श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1799, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंHere is the Devanagari text transcribed from the image:
बाइसवाँ अध्याय 22/90 ] परमहंस अथवा निष्किञ्चन वैष्णवका आचरण :- एत सब छाड़ि' आर वर्णाश्रम धर्म। अकिञ्चन हञा लय कृष्णैक-शरण ॥ 90 ॥ अनुवाद - असत्सङ्गका पूर्ण त्याग और वर्णाश्रम धर्मकी उपेक्षा करके अकिञ्चन (सांसारिक आसक्तिरहित) होकर श्रीकृष्णकी शरण ग्रहण करनी चाहिये ॥ 90 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - इन दो प्रकारके असाधुसङ्ग और वर्णाश्रमधर्मकी आसक्तिका परित्याग करके अकिञ्चनभावसे एकमात्र श्रीकृष्णके शरणागत होओ ॥ 90 ॥ अमृतानुकणा-श्रीमन्महाप्रभुके इस वाक्यसे कोई-कोई ऐसा सोचते हैं कि महाप्रभुने वर्णाश्रम विचारको त्याग करनेके लिये कहा है। वे इस प्रसङ्गमें साध्य-साधन विचारके निर्णयके समय श्रीरामानन्द प्रभुके द्वारा कहे गये 'वर्णाश्रम-धर्म'के सम्बन्धमें महाप्रभुकी उक्ति 'एहो बाह्य' और महाप्रभुके द्वारा कहे गये "नाहं विप्रः”- श्लोकको वे उक्त विचारोंको पुष्ट करनेवाला मानते हैं। किन्तु वास्तवमें उसे कभी भी 'सिद्धान्त' नहीं कहा जा सकता। “महाप्रभुकी उक्ति ('एहो बाह्य')का तात्पर्य यह था,-हे रामानन्द ! स्थूल-लिङ्गदेहको नियमित करनेके लिये वर्णाश्रम-धर्म है। यदि कोई केवल उसीसे ही सन्तुष्ट होकर हरिभजन न करे, तब उसको क्या लाभ होगा ? इसलिये वर्णाश्रम-विधि बद्धजीवके एकमात्र शुद्ध-जीवनका उपाय होनेपर भी वह 'बाह्य' है। इसके द्वारा ऐसा सिद्धान्त नहीं करना होगा कि महाप्रभुने वर्णाश्रम-धर्मको दूरसे ही छोड़ देनेकी आज्ञा दी है। यदि ऐसा होता, तब अपनी जीवन-लीलामें गृहस्थ- अवस्थामें गृहस्थ-धर्म और संन्यास-अवस्थामें संन्यास- धर्म सम्पूर्णरूपसे पालन करके वे सभी जीवोंको शिक्षा नहीं देते। जब तक देह है, तब तक वर्णाश्रम-धर्मका आश्रय ग्रहण करना होगा, किन्तु वह सदा भक्तिके सम्पूर्ण अधिकारमें और अधीन रहेगा। वर्णाश्रम-धर्म 'परमधर्म'की नींवस्वरूप है। 'परमधर्म'की (भक्तिकी) परिपक्वता होनेपर उपेयकी (श्रीकृष्णप्रेमकी) प्राप्ति होनेके साथ-साथ उपायका (वर्णाश्रम-धर्मका) क्रमशः अनादर होता है। और देहत्यागके साथ ही उसका त्याग हो जाता है।" “श्रीरामानन्दके द्वारा उद्धृत श्लोकके आखिरमें यह कहा गया है कि 'विष्णुराराध्यते पन्था नान्यत्ततोष- कारणम्।' उससे यह जानना होगा कि वर्णाश्रम-धर्मके आश्रयके अतिरिक्त संसारी जीवका श्रीहरिभजनके अनुकूल जीवन उपायका और कोई मार्ग नहीं है। इसको भक्तजीवन प्राप्त करनेका एकमात्र मार्ग कहा जाता है।" ('साधुवृत्ति'-श्रील भक्तिविनोद ठाकुर)। 'नाहं विप्रः' श्लोक कहनेवाले श्रीमन्महाप्रभुने पुनः स्वयं ही “आमि त' संन्यासी, आमार समदृष्टि धर्म” (अन्त्यलीला 4/179), “आमि त' संन्यासी, आपनारे विरक्त करि मानि” (अन्त्यलीला 5/35), “भिक्षुक संन्यासी आमि निर्जनवासी” (अन्त्यलीला 9/64)- आदिरूपमें पुनः पुनः अपनेको वर्णाश्रमके अन्तर्गत संन्यासी कहकर उन्होंने घोषणा की है। इसलिये यहाँपर महाप्रभुके निज आचरणमें वर्णाश्रम परित्यागका कोई भी दृष्टान्त लक्षित नहीं होता। “चातुर्वर्ण्य मया सृष्टं" (गीता 4/13)-वर्णाश्रम-व्यवस्थाके जो सृष्टा हैं, वे स्वयं ही अवतीर्ण होकर फिर उक्त व्यवस्थाके उल्लङ्घनके उपदेशके द्वारा समस्त लोगोंको भ्रमित नहीं कर सकते। “उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्।” (गीता 3/24) - 'यदि मैं यथाविधि कर्म न करूँ, तब मेरे दृष्टान्तसे ये समस्त लोग भ्रष्ट हो जायेंगे।' “वर्णाश्रम दूर होनेपर मानवका वैज्ञानिक समाज विनष्ट होगा और 'पुनर्मूषिको भव' यह अभिशाप प्राप्त होकर स्वेच्छाचारी म्लेच्छोंके जैसे अवैध जीवनकी सुविधा प्राप्त करेंगे। जहाँ वर्णाश्रम-धर्म नहीं है, वहाँ निष्काम कर्मयोग और उसका साध्य ज्ञानयोग और चरमफलरूप भक्तियोग सुन्दररूपसे आचरित नहीं हो सकता।" (सज्जनतोषणी)। इसलिये श्रीमन्महाप्रभुने आदर्श दिखानेके लिये यथार्थ वर्णाश्रम-धर्मका स्वयं सुन्दररूपसे आचरण करके । 353