श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1780, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 22/27-30 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अवज्ञा करते हैं, वे अपने स्थानसे भ्रष्ट होकर अधःपतित हो जाते हैं॥27-28॥ अनुभाष्य-श्रीनारद श्रीवसुदेवको श्रीभागवत धर्मका वर्णन करते हुए विदेहराज निमि और नवयोगेन्द्र-संवादका वर्णन कर रहे हैं; 'हरिभजन विमुख गोदास (इन्द्रियोंके दास)की क्या गति होती है?'-महाराज निमिके इस प्रश्नके उत्तरमें नवयोगेन्द्रोंमेंसे एक चमस ऋषि निम्नलिखित दो श्लोकोंमें भक्तिके अनुकूल दैव-वर्णाश्रम-सृष्टि और उसके व्यभिचारीकी दुरावस्थाका वर्णन कर रहे हैं- पुरुषस्य (भगवतः वैराजस्य ब्रह्मणः) मुखबाहूरुपादेभ्यः गुणैः (सत्त्वरजस्तमोगुणैः) आश्रमैः (ब्रह्मचारिगृहस्थवानप्रस्थ- भिक्षुकाक्रमचतुष्टयैः) सह पृथक् विप्रादयः (ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्राः) चत्वारः वर्णाः जज्ञिरे। एषां (विप्रक्षत्रियवैश्यशूद्राणां ब्रह्मचारिगृहस्थवानप्रस्थयतीनां मध्ये) ये (जनाः) साक्षात् आत्मप्रभवम् (आत्मनः प्रभवः जन्म प्राकट्यं वा, यस्मात् तम्) ईश्वरम् [अज्ञात्वा कृतघ्नाः सन्तः] न भजन्ति, अवजानन्ति (ज्ञात्वापि वर्णाश्रम- मर्यादा-मदभरेण कृष्णभजनस्यावश्यकता नास्तीति मन्यमानाः द्विषन्ति), [ते हरि-गुरु-वैष्णव-सेवा-विहीनाः] स्थानात् (स्व-स्व-वर्णाश्रमात्) भ्रष्टाः (सन्तः) अधःपतन्ति (निरयं यान्ति); [यतः प्राकृतवर्णाश्रमधर्मः अनित्यः कालक्षुब्धश्च तात्कालिक-फलोपयोगी असच्छब्द-वाच्यश्च]। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। [जो प्राकृतवर्णाश्रमधर्म है, वह केवल अनित्य और क्षणिक-फलकी प्राप्तिके लिये उपयोगी है, अतः उसे असत्-धर्म ही कहा जायेगा।]॥ 27-28॥ भक्ति-रहित मुक्ताभिमानी ज्ञानी भी अशुद्ध-मनोधर्मी, शुद्धभक्त ही निर्मल आत्मधर्मी :- ज्ञानी जीवन्मुक्तदशा पाइनु करि' माने। वस्तुतः बुद्धि 'शुद्ध' नहे कृष्णभक्ति बिने॥29॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें॥29॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मायावादादि मतावलम्बी व्यक्ति आपने आपको 'ज्ञानी' कहते हैं, किन्तु वास्तवमें श्रीकृष्णभक्तिके बिना बुद्धि शुद्ध नहीं होती॥ 29 ॥ अनुभाष्य-यद्यपि ज्ञानी मान सकते हैं, - 'मैं जीवनकालमें ही संसार-बन्धनसे मुक्त हो गया हूँ', तथापि श्रीकृष्णभक्तिके अतिरिक्त अहंग्रहोपासनासे बुद्धि शुद्ध नहीं हो सकती। क्योंकि मुक्तिकामी व्यक्ति जीवित अवस्थामें अपने आपको बद्ध जानकर उससे मुक्त और मुक्त-अवस्था जानकर उसके अतिरिक्त दृश्य वस्तुओंमें बद्ध मानता है, इसलिये वह ऐसे अनित्य भावसमूहके हाथोंसे मुक्त नहीं हो पाता॥ 29 ॥ श्रीकृष्णभक्तिरहित शुष्कज्ञानीको अधोगतिकी प्राप्ति :- श्रीमद्भागवत (10/2/32) में- येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिनस्त्वय्य- स्तभावादविशुद्धबुद्धयः। आरुह्य कृच्छ्रे पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रयः॥30॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 30 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे कमलनयन, जो 'मैं विमुक्त हो गया हूँ, ऐसा कहकर अभिमान करते हैं, वे आपमें भक्तिरहित होनेके कारण अशुद्ध बुद्धिवाले हैं। वे बहुत कष्ट करके मायासे अतीत परमपद ब्रह्म तक आरोहण करके भी भगवद्भक्तिके अनादरके कारण अधःपतित होते हैं॥ 30॥ अनुभाष्य-कंसके कारागारमें बद्ध देवकीके गर्भमें आविर्भूत होनेपर ब्रह्मादि देवता 'गर्भस्तोत्र'-नामसे प्रसिद्ध स्तवसे भगवान्की स्तुति कर रहे हैं- हे अरविन्दाक्ष, (पद्मपलाशलोचन,) अन्ये (अभक्ताः जनाः) ये विमुक्तमानिनः (विमुक्ताः-ज्ञानिनः वयमिति मन्यमानाः) त्वयि (भगवति) अस्तभावात् (अस्तः निरस्तः अतएव असन् यः भावः तस्मात्, भक्तेरभावात् तदनुशीलनराहित्यात्) अविशुद्धबुद्धयः (न विशुद्धा बुद्धिः येषां ते तथा, मुक्तिपिशाचीं बहुमन्यमानाः ज्ञानजनित-कैतव-कल्मषकषाय-दुष्टमतयः इत्यर्थः) कृच्छ्र स्वामिचरणाः, मोक्षपीठादव्यवहितप्रदेशम्) आरुह्य (अधिरुह्य) अनादृतयुष्मदङ्घ्रयः (न आदृतौ युष्मदङ्घ्री यैः ते, तव पादपद्मानित्यसेवयाः अनादरेण अपराधवशात् कृष्णकृपारज्जुविच्छिन्नाः 334 ।