श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1784, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 22/41–44 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
चाही गयी कामनाएँ दूर हो जाती हैं और उसे श्रीकृष्णरस प्राप्त होता है। श्रीकृष्णभजन ऐसी एक पवित्र वस्तु है कि श्रीकृष्णभजनमें प्रवृत्त व्यक्ति पहले चाही गयी कामनाओंको त्याग करके श्रीकृष्णदास बननेकी अभिलाषा करता है॥41॥
अनुभाष्य-अनन्त श्रीकृष्णविमुख जीव उपायरहित होकर संसारमें उच्च-नीच योनियोंमें भ्रमण कर रहे हैं। उनमेंसे किसीकी कोई सुकृति उदित होनेपर, वह व्यक्ति महत् व्यक्तिके चरणोंकी सेवाके प्रभावसे संसारसे पार हो जाता है। नदीमें लकड़ीके बहुतसे टुकड़े तैरते हुए जाते हैं; प्रवाहकी ठोकरोंसे कोई एक लकड़ीका टुकड़ा तटपर आकर लगता है, अन्य लकड़ीके टुकड़े जलके प्रवाहमें आगे बढ़ते ही जाते हैं॥43॥
सकाम ध्रुवकी श्रीहरिके दर्शन होनेपर प्रार्थना :- हरिभक्तिसुधोदयमें ध्रुव-चरित्र (7/28)में- स्थानाभिलाषी तपसि स्थितोऽहं त्वां प्राप्तवान् देवमुनीन्द्रगुह्यम्। काचं विचिन्वन्नपि दिव्यरत्नं स्वामिन् कृतार्थोऽस्मि वरं न याचे ॥42॥
श्रीमद्भागवत (10/38/5)- मैवं ममाधमस्यापि स्यादेवाच्युतदर्शनम्। ह्रियमाणः कालनद्या क्वचित्तरति कश्चन ॥44॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥42॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥44॥
अमृतप्रवाह भाष्य-ध्रुवको जब श्रीकृष्णने वर देनेकी इच्छा की, तब ध्रुवने कहा, - हे स्वामी, मैं (विश्वके स्वामी) पदकी अभिलाषासे आपकी तपस्यामें रत हुआ था, किन्तु अब देवताओं और मुनियोंके लिये भी दुर्लभ आपको प्राप्त करके मैं कृतार्थ हो गया हूँ। सामान्य काँचको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते मुझे दिव्यरत्न मिल गया है। मैं कृतार्थ हो गया हूँ, अब किसी अन्य वरकी याचना नहीं करता हूँ॥42॥
अमृतप्रवाह भाष्य-'मैं अत्यन्त अधम होनेके कारण भगवान्का दर्शन प्राप्त नहीं कर पाऊँगा'-मेरी ऐसी आशङ्का झूठी है। कालरूपी नदीके वेगमें बहते-बहते कदाचित् कोई-कोई नदीके पार भी लग जाता है॥44॥
अनुभाष्य-देवर्षि नारदके द्वारा कंसवधादि कार्योंके विषयमें बतलानेके बाद प्रस्थान करनेपर, महात्मा अक्रूर राम-कृष्णको लानेके लिये गोकुल-यात्रा करते हुए मार्गमें अपने श्रीकृष्णदर्शनके सौभाग्यका विचार कर रहे हैं-
अनुभाष्य- स्थानाभिलाषी (स्थानं पदम् अभिलषितुं शीलमस्य तथाभूतः) अहं तपसि स्थितः; हे प्रभो, काचं विचिन्वन् (अन्वेषणं कुर्वन्) दिव्यरत्नम् (इव) देवमुनीन्द्रगुह्यं (देवानां मुनीन्द्राणामपि गुह्यं दुर्लभं) त्वां प्राप्तवान्; हे स्वामिन्, अहं कृतार्थः अस्मि, [अतः अन्यं] वरं न याचे (ना प्रार्थये)।
[एतदुत्तमश्लोकदर्शनं मम दुर्लभम् एवं मन्ये; यद्वा,] मैवम्; अधमस्य (नीचस्यापि) मम अच्युतदर्शनं स्यात् एव; (यतः) कालनद्या ह्रियमाणः कश्चन क्वचित् तरति। अयं भावः-यथा नद्यां ह्रियमाणानां तृणादीनां किञ्चित् कदाचित् तरति, तथा कर्मवशेन कालेन ह्रियमाणानां क्वचित् जीवानामापि मध्ये कश्चित् तरेदिति सम्भवतीत्यर्थः।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥42॥
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। इसका भाव यह है-जिस प्रकार नदीमें बहते तिनकोंमेंसे कोई तिनका किनारे लग जाता है, उसी प्रकार कर्मके वशीभूत कालके प्रवाहमें बहते हुए जीवोंमेंसे कोई कभी तर जाता है, ऐसा सम्भव है॥44॥
सुकृतिमान् जीवका वर्णन :- संसार भ्रमिते कोन भाग्ये केह तरे। नदीर प्रवाहे येन काष्ठ लागे तीरे ॥43॥
अनुवाद-अनुभाष्य देखें॥43॥
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