भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1804, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1804

[ 22/103-106 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला साधन भक्तिका स्वरूप और तटस्थ लक्षण :- श्रवणादि-क्रिया—तार 'स्वरूप' लक्षण। 'तटस्थ'-लक्षणे उपजय प्रेमधन ॥ 103 ॥ नित्यसिद्ध निरपेक्ष शुद्ध (अनन्य, केवल अथवा अनुकूल) अभिधेयके द्वारा ही नित्यसिद्ध स्वप्रकाशित शुद्धप्रयोजनकी प्राप्ति :- नित्यसिद्ध कृष्णप्रेम 'साध्य' कभु नय। श्रवणादि-शुद्धचित्ते करये उदय ॥ 104 ॥ साधनभक्तिके भेद—(1) वैधी और (2) रागानुगा :- एइ त' साधनभक्ति—दुइ त' प्रकार। एक 'वैधी भक्ति', 'रागानुगा भक्ति' आर ॥ 105 ॥ (क) वैधीभक्तिका वर्णन और संज्ञा-निर्देश :- रागहीन जन भजे शास्त्रेर आज्ञाय। 'वैधी-भक्ति' बलि' तारे सर्वशास्त्रे गाय ॥ 106 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 103-106 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अनुकूलभावके साथ श्रवण, कीर्तन और स्मरण ही उस भक्तिका 'स्वरूप'-लक्षण है। अन्याभिलाषका त्याग और ज्ञानकर्मके साथ सम्बन्ध- विच्छेद [तटस्थ लक्षण] के द्वारा वह स्वरूप लक्षण 'प्रेमधन' उत्पन्न करता है। श्रीकृष्णप्रेम—नित्यसिद्ध वस्तु है, वह कभी भी (शुद्धभक्तिके अतिरिक्त अन्य किसी अभिधेय से) साध्य नहीं है; केवलमात्र श्रवणादिके द्वारा भली-भाँति शोधित चित्तमें ही उसका उदित होना सम्भव है। इसलिये शुद्ध श्रवण-कीर्तनादि क्रिया ही प्रधानतः साधन-भक्ति है। वह दो प्रकारकी है,—'वैधी' और 'रागानुगा'। जिनके हृदयमें रागका उदय नहीं हुआ, उनकी शास्त्रोंकी आज्ञानुसार जो भजनप्रवृत्ति होती है, वही 'वैधीभक्ति' है॥ 103-106 ॥ अमृतानुकणा—ईश्वरके प्रति जीवका जो प्रेम है, वह जीवका स्वाभाविक नित्य धर्म है। जीव वास्तवमें शुद्ध चिद्-वस्तु और चिद्-धर्मसे गठित है। 'चिद्-स्वरूप जीवका अपना एक विशेष शुद्ध अभिमान था कि 'मैं भगवान्‌का अमुक लक्षणवाला दास हूँ।' उस अभिमानने जीवके चिद्गत शुद्ध अहङ्काररूपमें चिद्-स्वरूपका आश्रय किया हुआ था। चिद्-स्वरूपको आश्रय करके आनन्दकी उपलब्धिके स्थानरूप शुद्धबुद्धि भी थी। अन्य पदार्थों और अन्य जीवों एवं परमपुरुष भगवान्के विषयमें जानकर उसका ज्ञान और ध्यानके उपयोगी मन भी था। जड़बद्ध होनेपर वे चिद्गत वृत्तियाँ जड़सङ्गके प्रभावसे लिङ्ग और स्थूलरूपमें परिणत होकर उन-उन सबके विषयरूप जड़ीय और अशुद्ध वृत्तियाँ प्रकाशित हुई हैं। इसलिये जो-रस चिदाश्रयमें भाव था, वह (जड़ाश्रयमें) विकृत भाव हो गया है। रस एक ही वस्तु है, नित्यावस्थामें नित्यानन्द स्वरूप है और जड़बद्धावस्थामें जड़ानन्द या जड़-दुःखरूपमें प्रकाशमान है।” (चैतन्यशिक्षामृत 7/1) इसलिये, अग्निका ताप देनेका धर्म जिस प्रकार स्वतःसिद्ध है, उसे किसी प्रकारके साधनके द्वारा प्राप्त करनेका कोई प्रयोजन नहीं है—उसी प्रकार विभुके प्रति अणुका आकर्षण तथा श्रीकृष्णके प्रति जीवका प्रेम भी नित्यसिद्ध है, उसकी साध्यरूपमें प्राप्तिका कोई अवकाश नहीं है। श्रीकृष्णविमुखताके कारण ही जीवकी बद्धदशा है, इसलिये श्रीकृष्णोन्मुखता होनेपर ही जीवके श्रीकृष्णदास्यरूप स्वधर्मका उदय होता है। कर्म, ज्ञान, योगादि साधनोंके द्वारा श्रीकृष्णोन्मुखता प्राप्त नहीं होती। केवल भक्ति-उन्मुखी सुकृतिके द्वारा ही प्राप्त शुद्धभक्तके सङ्गसे श्रीहरिके नाम-रूप-गुण-लीलाके निरन्तर श्रवण-कीर्तन-स्मरणके द्वारा ही श्रीकृष्णोन्मुखता प्राप्त करके जीवका सुप्त स्वधर्म जाग्रत होता है। श्रीहरि और श्रीहरिनामादि सब प्रकारसे अभिन्न हैं। इसलिये अनुकूल भावके सहित अर्थात् केवल श्रीकृष्णप्रीतिके उद्देश्यसे साधित हरिनामादि श्रवण-कीर्तन प्रक्रिया ही भक्तिके स्वरूप-लक्षणरूपमें वर्णित हुआ है। उसके द्वारा ही जीवके नित्यधर्मगत भगवत्प्रेम तथा अपने स्वरूपगत 'मैं अमुक लक्षणका भगवद्-दास हूँ'—ऐसा शुद्ध अभिमान जाग्रत होता है। किन्तु इसके मध्य एक विशेष बात यह है कि उक्त श्रवण-कीर्तनादिरूपा 358 |