भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1783

बाइसवाँ अध्याय 22/36-41 ] भक्तियोगके द्वारा मायाधीश पुरुषोत्तमकी सेवा करनी चाहिये॥ 36 ॥ श्रीकृष्णकी अहैतुकी दयाका परिचय :- अन्यकामी यदि करे कृष्णेर भजन। ना मागिलेह कृष्ण तारे देन स्व-चरण॥ 37 ॥ कृष्ण कहे,-"आमा भजे, मागे विषय-सुख। अमृत छाड़ि' विष मागे, - एइ बड़ मूर्ख ॥ 38 ॥ आमि-विज्ञ, एइ मूर्खे 'विषय' केने दिब? स्वचरणामृत दिया 'विषय' भुलाइब ॥ "39 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 37-39 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मुक्ति, भुक्ति और सिद्धिकी कामना करनेवाले शुद्धभक्तिकी कामना करनेवाले नहीं हैं। किसी सौभाग्यसे यदि वे शुद्ध श्रीकृष्णभजनमें लग जाँय, तो साधनभक्तिका फल जो श्रीकृष्णप्रेम है, यद्यपि तब उनका उद्देश्य नहीं भी हो, तथापि श्रीकृष्ण कृपा करके उन्हें वह प्रदान करते हैं। श्रीकृष्ण यह बात कह रहे हैं,-"इस समय भजनमें लगे हुए इस व्यक्तिके हृदयमें विषय-सुखकी कामना थी और बादमें वह कुछ स्वभावगत हो गई है। अब इसमें प्रेमरूपी अमृतको छोड़कर विषयरूपी विषकी वासना है, इसलिये यह व्यक्ति बड़ा ही मूर्ख है। यद्यपि यह व्यक्ति अज्ञानतावश सद्-विषयकी प्रार्थना नहीं कर पा रहा है, किन्तु मैं-विद्वान और सब कुछ जाननेवाला हूँ, इसके लिये जो सत् और असत् है, उसे जानता हूँ, इसलिये मैं अपना चरणामृत देकर इसकी विषयरूपी विषकी प्यासको भुलवा दूँगा॥ "37-39 ॥ सकाम उपासककी भी श्रीकृष्ण-कृपासे शुद्धभक्तिकी कामना अथवा निष्कामता :- श्रीमद्भागवत (5/19/26)में- सत्यं दिशत्यर्थितमर्थितो नृणां नैवार्थदो यत् पुनरर्थिता यतः। स्वयं विधत्ते भजतामनिच्छता- मिच्छापिधानं निजपादपल्लवम्॥ 40॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 40 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्ण प्रार्थना किये जानेपर मनुष्योंकी प्रार्थनाको पूर्ण करते हैं, यह बात सत्य है। किन्तु जिस अर्थसे (भोगकी वस्तुसे) बार-बार भोगके लिये प्रार्थना उदित होती है, श्रीकृष्ण उस अर्थको नहीं देते। अन्यकामी होकर जो एकमात्र उनके पादपल्लवको प्राप्त करनेकी इच्छा नहीं करनेपर भी उनका भजन करते हैं, श्रीकृष्ण उन्हें स्वयं ही अन्य-कामनाओंको शान्त कर देनेवाले अपने चरणकमलोंको दिया करते हैं॥ 40 ॥ अनुभाष्य-देवता भी मानव-जन्मकी सभी जन्मोंकी अपेक्षा श्रेष्ठता और प्रयोजनीयता एवं मनुष्योंमें अवतरित श्रीहरि और अहैतुकी शुद्ध हरिभक्तिके माहात्म्यका गान करते हैं, उसीको श्रीशुकदेव महाराज परीक्षितको बतला रहे हैं- [सः हरिः कामिभिः] अर्थितः (प्रार्थितः सन्) नृणां (कामिनां पुंसाम्) अर्थितं (प्रार्थितम् अभीष्टं द्रव्यं) दिशति (ददाति इति) सत्यम्, [तथापि सः प्रभुः प्रायशः तेषाम्] अर्थदः (परमार्थप्रदः) न [भवत्येव]; यत् (यस्मात्) यतः (दत्तादनन्तरं सकामैः पुरुषैः) पुनः अपि अर्थिता (कामपूरण- प्रार्थना) भवति। [तु] अनिच्छतां (निष्कामानां) भजतां (सेवकानाम्) इच्छापिधानं (इच्छानां वासनानां पिधानम् आच्छादकं सर्वकामपरिपूरकं) स्वयम् एव विधत्ते (सम्पादयति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 40 ॥ किसी-किसी सकाम उपासककी शुद्धभक्तिके अतिरिक्त असत् कामनाके रहनेपर भी निरन्तर सेवानन्दके प्रभावसे ऐसे अशुभका नाश होता है, तो भी सकामभाव निष्कामभावका कारण नहीं :- काम लागि' कृष्णे भजे, पाय कृष्ण-रसे। काम छाड़ि' 'दास' हैते हय अभिलाषे॥ 41 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 41 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-सामान्य कामनाओंके उद्देश्यसे यदि कोई श्रीकृष्णभजनके मार्गको खोजते हुए साधुसङ्गमें शुद्ध श्रीकृष्णभजनको अपना ले, तब उसकी पहले । 337