भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1781, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1781

बाइसवाँ अध्याय 22/30-32 ]

सन्तः) ततः (परमोच्चज्ञानाख्य-पीठाप्रान्तात्) अधः पतन्ति (अज्ञानान्धकारे संसार-तमिस्रे निमज्जन्ति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ ३० ॥ श्रीकृष्ण-दर्शनमें मायाका दर्शन नहीं, माया-दर्शनमें श्रीकृष्णका दर्शन नहीं :— कृष्ण—सूर्यसम, माया हय अन्धकार। याँहा कृष्ण, ताँहा नाहि मायार अधिकार ॥ ३१ ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण सूर्यके समान हैं और माया अन्धकार सदृश है। जहाँपर श्रीकृष्ण हैं, वहाँ मायाका अधिकार नहीं हो सकता ॥ ३१ ॥ अनुभाष्य—भागवतमें चतुःश्लोकीमें लिखा हुआ है— “ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि। तद्विद्यादात्मनो मायां यथा भासः यथा तमः॥” [अर्थात् “वास्तव प्रयोजन तत्त्वके अतिरिक्त जो कुछ भी प्रतीत होता है अथवा सत्तायुक्त होनेपर भी मेरे अधिष्ठानमें जिसकी प्रतीति नहीं है, उसे ही मेरी माया समझो।”] प्रकाशके रहनेपर जिस प्रकार अन्धकार नहीं रहता, उसी प्रकार जीव श्रीकृष्णोन्मुख होनेपर मायिक वासनाओंके हाथसे मुक्त हो जाता है। श्रीकृष्णभक्तके अतिरिक्त ज्ञानी, कर्मी और अन्याभिलाषी व्यक्तिको माया ग्रास करती है ॥ ३१ ॥

दुर्बुद्धि व्यक्ति 'मैं', 'मेरा' इस प्रकारकी बहुतसी बातोंके जालको प्रकाशित करते हैं ॥ ३२ ॥ अनुभाष्य—यहाँपर पाठान्तरमें (भाः 2/7/47) श्लोक उद्धृत हुआ है— “शश्वत् प्रशान्तमभयं प्रतिबोधमात्रं शुद्धं समं सदसतः परमात्मतत्त्वम्। शब्दो न यत्र पुरुकारकवान् क्रियार्थो माया परैत्यभिमुखे च विलज्जमाना। तद्वै पदं भगवतः परमस्य पुंसो ब्रह्मेति यद्विदुरजस्रसुखं विशोकम्॥” अर्थात् “मुनिगण जिस वस्तुको 'बृहत् निर्विकल्प-ब्रह्म' कहकर जानते हैं, वही परम-पुरुष भगवान्‌का प्रथम प्रतीति-स्वरूप है। यह ब्रह्म निरन्तर-सुख-युक्त, शोकरहित, नित्य-प्रशान्त, भेदशून्य, अभय, ज्ञानैकरस, शुद्ध, विषयकरण-सङ्गशून्य, परमात्म-तत्त्व, उत्पत्ति आदि चार प्रकारके क्रियाफलोंका प्रकाशक है। कर्मकाण्डीय-शब्द-कार्य उनका बोध करानेवाला नहीं हो सकता और माया उनके सामने जानेमें लज्जा अनुभव करती है और उनसे दूर भाग जाती है।” देवर्षि नारदके द्वारा लोकपितामह ब्रह्माको तपस्यामें प्रवृत्त देखकर उनके अतिरिक्त भी जो एक स्वतन्त्र सर्वेश्वरेश्वर नियन्त्रण करनेवाला है, उसके विषयमें जिज्ञासा करनेपर ब्रह्मा उन परमात्मा श्रीहरिकी लीला और मायाके द्वारा सृष्टि आदिका वर्णन कर रहे हैं— यस्य (भगवतः) ईक्षापथे (नेत्रगोचरे) स्थातुं विलज्जमानया (मत्कपटोऽसौ प्रभुर्जानातीति लज्जायुक्तया) अमुया (मायया) विमोहिताः (मुग्धाः) दुर्धियः (अविद्यावृत्तज्ञानाः असद्वियः जीवाः एव केवलं) 'मम' 'अहम्' इति [एतत्] विकत्थन्ते (आत्मानं श्लाघ्यन्ते) [तस्मै नमः इति पूर्वेणान्वयः]।

दासी मायाको अपने प्रभुके सामने खड़े होनेमें लज्जा, दूसरी ओर, प्रभुसे विमुख लोगोंको विपरीत बुद्धि देकर कारागारमें बन्द करनेवाली :— श्रीमद्भागवत (2/5/13)में— विलज्जमानया यस्य स्थातुमीक्षापथेऽमुया। विमोहिता विकत्थन्ते ममाहमिति दुर्धियः ॥ ३२ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ ३२ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णके सामने आनेपर माया लज्जित होती है। उस मायाके द्वारा विमोहित होकर श्लोक-भावानुवाद—श्रीकृष्णके सामने आनेपर माया यह सोचकर कि मेरे प्रभु मेरी कपटता जानते हैं, इसलिये लज्जित होती है। उस मायाके द्वारा विमोहित होकर विपरीत बुद्धिग्रस्त व्यक्ति 'मैं', 'मेरा' इस प्रकार कहकर अपनी प्रशंसा करते हैं ॥ ३२ ॥

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