भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ 22/41–44 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

चाही गयी कामनाएँ दूर हो जाती हैं और उसे श्रीकृष्णरस प्राप्त होता है। श्रीकृष्णभजन ऐसी एक पवित्र वस्तु है कि श्रीकृष्णभजनमें प्रवृत्त व्यक्ति पहले चाही गयी कामनाओंको त्याग करके श्रीकृष्णदास बननेकी अभिलाषा करता है॥41॥

अनुभाष्य-अनन्त श्रीकृष्णविमुख जीव उपायरहित होकर संसारमें उच्च-नीच योनियोंमें भ्रमण कर रहे हैं। उनमेंसे किसीकी कोई सुकृति उदित होनेपर, वह व्यक्ति महत् व्यक्तिके चरणोंकी सेवाके प्रभावसे संसारसे पार हो जाता है। नदीमें लकड़ीके बहुतसे टुकड़े तैरते हुए जाते हैं; प्रवाहकी ठोकरोंसे कोई एक लकड़ीका टुकड़ा तटपर आकर लगता है, अन्य लकड़ीके टुकड़े जलके प्रवाहमें आगे बढ़ते ही जाते हैं॥43॥

सकाम ध्रुवकी श्रीहरिके दर्शन होनेपर प्रार्थना :- हरिभक्तिसुधोदयमें ध्रुव-चरित्र (7/28)में- स्थानाभिलाषी तपसि स्थितोऽहं त्वां प्राप्तवान् देवमुनीन्द्रगुह्यम्। काचं विचिन्वन्नपि दिव्यरत्नं स्वामिन् कृतार्थोऽस्मि वरं न याचे ॥42॥

श्रीमद्भागवत (10/38/5)- मैवं ममाधमस्यापि स्यादेवाच्युतदर्शनम्। ह्रियमाणः कालनद्या क्वचित्तरति कश्चन ॥44॥

अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥42॥

अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥44॥

अमृतप्रवाह भाष्य-ध्रुवको जब श्रीकृष्णने वर देनेकी इच्छा की, तब ध्रुवने कहा, - हे स्वामी, मैं (विश्वके स्वामी) पदकी अभिलाषासे आपकी तपस्यामें रत हुआ था, किन्तु अब देवताओं और मुनियोंके लिये भी दुर्लभ आपको प्राप्त करके मैं कृतार्थ हो गया हूँ। सामान्य काँचको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते मुझे दिव्यरत्न मिल गया है। मैं कृतार्थ हो गया हूँ, अब किसी अन्य वरकी याचना नहीं करता हूँ॥42॥

अमृतप्रवाह भाष्य-'मैं अत्यन्त अधम होनेके कारण भगवान्का दर्शन प्राप्त नहीं कर पाऊँगा'-मेरी ऐसी आशङ्का झूठी है। कालरूपी नदीके वेगमें बहते-बहते कदाचित् कोई-कोई नदीके पार भी लग जाता है॥44॥

अनुभाष्य-देवर्षि नारदके द्वारा कंसवधादि कार्योंके विषयमें बतलानेके बाद प्रस्थान करनेपर, महात्मा अक्रूर राम-कृष्णको लानेके लिये गोकुल-यात्रा करते हुए मार्गमें अपने श्रीकृष्णदर्शनके सौभाग्यका विचार कर रहे हैं-

अनुभाष्य- स्थानाभिलाषी (स्थानं पदम् अभिलषितुं शीलमस्य तथाभूतः) अहं तपसि स्थितः; हे प्रभो, काचं विचिन्वन् (अन्वेषणं कुर्वन्) दिव्यरत्नम् (इव) देवमुनीन्द्रगुह्यं (देवानां मुनीन्द्राणामपि गुह्यं दुर्लभं) त्वां प्राप्तवान्; हे स्वामिन्, अहं कृतार्थः अस्मि, [अतः अन्यं] वरं न याचे (ना प्रार्थये)।

[एतदुत्तमश्लोकदर्शनं मम दुर्लभम् एवं मन्ये; यद्वा,] मैवम्; अधमस्य (नीचस्यापि) मम अच्युतदर्शनं स्यात् एव; (यतः) कालनद्या ह्रियमाणः कश्चन क्वचित् तरति। अयं भावः-यथा नद्यां ह्रियमाणानां तृणादीनां किञ्चित् कदाचित् तरति, तथा कर्मवशेन कालेन ह्रियमाणानां क्वचित् जीवानामापि मध्ये कश्चित् तरेदिति सम्भवतीत्यर्थः।

श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥42॥

श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। इसका भाव यह है-जिस प्रकार नदीमें बहते तिनकोंमेंसे कोई तिनका किनारे लग जाता है, उसी प्रकार कर्मके वशीभूत कालके प्रवाहमें बहते हुए जीवोंमेंसे कोई कभी तर जाता है, ऐसा सम्भव है॥44॥

सुकृतिमान् जीवका वर्णन :- संसार भ्रमिते कोन भाग्ये केह तरे। नदीर प्रवाहे येन काष्ठ लागे तीरे ॥43॥

अनुवाद-अनुभाष्य देखें॥43॥

338

बाइसवाँ अध्याय 22/45-48 ] भक्ति उन्मुखी सुकृतिके फलसे बद्धजीवको सिद्धिकी प्राप्ति :- कोन भाग्ये कारो संसार क्षयोन्मुख हय। साधुसङ्गे तरे, कृष्णे रति उपजाय ॥ 45 ॥ अनुवाद—किसी सौभाग्यसे जब जीवका संसारसे तरनेका समय आता है, तब उसका संसार क्षय होने लगता है और उसे साधुसङ्ग प्राप्त होता है। साधुसङ्गसे उसकी श्रीकृष्णमें रति उत्पन्न हो जाती है॥ 45 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यहाँपर 'भाग्य'-शब्दका अर्थ क्या केवल घटनामात्र है अथवा और कुछ है? भक्तिशास्त्र 'सुकृति'को ही 'भाग्य' कहते हैं। सुकृति तीन प्रकारकी है—भक्ति-उन्मुखी सुकृति, भोग-उन्मुखी सुकृति और मोक्ष-उन्मुखी सुकृति। जो सब कार्य संसारमें शुद्धभक्तिको उत्पन्न करनेवालेके रूपमें स्थिर किये गये हैं, वे सब कार्य भक्ति-उन्मुखी सुकृतिको उत्पन्न करते हैं। जिन सब कार्योंका फल—विषयभोग है, वे सब कार्य ही भोग-उन्मुखी सुकृति प्रदान करनेवाले हैं। जिन सब कार्योंका फल मोक्ष है, वे सब कार्य ही मोक्ष-उन्मुखी सुकृति उत्पन्न करनेवाले हैं। संसारके क्षय होनेपर स्वरूपधर्म श्रीकृष्णभक्तिका उद्घाटन करनेवाली सुकृति जब पुष्ट होकर फलोन्मुखी होती है, तभी भक्त साधुसङ्गमें संसारसे उद्धार प्राप्त करता है और श्रीकृष्णमें उसकी रति उत्पन्न होती है॥ 45 ॥ सुकृतिके फलसे साधुसङ्ग, उसके फलसे भजनमें प्रवृत्ति और अनर्थनिवृत्तिके क्रमसे साधनकी सिद्धि अथवा साध्य श्रीकृष्णप्रेमकी प्राप्ति :- श्रीमद्भागवत (10/51/53)में— भवापवर्गो भ्रवतो यदा भवे- ज्जनस्य तर्ह्यच्युत सत्समागमः। सत्सङ्गमो यर्हि तदैव सद्गतौ परावरेशे त्वयि जायते रतिः॥ 46 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 46 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे अच्युत, संसारमें भ्रमण करते-करते जब भवसागरसे पार होनेका फल उपस्थित होता है, तब यदि जीवको सत्सङ्गकी प्राप्ति होती है, तभी उसकी सद्गति और परमेश्वर-स्वरूप आपमें रति उत्पन्न होती है॥ 46 ॥ अनुभाष्य—कालयवन-दैत्यके पदके आघातसे निद्रासे उठे मुचुकुन्दके दृष्टिपातसे उनको देवताओंसे पूर्वमें प्राप्त वरके प्रभावसे कालयवनके भस्म होनेपर श्रीकृष्ण मुचुकुन्दको वर देनेके लिये उद्यत हुए, तब मुचुकुन्द श्रीकृष्णका स्तव कर रहे हैं— हे अच्युत, भ्रमतः (संसरतः) जनस्य यदा (भगवदनु- कम्पया) भवापवर्गः (भवस्य संसारस्य अपवर्गः अन्तः नाशः) भवेत्, (प्रातःकालः स्यादित्यर्थः), [तदा] सत्समागमः (साधुसङ्गः) भवेत्, यर्हि (यदा) सत्सङ्गमः हि भवेत्, [तदा] एव सद्गतौ (सर्वोत्तम-जनप्राप्ये नित्यपरमपदे) परावरेशे (भगवति कृष्णे) त्वयि रतिः (भक्तिः) जायते [ततो संसारात् मुच्यते इति भावः]॥ श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 46 ॥ श्रीकृष्णकी कृपासे ही गुरुकी कृपाकी प्राप्ति :- कृष्ण यदि कृपा करे कोन भाग्यवाने। गुरु-अन्तर्यामि-रूपे शिखाय आपने॥ 47 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 47 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पूर्वोक्त भक्ति-उन्मुखी-सुकृतिशाली व्यक्तिके निकट यदि कोई महात्मा पुरुष उपस्थित भी न हों, तथापि श्रीकृष्ण अन्तर्यामी-गुरुके रूपमें उसे शुद्धभक्तिकी शिक्षा प्रदान करते हैं॥ 47 ॥ श्रीमद्भागवत (11/29/6) में :- नैवोपयन्त्यपचितिं कवयस्तवेश ब्रह्मायुषापि कृतमृद्धमुदः स्मरन्तः। योऽन्तर्बहिस्तनुभृतामशुभं विधुन्व- न्नाचार्यचैत्यवपुषा स्वगतिं व्यनक्ति॥ 48 ॥ अनुवाद—हे ईश (भगवन्) ! ब्रह्माके समान आयु-प्राप्त । 339

[ 22/48-52 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला कवि (विद्वान) भी आपकी स्मृतिजनित आनन्दके द्वारा आपके प्रति कृतज्ञता स्वीकार करनेमें समर्थ नहीं हो पाते, क्योंकि आप अपार कृपावशतः देहधारी जीवके समस्त अशुभोंके नाश और स्वगति प्रकाश करनेके लिये बाहरसे आचार्यरूपमें एवं भीतरसे अन्तर्यामीरूपमें अवस्थित हैं॥48॥ अनुभाष्य-आदिलीला 1/48 संख्या देखें॥48॥ दीक्षाके बाद सम्बन्धज्ञान और अभिधेयके फलसे अनर्थनिवृत्ति, रुचि, आसक्ति और प्राप्य-प्रयोजनकी प्राप्ति :- साधुसङ्गे कृष्णभक्त्ये श्रद्धा यदि हय। भक्तिफल 'प्रेम' हय, संसार याय क्षय॥49॥ अनुवाद-साधुसङ्गके प्रभावसे जब श्रीकृष्णभक्तिमें श्रद्धा होती है, तभी भक्तिके फल 'प्रेम'की प्राप्ति होती है और संसार क्षय हो जाता है॥49॥ श्रद्धावान् भक्तियोगी अतिभोगी अथवा अतित्यागी नहीं :- श्रीमद्भागवत (11/20/8)- यदृच्छया मत्कथादौ जातश्रद्धस्तु यः पुमान्। न निर्विण्णो नातिसक्तो भक्तियोगोऽस्य सिद्धिदः॥50॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥50॥ अमृतप्रवाह भाष्य-किसी भाग्यके उदित होनेपर जो पुरुष मेरी कथाके प्रति श्रद्धावान् होता है और वह अत्यन्त वैरागी अथवा फल्गुवैरागी भी नहीं होता एवं संसारमें अति आसक्त भी नहीं होता, उसीको ही भक्तियोग प्रेमभक्तिरूपी सिद्धि प्रदान किया करता है॥50॥ अनुभाष्य-श्रीउद्धवको तीन प्रकारके योगोंकी बात बतलाते हुए भगवान् श्रीकृष्ण भक्तियोगके अधिकारीका निर्णय कर रहे हैं- यदृच्छया (केनापि भाग्योदयेन) यः पुमान् मत्कथादौ (भगवत्कथा-श्रवण-कीर्तनादौ) तु जातश्रद्धः, [अथच] निर्विण्णः (अतिविरक्तः फल्गुवैराग्याश्रितः) न, अतिसक्तः (संसारे अत्यभिनिविष्टः) च न, अस्य (श्रद्धालोर्जनस्य एव) भक्तियोगः सिद्धिदः (अभीष्टप्रदः भवति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥50॥ गुरु और वैष्णव अथवा साधुकी कृपासे ही अनर्थनिवृत्ति और शुद्धभक्तिकी प्राप्ति :- महत्-कृपा बिना कोन कर्मे 'भक्ति' नय। कृष्णभक्ति दूरे रहु, संसार नहे क्षय॥51॥ अनुवाद-महत् अर्थात् शुद्ध श्रीकृष्णभक्तकी कृपाके बिना किसी भी प्रकारका कोई भी कार्य करनेपर किसीमें 'भक्ति' उत्पन्न नहीं हो सकती, श्रीकृष्ण भक्तिकी बातको तो छोड़ो, किसीके संसारका भी क्षय नहीं हो सकता॥51॥ अनुभाष्य-कर्मकाण्डीय किसी प्राकृत सुकृतिके द्वारा अप्राकृत श्रीकृष्णभक्ति नहीं होती। एकमात्र श्रीकृष्णभक्तकी कृपाके अतिरिक्त अप्राकृत श्रीकृष्णभक्तिके उदित होनेकी सम्भावना नहीं है। श्रीकृष्णभक्तिकी बात तो दूर है, प्राकृतबुद्धिरूपी संसार तक भी नष्ट नहीं होता। श्रीकृष्णभक्तके अतिरिक्त अन्य किसी भी जीवमें महानताकी सम्भावना नहीं होती। श्रीकृष्णभक्त ही एकमात्र अप्राकृत हैं। प्राकृत-दर्शनसे कोई-कोई उन्हें 'प्राकृत' समझते हैं। परन्तु वास्तवमें समस्त प्राकृत वस्तुओंको परित्याग करनेवाले श्रीकृष्णभक्तको ही अतुलनीय श्रेष्ठ और जीवोंके एकमात्र प्रार्थनीय हितैषी जानना चाहिये। उनकी कृपाका भिक्षु बननेसे ही जीवके प्राकृत भोग दूर हो जाते हैं और अप्राकृत श्रीकृष्ण सेवाधिकार प्राप्त होता है॥51॥ शुद्धभक्तके आनुगत्यके बिना श्रीकृष्णप्राप्ति सुदुर्लभ :- श्रीमद्भागवत (5/12/12)में- रहूगणैतत् तपसा न याति न चेज्यया निर्वपणाद् गृहाद्वा। न च्छन्दसा नैव जलाग्निसूर्यै- र्बिना महत्पादरजोऽभिषेकम्॥52॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥52॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे रहूगण, महाजनोंके चरणोंकी 340 ।

