भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1782, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1782

[ 22/33–36 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला आत्मनिवेदनकारी सम्बन्धज्ञान-प्राप्त साधककी अनर्थ-निवृत्ति :- 'कृष्ण, तोमार हङ' यदि बले एकबार। मायाबन्ध हैते कृष्ण तारे करे पार ॥ 33 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 33 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो सब समय केवल मुखसे अभ्यासवशतः “कृष्ण मैं तुम्हारा हूँ”—यह बात बार-बार बोलते हैं, उनकी यह बात सहृदय (सरल) नहीं हैं; किन्तु जो एकबार भी सहृदय (काय-मन और वचनसे) “हे कृष्ण, मैं—आपका दास हूँ”—यह बात कहते हैं, उन्हें श्रीकृष्ण मायाके बन्धनसे पार करते हैं ॥ 33 ॥ परमदयालु श्रीकृष्णकी आश्वासन देनेवाली वाणी :- हरिभक्तिविलास (11/337)में उद्धृत श्लोक, रामायणके लङ्काकाण्ड (18/33)में विभीषणके साथ मिलनके सम्बन्धमें श्रीरामचन्द्रने सुग्रीवसे कहा— सकृदेव प्रपन्नो यस्तवास्मीति च याचते। अभयं सर्वदा तस्मै ददाम्येतद्व्रतं मम ॥ 34 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 34 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मेरा यह व्रत है कि यदि कोई वास्तवमें शरणागत होकर एकबार भी “मैं तुम्हारा हूँ” यह कहकर मुझसे अभयकी याचना करता है, तब मैं उसे सदैव अभय प्रदान करता हूँ ॥ 34 ॥ अनुभाष्य— यः (जनः) प्रपन्नः (शरणागतः सन्) तवास्मि (त्वया सह नित्यदास्यसूत्रे आबद्धः भवामि) इति सकृदेव (बारमेकं) च याचते (काकुयुक्तं प्रार्थयते), अहं (दाशरथिः भगवान्) तस्मै सर्वदा अभयं ददामि,—एतत् (एव) मम व्रतं (प्रतिज्ञातम्)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 34 ॥ सकाम अशान्त पुरुषोंको निरन्तर भजनके फलसे शान्तिकी प्राप्ति :- मुक्ति-भुक्ति-सिद्धिकामी 'सुबुद्धि' यदि हय। गाढ़-भक्तियोगे तबे कृष्णेरे भजय ॥ 35 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 35 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—दुर्वासना और दुःसङ्गके कारण जीवकी मुक्ति, भुक्ति और सिद्धि-कामनाएँ उदित होती हैं। यदि किसी सत्सङ्गसे सुबुद्धि उदित होती है, तब वह जीव मुक्ति-भुक्ति-सिद्धिके लोभका परित्याग करके गाढ़ शुद्धभक्तियोगके द्वारा श्रीकृष्णका भजन करता है ॥ 35 ॥ बुद्धिमान् व्यक्तिके लिये श्रीकृष्णभजन करना ही उचित :- श्रीमद्भागवत (2/3/10)में— अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः। तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम् ॥ 36 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 36 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पहले कोई 'अकाम' अर्थात् सर्वकामनाओंसे रहित हो अथवा 'सर्वकाम' अर्थात् सब प्रकारकी कामनाओंसे युक्त हो अथवा मोक्षकी कामना करनेवाला ही क्यों न हो, उदार-बुद्धि होने मात्रसे ही मनुष्य तीव्र शुद्धभक्तियोगसे परमपुरुष श्रीकृष्णका भजन करेंगे ॥ 36 ॥ अनुभाष्य—“जो अल्प समयमें ही मरनेवाला है, ऐसे मनुष्यका क्या कर्त्तव्य है?”—परीक्षितके इस प्रश्नके उत्तरमें श्रीशुकदेव जीवके लिये अहैतुकी शुद्धकृष्णभक्तिको ही एकमात्र नित्यधर्म कहकर दुर्बलचित्त कामी व्यक्तियोंके लिये भी श्रीहरिका भजन करना ही कर्त्तव्य है, यह कह रहे हैं— सर्वकामः (उक्तानुक्तसर्वकामना-युक्तः) मोक्षकामः (मुमुक्षुः) अकामः (एकान्त शुद्धभक्तः) वा, उदारधीः (सुधीः पुरुषः) तीव्रेण (दृढ़ेन स्वभावतः एव अप्रतिहतेन) भक्तियोगेन परं (मायाधीशं) पुरुषं (पुरुषोत्तमं) यजेत (सेवेत)। श्लोक-भावानुवाद—कही गयी अथवा न कही गयी सभी प्रकारकी कामनाओंसे युक्त अथवा मोक्षकामी अथवा अकाम अर्थात् एकान्त शुद्धभक्त, इनमेंसे कोई भी क्यों न हो, बुद्धिमान् व्यक्तिको दृढ़तापूर्वक निरन्तर 336