श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
[ 22/132-136 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अर्जुनने श्रीकृष्णके साथ सख्यभावसे, प्रह्लाद-पौत्र बलिने आत्मसमर्पणसे श्रीकृष्णकी परम प्राप्ति की है। इन भक्तोंने एक-एक अङ्गमें निष्ठासे ही श्रीकृष्णकी प्राप्ति की है॥ 132॥ श्रीअम्बरीषका सभी इन्द्रियोंके द्वारा श्रीकृष्णानुशीलन :- श्रीमद्भागवत (9/4/18-20)में- स वै मनः कृष्णपदारविन्दयो- र्वचांसि वैकुण्ठगुणानुवर्णने। करौ हरेर्मन्दिरमार्जनादिषु श्रुतिञ्चकाराच्युत-सत्कथोदये॥ 133 ॥ मुकुन्दलिङ्गालयदर्शने दृशौ तद्भृत्यगात्रस्पर्शोऽङ्गसङ्गमम्। घ्राणञ्च तत्पादसरोजसौरभे श्रीमत्तुलस्या रसनां तदर्पिते॥ 134 ॥ पादौ हरेः क्षेत्रपदानुसर्पणे शिरो हृषीकेश-पदाभिवन्दने। कामञ्च दास्ये न तु कामकाम्यया यथोत्तमश्लोकजनाश्रया रतिः॥ 135 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 133-135॥ अनुभाष्य- विष्णुरात परीक्षितके द्वारा महाभागवत ब्राह्मण-गुरु अम्बरीषके अप्राकृत श्रीकृष्णसेवामय चरित्रके सम्बन्धमें जिज्ञासा करनेपर श्रील शुकदेव गोस्वामी अम्बरीषकी सभी इन्द्रियोंके द्वारा हृषीकेशकी सेवा-वृत्तिका वर्णन कर रहे हैं,- उत्तमःश्लोकजनाश्रया (हरिजनानुगता) रतिः (अभिरुचिः) यथा [भवेत्, तथा] सः अम्बरीषः कृष्णपदारविन्दयोः (कृष्णपादपद्मयोः) मनः, वैकुण्ठगुणानुवर्णने (हरिगुणमहिमकथने) वचांसि (वाक्यानि), हरेः मन्दिरमार्जनादिषु (भगवदालय-वैष्णवचरण- नीराजन-धौति-लेपनादिकर्माणि शङ्खचक्राद्यूर्ध्वपुण्ड्र वा) करौ (भुजौ), अच्युतसत्कथोदये (अच्युतस्य विष्णोः सत्कथानाम् उदये) श्रुतिं (कर्णद्वयं), मुकुन्दलिङ्गालयदर्शने (कृष्णस्य लिङ्गानाम् अर्चानाम् आलयानि मन्दिराणि तेषां दर्शने) दृशौ (नेत्रे), तद्भृत्यगात्रस्पर्शे (हरिजनशरीरस्पर्शने) अङ्गसङ्गमम् (त्वचा उत्तमाङ्गस्पर्शनं), श्रीमत्तुलस्याः (श्रीमत्याः तुलस्याः) तत्पादसरोजसौरभे (भगवच्चरणपद्मेन यत् सौरभं तस्मिन् गन्धे) घ्राणं (नासिकां), तदर्पिते (तस्मै कृष्णाय निवेदिते महाप्रसादादौ) रसनां (जिह्वां), हरेः क्षेत्रपदानुसर्पणे (धामपरिक्रमादौ) पादौ, हृषीकेशपदाभिवन्दने (गोविन्दचरणप्रणमनादौ) शिरः (मस्तकं), दास्ये (भगवदुपयुक्तस्रग्गन्धवासोऽलङ्कारादीनां महाप्रसादत्वेन स्वीकारे) कामं च न तु कामकाम्यया (भोगेच्छया), चकार (नियुक्तवान्)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 133-135॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अम्बरीष राजाने अपने मनको श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें, अपनी वाणीको वैकुण्ठ- गुणानुवर्णनमें, अपने दोनों हाथोंको हरिमन्दिर मार्जनादिमें और अपने कानोंको