बाइसवाँ अध्याय 22/52–54 ]

रजमें अभिषिक्त हुए बिना भगवान्की भक्ति तपस्याके द्वारा, वैदिक अर्चनादिके द्वारा, संन्यास-पालनके द्वारा, गृहस्थ-धर्मके पालनके द्वारा, वेदपाठके द्वारा अथवा जल-अग्नि-सूर्य [आदिकी उपासना] के द्वारा कभी भी प्राप्त नहीं होती ॥ 52 ॥ अनुभाष्य—सिन्धुसौवीरके राजा रहूगणके द्वारा ब्राह्मणकुलमें जन्में अवधूत भरतके मुखसे तत्त्वज्ञानका श्रवण करते समय उन्हें प्रणाम करके दुर्बोध अध्यात्म- योगकी सुबोधरूपमें व्याख्या करनेकी प्रार्थना करनेपर, ब्राह्मणवेषी महाभागवत परमहंस भरत रहूगणको पहले अविद्या और उसके विनाशक शुद्धज्ञानमयविग्रह भगवान् वासुदेवकी कथा सुनाकर बादमें भगवद्-प्राप्तिके उपायका वर्णन कर रहे हैं— हे रहूगण, महत्पादरजोऽभिषेकं (शुद्धकृष्णभक्तपदरेणुना अभिषेकनं) बिना (ऋते) एतत् (अप्राकृतं वासुदेवात्मक-भगवत्तत्त्वं) तपसा (वानप्रस्थधर्मेण) न, इज्यया (वैदिककर्मणा देवार्चनेनेत्यर्थः) च न, निर्वपणात् (योषित्सङ्गराहित्यात् संन्यासात् इत्यर्थः) न, गृहात् (योषित्सङ्गमूलकगृहमेध-यज्ञ-चालनात्) वा न, छन्दसा (वेदाभ्यासेन) न, जलाग्निसूर्यैः (तत्तदुपासितैः) न याति (न प्राप्नोति) एव। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 52 ॥

महत् अथवा शुद्ध वैष्णवकी कृपासे ही अनर्थनाश और उसके फलस्वरूप विष्णुपदकी प्राप्ति :— श्रीमद्भागवत (7/5/32)में— नैषां मतिस्तावदुरुक्रमाङ्घ्रिं स्पृशत्यनर्थापगमो यदर्थः। महीयसां पादरजोऽभिषेकं निष्किञ्चनानां न वृणीत यावत् ॥ 53 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 53 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जब तक मनुष्योंकी मति निष्किञ्चन भगवद्भक्तोंकी पदधूलिके द्वारा अभिषिक्त नहीं होती, तब तक वह अनर्थनाशक श्रीकृष्णचरणकमलोंका स्पर्श नहीं कर पाती ॥ 53 ॥

अनुभाष्य—देवर्षि नारद धर्मराज युधिष्ठिरको प्रह्लादके उपाख्यानका वर्णन कर रहे हैं। हिरण्यकशिपुके प्रश्नके उत्तरमें महाभागवत प्रह्लादने विष्णुकी नवधा भक्तिको ही एकमात्र सर्वश्रेष्ठ पाण्डित्य और शिक्षारूपमें वर्णन किया। इस बातसे क्रु षण्ड-अमर्ककी तीव्र भर्त्सना की। तब षण्ड-अमर्कने प्रह्लादकी स्वाभाविकी मतिको ही उनकी विष्णुभक्तिका कारण बतलाकर अपने ऊपर लगाये दोषका निवारण किया। तब हिरण्यकशिपुने प्रह्लादसे उनकी ऐसी वैष्णवी मतिका कारण बतलानेके लिये कहा। किन्तु प्रह्लाद उसके सम्बन्धमें कुछ भी नहीं कहकर विष्णुभक्ति- विरोधी गृहव्रती लोगोंके बन्धन और मोक्षका उपाय बतला रहे हैं— निष्किञ्चनानां (निरस्तसकलविषयाभिमानानां) महीयसां (महत्तमानां वैष्णवानां) पादरजोऽभिषेकं (पदरजसा अभिषेकनं लेपनं) यावत् न वृणीत (कुर्वीत), तावत् [श्रुतिवाक्यतो ज्ञातोऽपि] एषां (गृहव्रतानां) मतिः (प्रवृत्तिः) उरुक्रमाङ्घ्रिम् (उरुक्रमस्य पदं) न स्पृशति (न प्राप्नोति असम्भावनादिभिर्विहन्यते इत्यर्थः); अनर्थापगमः (अनर्थस्य असदवग्रहस्य, तत्पदस्पर्शविघ्नस्य संसारस्येत्यर्थः अपगमः विनाशः) यदर्थः (यस्याः अङ्घ्रिस्पर्शिन्‍याः मतेः अर्थं फलं, महदनुग्रहाभावान्न तत्त्वनिश्चयः नापि मोक्षस्तेषामित्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 53 ॥

साधुके आधे क्षणके सङ्गके फलसे ही जीवकी चिद्-वृत्ति श्रीकृष्ण-सेवाका प्रबोध और साध्यकी प्राप्ति :— 'साधुसङ्ग' 'साधुसङ्ग'—सर्वशास्त्रे कय। लवमात्र साधुसङ्गे सर्वसिद्धि हय ॥ 54 ॥ अनुवाद—इसलिये सभी शास्त्र 'साधुसङ्ग', 'साधुसङ्ग' करनेके लिये कहते हैं, क्योंकि लवमात्रके (पलक झपकनेके समयके) साधुसङ्गसे सर्वसिद्धिकी प्राप्ति होती है ॥ 54 ॥ अनुभाष्य—'लव'—निमेषकाल, सवा ग्यारह 'लव'का एक सैकेण्ड होता है ॥ 54 ॥

। 341

[ 22/55-59 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

साधुसङ्गकी महिमा :- श्रीमद्भागवत (1/18/13)में- तुलयाम लवेनापि न स्वर्गं नापुनर्भवम्। भगवत्सङ्गिसङ्गस्य मर्त्यानां किमुताशिषः॥ 55॥

अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 55॥

अमृतप्रवाह भाष्य-भगवान्के सङ्गीके सङ्गके द्वारा जीवका जो असीम मङ्गल होता है, उसके साथ स्वर्ग अथवा मोक्षकी बिल्कुल भी तुलना नहीं की जा सकती (अति तुच्छ धन-वैभवादिके सम्बन्धमें तो क्या कहना?)॥ 55॥

अनुभाष्य-शौनकादि ऋषि यज्ञानुष्ठान आदि तुच्छ कर्मकाण्डमें स्वयंके व्यर्थके परिश्रमका उल्लेख करके महाभागवत हरिकथा-कीर्तनकारी श्रीसूतके सङ्गके माहात्म्यका वर्णन कर रहे हैं-

(हे सूत,) भगवत्सङ्गिसङ्गस्य (भगवत्सङ्गी हरिजनः तस्य सङ्गस्य) लवेन (अत्यल्पक्षणेन) अपि स्वर्गम् (आदर्शसुख-भोगस्थानं) न तुलयाम (तुल्यं न पश्याम), अपुनर्भवं (मोक्षं वा) न [तुलयाम]; मर्त्यानां (प्राकृतदेवविप्रराजन्वादीनाम्) आशिषः (अतितुच्छाः वित्त-वैभवाद्याः) किमुत (किं वक्तव्यं, नैव तुलयामेत्यर्थः)।

श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 55॥

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥ 58॥

अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 57-58॥

अमृतप्रवाह भाष्य-(हे अर्जुन,) तुम मेरे अत्यन्त आत्मीय (प्रिय) हो, इसलिये तुम्हें तुम्हारे हितके लिये सर्वगुह्यतम (सबसे गोपनीय) सर्वश्रेष्ठ उपदेश दे रहा हूँ,-तुम अपना मन पूर्णरूपसे मुझमें लगा दो, मेरे भक्त बनो और मेरा ही अर्चन करो और मेरे शरणागत होवो, तब तुम मुझे निश्चय ही प्राप्त करोगे। तुम मेरे अत्यन्त प्रिय हो, इसलिये मैंने अपनी इस प्रतिज्ञा-वाक्यको तुमसे कहा है॥ 57-58॥

अनुभाष्य- हे अर्जुन, मे (मम) सर्वगुह्यतमम् (अत्यन्तगोप्यं) परमं वचः (वाक्यं) भूयः (पुनः) शृणु; (यतः) मे (मम) दृढम् (अत्यन्तम्) इष्टः (प्रियतमः) असि, ततः (तस्माद्धेतोः) ते (तव) हितं (मङ्गलं) वक्ष्यामि (कथयामि)-[त्वं] मन्मना (मच्चित्तः) मद्भक्तः (मद्भजनशीलः) मद्याजी (मदर्चनशीलः) भव, माम् (अन्यप्राकृतदेवादीन् परित्यज्य अप्राकृतं मां कृष्णरूपम् एव) नमस्कुरु [एवं वर्तमानस्त्वं मत्प्रसादात् शुद्धभक्त्या] माम् एव एष्यसि (प्राप्स्यसि) [अत्र च संशयं मा कार्षीः]; त्वं हि मे प्रियः असि, (अतः) सत्यं (यथा भवति एवं) ते (तुभ्यम्) अहं प्रतिजाने (प्रतिज्ञां करोमि)।

श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 57-58॥

गीताकी शिक्षा :- कृष्ण कृपालु अर्जुनेरे लक्ष्य करिया। जगतेरे राखियाछेन उपदेश दिया॥ 56॥

अनुवाद-श्रीकृष्ण इतने कृपालु हैं कि उन्होंने अर्जुनको लक्ष्य करके अपने उपदेशोंको प्रदान करके जगत्की रक्षा की है॥ 56॥

पहले कर्मज्ञानयोगादिको अभिधेय कहनेपर भी, सबसे अन्तिम आज्ञा श्रीकृष्णभक्ति ही एकमात्र अभिधेय और विधि :- पूर्व आज्ञा,-वेद-धर्म, कर्म, योग, ज्ञान। सब साधि' अवशेषे एइ आज्ञा-बलवान्॥ 59॥

श्रीकृष्णप्राप्तिके उद्देश्यसे ही सभी क्रियाएँ करना कर्त्तव्य :- श्रीमद्भगवद्गीता (18/64-65)- सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः। इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्॥ 57॥

अनुवाद-श्रीकृष्णने भगवद्-गीतामें पहले वेद-धर्म, कर्म, योग और ज्ञान आदिके भली-भाँति पालन करनेका उपदेश प्रदान किया है, किन्तु उनके द्वारा दिया गया उपरोक्त अन्तिम उपदेश सबसे बलवान है और अन्य सभी उपदेशोंसे ऊपर है॥ 59॥

