श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1810, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 22/132-136 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अर्जुनने श्रीकृष्णके साथ सख्यभावसे, प्रह्लाद-पौत्र बलिने आत्मसमर्पणसे श्रीकृष्णकी परम प्राप्ति की है। इन भक्तोंने एक-एक अङ्गमें निष्ठासे ही श्रीकृष्णकी प्राप्ति की है॥ 132॥ श्रीअम्बरीषका सभी इन्द्रियोंके द्वारा श्रीकृष्णानुशीलन :- श्रीमद्भागवत (9/4/18-20)में- स वै मनः कृष्णपदारविन्दयो- र्वचांसि वैकुण्ठगुणानुवर्णने। करौ हरेर्मन्दिरमार्जनादिषु श्रुतिञ्चकाराच्युत-सत्कथोदये॥ 133 ॥ मुकुन्दलिङ्गालयदर्शने दृशौ तद्भृत्यगात्रस्पर्शोऽङ्गसङ्गमम्। घ्राणञ्च तत्पादसरोजसौरभे श्रीमत्तुलस्या रसनां तदर्पिते॥ 134 ॥ पादौ हरेः क्षेत्रपदानुसर्पणे शिरो हृषीकेश-पदाभिवन्दने। कामञ्च दास्ये न तु कामकाम्यया यथोत्तमश्लोकजनाश्रया रतिः॥ 135 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 133-135॥ अनुभाष्य- विष्णुरात परीक्षितके द्वारा महाभागवत ब्राह्मण-गुरु अम्बरीषके अप्राकृत श्रीकृष्णसेवामय चरित्रके सम्बन्धमें जिज्ञासा करनेपर श्रील शुकदेव गोस्वामी अम्बरीषकी सभी इन्द्रियोंके द्वारा हृषीकेशकी सेवा-वृत्तिका वर्णन कर रहे हैं,- उत्तमःश्लोकजनाश्रया (हरिजनानुगता) रतिः (अभिरुचिः) यथा [भवेत्, तथा] सः अम्बरीषः कृष्णपदारविन्दयोः (कृष्णपादपद्मयोः) मनः, वैकुण्ठगुणानुवर्णने (हरिगुणमहिमकथने) वचांसि (वाक्यानि), हरेः मन्दिरमार्जनादिषु (भगवदालय-वैष्णवचरण- नीराजन-धौति-लेपनादिकर्माणि शङ्खचक्राद्यूर्ध्वपुण्ड्र वा) करौ (भुजौ), अच्युतसत्कथोदये (अच्युतस्य विष्णोः सत्कथानाम् उदये) श्रुतिं (कर्णद्वयं), मुकुन्दलिङ्गालयदर्शने (कृष्णस्य लिङ्गानाम् अर्चानाम् आलयानि मन्दिराणि तेषां दर्शने) दृशौ (नेत्रे), तद्भृत्यगात्रस्पर्शे (हरिजनशरीरस्पर्शने) अङ्गसङ्गमम् (त्वचा उत्तमाङ्गस्पर्शनं), श्रीमत्तुलस्याः (श्रीमत्याः तुलस्याः) तत्पादसरोजसौरभे (भगवच्चरणपद्मेन यत् सौरभं तस्मिन् गन्धे) घ्राणं (नासिकां), तदर्पिते (तस्मै कृष्णाय निवेदिते महाप्रसादादौ) रसनां (जिह्वां), हरेः क्षेत्रपदानुसर्पणे (धामपरिक्रमादौ) पादौ, हृषीकेशपदाभिवन्दने (गोविन्दचरणप्रणमनादौ) शिरः (मस्तकं), दास्ये (भगवदुपयुक्तस्रग्गन्धवासोऽलङ्कारादीनां महाप्रसादत्वेन स्वीकारे) कामं च न तु कामकाम्यया (भोगेच्छया), चकार (नियुक्तवान्)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 133-135॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अम्बरीष राजाने अपने मनको श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें, अपनी वाणीको वैकुण्ठ- गुणानुवर्णनमें, अपने दोनों हाथोंको हरिमन्दिर मार्जनादिमें और अपने कानोंको श्रीकृष्णकथा श्रवणमें और श्रीकृष्णकी श्रीमूर्त्ति दर्शनमें अपने दोनों नेत्रोंको, श्रीकृष्ण दासोंके शरीरके स्पर्शमें अपने अङ्गोंको, श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी सुगन्धको सूंघनेमें अपनी नासिकाको, श्रीकृष्णको अर्पित तुलसीके आस्वादनमें अपनी जिह्वाको, श्रीकृष्णक्षेत्रमें अनुगमनमें अपने दोनों चरणोंको, हृषीकेशके चरणोंमें प्रणतिके लिये अपने मस्तकको, कामरहित दास्यमें अपने 'काम'को इस प्रकार नियुक्त किया था कि उससे श्रीकृष्णभक्तोंमें आश्रययोग्य रति उदित होती है॥133-135॥ ऐकान्तिक शरणागत भक्त श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य किसीके भी द्वारा बाध्य नहीं :- काम-त्यजि' कृष्ण भजे शास्त्र-आज्ञा मानि'। देव-ऋषि-पितृदिगेर कभु नहे ऋणी॥ 136 ॥ अनुवाद-जो समस्त प्रकारकी कामनाओंको छोड़कर शास्त्रकी आज्ञा मानकर केवल श्रीकृष्णका भजन करता है, वह देवताओं, ऋषियों, पितरों आदिका कभी भी ऋणी नहीं होता॥ 136 ॥ अनुभाष्य-देवऋण, ऋषिऋण, पितृऋण, भूतऋण और मनुष्यऋण,-ये पाँच ऋण पाँच प्रकारके यज्ञोंके द्वारा चुकाये जाते हैं। “अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञस्तु 364 |