श्रीकृष्णकथा श्रवणमें और श्रीकृष्णकी श्रीमूर्त्ति दर्शनमें अपने दोनों नेत्रोंको, श्रीकृष्ण दासोंके शरीरके स्पर्शमें अपने अङ्गोंको, श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी सुगन्धको सूंघनेमें अपनी नासिकाको, श्रीकृष्णको अर्पित तुलसीके आस्वादनमें अपनी जिह्वाको, श्रीकृष्णक्षेत्रमें अनुगमनमें अपने दोनों चरणोंको, हृषीकेशके चरणोंमें प्रणतिके लिये अपने मस्तकको, कामरहित दास्यमें अपने 'काम'को इस प्रकार नियुक्त किया था कि उससे श्रीकृष्णभक्तोंमें आश्रययोग्य रति उदित होती है॥133-135॥ ऐकान्तिक शरणागत भक्त श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य किसीके भी द्वारा बाध्य नहीं :- काम-त्यजि' कृष्ण भजे शास्त्र-आज्ञा मानि'। देव-ऋषि-पितृदिगेर कभु नहे ऋणी॥ 136 ॥ अनुवाद-जो समस्त प्रकारकी कामनाओंको छोड़कर शास्त्रकी आज्ञा मानकर केवल श्रीकृष्णका भजन करता है, वह देवताओं, ऋषियों, पितरों आदिका कभी भी ऋणी नहीं होता॥ 136 ॥ अनुभाष्य-देवऋण, ऋषिऋण, पितृऋण, भूतऋण और मनुष्यऋण,-ये पाँच ऋण पाँच प्रकारके यज्ञोंके द्वारा चुकाये जाते हैं। “अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञस्तु 364 |
बाइसवाँ अध्याय 22/136-140 ] तर्पणम्। होमो दैवो बलिर्भौतो नृयज्ञोऽतिथिपूजनम्॥" होमके द्वारा देवयज्ञ, अध्यापनके द्वारा ब्रह्मयज्ञ अथवा ऋषि-यज्ञ, तर्पणके द्वारा पितृयज्ञ, बलिके द्वारा भूतयज्ञ और अतिथि पूजाके द्वारा नृयज्ञ (मनुष्ययज्ञ) सम्पन्न होता है॥136॥ वैधी भक्तिके अधिकारीके लिये पाँच प्रकारके यज्ञादि कर्मकाण्डकी अनावश्यकता :- श्रीमद्भागवत (11/5/41)में- देवर्षिभूताप्तनॄणां पितॄणां न किङ्करो नायमृणी च राजन्। सर्वात्मना यः शरणं शरण्यं गतो मुकुन्दं परिहृत्य कर्त्तम्॥137॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥137॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो सांसारिक कर्त्तव्योंको पूर्णरूपसे त्याग करके सम्पूर्णरूपमें शरण लेने योग्य श्रीमुकुन्दके शरणागत हुए हैं, हे राजन्, वे देवताओं, ऋषियों, अन्य प्राणियों, आत्मीयजनों, मनुष्यों, पितरोंके ऋणी नहीं रह जाते। तात्पर्य यह है कि मनुष्य जन्म लेनेके साथ ही इन सबके ऋणोंसे ऋणी बन जाता है और शास्त्रोंके मतानुसार बहुत प्रकारके कर्त्तव्यानुष्ठानके द्वारा इन सब ऋणोंको चुकाता है। किन्तु जो समस्त प्रकारकी कामनाओंका परित्याग करके श्रीकृष्णके चरणोंमें शरणागत होता है, उसके ये सब ऋण उपयुक्त कर्मानुष्ठान नहीं करनेपर भी चुक जाते हैं॥137॥ अनुभाष्य-श्रीनारदने श्रीवसुदेवसे भागवतधर्मका वर्णन करते हुए विदेहराज निमि और नवयोगेन्द्रके संवादका वर्णन किया था। पहले आठ योगेन्द्रोंके द्वारा क्रमशः राजा निमिके प्रश्नोंका उत्तर देनेके करभाजन ऋषि निमिको भगवान् विष्णुके चार युगावतारोंके वर्ण-भेद और उपासना-भेद तथा भारतके विभिन्न स्थानोंपर भविष्यमें वैष्णवोंके आविर्भावका वर्णन करके अन्तमें श्रीकृष्णके एकान्त शरणागतोंकी महिमाको निम्नलिखित दो श्लोकोंमें बतला रहे हैं,- हे राजन् यः (जनः) कर्त्तं (भेदं, कृत्यं स्वधर्मं वा) परिहृत्य (परित्यज्य) सर्वात्मना (कायेन मनसा वाचा) शरण्यं (सर्वाश्रयं) मुकुन्दं शरणं गतः, (सः) अयं देवर्षिभूताप्तनॄणां (देवानाम् ऋषीणां भूतानाम् आप्तानां पोष्य-कुटुम्बिनां नॄणां) पितॄणां न किङ्करः (बाध्यः) न ऋणी च [अतः भक्तिमार्गाश्रितस्य फलकामि-कर्मिवत् पञ्चयज्ञानुष्ठानस्यावश्यकता नास्त्येवेत्यर्थः]। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। [इसलिये भक्तिमार्गके आश्रितको फलकामी कर्मियोंकी भाँति पञ्च-यज्ञोंके अनुष्ठानकी आवश्यकता नहीं है-यह अर्थ है]॥137॥ वैष्णव कभी भी पापी नहीं होता अथवा पापी कभी भी वैष्णव नहीं हो सकता :- विधि-धर्म छाड़ि' भजे कृष्णेर चरण। निषिद्ध पापाचारे तार कभु नहे मन॥138॥ दैववश साधकसे पाप होनेपर भी श्रीकृष्णकी कृपासे उसकी सम्पूर्ण पाप-निवृत्ति :- अज्ञाने वा हय यदि 'पाप' उपस्थित। कृष्ण ताँरे शुद्ध करे, ना कराय प्रायश्चित॥139॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥138-139॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो वैदिक विधिके अन्तर्गत सभी प्रकारके धर्मोंका पूर्ण त्याग करके निष्किञ्चन होकर भजन करता है, उसकी स्वाभाविक रूपसे किसी निषिद्ध पापाचारमें मति नहीं होती, यदि किसी कारणसे पाप उपस्थित भी होता है अर्थात् पाप कार्य हो जाता है, श्रीकृष्ण उससे कोई प्रायश्चित कराये बिना ही शुद्ध कर देते हैं॥138-139॥ अन्तर्यामी-चैत्यगुरुरूपमें पाप-शोधन :- श्रीमद्भागवत (11/5/42)में- स्वपादमूलं भजतः प्रियस्य त्यक्तान्यभावस्य हरिः परेशः। विकर्म यच्चोत्पतितं कथञ्चित् धुनोति सर्वं हृदि सन्निविष्टः॥140॥ । 365
[ 22/140–142 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
[बायाँ स्तम्भ]
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 140 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो अन्यभावको पूर्णरूपसे त्याग करके स्वयं श्रीहरिके चरणकमलोंका भजन करते हैं, श्रीकृष्णके प्रिय उन व्यक्तियोंके द्वारा यदि कभी पापका आचरण होता है, तो परमेश्वर श्रीहरि उनके हृदयमें वास करते हुए उनके उस पापको विनष्ट कर देते हैं॥ 140 ॥ अनुभाष्य— स्वपादमूलं (निजपादपल्लवं) भजतः (सेवनकारिणः) प्रियस्य (प्रेमवतः) त्यक्तान्यभावस्य (त्यक्तः भगवतः हरेः शुद्धनिष्कामसेवनात् अन्यस्मिन् देहादौ देवान्तरे वा भावः येन तस्य, अनन्यभक्तिपरायणस्य तस्य) कथञ्चित् (प्रमादिना) विकर्म (निषिद्धं कर्म) उत्पतितं (दुर्दैवात् अनुष्ठितं भवेत्) [तत् अपि] सर्वं परेशः हरिः हृदि सन्निविष्टः (अन्तर्यामिरूपेण स्थितः) धुनोति (विनाशयति)। श्लोक-भावानुवाद—भगवान् श्रीहरिके चरणकमलोंकी सेवा करनेवाले प्रिय भक्त जो उनकी शुद्ध निष्कामसेवाके अतिरिक्त अन्य देहादि और देवताओंके प्रति भावोंको त्यागकर अनन्यभक्तिपरायण हैं, उनसे कभी प्रमादवश दुर्भाग्यसे कोई निषिद्ध कर्म हो जाता है, तो परमेश्वर श्रीहरि अन्तर्यामी रूपमें स्थित रहकर उनके उस पापका विनाश कर देते हैं॥ 140 ॥ मनोधर्म ज्ञान और वैराग्य कभी भी आत्मधर्म भक्तिके अङ्ग नहीं, भक्तिके अनुगामी दो पुत्र मात्र :— ज्ञान-वैराग्यादि—भक्तिर कभु नहे 'अङ्ग'। अहिंस-यम-नियमादि बुले कृष्णभक्त-सङ्ग॥ 141 ॥ अनुवाद—ज्ञान-वैराग्यादि कभी भी 'भक्ति'के अङ्ग नहीं हैं। अहिंसा-यम-नियमादि सद्गुण स्वयं ही श्रीकृष्ण- भक्तके साथ चलते हैं॥ 141 ॥ अनुभाष्य—अनेक लोग भ्रान्तिवशतः सोचते हैं कि ज्ञान और कर्मके लिये वैराग्य ही शुद्धभक्तिका सोपान (सीढ़ी) है, वास्तवमें ऐसा निश्चित रूपमें नहीं है। ज्ञान अथवा कर्मसे उत्पन्न वैराग्य निज-स्वरूपको लक्ष्य
[दायाँ स्तम्भ]
नहीं करता और यह अनित्य-अवस्थाका परिणामशील एक धर्म है, इसलिये वह नित्य श्रीकृष्णदास्यका अङ्ग नहीं है। कर्म और ज्ञानका फल परिणामशील अनित्य- अनुभूतिका एक विकार है एवं भोग और मोक्ष ही उसकी परिणति हैं, इसलिये नित्यभक्तिके साथ उसका कोई भी सम्बन्ध नहीं है। ज्ञान अथवा वैराग्य परित्यक्त होनेपर (छोड़नेपर) ही शुद्धभक्ति हो सकती है। श्रीकृष्णभक्त स्वभावसे ही हिंसाशून्य, संयमशाली और नियमोंमें रत रहते हैं। उन्हें इन सब गुणोंको अर्जित नहीं करना पड़ता॥ 141 ॥ भक्तिके बिना ज्ञान-वैराग्यसे श्रेयलाभ नहीं होता :— श्रीमद्भागवत (11/20/31)— तस्मान्मद्भक्तियुक्तस्य योगिनो वै मदात्मनः। न ज्ञानं न च वैराग्यं प्रायः श्रेयो भवेदिह ॥ 142 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 142 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मेरे प्रति भक्तियुक्त, मुझमें एकान्तिक चित्तवाले प्रिय योगीके लिये ज्ञानचेष्टा और वैराग्यचेष्टा प्रायः ही श्रेयस्कर नहीं होती। तात्पर्य यह है कि भक्ति स्वाभावतः स्वतन्त्र है; ज्ञान-वैराग्य-योगादि प्राथमिक अवस्थामें उसके लिये किञ्चित् उपयोगी होनेपर भी भक्तिके अङ्गोंमें नहीं गिने जाते॥ 142 ॥ अनुभाष्य—श्रीमद् उद्धवने श्रीकृष्णसे विधि और निषेधात्मक भगवद्-आज्ञारूप वेदवाक्योंसे जीवोंकी भोग-बुद्धिकी उत्पत्ति, पुनः उन्हीं वेदवाक्योंके द्वारा ही भोगबुद्धिके विनाशके विषयमें श्रवण करके उनसे जीवकी बुद्धि-भ्रान्ति अथवा मोहको दूर करनेके उपायकी जिज्ञासा की। भगवान्ने सर्वप्रथम कर्म, ज्ञान और भक्तिमार्गके तारतम्य (छोटे-बड़े होनेका) वर्णन करनेके बाद भक्तिकी सर्वश्रेष्ठताका वर्णन किया,— तस्मात् (भक्तेः सर्वोपाधि-विनिर्मुक्तत्वात्) वै (निश्चितं) मद्भक्तियुक्तस्य मदात्मनः (मयि कृष्णे आत्मा मनः यस्य तस्य) योगिनः (भक्तियोगयुक्तस्य जनस्य) इह न ज्ञानं, न च वैराग्यं प्रायः श्रेयः (निःश्रेयसकारणं) भवेत्।
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बाइसवाँ अध्याय 22/142-148 ] [बायाँ स्तम्भ] श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 142 ॥ शुद्धभक्त दूसरोंको उद्वेग नहीं देते :- स्कन्दपुराणके वचन- एते न ह्यद्भुता व्याध तवाहिंसादयो गुणाः। हरिभक्तौ प्रवृत्ता ये न ते स्युः परतापिनः ॥ 143 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 143 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे व्याध, तुममें जो अहिंसादि गुण उत्पन्न हुए हैं, वह अद्भुत नहीं है, क्योंकि, जो हरिभक्तिमें प्रवृत्त होता है, वह दूसरोंको कष्ट देनेवाला नहीं होता ॥ 143 ॥ अनुभाष्य- हे व्याध, तव एते अहिंसादयः गुणाः अद्भुताः (असाधारणाः) न; हि (यतः) ये (जनाः) हरिभक्तौ (कृष्णभजने) प्रवृत्ताः (अनुरताः), ते (भक्ताः) परतापिनः (अपरद्रोहपराः) न स्युः (भवन्ति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 143 ॥ (ख) रागानुगा-भक्तिका वर्णन :- वैधीभक्ति-साधनेर कहिलुँ विवरण। रागानुगा-भक्तिर लक्षण शुन, सनातन ॥ 144 ॥ अनुवाद-हे सनातन, यहाँ तक मैंने वैधीभक्तिके साधनके विषयमें बतलाया। अब तुम रागानुगा-भक्तिके लक्षण सुनो ॥ 144 ॥ रागात्मिका और रागानुगा-भक्तिका परिचय :- रागात्मिका-भक्ति-'मुख्या' व्रजवासि-जने। तार अनुगत भक्तिर 'रागानुगा'-नामे ॥ 145 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 145 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-व्रजवासी भक्तोंकी जो रागस्वरूपा (रागात्मिका) भक्ति है, वही मुख्य है अर्थात् वैसी भक्ति और कहीं भी नहीं है। व्रजवासियोंके अनुगत होकर जो भक्ति विद्यमान रहती है, उसका नाम ही रागानुगा भक्ति है ॥ 145 ॥ [दायाँ स्तम्भ] रागात्मिका-भक्तिकी संज्ञा :- भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/272)- इष्टे स्वारसिकी रागः परमाविष्टता भवेत्। तन्मयी या भवेद्भक्तिः सात्र रागात्मिकोदिता ॥ 146 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 146 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-इष्टवस्तुमें स्वाभाविकी और परमाविष्टतामयी जो सेवनवृत्ति है, उसका नाम 'राग' है; श्रीकृष्णभक्ति तन्मयी (वैसी रागमयी) होनेपर 'रागात्मिका' नामसे कही जाती है ॥ 146 ॥ अनुभाष्य- इष्टे (अभीष्टवस्तुनि या) स्वारसिकी (स्वीय-सिद्धरसोपयोगिनी स्वाभाविकी गाढ़तृष्णामयीत्यर्थः) परमाविष्टता (तदभिनिवेशमयी सेवनप्रवृत्तिः सा,) रागः भवेत्। तन्मयी (एवम्विध रागमयी) या भक्तिः भवेत्, अत्र (शुद्धभक्तिसाहित्ये) सा 'रागात्मिका' उदिता (कथिता)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 146 ॥ रागात्मिका-भक्तिके 'स्वरूप' और 'तटस्थ' लक्षण- 'गाढ़तृष्णा' और 'आविष्टता' :- इष्टे 'गाढ़-तृष्णा'-रागेर स्वरूप-लक्षण। इष्टे 'आविष्टता'-तटस्थ-लक्षण कथन ॥ 147 ॥ रागमयी भक्तिर हय 'रागात्मिका' नाम। ताहा शुनि' लुब्ध हय कोन भाग्यवान् ॥ 148 ॥ अनुवाद-इष्ट-वस्तुमें 'गाढ़-तृष्णा'-रागका स्वरूप- लक्षण है और इष्ट-वस्तुमें 'आविष्टता'को तटस्थ लक्षण कहा जाता है। रागमयी भक्तिका नाम ही 'रागात्मिका' भक्ति है। उसके विषयमें सुनकर किसी भाग्यवान्को ही लोभ होता है ॥ 147-148 ॥ अनुभाष्य-अपने आनुकूल्य-विषय अर्थात् अभीष्ट वस्तुमें गाढ़-तृष्णारूपी राग ही मुख्य अर्थात् स्वरूप- लक्षण है। कार्यके द्वारा जिसका ज्ञान होता है, उसे तटस्थ-लक्षण कहते हैं, वही यहाँपर अभीष्ट वस्तुमें आविष्टता है ॥ 147-148 ॥ । 367
[ 22/148–149 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला रागानुगा-भक्तकी प्रकृति अथवा लक्षण :- लोभे व्रजवासीर भावे करे अनुगति। शास्त्रयुक्ति नाहि माने—रागानुगार प्रकृति ॥ 149 ॥ अनुवाद—व्रजवासियोंके भावोंके प्रति लुब्ध होकर जो उनके भावोंका अनुगमन करता है, वह रागानुग भक्त शास्त्र-वचनों और युक्तियोंकी अपेक्षा नहीं करता, यही रागानुग भक्तका स्वभाव है॥ 149 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'अनुगति'—अनुगमन॥ 149 ॥ अनुभाष्य—व्रजवासियोंके भावोंके प्रति लुब्ध होकर उनके भावों और इच्छाओंका अनुगमन करना ही रागानुग भक्तोंकी स्वाभाविकी प्रवृत्ति होती है। जातरुचि भक्त स्वाभाविक रूपमें ही शास्त्रकी युक्तियोंमें सुनिपुण होते हैं, उनकी नित्यसिद्ध रुचिके विरुद्धमें अन्य व्यक्तिके द्वारा शास्त्रयुक्तिको प्रदर्शित करनेपर भी वे उसे स्वीकार नहीं करते। जानने योग्य बात यह है कि प्राकृत-सहजिया आदि कुपथ-आश्रित सम्प्रदायके लोग वास्तवमें अजातरुचि होनेपर भी रागानुगाभिमानमें भक्तिग्रन्थोंकी चर्चा और श्रीरूपानुग पथका परित्याग करके अवैध-स्त्रीलम्पट और मूर्खजनोंके योग्य सांसारिक रुचिको ही बढ़ाकर अपना सर्वनाश किया करते हैं। वे वञ्चित और दुर्भागे हैं॥ 149 ॥ अमृतानुकणा—'प्रीति या आनन्दके वशीभूत होकर ही जीव अपने-अपने कार्योंमें प्रवृत्त होते हैं। पण्डितगण इस प्रीतिको चित्त और विषयका बन्धनसूत्र बतलाते हैं। प्रीतिरूप बन्धनसूत्र विषयके जिस अंशका आश्रय करके रहता है, उसका नाम 'रञ्जकता धर्म' है और चित्तके जिस अंशको आश्रय करके रहता है, उसका नाम 'राग' है। विषयके नाम, रूप, गुण और क्रियागत जो सौन्दर्य या चमत्कारिता है, उसको 'रञ्जकता धर्म' कहते हैं। विचार करनेसे पूर्व ही विषयके सौन्दर्यको देखते ही चित्त जिस प्रवृत्तिके द्वारा उस पदार्थकी ओर दौड़ता है, वही 'राग' है। रागकार्यमें विचारकी आवश्यकता नहीं रहनेपर पण्डितगण उसको 'सिद्धवृत्तिस्वरूप' कहते हैं। राग जिस वस्तुके प्रति धावित होता है, उसको उसका 'इष्टविषय' कहते हैं। नित्य और अनित्य भेदसे रागके इष्टविषय दो प्रकारके हैं। नित्य इष्टविषयके प्रति राग जब धावित होता है, तब उसको 'वैकुण्ठराग' और अनित्य इष्टविषयके प्रति जब धावित होता है, तब उसको 'जड़राग' कहा जाता है। जीवके चित्तमें स्थित राग एक ही तत्त्व होनेके कारण वैकुण्ठराग और जड़रागमें विषयकी भिन्नता है, रागकी भिन्नता नहीं है।" ('रागरहस्य'—साप्ताहिक 'गौड़ीय' 3रा वर्ष 38 संख्या) जड़राग विद्यमान होनेपर कर्त्तव्य बुद्धिके द्वारा अर्थात् शास्त्रविधि और युक्तिसे प्रेरित होकर जो इष्टसाधन प्रणाली है, उसका नाम 'वैधीभक्ति' है। जबतक 'रति'का उदय नहीं होता है, तबतक वैधी भक्तिमें अधिकार है। रतिके उदय होनेपर वह 'वैकुण्ठराग'में पर्यवसित होता है। वैकुण्ठराग उसके इष्टविषयके वैशिष्ट्यके अनुसार ऐश्वर्यपर और माधुर्यपर भेदसे दो प्रकारका होता है। व्रजवासियोंका श्रीकृष्णके प्रति जो राग है, वह केवल माधुर्यपर और ऐश्वर्यगन्धविहीन है। श्रीकृष्णके प्रति उनके उस रागमें आत्मसुखकी इच्छाकी गन्धमात्र भी नहीं रहती और तारतम्यके अनुसारसे वह सर्वश्रेष्ठ है। इसलिये व्रजवासियोंके परम, विशुद्ध वैकुण्ठरागको ही मुख्यत: 'रागात्मिका भक्ति' कहा जाता है। उस विषयमें शास्त्रके वर्णनको श्रवणकर उनके रागके प्रति जो लोभ उत्पन्न होता है (अर्थात् किसी विशेष रागमें लोभमात्र उत्पन्न होता है, परन्तु स्वयं वह विशेष राग उत्पन्न नहीं होता), उसके द्वारा जो भक्ति होती है, उसको 'रागानुगा भक्ति' कहते हैं। वहाँपर शास्त्रविधि और युक्तिके विषयमें उपयुक्त ज्ञान रहनेपर भी वह उक्त भक्तिका उत्तेजक नहीं है, परन्तु यथार्थ विषयमें लोभ ही उसका उत्तेजक है। “ततश्च तादृशलोभोवतो भक्तस्य लोभनीय-तद्भाव- प्राप्त्युपाय-जिज्ञासायां सत्यां शास्त्रयुक्त्यपेक्षा स्यात्। यथा दुग्धादिषु लोभे सति कथं मे दुग्धादिकं भवेदिति तदुपायजिज्ञासायां तदभिज्ञाप्तजन-कृतोपदेशवाक्यापेक्षा 368 |