342

बाइसवाँ अध्याय 22/60-63 ] सभी धर्मोंको छोड़कर श्रीकृष्ण भजनकी चेष्टा :- एइ आज्ञाबले भक्तरे 'श्रद्धा' यदि हय। सर्वकर्म त्याग करि' से कृष्णेरे भजय ॥ 60 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके इस उपदेशके बलमें यदि किसी भक्तकी 'श्रद्धा' होती है, तब वह भक्त सब प्रकारके कर्मोंका त्याग करके श्रीकृष्णका ही भजन करता है॥ 60॥ श्रीमद्भागवत (11/20/9) :— तावत् कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता। मत्कथाश्रवणादौ वा श्रद्धा यावन्न जायते ॥ 61 ॥ अनुवाद—जब तक कर्ममार्गमें निर्वेद (वैराग्य) उदित न हो, अथवा मेरी कथा-श्रवणादिमें श्रद्धा उत्पन्न न हो, तब तक नित्य-नैमित्तिकादि कर्म करने चाहिये ॥ 61 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 9/266 संख्या देखें ॥ 61 ॥ श्रद्धाकी संज्ञा :- 'श्रद्धा'-शब्दे विश्वास कहे सुदृढ़ निश्चय। कृष्णे भक्ति कैले सर्वकर्म कृत हय ॥ 62 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 62 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'श्रीकृष्ण भक्ति करनेसे सब कार्य करना हो जाता है'—ऐसे सुदृढ़ निश्चयात्मक विश्वासको भक्तिका अधिकार प्रदान करनेवाली 'श्रद्धा' कहते हैं ॥ 62 ॥ अनुभाष्य—सुदृढ़ निश्चयात्मक विश्वासको 'श्रद्धा' कहते हैं; श्रीकृष्णकी सेवा करनेसे संसारके समस्त पितरों-प्रणियों-देवोंके ऋणको चुकानेके लिये कुछ भी करनेकी आवश्यकता नहीं रहती। बद्धजीव भोगोंकी सामग्री जुटानेके लिये कर्म करता है। भगवद्भक्तिके उदित होनेपर कर्मफलके लिये चेष्टा नहीं करनी पड़ती। कर्मफलकी सबसे उत्तम प्राप्य वस्तु 'वैराग्य' सदैव भक्तोंमें आनुषङ्गिक रूपमें रहता है॥ 62॥ श्रीकृष्णके पूजनसे ही सभीकी पूजा :— श्रीमद्भागवत (4/31/14)— यथा तरोर्मूलनिषेचनेन तृप्यन्ति तत्स्कन्धभुजोपशाखाः। प्राणोपहाराच्च यथेन्द्रियाणां तथैव सर्वार्हणमच्युतेज्या ॥ 63 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 63 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिस प्रकार वृक्षकी जड़में जल सींचनेसे, उस वृक्षके स्कन्ध, भुजाएँ, उपशाखाएँ आदि सभी तृप्त हो जाते हैं अथवा प्राणोंकी तृप्तिसे ही जिस प्रकार सभी इन्द्रियोंकी तृप्ति होती है, उसी प्रकार श्रीकृष्णकी पूजा करनेसे ही समस्त देवताओंकी पूजा हो जाती है ॥ 63 ॥ अनुभाष्य—प्रजापति दक्षके पुत्र प्रचेतागणोंके द्वारा अपने गुरुदेव देवर्षि श्रीनारदके दर्शन करके उनसे पुनः आत्मतत्त्व अर्थात् श्रीहरिकी कथाका कीर्तन करनेका अनुरोध करनेपर श्रीनारद सर्वभूतात्मा श्रीहरिके माहात्म्यका वर्णन कर रहे हैं— यथा तरोः (वृक्षस्य) मूलनिषेचनेन (पाददेशे जलप्रक्षेपेण) तत्स्कन्धभुजोपशाखाः (स्कन्धादिपत्रपुष्पाद्यन्तानि सर्वाणि वृक्षाङ्गानि) तृप्यन्ति [न तु मूलसेकं बिना ताः स्वस्वनिषेचनेन], यथा प्राणोपहारात् (प्राणस्य उपहारः भोजनं तस्मात्) इन्द्रियाणां च तृप्तिः [न तु तत्तदिन्द्रियेषु पृथक् पृथगन्नलेपनेन], तथा अच्युतेज्या (भगवतः विष्णोः अर्चनम्) एव सर्वार्हणं (सकल-देवताराधनं, न हि पृथगुपासनायामावश्यकतास्तीत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद—जिस प्रकार वृक्षकी जड़में जल सींचनेसे, उस वृक्षके स्कन्ध, भुजाएँ, उपशाखाएँ आदि सभी तृप्त हो जाते हैं [न कि जड़को सींचनेके बदले स्कन्ध, शाखाओं आदिको सींचनेपर] अथवा प्राणोंकी तृप्तिसे ही जिस प्रकार सभी इन्द्रियोंकी तृप्ति होती है [न कि इन्द्रियोंको पृथक् पृथक् रूपसे आहार देनेपर], उसी प्रकार श्रीकृष्णकी पूजा करनेसे ही समस्त देवताओंकी पूजा हो जाती है अर्थात् उनकी पृथक् । 343

[ 22/63-68 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला रूपसे उपासना करनेकी आवश्यकता नहीं है—यह अर्थ है॥ 63 ॥ भक्तिके अधिकारी (तीन प्रकारके भक्तिके अधिकारियोंका) निर्णय और भेद :- श्रद्धावान् जन हय भक्ति-अधिकारी। 'उत्तम', 'मध्यम', 'कनिष्ठ'—श्रद्धा-अनुसारी॥ 64 ॥ अनुवाद—श्रद्धावान् व्यक्ति ही भक्तिके अधिकारी हैं। श्रद्धाके अनुसार ही वे 'उत्तम', 'मध्यम' और 'कनिष्ठ' अधिकारके भक्त होते हैं॥ 64 ॥ अनुभाष्य—श्रद्धावान् अर्थात् जो श्रीकृष्णको केवल वास्तव-वस्तु, नित्यसत्य और परमार्थ जानता है। जिसका श्रीकृष्णमें ऐसा सुदृढ़-निश्चयात्मक विश्वास है, वही भक्तिका अधिकारी होता है। भक्तके विश्वासकी निश्चयात्मक दृढ़ताके तारतम्यसे ही उत्तम, मध्यम और कनिष्ठ अधिकारका निर्णय होता है॥ 64 ॥ (1) उत्तम-अधिकारीकी संज्ञा :- शास्त्रयुक्त्ये सुनिपुण, दृढ़श्रद्धा याँर। 'उत्तम-अधिकारी' सेइ तारय संसार॥ 65 ॥ अनुवाद—जो भक्त शास्त्रों और शास्त्रोंकी युक्तियोंमें अत्यन्त निपुण है और जिसकी श्रीकृष्णमें दृढ़ श्रद्धा है, वह 'उत्तम-अधिकारी' है। वह सारे संसारका उद्धार कर सकता है॥ 65 ॥ अनुभाष्य—(भःरःसिः पूःविः द्वितीय लहरी वैधीभक्तिके वर्णनमें श्लोक 11)में श्रीरूपगोस्वामिपादने लिखा है— “शास्त्रे युक्तौ च निपुणः सर्वथा दृढ़ निश्चयः। प्रौढ़ाश्रद्धोऽधिकारी यः स भक्तावुत्तमो मतः॥” अर्थात् “भक्ति-शास्त्रोंमें दक्ष और उसके अतिरिक्त अन्यान्य मार्गोंके खण्डनमें दृढ़ युक्तिमें प्रवीण,—ऐसे प्रौढ़ श्रद्धावाले व्यक्ति ही भक्तोंमें 'उत्तम-अधिकारी' हैं॥”65॥ (2) मध्यम-अधिकारीकी संज्ञा :- शास्त्र-युक्ति नाहि जाने दृढ़, श्रद्धावान्। 'मध्यम-अधिकारी' सेइ महाभाग्यवान्॥ 66 ॥ अनुवाद—जो शास्त्रोंकी युक्तियोंको भली-भाँति नहीं जानता, किन्तु दृढ़ श्रद्धावान् है, वह महाभाग्यवान् व्यक्ति 'मध्यम-अधिकारी' है॥ 66 ॥ (3) कनिष्ठ-अधिकारीकी संज्ञा :- याहार कोमल श्रद्धा, से 'कनिष्ठ' जन। क्रमे क्रमे तैं हो भक्त हइबे 'उत्तम'॥ 67 ॥ अनुवाद—जिसकी श्रद्धा कोमल और आसानीसे बदलनेवाली है, वह कनिष्ठ-अधिकारी है। परन्तु भक्तिकी प्रक्रियाका पालन करनेपर क्रमशः वह भी 'उत्तम' भक्तके स्तरपर पहुँच जाता है॥ 67 ॥ भक्तके तारतम्यका कथन :- रति-प्रेम-तारतम्ये भक्त—तर-तम। एकादश स्कन्धे तार करियाछे लक्षण॥ 68 ॥ अनुवाद—रति और प्रेमके तारतम्यसे भक्तोंमें भी तारतम्य होता है। श्रीमद्भागवतके ग्यारहवें स्कन्धमें इसके लक्षण बतलाये गये हैं॥ 68 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पहले कहे गये मतानुसार जिनके हृदयमें श्रद्धा हुई है, वे ही भक्तिके अधिकारी हैं। वे श्रद्धावान् व्यक्ति-'उत्तम', 'मध्यम' और 'कनिष्ठ'के भेदसे तीन प्रकारके हैं। जो शास्त्र और युक्तिमें दक्ष होकर दृढ़ श्रद्धावान् हुए हैं, वे—'उत्तमाधिकारी' हैं। जो दृढ़ शास्त्रयुक्ति नहीं जानते, किन्तु श्रद्धावान् हैं, वे—'मध्यमाधिकारी' हैं। जिनकी श्रद्धा दृढ़ नहीं हुई, वे 'कनिष्ठाधिकारी' हैं। इन तीन प्रकारके विभागके द्वारा भक्तोंका विभाग हुआ है, केवल ऐसा नहीं है, शुद्धभक्तिके अधिकारी व्यक्तिका भी विभाग हुआ है। 'कनिष्ठ-श्रद्धावान्' केवल 'श्रीकृष्ण भक्ति करना अच्छा है'—इतना ही विश्वास करता है, किन्तु शुद्धभक्ति क्या है और भक्तिके तटस्थ लक्षणोंके द्वारा सिद्ध प्रक्रिया क्या है, वह उसे नहीं जानता। इसलिये कोमल श्रद्धावालोंके हृदयमें ज्ञान-कर्मका मिश्रित भाव पाया जाता है। उसके दूर होनेपर साधक 'मध्यमाधिकारी' बन जाता है। पुनः वह मध्यमाधिकारवाली श्रद्धा शास्त्रयुक्तिके 344 ।

बाईसवाँ अध्याय 22/64-71 ] द्वारा जब दृढ़ होती है, तब वह 'उत्तमाधिकारी' बन जायेगा। यहाँ तक भक्तिका अधिकारका निर्णय हुआ है, अब भक्तोंका विभाग कर रहे हैं। रति और प्रेमके तारतम्यसे 'भक्त', 'भक्ततर' और 'भक्ततम',—ये तीन प्रकारके विभाग हैं॥ 64-68 ॥ अनुभाष्य—(भःरःसिः पूःविः द्वितीय लहरीके 12 श्लोकमें) श्रीरूपगोस्वामिपादने लिखा है,— “यः शास्त्रादिष्वनिपुणः श्रद्धावान् स तु मध्यमः। यो भवेत् कोमलश्रद्धः स कनिष्ठो निगद्यते॥” मध्यमभक्त श्रद्धावान् होनेपर भी शास्त्रादिके तात्पर्यमें उतना कुशल नहीं होता और जो कोमल श्रद्धावाला है, वही कनिष्ठ है। कनिष्ठाधिकारी अभक्तोंके सङ्गसे श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें कोमल श्रद्धासे भी विच्युत हो सकता है। मध्यमाधिकारी शास्त्रादिके तात्पर्यके द्वारा अभक्त-सङ्गके कुफलसे तत्क्षणात् मुक्त नहीं हो पानेपर भी शास्त्रादि और भक्त-सङ्गके प्रभावसे दृढ़ता प्राप्त करता है। अभक्त-सङ्ग किसी भी प्रकारसे उत्तमाधिकारीकी श्रद्धाकी हानि नहीं कर सकता। श्रद्धाकी वृद्धिके साथ-साथ भक्तका अधिकार उन्नत होता है। अजात-रुचि (जिनकी रुचि अभी उत्पन्न नहीं हुई है, ऐसे) वैध-भक्तकी श्रद्धाके परिमाणानुसार रतिका (जातरुचि-भक्तकी श्रद्धाको ही 'रति' कहते हैं) तारतम्य होता है। रतिके तारतम्यके भेदसे प्रेमभक्तिरसका तारतम्य होता है। ग्यारहवें स्कन्धमें श्रीभगवान् और उद्धवके संवादमें भक्तोंका अधिकार लिखा गया है॥ 66-68॥ उत्तमाधिकारी अथवा महाभागवतका लक्षण :- श्रीमद्भागवत (11/2/45-47)में— सर्वभूतेषु यः पश्येद्भगवद्भावमात्मनः। भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः ॥ 69 ॥ अनुवाद—जो उत्तम भागवत होते हैं, वे सभी प्राणियोंमें आत्माके भी आत्मरूप भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रको ही देखते हैं और आत्माके आत्मस्वरूप श्रीकृष्णमें समस्त जीवोंको देख पाते हैं॥ 69 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 8/274 संख्या देखें ॥ 69 ॥ मध्यमाधिकारीके लक्षण :— ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च। प्रेम-मैत्री-कृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः ॥ 70 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 70 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो भक्त ईश्वरमें प्रेम, भक्तोंसे मैत्री, मूर्ख व्यक्तियोंके प्रति कृपा और विद्वेषी लोगोंके प्रति उपेक्षा करता है, वह—'मध्यम भक्त' है॥ 70 ॥ अनुभाष्य—श्रीनारद वसुदेवको भागवतधर्मके विषयमें बतलाते हुए विदेहराज निमि और नवयोगेन्द्रके संवादका वर्णन कर रहे हैं। निमिके द्वारा तीन प्रकारके भक्तों अथवा भागवतोंके लक्षण और आचरणके सम्बन्धमें जिज्ञासा करनेपर उसके उत्तरमें नवयोगेन्द्रोंमेंसे एक हवि-ऋषिने कहा— यः ईश्वरे (भगवति कृष्णे) प्रेमाणं करोति, तदधीनेषु (उत्तम-मध्यम-कनिष्ठाधिकारिषु भगवद्भक्तेषु) मैत्रीं (शुश्रूषाप्रणति- समादरादि-यथोचितसख्यतां) करोति, बालिशेषु (भक्त्यनभिज्ञेषु) कृपां करोति, द्विषत्सु (भगवद्भागवतविरोधिजनेषु) उपेक्षां करोति (वीतरागं प्रदर्शयति, तेषां सङ्गं सर्वथा वर्जयतीत्यर्थः), सः (भागवतः) 'मध्यमः' (मध्यमसंज्ञकः एवम्भूतस्य भेदस्य दर्शनात्)। श्लोक-भावानुवाद—जो भगवान् श्रीकृष्णसे प्रेम करता है, भगवद्भक्तोंसे यथोचित मैत्री अर्थात् उत्तम भक्तोंकी सेवा और उनके प्रति प्रणति, मध्यम और कनिष्ठ भक्तोंका समादर और प्रीति करता है, भक्तिसे अनभिज्ञ लोगोंपर कृपा करता है, भगवान् और भागवतोंके विरोधी लोगोंकी उपेक्षा करता है अर्थात् उनके प्रति कोई राग न दिखलाकर उनके सङ्गका सर्वथा वर्जन करता है, वह भक्त 'मध्यम' स्तरका कहलाता है (वह इस प्रकार भेद-दर्शन करता है)।॥ 70 ॥ कनिष्ठाधिकारीके लक्षण :— अर्चायामेव हरये पूजां यः श्रद्धयेहते। न तद्भक्तेषु चान्येषु स भक्तः प्राकृतः स्मृतः ॥ 71 ॥ । 345

