श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1801, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबाइसवाँ अध्याय 22/94-97 ] अनुभाष्य—श्रीकृष्णके गुणोंका ज्ञान होने मात्रसे ही अभिज्ञ (बुद्धिमान) व्यक्ति दूसरोंकी उपासनाको त्याग करके श्रीकृष्णका ही भजन करता है; इस विषयमें उद्धवजी ही प्रमाण हैं॥ 94॥ श्रीकृष्ण-दयाके सागर :- श्रीमद्भागवत (3/2/23)में— अहो बकी यं स्तनकालकूटं जिघांसयापाययदप्यसाध्वी। लेभे गतिं धात्र्युचितां ततोऽन्यं कं वा दयालुं शरणं व्रजेम॥ 95॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 95॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अहो, जिन श्रीकृष्णका वध करनेके लिये इस बकासुरकी बहन पूतनाने दुष्ट-वृत्तियुक्त होकर उन्हें स्तनपर लगाये कालकूट (विष)का पान कराया था और ऐसा करनेपर भी उसने माताके योग्य गतिको प्राप्त किया था, उनके (उन श्रीकृष्णके) अतिरिक्त अन्य किस दयालुके शरणागत हो सकता हूँ?॥ 95॥ अनुभाष्य—महाभागवत श्रील उद्धव श्रीकृष्णके वियोगके कारण शोकाकुल होकर विदुरजीसे श्रीकृष्णकी बाल्यलीला आदिका वर्णन कर रहे हैं,— अहो (आश्चर्य), बकी (पूतना) जिघांसया (हन्तुम् इच्छया अपि) स्तनकालकूटं (स्तनयोः गृहीतं कालकूटं विषं) यं (कृष्णम्) अपाययत्, असाध्वी (कृष्णविरोधिनी दुष्टा दानवी) अपि धात्र्युचितां (पालयित्र्याः स्तनदातृकायाः योग्यां) गतिम् (उत्तमां गतिं) लेभे, ततः (श्रीकृष्णात्) अन्यं (अपरं) कं वा दयालुं (वदान्यं) शरणं व्रजेम (भजेमेत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 95॥ परमहंस या वैष्णव ही श्रीकृष्णके प्रति समर्पितात्मा :- शरणागतेर, अकिञ्चनेर—एकइ लक्षण। तार मध्ये प्रवेशये 'आत्मसमर्पण'॥ 96॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 96॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'अकिञ्चन भक्त' और 'शरणागत भक्त'—इन दोनोंके एक ही लक्षण हैं। इन दोनोंमेंसे शरणागतका 'आत्म-समर्पण'-रूप एक लक्षण अधिक होता है॥ 96॥ छः प्रकारकी शरणागति :- हरिभक्तिविलास (11/417)में उद्धृत वैष्णवतन्त्रवाक्य— आनुकूल्यस्य सङ्कल्पः प्रातिकूल्य-विवर्जनम्। रक्षिष्यतीति विश्वासो गोप्तृत्वे वरणं तथा। आत्मनिक्षेप-कार्पण्ये षड्विधा शरणागतिः॥ 97॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 97॥ अमृतप्रवाह भाष्य—शरणागतिके छः प्रकारके लक्षण—(1) आनुकूल्य-सङ्कल्प अर्थात् 'श्रीकृष्णभक्तिके जो अनुकूल है, उसे मैं अवश्य ही स्वीकार करूँगा'—ऐसा सङ्कल्प; (2) प्रातिकूल्य-विवर्जन अर्थात् 'श्रीकृष्णभक्तिके जो प्रतिकूल है, उसका मैं अवश्य ही वर्जन (त्याग) करूँगा', इस भावनासे त्याग; (3) 'वे मेरी रक्षा करेंगे' अर्थात् 'श्रीकृष्णके अतिरिक्त मेरा और कोई रक्षा करनेवाला नहीं है', यह विश्वास—'अभेद ब्रह्मज्ञानके द्वारा मैं मृत्युसे बच सकता हूँ',—ऐसा विश्वास नहीं, 'श्रीकृष्ण कृपा करके मेरी रक्षा करेंगे',—ऐसा विश्वास; (4) श्रीकृष्णको 'गोप्ता' अथवा 'पालन करनेवाले'के रूपमें वरण करना अर्थात् 'समस्त कर्म करके मैं (कर्मोंके) उन-उन अधिष्ठातृ-देवताके द्वारा पालित होऊँगा',—ऐसे विश्वासको पूर्णरूपसे त्याग करके 'श्रीकृष्ण ही मेरे एकमात्र पालनकर्त्ता हैं और देवताओं तथा मनुष्योंमेंसे कोई भी मेरा पालनकर्त्ता नहीं हैं',—ऐसा अचल विश्वास; (5) आत्मनिक्षेप अर्थात् 'मेरी इच्छा स्वतन्त्र नहीं है, वह—श्रीकृष्णकी इच्छाके परतन्त्र है' ऐसी बुद्धि ही आत्मसमर्पण है, और (6) कार्पण्य अर्थात् स्वयंको दीन-हीन मानना॥ 97॥ अनुभाष्य— आनुकूल्यस्य (कृष्णभजनसहायस्य) सङ्कल्पः (सम्यक् निर्णयः, ग्रहणं वा), प्रातिकूल्यविवर्जनं (कृष्णभजनविरोधिवस्तु-सङ्गत्यागः), । 355