श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1803, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबाइसवाँ अध्याय 22/98–102 ]
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 98॥ वैष्णव-श्रीकृष्णसे अभिन्न :- शरण लञा करे कृष्णे आत्मसमर्पण। कृष्ण ताँरे करे तत्काले आत्मसम॥ 99॥ **अनुवाद—**जब भक्त श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें पूर्ण शरणागत होकर आत्मसमर्पण करता है, श्रीकृष्ण तुरन्त ही उसे अपने भक्तके रूपमें स्वीकार कर लेते हैं॥ 99॥ श्रीकृष्णकी भाँति वैष्णव भी सच्चिदानन्दमय :- श्रीमद्भागवत (11/29/34)में— मर्त्यो यदा त्यक्तसमस्तकर्मा निवेदितात्मा विचिकीर्षितो मे। तदामृतत्वं प्रतिपद्यमानो मयात्मभूयाय च कल्पते वै॥ 100॥ **अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 100॥ **अमृतप्रवाह भाष्य—**मरणशील जीव जब समस्त कर्मोंका परित्याग करके स्वयंको मेरे (भगवान्के) प्रति सम्पूर्णरूपसे निवेदन करके मेरी इच्छासे क्रिया करता है, तब वह अमृतत्वको (मोक्षको) प्राप्त करता है। इस प्रकार वह मेरे साथ मेरे समान चित्स्वरूप रस-भोग करनेके योग्य होता है॥ 100॥ **अनुभाष्य—**भगवान् श्रीकृष्ण अपने प्रिय भक्तोंमें श्रेष्ठ उद्धवजीको सम्बन्ध-अभिधेय-प्रयोजनतत्त्वका वर्णन करके अन्तमें एकान्त समर्पित आत्मा शुद्धभक्तकी गतिका वर्णन कर रहे हैं,- यदा मर्त्यः (मनुष्यः) त्यक्तसमस्तकर्मा (विरतभोगमोक्षः सन्) मे (मह्यं) निवेदितात्मा (भवति, आत्मसमर्पणं करोतीत्यर्थः), तदा [असौ] मया विचिकीर्षितः (प्रेरितः सन् विशेषेण कर्तुमभिलषितो भवति; ततश्च) अमृतत्वं (मोक्षं) प्रतिपद्यमानः, मया (सह) आत्मभूयाय (मादृशसच्चिदानन्दमयत्वाय) कल्पते (योग्यो भवति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 100॥ (1) साधन भक्तिके लक्षणका वर्णन :- एबे साधनभक्ति-लक्षण शुन, सनातन। याहा हैते पाइ कृष्णप्रेम-महाधन॥ 101॥ **अनुवाद—**हे सनातन, अब तुम उस साधनभक्तिके लक्षण सुनो, जिसके द्वारा श्रीकृष्णप्रेमरूपी महाधनकी प्राप्ति होती है॥ 101॥ साधनकी संज्ञा :- भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/2)— कृतिसाध्या भवेत् साध्यभावा सा साधनाभिधा। नित्यसिद्धस्य भावस्य प्राकट्यं हृदि साध्यता॥ 102॥ **अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 102॥ अमृतप्रवाह भाष्य—“साध्य (साधनीय) भावभक्ति जब इन्द्रियोंके द्वारा साधित होती है, तब उसे 'साधन-भक्ति' कहते हैं। भक्ति ही जीवका नित्यसिद्ध भाव है, उसे हृदयमें प्रकट अवस्थामें लानेका नाम ही 'साध्यता' (साधनयोग्यता) है।” तात्पर्य यह है कि चित्कण-जीवमें स्वाभाविक रूपमें चित्-सूर्यरूप श्रीकृष्णका जो आनन्दकण है, मायाबद्ध होकर वह इस समय प्राय लुप्त है। वह नित्यसिद्ध भाव ही हृदयमें प्रकट करानेके योग्य है। इस (बद्ध) अवस्थामें 'नित्यसिद्ध'-वस्तु ही 'साध्य' हुई है। वही साध्यभावरूपी भक्ति जब बद्धजीवकी इन्द्रियोंके द्वारा साधित होती है, तब उसका ही नाम 'साधन-भक्ति' है॥ 102॥ अनुभाष्य— कृतिसाध्या (कृत्या इन्द्रिय-प्रेरणया साधनीया या) साध्यभावा (साधनीयः भावः यया) सा साधनाभिधा (साधनभक्तिनाम्नी) भवेत्; हृदि (जीवात्म-हृदये) नित्यसिद्धस्य (नित्यवर्त्तमानस्य स्वतःप्रकाशस्य) भावस्य (कृष्णप्रेमभावस्य) प्राकट्यम् (आविष्करणम् एव) साध्यता (साधनयोग्यता)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 102॥ 357