[ 22/71–75 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥71॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो लौकिक और पारिवारिक प्रथाके अनुसार परम्परागत श्रद्धाके साथ अर्चा-मूर्तिमें श्रीहरिकी पूजा करते हैं, परन्तु शास्त्र-अनुशीलनके द्वारा शुद्धभक्तितत्त्वको नहीं जाननेके कारण हरिभक्तोंकी पूजा नहीं करते, वे—'प्राकृत भक्त' हैं अर्थात् उन्होंने अभी भक्तिपर्व आरम्भ मात्र ही किया है। उन्हें 'भक्तप्राय' अथवा 'वैष्णवाभास' शब्दोंके द्वारा सम्बोधित किया जाता है॥71॥ तात्पर्य यह है कि जब कोई ईश्वरके प्रति 'प्रेम', भक्तोंके प्रति 'मैत्री', मूर्ख लोगोंके प्रति 'कृपा' और भगवद्-विद्वेषी और भगवद्भक्त-विद्वेषीकी 'उपेक्षा' कर सकता है, तभी वह शुद्धभक्तरूपमें 'मध्यमभक्त'में गिना जाता है। बादमें भजन करते-करते जब वह सभी प्राणियोंमें अपने सम्बन्धसे भगवद्भाव और आत्मस्वरूप भगवद्-पदार्थमें समस्त प्राणियोंकी विद्यमानता देखता है, तब उसका ईश्वर, उनके अधीन व्यक्ति (भक्त), मूर्ख और विद्वेषीके प्रति भेदभाव नहीं रहता; उस अवस्थामें वह 'भागवतोत्तम' कहलाता है॥69-71॥ अनुभाष्य— यः हरये (भगवते गुरवे आत्मानं निवेद्य) अर्चायां (श्रीविग्रहे) श्रद्धया (दीक्षितः सन् मिश्रत्वेन भक्त्याभासेन पाञ्चरात्रिकविधानेन) पूजाम् ईहते (करोति), तद्भक्तेषु (हरिजनेषु) पूजां न [ईहते भक्ततारतम्यज्ञानाभावात्] अन्येषु च (हरिविमुखसङ्गं च वर्ज्जयतीत्यर्थः), स भक्तः प्राकृतः (कनिष्ठः वैष्णवप्रायः, न तु शुद्ध इत्यर्थः) स्मृतः (कथितः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥71॥ शुद्धभक्त श्रीकृष्णके सभी गुणोंसे विभूषित :— सर्व महागुणगण वैष्णव-शरीरे। कृष्णभक्ते कृष्णेर गुण सकलि सञ्चारे॥72॥ अनुवाद—वैष्णवोंमें समस्त महान गुण विराज करते हैं। श्रीकृष्णके भक्तोंमें श्रीकृष्णके समस्त गुण स्वतः ही सञ्चारित होते हैं॥72॥ अनुभाष्य—श्रीभगवान् विष्णु ही भक्तोंकी एकमात्र उपास्य-वस्तु हैं; भगवद्-गुणसमूह भक्तोंकी ही सम्पत्ति हैं। भगवान्की समस्त गुणराशि शुद्धभक्तमें सञ्चारित होती है॥72॥ शुद्धवैष्णव—सर्वमहागुणोंसे गुणी, अवैष्णव—सर्वथा गुणहीन :— (श्रीमद्भागवत 5/18/12)— यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिञ्चना सर्वैर्गुणैस्तत्र समासते सुराः। हरावभक्तस्य कुतो महद्गुणा मनोरथेनासति धावतो बहिः॥73॥ अनुवाद—श्रीकृष्णमें जिनकी केवला भक्ति है, उन व्यक्तियोंमें समस्त गुणोंके सहित देवता वास करते हैं। हरिभक्तिविहीन व्यक्तियोंका मन सदा असत् बाह्य विषयोंमें दौड़ता रहता है, इसलिये उनमें महद्गुणोंका होना असम्भव है॥73॥ अनुभाष्य—श्रीशुकदेव परीक्षितसे 'भद्रश्रवा' नामक वर्षपति और उनके सेवकोंके द्वारा किये गये भगवान् श्रीनृसिंह और उनके शुद्धभक्तोंके स्तवगानका वर्णन कर रहे हैं। आदिलीला 8/58 संख्या देखें॥73॥ वैष्णवोंके छब्बीस गुण अथवा लक्षणोंका वर्णन :— सेइ सब गुण हय वैष्णव-लक्षण। सब कहा ना याय, करि दिग्दर्शन॥74॥ अनुवाद—वे सब गुण ही वैष्णवके लक्षण हैं। वैष्णवके समस्त गुणोंका वर्णन नहीं किया जा सकता, इसलिये मैं उनका केवल दिग्दर्शन ही करा रहा हूँ॥74॥ उनमेंसे श्रीकृष्णके प्रति शरणागति ही 'स्वरूप' लक्षण, अन्य सभी 'तटस्थ' लक्षण :— कृपालु, अकृतद्रोह, सत्यसार, सम। निर्दोष, वदान्य, मृदु, शुचि, अकिञ्चन॥75॥ 346 |

बाईसवाँ अध्याय [ 22/75-79 ] सर्वोपकारक, शान्त, कृष्णैकशरण। अकाम, निरीह, स्थिर, विजित-षड्गुण ॥ 76 ॥ मितभुक्, अप्रमत्त, मानद, अमानी। गम्भीर, करुण, मैत्र, कवि, दक्ष, मौनी ॥ 77 ॥ **अनुवाद—**श्रीकृष्णभक्त कृपाकी मूर्ति होता है। वह किसीसे भी वैर भाव नहीं रखता और उसके जीवनका सार है सत्य। वह समदर्शी, निर्दोष, दानी, मधुरस्वभाव और पवित्र होता है। वह धनादिके संग्रहसे सर्वथा दूर रहता है। वह सभीका उपकार करनेवाला, शान्त (निष्काम) और श्रीकृष्णमें पूर्ण शरणागत होता है। वह समस्त जागतिक कामनाओंसे रहित, किसी भी जागतिक वस्तुके लिये चेष्टारहित और भक्तिमें स्थिर रहता है। भूख-प्यास, शोक-मोह और जन्म-मृत्यु—ये छहों उसके वशमें रहते हैं। वह परिमित भोग स्वीकार करता है और प्रमादरहित (सावधान) होता है। वह दूसरोंको सम्मान देनेवाला और अपने सम्मानकी अभिलाषासे रहित होता है। वह गम्भीर स्वभावका होता है और उसके हृदयमें करुणा भरी होती है। वह सभीके साथ मित्रताका व्यवहार करता है, मेरे तत्त्वका उसे यथार्थ ज्ञान होता है और वह मेरे सम्बन्धकी बातें दूसरोंको समझानेमें बड़ा निपुण होता है। वह मौनी अर्थात् सदा श्रीकृष्णकथा ही कहता और सांसारिक विषयोंमें सदा मौन होता है॥ 75-77 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'कृपालु'से लेकर 'मौनी' तक गुणसमूह—वैष्णवोंके विशेष लक्षण हैं॥ 75-77 ॥ प्रमाण :— श्रीमद्भागवत (3/25/21)में— तितिक्षवः कारुणिकाः सुहृदः सर्वदेहिनाम्। अजातशत्रवः शान्ताः साधवः साधुभूषणाः ॥ 78 ॥ **अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 78 ॥ **अमृतप्रवाह भाष्य—**समस्त साधुओंमें सहनशीलता, जीवोंके दुःखमें दयार्द्र होना, प्राणिमात्रका ही नित्य मङ्गलविधान करना, सबको ही भगवान्के सेवक जानकर किसीको भी शत्रु नहीं मानना, निष्काम इसलिये शान्त होना—इन गुणोंसे युक्त होते हैं और ये गुण ही साधुओंके भूषण होते हैं॥ 78 ॥ **अनुभाष्य—**शौनक आदि ऋषियोंके द्वारा भगवान् कपिलदेवकी लीलाकथाकी जिज्ञासा करनेपर महाभागवत सूत उन्हें व्यास-सखा भगवान् मैत्रेयके द्वारा पूर्वकालमें विदुरके समक्ष वर्णित इस आत्मतत्त्व और भगवान् कपिल और देवहूतिके संवादका प्रसङ्ग वर्णन कर रहे हैं, कपिलदेव असद् वस्तुमें आसक्तिको ही जीवके बन्धनका कारण और सद्-वस्तुमें आसक्तिको ही मोक्षके द्वारके रूपमें वर्णन करके सद्वस्तु साधुओंके पहले 'तटस्थ', बादमें 'स्वरूप'-लक्षण बतला रहे हैं— (साधूनां लक्षणमाह—) तितिक्षवः (सहिष्णवः) कारुणिकाः (दयार्द्रचित्ताः) सर्वदेहिनां (सर्वजीवानां) सुहृदः (बान्धवाः) अजातशत्रवः (निर्वैराः) शान्ताः (निष्कामाः) साधुभूषणाः (साधु सुशीलं, तदेव भूषणं येषां ते) साधवः (शास्त्रानुवर्तिनः)। **श्लोक-भावानुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 78 ॥ महत् या वैष्णवोंकी सेवासे ही मायासे छुटकारा; स्त्री-सङ्गीकी सेवासे संसार-बन्धन और नरककी प्राप्ति :— (श्रीमद्भागवत 5/5/2)में— महत्सेवां द्वारमाहुर्विमुक्ते- स्तमोद्वारं योषितां सङ्गिसङ्गम्। महान्तस्ते समचित्ताः प्रशान्ता विमन्यवः सुहृदः साधवो ये ॥ 79 ॥ **अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 79 ॥ **अमृतप्रवाह भाष्य—**पण्डित लोग महत्-सेवाको ही वास्तविक मुक्तिका द्वार-स्वरूप और स्त्रियोंके प्रति जिनकी आसक्ति है, उनके सङ्गको ही तमोगुणका द्वार कहते हैं। जो साधु हैं, वे भगवान्में निष्ठायुक्त, समदर्शी, प्रशान्त, क्रोधरहित और सभीका मङ्गल करनेवाले हैं॥ 79 ॥ । 347

