भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1802

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[ 22/97-98 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला मां रक्षिष्यति इति विश्वासः (दृढ़श्रद्धा,- “क्षेमं विधास्यति स नो भगवान्त्र्यधीशः" इत्यादि प्रकारः), गोप्तृत्वे (प्रभुत्वे, पालयितृत्वे, पतित्वे वा) वरणं (प्रार्थनम् अङ्गीकरणं वा- “त्वां प्रपन्नोऽस्मि शरणं देवदेवं जनार्दनम्। इति यः शरणं प्राप्तस्तं क्लेशादुद्धराम्यहम्॥” इति नारसिंहोक्तप्रकारम्), आत्मनिक्षेपकार्पण्ये (आत्मसमर्पणं “केनापि देवेन हृदिस्थितेन यथा नियुक्तोऽस्मि, तथा करोमि" इति गौतमीतन्त्रोक्तप्रकारं च, स्वीयदैन्यज्ञापकं कार्पण्यं “परमकारुणिको न भवत्परः परमशोच्यतमो न च मत्परः” इत्यादिप्रकारं च-काकुभाषणञ्चेत्यर्थः)- इति षड्विधा शरणागतिः (शरणापत्तिः)। श्लोक-भावानुवाद— [“आनुकूल्यस्य संकल्पः” - जो श्रीकृष्ण भजनमें सहायक है, उसको सम्पूर्ण रूपसे ग्रहण या वैसा सम्पूर्ण निर्णय करना। “प्रातिकूल्य-विवर्जनम्”- श्रीकृष्णभजन-विरोधी वस्तुका सङ्गत्याग। “रक्षिष्यतीति विश्वासः”—'त्रिलोकके अधीश वे भगवान् मेरा मङ्गल विधान करेंगे', इस प्रकारसे दृढ़ श्रद्धा होना। “गोप्तृत्वे वरणम्"-प्रभुरूपमें, पालकरूपमें या पतिरूपमें वरण, अथवा प्रार्थना करना, जैसे नारसिंह-पुराणमें कहा गया है,-'हे भगवन् ! देवदेव जनार्दन ! मैं आपकी शरण ग्रहण करता हूँ'—इस रूपमें यदि मेरे शरणागत होता है, तो मैं उसके समस्त क्लेशोंसे उसका उद्धार करता हूँ। “आत्मनिक्षेप-कार्पण्ये”— आत्मसमर्पण, जैसा गौतमीय-तन्त्रमें कहा गया है, 'हृदयमें स्थित किसी देवके द्वारा मैं जिस प्रकार नियुक्त हुआ हूँ, उस रूपमें कर रहा हूँ'-आदि प्रकार; 'कार्पण्य' अर्थात् जो अपने दैन्यका ज्ञापक है, जैसे 'हे भगवन् ! आपकी अपेक्षा अधिक करुणाशील और कोई नहीं है और मेरी अपेक्षा भी अधिक अधम और कोई नहीं हैं', आदि प्रकारके काकुवाक्य; यह छः प्रकारकी शरणागति अर्थात् शरणापत्ति है।] भक्ति सन्दर्भमें 236 संख्यामें श्रीजीवप्रभु- “अङ्गाङ्गिभेदेन षड्विधा; तत्र 'गोप्तृत्वे वरणम्' एवाङ्गि, शरणागतिशब्देनैकार्थ्यात्; अन्यानि त्वङ्गानि, तत्परिकरत्वात्। तदेवं यस्य सर्वाङ्ग सम्पन्ना शरणापत्तिस्तस्य झटित्येव सम्पूर्णफला; अन्येषां तु यथासम्पत्ति यथाक्रमञ्चेति ज्ञेयम्। तामेतां शरणापत्तिं श्लाघ्यते (भाः 11/19/9 पद्येन) - शरणागतानां सर्वदुःखदूरीकरणं निज-माधुरीणां सर्वतो वर्षश्चात्राभिहितम्।" [अर्थात् “छः प्रकारकी शरणागतिके मध्य अङ्ग-अङ्गी भावको जानना होगा। उसमें 'गोप्तृत्वे वरण' ही अङ्गीस्वरूप है, क्योंकि उसका 'शरणागति'-शब्दके साथ एक ही अर्थका वैशिष्ट्य है और अन्य पाँचको उसका परिकर कहकर अङ्गरूपमें जानना होगा। इस प्रकारसे जिनकी सर्वाङ्गरूपसे शरणागति होती है, उनकी शरणागति शीघ्र ही सम्पूर्ण फलको देनेवाली होती है। अन्य लोगोंकी क्षेत्रमें सम्पत्तिके अनुसारसे (अर्थात् जिस परिमाणमें शरणागति है, उस अनुपातसे) और क्रमानुसारसे उनकी सिद्धि जाननी होगी। इस शरणागतिकी प्रशंसा, जैसे (भाः 11/19/9 श्लोकमें) - 'हे भगवन् ! इस घोर संसारमें त्रितापके द्वारा आक्रान्त सन्तप्त चित्तसे मानवोंके लिये आपकी अमृतराशि-वर्षण करनेवाले चरणकमलयुगल-रूप छत्रके अतिरिक्त अन्य कोई आश्रय नहीं दिखायी देता।' यहाँपर शरणागतके सब दुःखोंको दूर करने और सर्वत्र अपनी माधुरीका वर्षण करना वर्णित हुआ है।”] ॥ 97 ॥ शरणागतका आचरण :- हरिभक्तिविलास (11/418) में उद्धृत वैष्णवतन्त्रवाक्य- तवास्मीति वदन् वाचा तथैव मनसा विदन्। तत्स्थानमाश्रितस्तन्वा मोदते शरणागतः॥ 98 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 98 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - शरणागत व्यक्ति भगवान्की लीला-स्थलीका शरीरके द्वारा आश्रय ग्रहण करके 'हे भगवन्, मैं आपका हूँ, ऐसा मुखसे बोलकर और मनमें जानकर आनन्द प्राप्त किया करता है॥ 98 ॥ अनुभाष्य- शरणागतः (प्रपन्नः) '[अहं] तव [एव] अस्मि' इति वाचा वदन्, तथा एव मनसा विदन् (आत्मानं सेवापरं जानन्) तन्वा (शरीरेण) तत्स्थानं (भगवन्तः भक्तस्य च स्थानम्) आश्रितः (सन्) मोदते (हृष्यति)। 356 ।