श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1805, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबाइसवाँ अध्याय 22/103-109 ] भक्तियाजन करते समय युगपत् अर्थात् उसके साथ ही अन्यभिलाष-त्याग और ज्ञान-कर्म-योगादिके सहित सम्बन्धको काटना आदि तटस्थ-लक्षणवाली साधन भक्तिका आश्रय करनेपर ही उक्त स्वरूप-लक्षणवाली भक्ति जीवके निर्मल चित्तमें 'प्रेमधन'को उदय कराती है॥ 103-104॥ श्रीहरिका ही श्रवण, कीर्तन और स्मरण ही विधि :- श्रीमद्भागवत (2/1/5)में- तस्माद्भारत सर्वात्मा भगवान् हरिरीश्वरः। श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च स्मर्त्तव्यश्चेच्छताभयम्॥ 107॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 107॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे भारत (परीक्षित), सर्वात्मा भगवान् ईश्वर हरि अभय प्राप्त करनेके इच्छुक व्यक्तियोंके लिये सर्वदा ही श्रवणीय, कीर्तनीय और स्मरणीय हैं॥ 107॥ अनुभाष्य-'मरणासन्न व्यक्तिके लिये क्या करना कर्त्तव्य है?'-राजा परीक्षितके इस प्रश्नके उत्तरमें श्रील शुकदेव गोस्वामी इस प्रश्नकी विशेषरूपसे प्रशंसा करके पहले गृहमें आसक्त व्यक्तियोंकी बद्धदशाका वर्णन करके उससे मुक्त होनेका उपाय बतला रहे हैं,- हे भारत (भरतवंश्य), तस्मात् (कृष्णविमुखो जीवः स्वनिधनं पश्यन्नपि न पश्यति, अतः कारणात्) अभयं (स्वपराभवाभावं मोक्षम्, आत्मत्राणं वा) इच्छता (द्वितीयाभिनिवेशत्यागमभिलषता जनेन इत्यर्थः) सर्वात्मा (सर्वान्तर्यामी) भगवान् ईश्वरः हरिः (एव) श्रोतव्यः (श्रवणीयः) कीर्तितव्यः (कीर्तनीयः) स्मर्त्तव्यः च (स्मरणीयश्च)। श्लोक-भावानुवाद-हे भरतवंशी! कृष्णविमुख जीव अपनी मृत्युको आता देखकर भी देख नहीं पाता, इसलिये अभय अर्थात् अपने पराभवके अभावके अथवा आत्माके त्राणके इच्छाकारीको (द्वितीयाभिनिवेशके त्यागकी इच्छा करनेवाले व्यक्तिको) सर्वान्तर्यामी भगवान् हरिकी कथाका श्रवण, कीर्तन और स्मरण करना उचित है॥ 107॥ अमृतानुकणिका-इस श्लोककी टीकामें श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुरने इस प्रकार कहा है- सर्वात्मा, भगवान् और ईश्वर-इन तीन विशेषणोंके द्वारा मोक्षाभिसन्धिनी, रागानुगा और वैधी भक्तिको कहा गया है। मोक्षाभिसन्धिनी भक्तिके पक्षमें अभय कहनेसे मोक्ष इच्छाकारी व्यक्तिके पक्षमें सर्वात्मा अर्थात् परमात्मा हरि ही श्रवणीय हैं। रागानुगा भक्तिके पक्षमें अभय अर्थात् निष्कम्प, सर्वप्रकारसे भयशून्य जिस प्रकार हो, उस प्रकारसे अभिलाषी अर्थात् लोभयुक्त पुरुषके पक्षमें भगवान् नन्दनन्दन (श्रीकृष्ण) ही श्रवणीय हैं। वैधी भक्तिके पक्षमें अभय कहनेसे जिनसे कोई भी भय नहीं है, वे ही अभय अर्थात् श्रीहरि ही हैं। आत्माके त्राणके इच्छाकारी व्यक्तिके पक्षमें अभय कहनेसे सबके नियामकरूपसे ईश्वर हरि ही श्रवणीय, कीर्तनीय और स्मरणीय हैं। 'कीर्तितव्यश्च एवं स्मर्त्तव्यश्च'-यहाँ दो 'च-कार'के प्रयोगके द्वारा यह कहा गया है कि श्रवण, कीर्तन और स्मरण एक कालमें ही करना उचित है॥ 107॥ वैधीभक्तिके प्रारम्भमें परमहंसावस्थाको प्राप्त करनेसे पहले दैववर्णाश्रमधर्मका पालन; उसकी उत्पत्ति :- श्रीमद्भागवत (11/5/2-3)में- मुखबाहूरुपादेभ्यः पुरुषस्याश्रमैः सह। चत्वारो जज्ञिरे वर्णा गुणैर्विप्रादयः पृथक् ॥ 108॥ य एषां पुरुषं साक्षादात्म-प्रभवमीश्वरम्। न भजन्त्यवजानन्ति स्थानाद् भ्रष्टाः पतन्त्यधः॥ 109॥ अनुवाद-ब्रह्माके मुखसे 'ब्राह्मण', भुजासे 'क्षत्रिय', जङ्घासे 'वैश्य' और पैरोंसे 'शूद्र'-ये चार वर्ण पृथक् पृथक् आश्रमोंके साथ और अपने वर्णगत गुणोंके साथ उत्पन्न हुए थे। इन चारों वर्णाश्रमियोंमेंसे जो अपने प्रभु भगवान् विष्णुका साक्षात् भजन नहीं करके, अपने-अपने वर्णाश्रमके अहङ्कारके कारण उनके भजनमें अवज्ञा करते हैं, वे अपने स्थानसे भ्रष्ट होकर अधःपतित हो जाते हैं॥ 108-109॥ । 359