[ 22/79-80 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य—किसी समय राजर्षि भरतके पिता भगवान् ऋषभदेवने ब्रह्मावर्त्तमें उपस्थित होकर ऋषियोंके निकट उपदेश श्रवणमें रत पुत्रोंको मोक्षधर्म और पारमहंस्य-धर्मका वर्णन किया था— [तत्त्वकोविदाः] महत्सेवां (वैष्णवपरिचर्यां) विमुक्तेः (संसारबन्धनस्य) द्वारं (मोचनहेतुम्) आहुः (कथयन्ति) योषितां सङ्गिसङ्गं (स्त्रीसङ्गिविषयिणां भोक्तॄणां सङ्गं) तमोद्वारं (संसारस्य नरकस्य वा, द्वारं हेतुम् आहुः); [तत्र] ये समचित्ताः (समदर्शिनः पण्डिताः) प्रशान्ताः (शुद्धचित्ताः) विमन्यवः (क्रोधरहिताः) सुहृदः (बान्धवाः) साधवः (परदोषादर्शिनः), ते महान्तः [ज्ञेयाः]। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 79 ॥ साधुसङ्गके माहात्म्यका वर्णन; साधुसङ्गके फलसे ही श्रीकृष्णसेवाकी प्राप्ति :- कृष्णभक्ति-जन्ममूल हय 'साधुसङ्ग' । कृष्णप्रेम जन्मे, तँहो पुनः मुख्य अङ्ग ॥ 80 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 80 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—साधुसङ्ग यद्यपि प्रथमावस्थामें श्रीकृष्णभक्तिके उत्पन्न होनेका मूल कारण है, तथापि श्रीकृष्णप्रेम उत्पन्न होनेपर भी वही साधुसङ्ग ही पुनः प्रेमके मुख्य अङ्गमें गिना जाता है ॥ 80 ॥ अमृतानुकणा—साधुसङ्ग ही भक्तिराज्यमें प्रवेशका एकमात्र उपायस्वरूप है—'भक्तिस्तु भगवद्भक्तसङ्गेन परिजायते।' (वृहन्नारदीय पुराण)। “जिसका अपना स्वभाव अत्यन्त लुप्तप्राय है, उसको कौन जाग्रत करेगा? कर्म, ज्ञान और वैराग्यकी चेष्टासे वह जाग्रत नहीं होगा, इसलिये जिसका किसी सौभाग्यसे निज-स्वभाव जाग्रत होता है, उनके (अर्थात् भगवद्भक्तोंके) सङ्गबलसे ही जीवका गुप्तप्राय निज-स्वभाव जाग्रत हो सकता है। इस विषयमें दो घटनाओंका होना आवश्यक है। जो निज-स्वभावको जाग्रत करनेकी इच्छा करते हैं, वे पूर्व भक्ति-उन्मुखी सुकृतिके द्वारा कुछ परिमाणमें शरणागति लक्षणवाली श्रद्धा प्राप्त करते हैं—यह एक घटना है। उस सुकृतिके बलसे उनको किसी उपयुक्त साधुका सङ्ग होता है—यह दूसरी घटना है।” (दशमूल-निर्याास)। उसके बाद साधुसङ्गसे ही श्रवण-कीर्त्तनादि समस्त भजनक्रिया आरम्भ होती है, अन्यथा यह सम्भव नहीं है। इसलिये श्रद्धाको श्रीकृष्णभक्ति-लताका अङ्कुर कहनेपर साधुसङ्गको उसका मूल कहना होगा— “आदौ श्रद्धा ततः साधुसङ्गोऽथ भजनक्रिया। ततोऽनर्थनिवृत्तिः स्यात् ततो निष्ठा रुचिस्ततः॥ अथासक्तिस्ततो भावस्ततः प्रेमाभ्युदञ्चति। साधकानामयं प्रेम्णः प्रादुर्भावे भवेत् क्रमः॥” [अर्थात् “सर्वप्रथम श्रद्धा, तदनन्तर साधुसङ्ग, उसके पश्चात् भजनक्रिया, तदनन्तर अनर्थनिवृत्ति, उसके पश्चात् निष्ठा, तदनन्तर रुचि और उसके बाद आसक्ति, तत्पश्चात् भाव और भावके बादमें प्रेमका उदय होता है। साधकोंके हृदयमें प्रेम उत्पन्न होनेका यह क्रम निरूपित हुआ है।”] साधुसङ्गके बिना कोई जब भी अपनी कपोल- कल्पनासे उत्पन्न उपायका सहारा लेगा, तभी माया श्रीकृष्णभक्तिका छल करके उसको भक्तिमार्गसे भ्रष्ट करा देगी और फलभोगवादी-कर्मी, अथवा अभेद- ब्रह्मानुसन्धानपरक ज्ञानी, अथवा सहजिया, सखीभेकी, कर्मजड़-स्मार्त्तबुद्धिपर गोसाईं, आउल, बाउल आदि श्रीकृष्ण बहिर्मुख दलमें शामिल करा देगी। साधुसङ्ग ही भक्तिप्रतिकूल मार्गके अनुसरणकी प्रवृत्तिके मूलको काटनेवाला है। साधुओंके प्रकृष्ट सङ्गमें ही श्रीभगवान्‌की हृदय और कानोंको रसायन लगनेवाली कथाओंकी चर्चा होती है। उन कथाओंको सुनते-सुनते अविद्यानिवृत्ति मार्गस्वरूप भगवान्‌के चरणकमलोंमें क्रमशः साधनभक्ति, भावभक्ति और अन्तमें प्रेमभक्ति प्राप्त होती है। प्रेमभक्ति प्राप्त होनेके बाद भी साधुसङ्ग पुनः प्रेमके मुख्य अङ्गके रूपमें ही निर्णित हुआ है, इसलिये साधुसङ्गके नित्य होनेकी घोषणा की गयी है। इसका तात्पर्य यह है कि भक्तिकल्पलताके आश्रित साधकभक्त साधुसङ्गके द्वारा परम प्राप्य प्रेमफल प्राप्त करनेके बाद 348 ।

बाइसवाँ अध्याय 22/80-84 ] भी उक्त कल्पलताकी क्रमशः ऊपरवाली शाखाओंमें और-भी सब उत्तरोत्तर आस्वादन और वैशिष्ट्यसे युक्त 'स्नेह', 'मान', 'प्रणय', 'राग', 'अनुराग', 'महाभाव'-नामक विराजमान फलोंको प्राप्त नहीं करते। इसका कारण यह है उनके आस्वादनजनित उष्णता, शीतलता और सम्मर्दनको सहनेकी योग्यता साधककी देहमें नहीं है। बादमें स्वरूपानुबन्धी सिद्धदेह प्राप्त करके नित्यसिद्ध रागात्मिक भगवत्पार्षद गुरुवर्गोंके सङ्गके द्वारा ही साधनसिद्ध भक्तोंमें क्रमशः स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग, भाव और महाभाव सभी उदित होते हैं॥80॥ सुकृति-फलसे साधुसङ्ग, उसके फलस्वरूप श्रीकृष्णभक्ति :- श्रीमद्भागवत (10/51/53)में- भवापवर्गो भ्रमते यदा भवे- ज्जनस्य तर्ह्यच्युत सत्समागमः। सत्सङ्गमो यर्हि तदैव सद्गतौ परावरेशे त्वयि जायते रतिः॥81॥ अनुवाद-हे अच्युत, संसारमें भ्रमण करते-करते जब भवसागरसे पार होनेका फल उपस्थित होता है, तब यदि जीवको सत्सङ्गकी प्राप्ति होती है, तभी उसकी सद्गति और परमेश्वर-स्वरूप आपमें रति उत्पन्न होती है॥81॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 22/46 संख्या देखें॥81॥ सत्सङ्ग ही परमधन :- श्रीमद्भागवत (11/2/30)में- अत आत्यन्तिकं क्षेमं पृच्छामो भवतोऽनघाः। संसारेऽस्मिन् क्षणार्द्धोऽपि सत्सङ्गः सेवधिर्नृणाम्॥82॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥82॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे निष्पाप ऋषियों, मैं आपसे जीवोंके आत्यन्तिक (सर्वोत्तम) मङ्गलके विषयमें जिज्ञासा कर रहा हूँ, क्योंकि संसारमें आधे क्षणके परिमाणका साधुसङ्ग भी जीवोंके लिये अमूल्य रत्ननिधि है॥82॥ अनुभाष्य-श्रीवसुदेवको श्रीनारद भागवतधर्मके विषयमें सुनाते हुए विदेहराज निमि और नवयोगेन्द्रके संवादका वर्णन कर रहे हैं। महाराज निमि यज्ञ कर रहे हैं, ऐसे समयमें महाभागवत नवयोगेन्द्र दैववश वहाँ उपस्थित हुए, उन्हें देख निमि उनकी यथाविधि पूजा करके कह रहे हैं- (हे) अनघाः, (निष्पापाः, निरवद्याः ऋषयः), अतः (भगवद्-भागवत-दर्शनदुर्लभत्वात्) भवतः (युष्मान्) आत्यन्तिकं (निरतिशयं) क्षेमं (कल्याणं) पृच्छामः ; [यतः] अस्मिन् संसारे (भवे) क्षणार्द्धः (अत्यल्पकालम्) अपि [स्थायी] सत्सङ्गः नृणां (पुंसां) सेवधिः (सर्वफलप्रदः निधिः-निधिलाभे यथानन्दो भवति, तथा परमानन्दः इत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥82॥ श्रीमद्भागवत (3/25/25)- सतां प्रसङ्गान्मम वीर्यसंविदो भवन्ति हृत्कर्णरसायनाः कथाः। तज्जोषणादाश्वपवर्गवर्त्मनि श्रद्धा रतिर्भक्तिरनुक्रमिष्यति ॥83॥ अनुवाद-साधुसङ्गमें हृदय और कानोंको रसपूर्ण लगनेवाली मेरी बलवती कथाओंकी आलोचना होती है। उन-उन कथाओंको श्रवण करते-करते अतिशीघ्र अपवर्ग पथस्वरूप मुझमें पहले श्रद्धा, तत्पश्चात् रति और अन्तमें प्रेमभक्ति उदित होती है॥83॥ अनुभाष्य-आदिलीला 1/60 संख्या देखें॥83॥ वैष्णवका आचार और अवैष्णवका निर्देश :- असत्सङ्गत्‍याग,–एइ वैष्णव-आचार। 'स्त्री-सङ्गी'–एक असाधु, 'कृष्णअभक्त' आर॥84॥ अनुवाद-वैष्णवोंको सदा ही असत्सङ्गका त्याग करना चाहिये, यही वैष्णव-आचार है। असत्सङ्ग दो प्रकारका है-'स्त्री-सङ्गी' अर्थात् स्त्रीके प्रति आसक्त व्यक्ति-एक प्रकारका असाधु है और 'श्रीकृष्ण-अभक्त' व्यक्ति-दूसरे प्रकारका असाधु है॥84॥ । 349

[ 22/84 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अमृतप्रवाह भाष्य—साधुसङ्ग जिस प्रकारसे ‘अन्वय’ अर्थात् प्रत्यक्षरूपमें वैष्णव-आचार है, असत्-सङ्गत्याग भी ‘व्यतिरेक’ अर्थात् अप्रत्यक्षरूपमें वैष्णव-आचार है। ‘असत्’—दो प्रकारका है; स्त्रीसङ्गी अर्थात् स्त्रीके प्रति आसक्त व्यक्ति एक प्रकारका ‘असाधु’ और ‘श्रीकृष्ण-अभक्त’ व्यक्ति—दूसरे प्रकारका ‘असाधु’ है। शुद्धभक्त इन दो प्रकारके असत्सङ्ग-त्यागमें विशेष रूपसे प्रयत्न करेंगे॥ 84॥ अनुभाष्य—अवैष्णवसङ्गका परित्याग ही वैष्णवोंका एकमात्र सदाचार है। ‘अवैष्णव’ कहनेसे ‘स्त्रीसङ्गी’ और ‘श्रीकृष्ण-अभक्त’,-इन दो श्रेणियोंके लोगोंको ही समझना चाहिये। स्त्रीसङ्ग दो प्रकारका है—‘वैधधर्मपर’ स्त्रीसङ्ग, जिसपर वर्णाश्रम-धर्म प्रतिष्ठित है और ‘अवैध’ स्त्रीसङ्ग, जो-अधर्मपर है और जिसके फलस्वरूप वर्णाश्रमधर्मके नियम भङ्ग होनेके कारण कर्मफल हेतु नरकादिकी प्राप्ति होती है। संसारमें पापपरायण व्यक्ति कदापि ‘वैष्णव’ नहीं कहे जा सकते। ‘धर्म’ ‘अर्थ’ और ‘काम’-नामक त्रिवर्ग स्त्रीसङ्गरूपी अवैष्णवाचारमें आबद्ध है। ‘मोक्ष’-नामक चतुर्थवर्ग स्त्रीसङ्गसे उत्पन्न नहीं होनेपर भी श्रीकृष्ण-विमुखताके कारण मोक्षाभिलाषी होनेपर स्त्रीसङ्गीकी अपेक्षा अधिक अवैष्णव और तुच्छ है। मायावादी और मायाविलासी,-दोनोंका सङ्ग ही वैष्णवता अथवा भक्तिनाशका कारण है। मायावादी मुक्तिकामी हैं अर्थात् वे मोक्षफलभोगकी कामनासे आत्माके उत्कर्षके लिये जड़भोगोंका त्याग करते हैं। और स्त्रीसङ्गी भोगी हैं। दोनों ही अपनी-अपनी जड़ेन्द्रियोंकी तुष्टिके लिये प्रयास करते हैं। वे श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्यान्य फलोंका अन्वेषण करनेवाले कपटतायुक्त होनेके कारण ‘श्रीकृष्णदास’ नहीं हैं॥ 84॥ अमृतानुकणा—“साधुसङ्गके प्रति कितना आदर उत्पन्न हुआ है, उसको जाननेका एकमात्र उपाय है, असत्सङ्ग-त्यागके प्रति हमारी कितना औदासीन्य (उदासीनता) या अनादर है। इसलिये असत्सङ्ग-त्यागको भी एक वैष्णव-सदाचारके मध्यमें गिना गया है, क्योंकि अवैष्णवोंका सम्पूर्णरूपसे अनादर या अनात्मबुद्धि नहीं आने तक वैष्णवमें आत्मीय-ज्ञान होनेकी आशा नहीं है। जिस परिमाणमें अवैष्णवमें परायेकी बुद्धि होगी, उसी परिमाणमें वैष्णवमें अपना माननेकी बुद्धि आयेगी। वास्तवमें यदि वैष्णवके साथ सम्बन्धयुक्त होनेकी इच्छा है, तब अवैष्णवके प्रति ममताको सबसे पहले त्याग करना होगा।”—“ततो दुःसङ्गमुत्सृज्य सत्सु सज्जेत बुद्धिमान्।” (भाः 11/26/26) ‘दुःसङ्ग’—स्त्रीसङ्ग और अभक्तसङ्ग, इन दो प्रकारका है। “इन्द्रियोंके द्वारा भोगकी जानेवाली वस्तुमात्र ही स्त्री है। उसके प्रति सम्पूर्णरूपसे प्रीति अथवा अभिनिवेश या ध्यान अथवा चित्तमें उसका सम्पूर्णरूपसे आधिपत्य करवा देनेका नाम ही ‘सङ्ग’ है। जीवकी इन्द्रियभोग्य सभी वस्तुएँ ही जड़ और अचेतन हैं। स्त्रीदेहधारी ही हो अथवा पुरुषदेहधारी ही हो, सभीकी देह जड़ है—इसलिये वह स्त्री ही है। स्त्रीदेहधारी अथवा पुरुषदेहधारी जीव जब भोगबुद्धि लेकर जड़देहमें अभिनिविष्ट होता है, तब वह स्त्रीसङ्गी होता है। अपनेमें श्रीकृष्ण-स्त्री (श्रीकृष्णशक्ति) या दृश्य (श्रीकृष्णके द्वारा दिखनेवाली वस्तु) होनेका अभिमान जहाँपर है, वहाँ स्त्रीसङ्ग नहीं है। पुरुष-अभिमान तथा द्रष्टा-अभिमान (में देखनेवाला हूँ, ऐसा अभिमान) रहनेपर ही स्त्रीसङ्ग होता है। भोक्ता-अभिमानके द्वारा भोग्य-ज्ञानसे दर्शन ही स्त्री-दर्शन है। जहाँ गुरु-दर्शन है, वहाँ स्त्री-दर्शन नहीं है। श्रीकृष्णवस्तुका (अर्थात् सभी वस्तुओंके भोक्ता एकमात्र श्रीकृष्ण हैं, ऐसा) दर्शन होनेपर फिर स्त्रीका (सभी वस्तुओंमें भोग्य होनेका) दर्शन नहीं रहता। जीवमात्र ही श्रीकृष्णशक्ति या श्रीकृष्णस्त्री है, इसलिये वह भोग्य नहीं है और त्याज्य भी नहीं है, परन्तु सेव्य है। श्रीपुरुषोत्तमके साथ सम्बन्धयुक्त होनेपर तुच्छ अधम-पुरुषत्व अभिमान दूर होकर स्त्री-दर्शनसे मुक्ति प्राप्त होती है।” “स्त्री-जातिको घृणा करके कोई कभी भी स्त्रीसङ्गसे 350 ।

