श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1809, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबाइसवाँ अध्याय 22/129-132 ] अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 129 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सहसा दुर्बोध और अद्भुत शक्तिसम्पन्न अन्तिम पाँच अङ्गोंमें श्रद्धाकी बात तो दूर रहे, अति अल्प सम्बन्ध उत्पन्न होनेपर भी वह निरपराधी व्यक्तिकी भावोत्पत्तिका कारण बन जाता है॥ 129 ॥ अनुभाष्य— अस्मिन् दुरूहाद्भुतवीर्ये (दुःसाध्ये अपूर्वे च प्रभावमये) पञ्चसु (साधुसङ्गाद्यङ्गेषु पञ्चसु) श्रद्धा दूरे अस्तु, यत्र (साधनश्रेष्ठाङ्गपञ्चके) स्वल्पः सम्बन्धः अपि सद्धियां (सद्बुद्धिमतां सुचतुराणां वैष्णवानां) भावजन्मने (भावस्य अभिव्यक्तये समर्थः भवतीति शेषः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 129 ॥ इनमेंसे प्रत्येकके निरन्तर अनुशीलनसे श्रीकृष्णप्रेमकी प्राप्ति :— 'एक' अङ्ग साधे, केह साधे 'बहु' अङ्ग। 'निष्ठा' हैते उपजाय प्रेमेर तरङ्ग ॥ 130 ॥ अनुवाद—यदि कोई (नवधा) भक्तिके केवल किसी एक ही अङ्गका पालन करता है अथवा अनेक अङ्गोंका पालन करता है, उसके द्वारा अनर्थ निवृत्ति होकर निष्ठा उदित होती है और निष्ठासे प्रेम उत्पन्न होता है॥ 130 ॥ अनुभाष्य—भजनानुष्ठानके फलसे जीवकी अनर्थ निवृत्ति होनेसे ही निष्ठा उदित होती है; निष्ठासे प्रेम उत्पन्न होता है ॥ 130 ॥ नवधा भक्तिमेंसे किसीके द्वारा एक अङ्गके और किसीके द्वारा सभी अङ्गोंके अनुशीलनसे सिद्धि या भगवत्प्रेमकी प्राप्ति :— 'एक' अङ्गे सिद्धि पाइल बहु भक्तगण। अम्बरीषादि भक्तरे 'बहु' अङ्ग-साधन ॥ 131 ॥ अनुवाद—नवधा भक्तिके किसी एक अङ्गका पालन करनेसे बहुतसे भक्तोंको सिद्धिकी प्राप्ति हुई है। अम्बरीषादि भक्तों ने बहुतसे अङ्गोंका साधन किया था और उन्हें सिद्धि प्राप्त हुई थी॥ 131 ॥ नवधा भक्तिके एक-एक अङ्गके अनुशीलनमें रत भक्तोंके नाम :— पद्यावली (53) और भःरःसिः (1/2/263)में— श्रीविष्णोः श्रवणे परीक्षिदभवद्वैयासकिः कीर्त्तने प्रह्लादः स्मरणे तदङ्घ्रिभजने लक्ष्मीः पृथुः पूजने। अक्रूरस्त्वभिवन्दने कपिपतिर्दास्येऽथ सख्येऽर्जुनः सर्वस्वात्मनिवेदने बलिरभूत् कृष्णाप्तिरेषां परम् ॥ 132 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 132 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—राजा परीक्षितने श्रीविष्णुकी कथा-श्रवणसे, शुकदेवने उसके कीर्त्तनसे, प्रह्लादने उसके स्मरणसे, लक्ष्मीने उनके चरणकमलोंकी सेवासे, पृथु राजाने उनके पूजनसे, अक्रूरने उनकी वन्दनासे, कपिपति हनुमानने उनके दास्यसे, अर्जुनने उनके सख्यसे और बलिने उन्हें सर्वस्व और आत्मनिवेदनसे श्रेष्ठरूपमें श्रीकृष्णको प्राप्त किया था॥ 132 ॥ अनुभाष्य— परीक्षित् (विष्णुरातः) श्रीविष्णोः श्रवणे (श्रीमद्भागवतोक्त- कृष्णनामरूपगुणलीला-श्रवणे), वैयासकिः (ब्रह्मरातः शुकदेवः) कीर्त्तने (श्रीहरिकथात्मक श्रीमद्भागवत-कीर्त्तने), प्रह्लादः [विष्णोः] स्मरणे [शुद्धान्तःकरणत्वात्], लक्ष्मीः तदङ्घ्रिभजने (नारायण-पादपद्मसेवने), पृथुः [विष्णोः] पूजने (अर्चने), अक्रूरः तु [यादवस्य] अभिवन्दने, कपिपतिः (हनुमान्) दास्ये (रामकैङ्कर्ये), अर्जुनः [कृष्णेन सह] सख्ये, बलिः (प्रह्लाद-पौत्रः) सर्वस्वात्मनिवेदने (आत्मसमर्पणे) परं (केवलं निष्ठितः) अभूत्; एषां (हरिजनानाम्) [एकैकाङ्गनिष्ठया एव] कृष्णाप्तिः (कृष्णलाभः अभूत्)। श्लोक-भावानुवाद—परीक्षितने श्रीमद्भागवतमें उक्त श्रीकृष्णनामरूपगुणलीलाके श्रवणसे, शुकदेवने श्रीहरि- कथात्मक श्रीमद्भागवतके कीर्त्तनसे, प्रह्लादने शुद्धान्तःकरणसे विष्णु-स्मरणसे, लक्ष्मीने श्रीनारायण-चरणकमलोंके सेवनसे, पृथुने विष्णुके अर्चनसे, अक्रूरने यदुकुलश्रेष्ठ श्रीकृष्णके अभिवन्दनसे, कपिपति हनुमान्ने श्रीरामके कैङ्कर्यसे, । 363