भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1808

[ 22/125-129 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला उनके आंशिक अनुष्ठानके प्रभावसे ही श्रीकृष्ण-प्रेमका उदय :- सकलसाधन-श्रेष्ठ एइ पञ्च अङ्ग। कृष्णप्रेम जन्माय एइ पाँचरे अल्प सङ्ग ॥ 126 ॥ अनुवाद-साधुसङ्ग, नाम-कीर्तन, भागवत-श्रवण, मथुरावास और श्रीमूर्तिकी श्रद्धापूर्वक सेवा, समस्त प्रकारके साधन-अङ्गोंमें ये पाँच अङ्ग सबसे श्रेष्ठ हैं। इन पाँचोंके अल्प सङ्गसे ही श्रीकृष्णप्रेम उत्पन्न हो जाता है॥ 125-126॥ साधुसङ्ग और भागवत-श्रवण-कीर्तनकी विधि :- भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/90-91)- सजातीयाशये स्निग्धे साधौ सङ्गः स्वतो वरे। श्रीमद्भागवतार्थानामास्वादो रसिकैः सह ॥ 127 ॥ विशेषतः श्रीविग्रहपूजा, श्रीनामसङ्कीर्तन और श्रीधामवासका माहात्म्य :- श्रद्धा विशेषतः प्रीतिः श्रीमूर्तेरङ्घ्रिसेवने। नामसङ्कीर्तनं श्रीमन्मथुराण्डले स्थितिः॥ 128 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 127-128 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-समजातीय वासनाके द्वारा स्निग्ध, किन्तु अपनेसे श्रेष्ठ साधुका सङ्ग करना। ऐसे रसिक साधुओंके साथ श्रीमद्भागवतके अर्थोंका आस्वादन करना। श्रद्धासे श्रीमूर्तिकी पदसेवामें प्रीति, नामसङ्कीर्तन और मथुरामण्डलमें वास करना॥ 127-128 ॥ अनुभाष्य- सजातीयाशये (समजातीयवासनाविशिष्टे) स्निग्धे (गाढ़- विश्रम्भात्मक-स्नेहपरे) स्वतः वरे (श्रेष्ठे) साधौ सङ्गः [कार्यः]। रसिकैः (कृष्णभजनविज्ञैः) सह श्रीमद्भागवतार्थानाम् आस्वादः (कार्यः, तात्पर्यं ग्रहणीयमित्यर्थः-श्रौतमार्ग-भक्तियोगत्यागी वैयाकरणस्य शाब्दिकस्य योषित्सङ्गिगृहव्रतस्य विष्णुवैष्णवविरोधिनः मायावादिनः नामापराधिनः वेषोपजीविनः मन्त्रजीविनः भागवतजीविनः इन्द्रियतर्पणरत-विषयिणश्च "यस्य देवे पराः भक्तिः” इति “भक्त्या भागवतं ग्राह्यं न बुद्ध्या न च टीकया” इति श्रुति-स्मृतिवचनात् तेषां पारमहंस्यशास्त्रार्थ-बोधासम्भवात् ग्रन्थतात्पर्यार्थग्रहणे अनधिकारत्वाच्च)। श्रीमूर्तेरङ्घ्रिसेवने श्रद्धा विशेषतः (विशेषेण) प्रीतिः (बहिःपूजायाम् अर्चने सामान्यतः, ब्रजदम्पत्योः मानससेवायां विशेषतः सार्वकालिकभजनानुरागः), नामसङ्कीर्तनं (नामभजनं), श्रीमन्मथुराण्डले स्थितिः (कृष्णवसतिस्थले अवस्थानम्- श्रीगौरमण्डलभूमौ चिन्तामणिज्ञानं, तदेव मथुरावासः इति श्रीमन्नरोत्तमप्रभुचरणैः प्रेमभक्तिचन्द्रिकायां निर्णीतम्। श्रीगौरविलासभूमि-श्रीमायापुरादिधामवासः श्रीक्षेत्र-दाक्षिणात्य- व्रजमण्डलादिधामवासश्च मथुरावासेन सह अभिन्नो ज्ञेयः। तद्भेदवादिनां तथाकथित-मथुरावासोऽपि प्राकृत-भोगमयः अधोगतिप्रदश्चेति)। श्लोक-भावानुवाद-समजातीयवासनायुक्त गाढ़- विश्रम्भात्मक-स्नेहपर अपनेसे श्रेष्ठ साधुका सङ्ग करना। श्रीकृष्णभजनविज्ञके साथ श्रीमद्भागवतके तात्पर्यको ग्रहण करना। ("यस्य देवे पराः भक्तिः" और "भक्त्या भागवतं ग्राह्यं न बुद्ध्या न च टीकया",-श्रुति-स्मृति वचनोंके अनुसार श्रौतमार्ग-भक्तियोगत्यागी वैयाकरण-पण्डित, श्रुतियोंके विद्वान, स्त्रीसङ्गी गृहव्रतधारी, विष्णु-वैष्णवविरोधी मायावादी, नामापराधी, वेष-मन्त्र-भागवतादिको जीविका बनानेवाले और इन्द्रियभोगमें रत विषयी लोगोंको पारमहंस्य-शास्त्रका अर्थ बोध होना सम्भव नहीं है, उनका ग्रन्थके तात्पर्यार्थको ग्रहण करनेका अधिकार नहीं है।)। श्रद्धासे श्रीमूर्तिकी पदसेवामें विशेष प्रीति (अर्थात् बाहरसे अर्चन सामान्य प्रीति है, सब समय भजनमें अनुरागके साथ व्रजदम्पत्तिकी मानससेवा विशेष प्रीति है), नामभजन और श्रीमथुरामण्डलमें वास करना (श्रीगौरमण्डलभूमिको चिन्तामणि जानकर वहाँ भी वास मथुरावास ही है-ऐसा श्रीमन्नरोत्तमप्रभुने प्रेमभक्तिचन्द्रिकामें निर्णीत किया है। श्रीगौरविलासभूमि अर्थात् श्रीमायापुरादि- धामवास, श्रीक्षेत्र-दक्षिणभारत-व्रजमण्डलादिधामवासको मथुरावासके साथ अभिन्न जानना चाहिये। उनमें भेद माननेवालेका तथाकथित मथुरावास भी प्राकृत-भोगमय है और वह अधोगतिको प्रदान करता है।)॥ 127-128 ॥ भक्तिरसामृत सिन्धु (1/2/238) :- दुरुहाद्भुतवीर्येऽस्मिन् श्रद्धा दूरेऽस्तु पञ्चके। यत्र स्वल्पोऽपि सम्बन्धः सद्धियां भावजन्मने ॥ 129 ॥ 362 |