बाइसवाँ अध्याय 22/84-87 ]

अपनी रक्षा नहीं कर सकता। उसमें केवल द्वेष अथवा तुच्छ-ज्ञान करनेसे आसक्ति और भी अधिक बढ़ जाती है। घृणा आसक्तिकी ही एक दिशा है। आसक्तिकी अपेक्षा घृणासे और भी अधिक अभिनिवेश होता है। आकार अर्थात् रूप दर्शन करते ही यह आसक्ति अथवा घृणा आ जाती है। भोग्य-ज्ञान करके बादमें घृणा या उपेक्षा करनेपर विपरीत चिन्ताके द्वारा प्रबल स्त्रीसङ्गी अवश्य ही होना होगा। कृत्रिम उपायसे स्त्रीसङ्ग या स्त्री-दर्शनसे मुक्ति नहीं हो सकती। शरणागत होकर ही श्रीकृष्णदास अभिमान जाग्रत होनेपर यह स्त्री-दर्शन दूर होगा। भोगनेत्रोंसे दर्शन करनेपर भोग्यका ही दर्शन होता है। इसलिये साधु-शास्त्र कानोंके द्वारा दर्शन करनेके लिये कहते हैं। 'श्रुति'के अनुगत होकर दर्शन करनेपर सेवोन्मुख शरणागत कानोंके द्वारा दर्शन करनेसे ही ठीक दर्शन होगा। ('स्त्रीसङ्ग घृणित'—दैनिक नदिया प्रकाश)। असत्सङ्गको अवश्य ही त्याग करना चाहिये। अभक्त कौन हैं? जो भगवान्‌के अनुगत नहीं हैं, वे ही अभक्त हैं। ज्ञानवादी पुरुष कभी भी भगवान्‌के अनुगत नहीं हैं। वे मनमें विचार करते हैं,-'मैं भी ज्ञानके बलसे भगवान्‌के समान हो जाऊँगा। ज्ञानके बलसे ही भगवान्‌की ब्रह्मता है और ज्ञानके बलसे मैं भी ब्रह्म हो जाऊँगा।' इसलिये ज्ञानवादियोंकी समस्त चेष्टाएँ ही भगवान्‌से स्वाधीन होती हैं। आत्मज्ञानी और प्राकृत-ज्ञानी लोग भी श्रीभगवान्‌की कृपाकी अपेक्षा नहीं करते। इसलिये ज्ञानीमात्र ही अभक्त हैं। यद्यपि कुछ ज्ञानी लोग साधनकालमें भक्तिको स्वीकार करते हैं, किन्तु वे सिद्धिकालमें भक्तिको विसर्जन कर देते हैं। इसलिये जो ज्ञानवादमें आसक्त हैं, उनकी अभक्तोंमें ही गणना की गयी है। कर्मवादी पुरुष भी भक्त नहीं हैं, इसलिये वे भी अभक्त हैं। श्रीकृष्णकृपा पानेके लिये यदि कोई कर्म करता है, तब उस कर्मका नाम 'भक्ति' है। जो कर्म, प्राकृत-फल या बहिर्मुख ज्ञान प्रदान करते हैं, वे कर्म भगवद्विमुख हैं। अपने स्वार्थके लिये किये गये कर्मोंको ही कर्म कहते हैं। इसलिये कर्मी व्यक्तियोंको भी अभक्त कहा जाता है।” “योगीगण भी कहींपर ज्ञानके फल कैवल्य-मोक्ष और कहींपर कर्मके फल विभूति (ऐश्वर्य) का अनुसन्धान करते हैं। इसलिये उनको भी अभक्त ही कहा गया है। अनेक देवोंके पूजकोंकी भी अनन्य शरणागति नहीं होनेसे उनको भी अभक्त कहा गया है। जो केवल शुष्क न्यायादिके विचारमें आसक्त हैं, वे भी भगवद्- बहिर्मुख हैं। जो इस प्रकार सिद्धान्त करते हैं कि, 'भगवान् एक काल्पनिक तत्त्वमात्र हैं, उनकी तो बात कहने योग्य नहीं है।' जिनको विषयोंमें आसक्त होकर भगवान्‌को स्मरण करनेके लिये समय नहीं मिलता, वे भी अभक्तोंके मध्यमें गिने जाते हैं। इन सब अभक्तोंका सङ्ग करनेसे अति अल्प समयमें बुद्धिनाश हो जाता है और उनके समान-प्रवृत्ति आकर हृदयमें बैठ जाती है। यदि किसीमें शुद्धभक्ति पानेकी वासना है, तो उसे विशेष रूपसे सतर्क रहते हुए अभक्त-सङ्ग परित्याग करना चाहिये।' ('सङ्गत्याग'—श्रील भक्तिविनोद ठाकुर) ॥ 84 ॥ स्त्री-सङ्ग और स्त्री-सङ्गीके सङ्गका भयानक परिणाम :- श्रीमद्भागवत (3/31/33-35)में— सत्यं शौचं दया मौनं बुद्धिर्हीः श्रीर्यशः क्षमा। शमो दमो भगश्चेति यत्सङ्गाद्याति संक्षयम् ॥ 85 ॥ तेष्वशान्तेषु मूढेषु खण्डितात्मस्वसाधुषु। सङ्गं न कुर्याच्छोच्येषु योषित्क्रीडामृगेषु च ॥ 86 ॥ न तथास्य भवेन्मोहो बन्धश्चान्यप्रसङ्गतः। योषित्सङ्गाद्यथा पुंसो यथा तत्सङ्गिसङ्गतः ॥ 87 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 85-87 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सत्य, पवित्रता, दया, मौन, बुद्धि, लज्जा, श्री, यश, क्षमा, शम, दम और ऐश्वर्य आदि सब कुछ ही जिनके सङ्गसे क्षय हो जाता है, उन शोचनीय आत्मविनाशकारी अशान्त मूर्ख स्त्री-क्रीड़ा- । 351

[ 22/85-89 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला मृग (स्त्रीके हाथके खिलौने) असाधुओंका सङ्ग कभी भी मत करना। अन्य किसी भी वस्तुसे जीवका ऐसा मोहका बन्धन नहीं होता, जैसा स्त्रीसङ्गसे और स्त्रीसङ्गीके सङ्गसे होता है॥ 85-87॥ अनुभाष्य- भगवान् कपिलदेव देवहूतिको पाप-पुण्यके कारण श्रीकृष्णविमुख स्वरूप-विस्मृत जीवके जन्मसे पूर्व योनि-भ्रमण और गर्भवास-यन्त्रणाका वर्णन करके जन्म होनेके बाद बाल्य, पौगण्ड और यौवन अवस्थामें अनेक प्रकारके इन्द्रियभोगों अथवा स्त्रीसङ्गकी स्पृहा, उसके प्रभाव और कुफलकी बात तीन श्लोकोंमें बतला रहे हैं- यत्सङ्गात् (येषां असतां सङ्गवशात्) सत्यं शौचं दया मौनं बुद्धिः (पारमार्थिकीत्यर्थः) ह्रीः श्रीः (भक्तिसम्पत्) यशः क्षमा शमः दमः भगः (ऐश्वर्यं वैभवं वा) इति संक्षयं (सम्यक् विनाशं) याति (प्राप्नोति), तेषु अशान्तेषु (जड़विषयभोग-लम्पटेषु) मूढेषु असाधुषु खण्डितात्मसु (प्राकृतदेहादौ अप्राकृतात्मबुद्धिषु) योषित्क्रीड़ा-मृगेषु (स्त्रीणां क्रीड़ामृगाः एकान्त-वशीभूताः तेषु स्त्रैणेषु) शोच्येषु (दुःखाश्रयेषु) असाधुषु (अवैष्णवेषु) सङ्गं न कुर्यात्। अस्य (पुंसः) यथा योषित्सङ्गात् (जड़भोक्तृबुद्धया भोग्य-सहवासेन), यथा [च] तत्सङ्गिसङ्गतः (योषिद्भोक्तॄणां रक्त-शुक्रमय-देहादौ आत्मबुद्धीनां वा सहवासेन), मोहः (बुद्धिनाशः) बन्धः (भवबन्धः) च भवेत्, तथा अन्यप्रसङ्गतः न भवेत्। श्लोक-भावानुवाद-जिन असत् लोगोंके सङ्गसे सत्य, पवित्रता, दया, मौन, बुद्धि (पारमार्थिक), लज्जा, श्री (भक्तिरूपी सम्पत्ति), यश, क्षमा, शम, दम और ऐश्वर्य आदि सब कुछ ही सम्पूर्णरूपसे नष्ट हो जाता है, उन जड़विषयभोग-लम्पट मूर्ख देहात्मबुद्धिवाले स्त्री-क्रीड़ा-मृग (स्त्रीके सम्पूर्ण वशीभूत) असाधुओंका सङ्ग कभी भी मत करना। अन्य किसी भी वस्तुसे जीवका ऐसा मोहका बन्धन नहीं होता, जैसा स्त्रीसङ्गसे (जड़भोगबुद्धिसे स्त्रीके भोग और सहवाससे) और स्त्रीसङ्गीके (स्त्रीभोगकामी जिसकी रक्त-शुक्रमय देहमें आत्मबुद्धि है, ऐसे व्यक्तिके सङ्गीके) सङ्गसे होता है॥ 85-87॥ हरिविमुख-सङ्गके प्रति भक्तका मनोभाव :- कात्यायनसंहिता-वचन- वरं हुतवहज्वाला-पञ्जरान्तर्व्यवस्थितिः। न शौरिचिन्ताविमुख-जनसंवासवैशसम्॥ 88॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 88॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अग्निकी ज्वालामें और पिञ्जरेमें बन्द होनेसे जो कष्ट होता है, उसे सहन करना तब भी उचित है, किन्तु श्रीकृष्णके चिन्तनसे बहिर्मुख व्यक्तियोंका कष्ट प्रदान करनेवाला सङ्ग कभी भी मत करना। तात्पर्य यह है कि यदि कभी भी आगमें जलकर मरने अथवा कारागारमें बन्द होना पड़े, उसे भी स्वीकार करना, किन्तु श्रीकृष्ण बहिर्मुख लोगोंके साथ सङ्ग मत करना॥ 88॥ अनुभाष्य- हुतवहज्वाला-पञ्जरान्तर्व्यवस्थितिः (प्रज्वलितवह्निश्खिायां पिञ्जरमध्यनिवासः अपि) वरं [प्रार्थनीयः तथापि] शौरिचिन्ताविमुख- जनसंवास-वैशसं (शौरेः कृष्णस्य चिन्तायाः विमुखः जनः तेन सह सम्यक् वासः, स एव वैशसं विपत्पातः) न। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 88॥ विष्णुभक्तिरहित व्यक्तिके प्रति व्यवहारकी विधि :- गोस्वामीपादोक्ति- मा द्राक्षीः क्षीणपुण्यान् क्वचिदपि भगवद्भक्तिहीनान् मनुष्यान्॥ 89॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 89॥ अमृतप्रवाह भाष्य-भगवद्भक्तिविहीन मन्द-भाग्य मनुष्योंको कभी भी मत देखना॥ 89॥ अनुभाष्य- भगवद्भक्तिहीनान् (कृष्णसेवाविहीनान्) क्षीणपुण्यान् (मन्दभाग्यान्) मनुष्यान् क्वचित् (लौकिक-मर्यादौ) अपि मा (न) अद्राक्षीः (पश्येत्)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 89॥ 352 |

Here is the Devanagari text transcribed from the image:

