भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1800, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1800

[ 22/90-94 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला वर्णाश्रम-व्यवस्थाके वास्तविक तात्पर्यका प्रदर्शन किया है—“चारि वर्णाश्रमी यदि कृष्ण नाहि भजे। स्वकर्म करिते से रौरवे पड़ि' मजे॥”(चै.च. मध्यलीला 22/26) यहाँपर महाप्रभुके “एत सब छाड़ि' आर वर्णाश्रम- धर्म। अकिञ्चन हैया लय कृष्णैकशरण॥” वाक्यमें उनके द्वारा पहले दिये गये उपदेश 'नाहं विप्रः' श्लोककी ही प्रतिध्वनि हुई है। वर्णाश्रमके अन्तर्गत अभिमान या उसके प्रति आसक्ति परमपुरुषार्थ-साधनके क्षेत्रमें नितान्त ही अनावश्यक है। वहाँ स्थूल-लिङ्गदेहगत वर्णाश्रमका परिचय कोई भी कार्य नहीं करता, इसलिये उस-उस अभिमान और उसके प्रति आसक्ति छोड़कर, यहाँ तक कि रूप-धन-विद्याके अभिमानका परित्याग करके अकिञ्चन होकर केवल अपने स्वरूपगत “गोपीभर्तुः पदकमलयोर्दासदासानुदासः” परिचयको ही ग्रहण करना होगा॥90॥ श्रीमद्भगवद्गीता (18/66)में :- सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥91॥ अनुवाद—समस्त धर्मोंका परित्याग करके एकमात्र, मैं जो भगवान् हूँ, मेरे शरणागत होओ। ऐसा करनेपर मैं तुम्हें समस्त पापोंसे मुक्त करूँगा। तुम शोक मत करो॥91॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 8/63 संख्या देखें॥91॥ श्रीकृष्ण ही एकमात्र भजनीय वस्तु :- भक्तवत्सल, कृतज्ञ, समर्थ, वदान्य। हेन कृष्ण छाड़ि' पण्डित नाहि भजे अन्य॥92॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण भक्तवत्सल हैं। वे कृतज्ञ, सर्वसमर्थ और परम उदार हैं। पण्डित व्यक्ति ऐसे श्रीकृष्णको छोड़कर अन्य किसीका भजन नहीं करते॥92॥ अनुभाष्य—भक्तवत्सल, कृतज्ञ, उदार और सामर्थ्यवान् श्रीकृष्णको छोड़ करके कोई भी पण्डित श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्यान्य तुच्छ वस्तुओंका भजन नहीं करते। जो श्रीकृष्णभजन छोड़कर जड़विषयोंके प्रति मुग्ध होते हैं, उनके समान मूर्ख आत्मघाती व्यक्ति अत्यन्त विरले होते हैं अर्थात् वे महामूर्ख होते हैं॥92॥ स्वयं तकको प्रदान कर देनेवाले सर्वात्मा श्रीकृष्ण :- श्रीमद्भागवत (10/48/26)में— कः पण्डितस्त्वदपरं शरणं समीया- द्भक्तप्रियादृतगिरः सुहृदः कृतज्ञात्। सर्वान् ददाति सुहृदो भजतोऽभिकामा- नात्मानमप्युपचयापचयौ न यस्य॥93॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥93॥ अमृतप्रवाह भाष्य—प्रिय, सत्यवादी, सुहृत् और कृतज्ञरूपी [भक्तप्रेमका प्रतिदान करनेवाले] आपको छोड़कर कौन पण्डित दूसरोंके शरणागत होते हैं? आप भजनशील सुहृद् व्यक्तियोंकी समस्त कामनाएँ पूर्ण करते हैं और स्वयं तकको भी दिया करते हैं, परन्तु आपमें ह्रास (कमी) और वृद्धि नहीं होती॥93॥ अनुभाष्य—भगवान् श्रीकृष्णके कुब्जाकी अभीष्ट- वाञ्छाको पूर्ण करके अक्रूरको हस्तिनापुरमें भेजनेकी इच्छासे बलरामजीके साथ उनके घरपर उपस्थित होनेपर, अक्रूर उनकी वन्दना करते-करते स्तव कर रहे हैं,— [यतो भवान्] भजतः (भजनशीलान्) सर्वान् सुहृदः (मित्रान्) अभिकामान् (सर्वतोभावेन कामान्), यस्य (च) उपचयापचयौ (ह्रासवृद्धी) न स्तः, (तादृशम्) आत्मानं (निजविग्रहम्) अपि ददाति, [अतः] भक्तप्रियात् (भक्तवत्सलात्) ऋतगिरः (सत्यवाचः) सुहृदः (बान्धवात्) कृतज्ञात् (भक्तप्रेमप्रतिदानकारिणः) त्वत्तः (त्वां बिना) अपरं शरणं (आश्रयं) कः पण्डितः समीयात् (गच्छेत्)? श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥93॥ उद्धव ही अनन्य-श्रीकृष्ण भजनके प्रमाण :- विज्ञ-जनेर हय यदि कृष्णगुण-ज्ञान। अन्य त्यजि' भजे, ताते उद्धव-प्रमाण॥94॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥94॥ 354 |