति (न प्राप्नोति असम्भावनादिभिर्विहन्यते इत्यर्थः); अनर्थापगमः (अनर्थस्य असदवग्रहस्य, तत्पदस्पर्शविघ्नस्य संसारस्येत्यर्थः अपगमः विनाशः) यदर्थः (यस्याः अङ्घ्रिस्पर्शिन्याः मतेः अर्थं फलं, महदनुग्रहाभावान्न तत्त्वनिश्चयः नापि मोक्षस्तेषामित्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 53 ॥
साधुके आधे क्षणके सङ्गके फलसे ही जीवकी चिद्-वृत्ति श्रीकृष्ण-सेवाका प्रबोध और साध्यकी प्राप्ति :— 'साधुसङ्ग' 'साधुसङ्ग'—सर्वशास्त्रे कय। लवमात्र साधुसङ्गे सर्वसिद्धि हय ॥ 54 ॥ अनुवाद—इसलिये सभी शास्त्र 'साधुसङ्ग', 'साधुसङ्ग' करनेके लिये कहते हैं, क्योंकि लवमात्रके (पलक झपकनेके समयके) साधुसङ्गसे सर्वसिद्धिकी प्राप्ति होती है ॥ 54 ॥ अनुभाष्य—'लव'—निमेषकाल, सवा ग्यारह 'लव'का एक सैकेण्ड होता है ॥ 54 ॥
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