बाइसवाँ अध्याय 22/90 ] परमहंस अथवा निष्किञ्चन वैष्णवका आचरण :- एत सब छाड़ि' आर वर्णाश्रम धर्म। अकिञ्चन हञा लय कृष्णैक-शरण ॥ 90 ॥ अनुवाद - असत्सङ्गका पूर्ण त्याग और वर्णाश्रम धर्मकी उपेक्षा करके अकिञ्चन (सांसारिक आसक्तिरहित) होकर श्रीकृष्णकी शरण ग्रहण करनी चाहिये ॥ 90 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - इन दो प्रकारके असाधुसङ्ग और वर्णाश्रमधर्मकी आसक्तिका परित्याग करके अकिञ्चनभावसे एकमात्र श्रीकृष्णके शरणागत होओ ॥ 90 ॥ अमृतानुकणा-श्रीमन्महाप्रभुके इस वाक्यसे कोई-कोई ऐसा सोचते हैं कि महाप्रभुने वर्णाश्रम विचारको त्याग करनेके लिये कहा है। वे इस प्रसङ्गमें साध्य-साधन विचारके निर्णयके समय श्रीरामानन्द प्रभुके द्वारा कहे गये 'वर्णाश्रम-धर्म'के सम्बन्धमें महाप्रभुकी उक्ति 'एहो बाह्य' और महाप्रभुके द्वारा कहे गये "नाहं विप्रः”- श्लोकको वे उक्त विचारोंको पुष्ट करनेवाला मानते हैं। किन्तु वास्तवमें उसे कभी भी 'सिद्धान्त' नहीं कहा जा सकता। “महाप्रभुकी उक्ति ('एहो बाह्य')का तात्पर्य यह था,-हे रामानन्द ! स्थूल-लिङ्गदेहको नियमित करनेके लिये वर्णाश्रम-धर्म है। यदि कोई केवल उसीसे ही सन्तुष्ट होकर हरिभजन न करे, तब उसको क्या लाभ होगा ? इसलिये वर्णाश्रम-विधि बद्धजीवके एकमात्र शुद्ध-जीवनका उपाय होनेपर भी वह 'बाह्य' है। इसके द्वारा ऐसा सिद्धान्त नहीं करना होगा कि महाप्रभुने वर्णाश्रम-धर्मको दूरसे ही छोड़ देनेकी आज्ञा दी है। यदि ऐसा होता, तब अपनी जीवन-लीलामें गृहस्थ- अवस्थामें गृहस्थ-धर्म और संन्यास-अवस्थामें संन्यास- धर्म सम्पूर्णरूपसे पालन करके वे सभी जीवोंको शिक्षा नहीं देते। जब तक देह है, तब तक वर्णाश्रम-धर्मका आश्रय ग्रहण करना होगा, किन्तु वह सदा भक्तिके सम्पूर्ण अधिकारमें और अधीन रहेगा। वर्णाश्रम-धर्म 'परमधर्म'की नींवस्वरूप है। 'परमधर्म'की (भक्तिकी) परिपक्वता होनेपर उपेयकी (श्रीकृष्णप्रेमकी) प्राप्ति होनेके साथ-साथ उपायका (वर्णाश्रम-धर्मका) क्रमशः अनादर होता है। और देहत्यागके साथ ही उसका त्याग हो जाता है।" “श्रीरामानन्दके द्वारा उद्धृत श्लोकके आखिरमें यह कहा गया है कि 'विष्णुराराध्यते पन्था नान्यत्ततोष- कारणम्।' उससे यह जानना होगा कि वर्णाश्रम-धर्मके आश्रयके अतिरिक्त संसारी जीवका श्रीहरिभजनके अनुकूल जीवन उपायका और कोई मार्ग नहीं है। इसको भक्तजीवन प्राप्त करनेका एकमात्र मार्ग कहा जाता है।" ('साधुवृत्ति'-श्रील भक्तिविनोद ठाकुर)। 'नाहं विप्रः' श्लोक कहनेवाले श्रीमन्महाप्रभुने पुनः स्वयं ही “आमि त' संन्यासी, आमार समदृष्टि धर्म” (अन्त्यलीला 4/179), “आमि त' संन्यासी, आपनारे विरक्त करि मानि” (अन्त्यलीला 5/35), “भिक्षुक संन्यासी आमि निर्जनवासी” (अन्त्यलीला 9/64)- आदिरूपमें पुनः पुनः अपनेको वर्णाश्रमके अन्तर्गत संन्यासी कहकर उन्होंने घोषणा की है। इसलिये यहाँपर महाप्रभुके निज आचरणमें वर्णाश्रम परित्यागका कोई भी दृष्टान्त लक्षित नहीं होता। “चातुर्वर्ण्य मया सृष्टं" (गीता 4/13)-वर्णाश्रम-व्यवस्थाके जो सृष्टा हैं, वे स्वयं ही अवतीर्ण होकर फिर उक्त व्यवस्थाके उल्लङ्घनके उपदेशके द्वारा समस्त लोगोंको भ्रमित नहीं कर सकते। “उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्।” (गीता 3/24) - 'यदि मैं यथाविधि कर्म न करूँ, तब मेरे दृष्टान्तसे ये समस्त लोग भ्रष्ट हो जायेंगे।' “वर्णाश्रम दूर होनेपर मानवका वैज्ञानिक समाज विनष्ट होगा और 'पुनर्मूषिको भव' यह अभिशाप प्राप्त होकर स्वेच्छाचारी म्लेच्छोंके जैसे अवैध जीवनकी सुविधा प्राप्त करेंगे। जहाँ वर्णाश्रम-धर्म नहीं है, वहाँ निष्काम कर्मयोग और उसका साध्य ज्ञानयोग और चरमफलरूप भक्तियोग सुन्दररूपसे आचरित नहीं हो सकता।" (सज्जनतोषणी)। इसलिये श्रीमन्महाप्रभुने आदर्श दिखानेके लिये यथार्थ वर्णाश्रम-धर्मका स्वयं सुन्दररूपसे आचरण करके । 353

[ 22/90-94 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला वर्णाश्रम-व्यवस्थाके वास्तविक तात्पर्यका प्रदर्शन किया है—“चारि वर्णाश्रमी यदि कृष्ण नाहि भजे। स्वकर्म करिते से रौरवे पड़ि' मजे॥”(चै.च. मध्यलीला 22/26) यहाँपर महाप्रभुके “एत सब छाड़ि' आर वर्णाश्रम- धर्म। अकिञ्चन हैया लय कृष्णैकशरण॥” वाक्यमें उनके द्वारा पहले दिये गये उपदेश 'नाहं विप्रः' श्लोककी ही प्रतिध्वनि हुई है। वर्णाश्रमके अन्तर्गत अभिमान या उसके प्रति आसक्ति परमपुरुषार्थ-साधनके क्षेत्रमें नितान्त ही अनावश्यक है। वहाँ स्थूल-लिङ्गदेहगत वर्णाश्रमका परिचय कोई भी कार्य नहीं करता, इसलिये उस-उस अभिमान और उसके प्रति आसक्ति छोड़कर, यहाँ तक कि रूप-धन-विद्याके अभिमानका परित्याग करके अकिञ्चन होकर केवल अपने स्वरूपगत “गोपीभर्तुः पदकमलयोर्दासदासानुदासः” परिचयको ही ग्रहण करना होगा॥90॥ श्रीमद्भगवद्गीता (18/66)में :- सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥91॥ अनुवाद—समस्त धर्मोंका परित्याग करके एकमात्र, मैं जो भगवान् हूँ, मेरे शरणागत होओ। ऐसा करनेपर मैं तुम्हें समस्त पापोंसे मुक्त करूँगा। तुम शोक मत करो॥91॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 8/63 संख्या देखें॥91॥ श्रीकृष्ण ही एकमात्र भजनीय वस्तु :- भक्तवत्सल, कृतज्ञ, समर्थ, वदान्य। हेन कृष्ण छाड़ि' पण्डित नाहि भजे अन्य॥92॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण भक्तवत्सल हैं। वे कृतज्ञ, सर्वसमर्थ और परम उदार हैं। पण्डित व्यक्ति ऐसे श्रीकृष्णको छोड़कर अन्य किसीका भजन नहीं करते॥92॥ अनुभाष्य—भक्तवत्सल, कृतज्ञ, उदार और सामर्थ्यवान् श्रीकृष्णको छोड़ करके कोई भी पण्डित श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्यान्य तुच्छ वस्तुओंका भजन नहीं करते। जो श्रीकृष्णभजन छोड़कर जड़विषयोंके प्रति मुग्ध होते हैं, उनके समान मूर्ख आत्मघाती व्यक्ति अत्यन्त विरले होते हैं अर्थात् वे महामूर्ख होते हैं॥92॥ स्वयं तकको प्रदान कर देनेवाले सर्वात्मा श्रीकृष्ण :- श्रीमद्भागवत (10/48/26)में— कः पण्डितस्त्वदपरं शरणं समीया- द्भक्तप्रियादृतगिरः सुहृदः कृतज्ञात्। सर्वान् ददाति सुहृदो भजतोऽभिकामा- नात्मानमप्युपचयापचयौ न यस्य॥93॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥93॥ अमृतप्रवाह भाष्य—प्रिय, सत्यवादी, सुहृत् और कृतज्ञरूपी [भक्तप्रेमका प्रतिदान करनेवाले] आपको छोड़कर कौन पण्डित दूसरोंके शरणागत होते हैं? आप भजनशील सुहृद् व्यक्तियोंकी समस्त कामनाएँ पूर्ण करते हैं और स्वयं तकको भी दिया करते हैं, परन्तु आपमें ह्रास (कमी) और वृद्धि नहीं होती॥93॥ अनुभाष्य—भगवान् श्रीकृष्णके कुब्जाकी अभीष्ट- वाञ्छाको पूर्ण करके अक्रूरको हस्तिनापुरमें भेजनेकी इच्छासे बलरामजीके साथ उनके घरपर उपस्थित होनेपर, अक्रूर उनकी वन्दना करते-करते स्तव कर रहे हैं,— [यतो भवान्] भजतः (भजनशीलान्) सर्वान् सुहृदः (मित्रान्) अभिकामान् (सर्वतोभावेन कामान्), यस्य (च) उपचयापचयौ (ह्रासवृद्धी) न स्तः, (तादृशम्) आत्मानं (निजविग्रहम्) अपि ददाति, [अतः] भक्तप्रियात् (भक्तवत्सलात्) ऋतगिरः (सत्यवाचः) सुहृदः (बान्धवात्) कृतज्ञात् (भक्तप्रेमप्रतिदानकारिणः) त्वत्तः (त्वां बिना) अपरं शरणं (आश्रयं) कः पण्डितः समीयात् (गच्छेत्)? श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥93॥ उद्धव ही अनन्य-श्रीकृष्ण भजनके प्रमाण :- विज्ञ-जनेर हय यदि कृष्णगुण-ज्ञान। अन्य त्यजि' भजे, ताते उद्धव-प्रमाण॥94॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥94॥ 354 |

