श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1806, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 22/108-124 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य-मध्यलीला 22/27-28 संख्या कृष्णप्रीत्ये भोगत्याग, कृष्णतीर्थे वास। देखें ॥ 108-109 ॥ यावत् निर्वाह-प्रतिग्रह, एकादश्युपवास ॥ 113 ॥ विष्णुस्मृति-उद्दीपक प्रत्येक क्रिया ही 'विधि', धात्र्यश्वत्थ-गो-विप्र-वैष्णव-पूजन। विष्णुस्मृतिविनाशक प्रत्येक क्रिया ही 'निषेध' :- सेवा-नामापराधादि दूरे विसर्जन ॥ 114 ॥ पद्मपुराण-वाक्य (72/100)- अवैष्णव-सङ्ग-त्याग, बहुशिष्य ना करिब। स्मर्त्तव्य सततं विष्णुर्विस्मर्त्तव्यो न जातुचित् । बहुग्रन्थ-कलाभ्यास-व्याख्यान वर्जिब ॥ 115 ॥ सर्वे विधिनिषेधाः स्युरेतयोरेव किङ्कराः ॥ 110 ॥ हानि-लाभे सम, शोकादिर वश ना हइब। अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 110 ॥ अन्यदेव, अन्यशास्त्र निन्दा ना करिब ॥ 116 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'विष्णु सदा ही स्मरणीय हैं, कभी भी विस्मरणीय नहीं हैं' - समस्त प्रकारके विधि विष्णुवैष्णव-निन्दा, ग्राम्यवार्त्ता ना शुनिब। और निषेध इन्हीं दो बातोंके अनुगत हैं। तात्पर्य यह प्राणीमात्रे मनोवाक्ये उद्वेग ना दिब ॥ 117 ॥ है कि शास्त्रोंमें जितनी प्रकारकी 'विधियाँ' उत्पन्न हुई श्रवण, कीर्त्तन, स्मरण, पूजन, वन्दन। हैं और 'निषेध' बतलाये गये हैं, वे सभी उक्त दोनों परिचर्या, दास्य, सख्य, आत्मनिवेदन ॥ 118 ॥ बातोंके आधारपर ही कहे गये हैं। जिसका अवलम्बन करनेसे भगवान् स्मरणपथपर आते हैं, वही कर्त्तव्यके अग्रे नृत्य, गीत, विज्ञप्ति, दण्डवन्नति। रूपमें 'विधि' है; जिस कार्यके द्वारा भगवान्का विस्मरण अभ्युत्थान, अनुव्रज्या, तीर्थगृहे गति ॥ 119 ॥ होता है, वही कार्य ही 'निषेध' है ॥ 110 ॥ परिक्रमा, स्तवपाठ, जप, सङ्कीर्त्तन । अनुभाष्य- धूप-माल्य-गन्ध-महाप्रसाद-भोजन ॥ 120 ॥ विष्णुः सततं स्मर्त्तव्यः, न जातुचित् (कदाचित्) आरात्रिक-महोत्सव-श्रीमूत्तिदर्शन। विस्मर्त्तव्यः- सर्वे विधिनिषेधाः एतयोः (विष्णुस्मरणामस्मरणरुपयोः निजप्रिय-दान, ध्यान, तदीय-सेवन ॥ 121 ॥ विधिनिषेधयोः द्वयोः) एव किङ्कराः (अनुगताः भृत्याः) स्युः (भवेयुः)। 'तदीय'-तुलसी, वैष्णव, मथुरा, भागवत। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 110 ॥ एइ चारिर सेवा हय कृष्णेर अभिमत ॥ 122 ॥ असंख्य वैधी-भक्तिमेंसे चौंसठ भक्तिके अङ्गोंका वर्णन :- कृष्णार्थे अखिलचेष्टा, तत्कृपावलोकन। विविधाङ्ग साधनभक्तिर बहुत विस्तार। जन्म-दिनादि-महोत्सव लञा भक्तगण ॥ 123 ॥ संक्षेपे कहिये किछु साधनाङ्ग-सार ॥ 111 ॥ सर्वथा शरणापत्ति, कार्त्तिकादि-व्रत। अनुवाद-अनेक अङ्गोंवाली साधनभक्तिका बहुत 'चतुःषष्ठि अङ्ग' एइ परम-महत्त्व ॥ 124 ॥ विस्तृत वर्णन है। मैं संक्षेपमें साधनके अङ्गोंका सार बतला रहा हूँ ॥ 111 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 112-124 ॥ गुरुपादाश्रय, दीक्षा, गुरुर सेवन। अमृतप्रवाह भाष्य - (1) गुरुपादाश्रय, (2) दीक्षा सद्धर्म-शिक्षा-पृच्छा, साधुमार्गानुगमन ॥ 112 ॥ अर्थात् मन्त्रदीक्षा, (3) गुरुसेवा, (4) सद्धर्म-शिक्षा और जिज्ञासा, (5) साधुओंके पथका अनुगमन, 360