श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1807, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबाइसवाँ अध्याय 22/112-126 ]
(6) श्रीकृष्णप्रीतिके लिये अपना भोगत्याग, (7) श्रीकृष्ण- तीर्थमें वास, (8) जितना मात्र प्राप्त होनेपर जीवनका निर्वाह होता है, उसी परिमाणमें ग्रहण करना, (9) एकादशीका उपवास और (10) आँवला, पीपल, गो, ब्राह्मण, वैष्णवका सम्मान,-ये दस अङ्ग ही भजनके प्रारम्भिक रूप हैं; एवं (11) सेवापराध और नामापराधका दूरसे ही त्याग, (12) अवैष्णव-सङ्गत्याग, (13) बहुतसे शिष्य नहीं बनाना, (14) बहुतसे ग्रन्थोंमें कला अर्थात् आंशिक अभ्यास और व्याख्यावादका त्याग, (15) हानि और लाभमें समबुद्धि, (16) शोकादिके वशीभूत नहीं होना, (17) अन्य देवता अथवा शास्त्रोंकी अवज्ञा नहीं करना, (18) विष्णु और वैष्णवोंकी निन्दा नहीं सुनना, (19) ग्राम्यवार्त्ता अर्थात् स्त्री-पुरुषकी इन्द्रियतृष्टिमूलक गृहवार्त्ताको नहीं सुनना, (20) प्राणीमात्रके मनमें उद्वेग उत्पन्न नहीं करना, - इन बाकी दस निषेध-लक्षण अङ्गोंका व्यतिरेक-भावसे (वर्जनके रूपसे) अनुष्ठान करना। 'व्यवहारे अकार्पण्य' और 'महारम्भेरे अनुद्यम' - इन दोनोंको भक्तिरसामृतसिन्धुमें इन दस अङ्गोंमें रखा गया है। भक्तिरसामृतसिन्धुमें इस ग्रन्थमें लिखित 'ग्राम्यवार्त्ता मत सुनना'-यह अङ्ग पूर्वोक्त दस अङ्गोंमें उद्धृत नहीं किया गया है। ये बीस अङ्ग ही भजनमन्दिरमें प्रवेश-द्वारस्वरूप हैं। इनमेंसे 'गुरु-पादाश्रय', 'दीक्षा' और 'गुरुसेवा'-ये तीन अङ्ग प्रधान अङ्गोंमें गिने जाते हैं। (1) श्रवण, (2) कीर्त्तन, (3) स्मरण, (4) पूजन, (5) वन्दन, (6) परिचर्या, (7) दास्य, (8) सख्य, (9) आत्म-निवेदन, (10) श्रीविग्रहके आगे नृत्य, (11) गीत-गान, (12) विज्ञप्ति (अपनी प्रार्थना भगवान्के सामने रखना), (13) दण्डवत् प्रणाम, (14) अभ्युत्थान अर्थात् भगवान् अथवा भक्तको आते देखकर उठना, (15) अनुव्रज्या अर्थात् भक्त अथवा भगवान्के यात्रा करनेपर उनके पीछे-पीछे जाना, (16) तीर्थ और भगवद्-गृहमें (धाममें) जाना, (17) परिक्रमा; (18) स्तवपाठ, (19) जप, (20) सङ्कीर्त्तन, (21) भगवान्की प्रसादी धूप और मालाकी गन्धको ग्रहण करना, (22) महाप्रसादका सेवन, (23) आरति आदि महोत्सवोंका दर्शन, (24) श्रीमूर्त्तिका दर्शन, (25) अपनी प्रियवस्तु भगवान्को समर्पित करना, (26) ध्यान। तदीय अर्थात् भगवान्से अभिन्न वस्तुओंकी सेवा- (27) तुलसी आदिकी सेवा, (28) वैष्णव-सेवा, (29) मथुरा-वास और (30) भागवतका आस्वादन, (31) श्रीकृष्णके लिये समस्त चेष्टाएँ, (32) उनकी कृपाकी प्रतीक्षा, (33) भक्तोंके साथ जन्मदिन (जन्माष्टमी) आदि महोत्सवका पालन, (34) सब प्रकारसे शरणागति, (35) कार्त्तिकादि व्रत, - इन पैंतीस अङ्गोंमें और चार अङ्गोंका योग करना होगा अर्थात् देहमें (1) वैष्णवचिह्न धारण, (2) हरिनामाक्षरधारण, (3) निर्माल्यधारण और (4) चरणामृत पान; - इन चार अङ्गोंको श्रीकविराज गोस्वामीने अर्चनादिके अन्तर्गत स्वीकार किया है। इन चार अङ्गोंके योगसे उनतालीस (39) अङ्ग होते हैं, उनमें (1) साधुसङ्ग (2) नामकीर्त्तन, (3) भागवत-श्रवण, (4) मथुरावास, (5) श्रद्धापूर्वक श्रीमूर्त्तिसेवारूपी अन्य पाँच अङ्गोंका पुनः योग करना होगा। श्रीरूपगोस्वामीने (भःरःसिः पूर्व विभाग, द्वितीय लहरीमें चौंसठ वैधीभक्तिके अङ्गोंके वर्णनके अन्तमें लिखा है, - "अङ्गानां पञ्चकस्यास्य पूर्वविलिखितस्य च। निखिलश्रेष्ठ्यबोधाय पुनरप्यत्र शंसनम्॥", इन पाँच अङ्गोंका योग करनेसे चौवालीस अङ्ग होते हैं। इन चौवालीसको पहले बतलाये गये बीसके साथ योग करनेपर कुल मिलाकर चौंसठ अङ्ग होते हैं। ये भक्तिके चौंसठ-अङ्ग ही शरीर, इन्द्रिय और अन्तःकरणके द्वारा पृथक् पृथक् यजन अथवा उपासना है। इनमेंसे कुछ बिल्कुल ही पृथक् हैं, और कुछ मिश्रित-भाववाले हैं॥ 112-126 ॥ उनमेंसे साधुसङ्गादि पाँच भक्तिके अङ्गोंकी सर्वश्रेष्ठता :- साधुसङ्ग, नामकीर्त्तन, भागवतश्रवण। मथुरावास, श्रीमूर्त्तिर श्रद्धाय सेवन ॥ 125 ॥
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