बाइसवाँ अध्याय 22/94-97 ] अनुभाष्य—श्रीकृष्णके गुणोंका ज्ञान होने मात्रसे ही अभिज्ञ (बुद्धिमान) व्यक्ति दूसरोंकी उपासनाको त्याग करके श्रीकृष्णका ही भजन करता है; इस विषयमें उद्धवजी ही प्रमाण हैं॥ 94॥ श्रीकृष्ण-दयाके सागर :- श्रीमद्भागवत (3/2/23)में— अहो बकी यं स्तनकालकूटं जिघांसयापाययदप्यसाध्वी। लेभे गतिं धात्र्युचितां ततोऽन्यं कं वा दयालुं शरणं व्रजेम॥ 95॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 95॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अहो, जिन श्रीकृष्णका वध करनेके लिये इस बकासुरकी बहन पूतनाने दुष्ट-वृत्तियुक्त होकर उन्हें स्तनपर लगाये कालकूट (विष)का पान कराया था और ऐसा करनेपर भी उसने माताके योग्य गतिको प्राप्त किया था, उनके (उन श्रीकृष्णके) अतिरिक्त अन्य किस दयालुके शरणागत हो सकता हूँ?॥ 95॥ अनुभाष्य—महाभागवत श्रील उद्धव श्रीकृष्णके वियोगके कारण शोकाकुल होकर विदुरजीसे श्रीकृष्णकी बाल्यलीला आदिका वर्णन कर रहे हैं,— अहो (आश्चर्य), बकी (पूतना) जिघांसया (हन्तुम् इच्छया अपि) स्तनकालकूटं (स्तनयोः गृहीतं कालकूटं विषं) यं (कृष्णम्) अपाययत्, असाध्वी (कृष्णविरोधिनी दुष्टा दानवी) अपि धात्र्युचितां (पालयित्र्याः स्तनदातृकायाः योग्यां) गतिम् (उत्तमां गतिं) लेभे, ततः (श्रीकृष्णात्) अन्यं (अपरं) कं वा दयालुं (वदान्यं) शरणं व्रजेम (भजेमेत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 95॥ परमहंस या वैष्णव ही श्रीकृष्णके प्रति समर्पितात्मा :- शरणागतेर, अकिञ्चनेर—एकइ लक्षण। तार मध्ये प्रवेशये 'आत्मसमर्पण'॥ 96॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 96॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'अकिञ्चन भक्त' और 'शरणागत भक्त'—इन दोनोंके एक ही लक्षण हैं। इन दोनोंमेंसे शरणागतका 'आत्म-समर्पण'-रूप एक लक्षण अधिक होता है॥ 96॥ छः प्रकारकी शरणागति :- हरिभक्तिविलास (11/417)में उद्धृत वैष्णवतन्त्रवाक्य— आनुकूल्यस्य सङ्कल्पः प्रातिकूल्य-विवर्जनम्। रक्षिष्यतीति विश्वासो गोप्तृत्वे वरणं तथा। आत्मनिक्षेप-कार्पण्ये षड्विधा शरणागतिः॥ 97॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 97॥ अमृतप्रवाह भाष्य—शरणागतिके छः प्रकारके लक्षण—(1) आनुकूल्य-सङ्कल्प अर्थात् 'श्रीकृष्णभक्तिके जो अनुकूल है, उसे मैं अवश्य ही स्वीकार करूँगा'—ऐसा सङ्कल्प; (2) प्रातिकूल्य-विवर्जन अर्थात् 'श्रीकृष्णभक्तिके जो प्रतिकूल है, उसका मैं अवश्य ही वर्जन (त्याग) करूँगा', इस भावनासे त्याग; (3) 'वे मेरी रक्षा करेंगे' अर्थात् 'श्रीकृष्णके अतिरिक्त मेरा और कोई रक्षा करनेवाला नहीं है', यह विश्वास—'अभेद ब्रह्मज्ञानके द्वारा मैं मृत्युसे बच सकता हूँ',—ऐसा विश्वास नहीं, 'श्रीकृष्ण कृपा करके मेरी रक्षा करेंगे',—ऐसा विश्वास; (4) श्रीकृष्णको 'गोप्ता' अथवा 'पालन करनेवाले'के रूपमें वरण करना अर्थात् 'समस्त कर्म करके मैं (कर्मोंके) उन-उन अधिष्ठातृ-देवताके द्वारा पालित होऊँगा',—ऐसे विश्वासको पूर्णरूपसे त्याग करके 'श्रीकृष्ण ही मेरे एकमात्र पालनकर्त्ता हैं और देवताओं तथा मनुष्योंमेंसे कोई भी मेरा पालनकर्त्ता नहीं हैं',—ऐसा अचल विश्वास; (5) आत्मनिक्षेप अर्थात् 'मेरी इच्छा स्वतन्त्र नहीं है, वह—श्रीकृष्णकी इच्छाके परतन्त्र है' ऐसी बुद्धि ही आत्मसमर्पण है, और (6) कार्पण्य अर्थात् स्वयंको दीन-हीन मानना॥ 97॥ अनुभाष्य— आनुकूल्यस्य (कृष्णभजनसहायस्य) सङ्कल्पः (सम्यक् निर्णयः, ग्रहणं वा), प्रातिकूल्यविवर्जनं (कृष्णभजनविरोधिवस्तु-सङ्गत्यागः), । 355

यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:

[ 22/97-98 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला मां रक्षिष्यति इति विश्वासः (दृढ़श्रद्धा,- “क्षेमं विधास्यति स नो भगवान्त्र्यधीशः" इत्यादि प्रकारः), गोप्तृत्वे (प्रभुत्वे, पालयितृत्वे, पतित्वे वा) वरणं (प्रार्थनम् अङ्गीकरणं वा- “त्वां प्रपन्नोऽस्मि शरणं देवदेवं जनार्दनम्। इति यः शरणं प्राप्तस्तं क्लेशादुद्धराम्यहम्॥” इति नारसिंहोक्तप्रकारम्), आत्मनिक्षेपकार्पण्ये (आत्मसमर्पणं “केनापि देवेन हृदिस्थितेन यथा नियुक्तोऽस्मि, तथा करोमि" इति गौतमीतन्त्रोक्तप्रकारं च, स्वीयदैन्यज्ञापकं कार्पण्यं “परमकारुणिको न भवत्परः परमशोच्यतमो न च मत्परः” इत्यादिप्रकारं च-काकुभाषणञ्चेत्यर्थः)- इति षड्विधा शरणागतिः (शरणापत्तिः)। श्लोक-भावानुवाद— [“आनुकूल्यस्य संकल्पः” - जो श्रीकृष्ण भजनमें सहायक है, उसको सम्पूर्ण रूपसे ग्रहण या वैसा सम्पूर्ण निर्णय करना। “प्रातिकूल्य-विवर्जनम्”- श्रीकृष्णभजन-विरोधी वस्तुका सङ्गत्याग। “रक्षिष्यतीति विश्वासः”—'त्रिलोकके अधीश वे भगवान् मेरा मङ्गल विधान करेंगे', इस प्रकारसे दृढ़ श्रद्धा होना। “गोप्तृत्वे वरणम्"-प्रभुरूपमें, पालकरूपमें या पतिरूपमें वरण, अथवा प्रार्थना करना, जैसे नारसिंह-पुराणमें कहा गया है,-'हे भगवन् ! देवदेव जनार्दन ! मैं आपकी शरण ग्रहण करता हूँ'—इस रूपमें यदि मेरे शरणागत होता है, तो मैं उसके समस्त क्लेशोंसे उसका उद्धार करता हूँ। “आत्मनिक्षेप-कार्पण्ये”— आत्मसमर्पण, जैसा गौतमीय-तन्त्रमें कहा गया है, 'हृदयमें स्थित किसी देवके द्वारा मैं जिस प्रकार नियुक्त हुआ हूँ, उस रूपमें कर रहा हूँ'-आदि प्रकार; 'कार्पण्य' अर्थात् जो अपने दैन्यका ज्ञापक है, जैसे 'हे भगवन् ! आपकी अपेक्षा अधिक करुणाशील और कोई नहीं है और मेरी अपेक्षा भी अधिक अधम और कोई नहीं हैं', आदि प्रकारके काकुवाक्य; यह छः प्रकारकी शरणागति अर्थात् शरणापत्ति है।] भक्ति सन्दर्भमें 236 संख्यामें श्रीजीवप्रभु- “अङ्गाङ्गिभेदेन षड्विधा; तत्र 'गोप्तृत्वे वरणम्' एवाङ्गि, शरणागतिशब्देनैकार्थ्यात्; अन्यानि त्वङ्गानि, तत्परिकरत्वात्। तदेवं यस्य सर्वाङ्ग सम्पन्ना शरणापत्तिस्तस्य झटित्येव सम्पूर्णफला; अन्येषां तु यथासम्पत्ति यथाक्रमञ्चेति ज्ञेयम्। तामेतां शरणापत्तिं श्लाघ्यते (भाः 11/19/9 पद्येन) - शरणागतानां सर्वदुःखदूरीकरणं निज-माधुरीणां सर्वतो वर्षश्चात्राभिहितम्।" [अर्थात् “छः प्रकारकी शरणागतिके मध्य अङ्ग-अङ्गी भावको जानना होगा। उसमें 'गोप्तृत्वे वरण' ही अङ्गीस्वरूप है, क्योंकि उसका 'शरणागति'-शब्दके साथ एक ही अर्थका वैशिष्ट्य है और अन्य पाँचको उसका परिकर कहकर अङ्गरूपमें जानना होगा। इस प्रकारसे जिनकी सर्वाङ्गरूपसे शरणागति होती है, उनकी शरणागति शीघ्र ही सम्पूर्ण फलको देनेवाली होती है। अन्य लोगोंकी क्षेत्रमें सम्पत्तिके अनुसारसे (अर्थात् जिस परिमाणमें शरणागति है, उस अनुपातसे) और क्रमानुसारसे उनकी सिद्धि जाननी होगी। इस शरणागतिकी प्रशंसा, जैसे (भाः 11/19/9 श्लोकमें) - 'हे भगवन् ! इस घोर संसारमें त्रितापके द्वारा आक्रान्त सन्तप्त चित्तसे मानवोंके लिये आपकी अमृतराशि-वर्षण करनेवाले चरणकमलयुगल-रूप छत्रके अतिरिक्त अन्य कोई आश्रय नहीं दिखायी देता।' यहाँपर शरणागतके सब दुःखोंको दूर करने और सर्वत्र अपनी माधुरीका वर्षण करना वर्णित हुआ है।”] ॥ 97 ॥ शरणागतका आचरण :- हरिभक्तिविलास (11/418) में उद्धृत वैष्णवतन्त्रवाक्य- तवास्मीति वदन् वाचा तथैव मनसा विदन्। तत्स्थानमाश्रितस्तन्वा मोदते शरणागतः॥ 98 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 98 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - शरणागत व्यक्ति भगवान्की लीला-स्थलीका शरीरके द्वारा आश्रय ग्रहण करके 'हे भगवन्, मैं आपका हूँ, ऐसा मुखसे बोलकर और मनमें जानकर आनन्द प्राप्त किया करता है॥ 98 ॥ अनुभाष्य- शरणागतः (प्रपन्नः) '[अहं] तव [एव] अस्मि' इति वाचा वदन्, तथा एव मनसा विदन् (आत्मानं सेवापरं जानन्) तन्वा (शरीरेण) तत्स्थानं (भगवन्तः भक्तस्य च स्थानम्) आश्रितः (सन्) मोदते (हृष्यति)। 356 ।

बाइसवाँ अध्याय 22/98–102 ]

श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 98॥ वैष्णव-श्रीकृष्णसे अभिन्न :- शरण लञा करे कृष्णे आत्मसमर्पण। कृष्ण ताँरे करे तत्काले आत्मसम॥ 99॥ **अनुवाद—**जब भक्त श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें पूर्ण शरणागत होकर आत्मसमर्पण करता है, श्रीकृष्ण तुरन्त ही उसे अपने भक्तके रूपमें स्वीकार कर लेते हैं॥ 99॥ श्रीकृष्णकी भाँति वैष्णव भी सच्चिदानन्दमय :- श्रीमद्भागवत (11/29/34)में— मर्त्यो यदा त्यक्तसमस्तकर्मा निवेदितात्मा विचिकीर्षितो मे। तदामृतत्वं प्रतिपद्यमानो मयात्मभूयाय च कल्पते वै॥ 100॥ **अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 100॥ **अमृतप्रवाह भाष्य—**मरणशील जीव जब समस्त कर्मोंका परित्याग करके स्वयंको मेरे (भगवान्के) प्रति सम्पूर्णरूपसे निवेदन करके मेरी इच्छासे क्रिया करता है, तब वह अमृतत्वको (मोक्षको) प्राप्त करता है। इस प्रकार वह मेरे साथ मेरे समान चित्स्वरूप रस-भोग करनेके योग्य होता है॥ 100॥ **अनुभाष्य—**भगवान् श्रीकृष्ण अपने प्रिय भक्तोंमें श्रेष्ठ उद्धवजीको सम्बन्ध-अभिधेय-प्रयोजनतत्त्वका वर्णन करके अन्तमें एकान्त समर्पित आत्मा शुद्धभक्तकी गतिका वर्णन कर रहे हैं,- यदा मर्त्यः (मनुष्यः) त्यक्तसमस्तकर्मा (विरतभोगमोक्षः सन्) मे (मह्यं) निवेदितात्मा (भवति, आत्मसमर्पणं करोतीत्यर्थः), तदा [असौ] मया विचिकीर्षितः (प्रेरितः सन् विशेषेण कर्तुमभिलषितो भवति; ततश्च) अमृतत्वं (मोक्षं) प्रतिपद्यमानः, मया (सह) आत्मभूयाय (मादृशसच्चिदानन्दमयत्वाय) कल्पते (योग्यो भवति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 100॥ (1) साधन भक्तिके लक्षणका वर्णन :- एबे साधनभक्ति-लक्षण शुन, सनातन। याहा हैते पाइ कृष्णप्रेम-महाधन॥ 101॥ **अनुवाद—**हे सनातन, अब तुम उस साधनभक्तिके लक्षण सुनो, जिसके द्वारा श्रीकृष्णप्रेमरूपी महाधनकी प्राप्ति होती है॥ 101॥ साधनकी संज्ञा :- भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/2)— कृतिसाध्या भवेत् साध्यभावा सा साधनाभिधा। नित्यसिद्धस्य भावस्य प्राकट्यं हृदि साध्यता॥ 102॥ **अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 102॥ अमृतप्रवाह भाष्य—“साध्य (साधनीय) भावभक्ति जब इन्द्रियोंके द्वारा साधित होती है, तब उसे 'साधन-भक्ति' कहते हैं। भक्ति ही जीवका नित्यसिद्ध भाव है, उसे हृदयमें प्रकट अवस्थामें लानेका नाम ही 'साध्यता' (साधनयोग्यता) है।” तात्पर्य यह है कि चित्कण-जीवमें स्वाभाविक रूपमें चित्-सूर्यरूप श्रीकृष्णका जो आनन्दकण है, मायाबद्ध होकर वह इस समय प्राय लुप्त है। वह नित्यसिद्ध भाव ही हृदयमें प्रकट करानेके योग्य है। इस (बद्ध) अवस्थामें 'नित्यसिद्ध'-वस्तु ही 'साध्य' हुई है। वही साध्यभावरूपी भक्ति जब बद्धजीवकी इन्द्रियोंके द्वारा साधित होती है, तब उसका ही नाम 'साधन-भक्ति' है॥ 102॥ अनुभाष्य— कृतिसाध्या (कृत्या इन्द्रिय-प्रेरणया साधनीया या) साध्यभावा (साधनीयः भावः यया) सा साधनाभिधा (साधनभक्तिनाम्नी) भवेत्; हृदि (जीवात्म-हृदये) नित्यसिद्धस्य (नित्यवर्त्तमानस्य स्वतःप्रकाशस्य) भावस्य (कृष्णप्रेमभावस्य) प्राकट्यम् (आविष्करणम् एव) साध्यता (साधनयोग्यता)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 102॥ 357