बाइसवाँ अध्याय 22/148-150 ] स्यात्।” (रागवर्त्म-चन्द्रिका) - बादमें इस प्रकार लोभसे युक्त भक्त जब श्रीकृष्ण परिकरोंके भावप्राप्तिके उपायोंके जिज्ञासु होते हैं, तब उस अवस्थामें शास्त्र और उसके अनुकूल युक्तिकी व्यवस्था देखी जाती है। जैसे, किसी व्यक्तिको यदि दूध पीनेके लिये लोभ हुआ है, तब किस प्रकारसे दूध प्राप्त होगा, इस उपायको जाननेके लिये उसमें जिज्ञासा उत्पन्न होती है और उस समय उस व्यक्तिके लिये एक विश्वसनीय जानकार व्यक्तिके द्वारा उपदेश-वाक्यकी अपेक्षा देखी जाती है। उसी प्रकार भावके लिये लोभी व्यक्तियोंके लिये भी शास्त्रमें कहे गये उपदेशोंकी अपेक्षा दिखलायी देती है। इसलिये लोभ उत्पत्तिके लिये यद्यपि शास्त्रादिकी कोई अपेक्षा नहीं है, तथापि अभीष्ट भावके पानेके लिये शास्त्रोंके उपदेशकी अवश्य ही अपेक्षा है, ऐसा जानना होगा। इसलिये वैधी साधनभक्तिके जो समस्त अङ्ग हैं, रागानुगा भक्ति उन सभी अङ्गोंको स्वीकार करती है। “वस्तुतस्तु लोभ-प्रवर्तितं विधिमार्गेण सेवनमेव रागमार्ग उच्यते, विधिप्रवर्तितं विधिमार्गेण सेवनञ्च विधिमार्ग इति। विधिविनाभूतं सेवनं तु श्रुतिस्मृतिर्यादिवाक्यादुत्पातप्रापकमेव।” (रागवर्त्म चन्द्रिका) - वस्तुतः लोभके द्वारा प्रवृत्त होनेपर विधिमार्गके अनुसार सेवा ही 'रागमार्ग'रूपमें कही गयी है और शास्त्रविधि-हेतु अर्थात् कर्त्तव्यबुद्धिसे प्रवृत्त होनेपर विधिमार्गमें जो सेवा है, उसे 'विधिमार्ग' कहा गया है। किन्तु शास्त्रविधिके बिना सेवा भक्तिरसामृतसिन्धु ग्रन्थमें उल्लिखित “श्रुति-स्मृति-पुराणादि-पञ्चरात्र-विधिं बिना। ऐकान्तिकी हरेर्भक्तिरुत्पातायैव कल्पते।” - इस वाक्यके अनुसार वह उत्पातका कारण होती है। “रागभक्तगण जातरुचि हैं-उनकी स्वभावतः ही शास्त्रयुक्तिमें सुनिपुणता होती है। अजातरुचि व्यक्तिका शास्त्रसिद्धान्तमें सम्पूर्ण अनिपुण और उच्छृङ्खल होकर रागानुगाका अभिमान करना कपटतामात्र है। इस कपटमयी प्राकृत-अभिनिवेशमयी रुचिको रागमयी भक्तिमें लोभ नहीं समझना चाहिये, क्योंकि वह वास्तवमें सम्भोग- स्पृहासे दोषयुक्त है। वैधीभक्तिके द्वारा चित्त निर्मल होनेपर यदि अहैतुक हरि-गुरु-वैष्णव-कृपासे किसी सौभाग्यवानमें रागमय लोभ स्वतः प्रकाशित होता है, तभी उसका रागानुगा भक्तिमें अधिकार उत्पन्न होता है। कोई कृत्रिमरूपसे इच्छा करनेपर या गानके बलसे रागानुगा भक्त नहीं हो सकता। मूर्खता, उच्छ्र कल्पना, निषिद्धाचार, शास्त्र-उल्लंघन या व्यभिचार- रागानुगा भक्ति या लोभमयी श्रद्धा नहीं है। पुरुषाभिमानी व्यक्ति रागभजन नहीं कर सकता। महत् व्यक्तिकी कृपा होनेपर ही यह पुरुषाभिमान दूर होता है और श्रीपुरुषोत्तमकी प्रकृति होनेका अभिमान जाग्रत होता है। अनर्थ सङ्कुचित होनेपर निर्मल आत्मा या शुद्धजीवस्वरूपमें जो स्वतःसिद्ध रागमय सेवा-भाव प्रकाशित होता है, उसमें अपने-अपने शुद्धस्वरूपके रसभेदसे रागात्मिक व्रजवासियोंके नित्यसिद्ध-भावके प्रति रागानुगा निष्ठा प्रकट होती है। तब श्रीगुरुकृपाके बलसे परम सौभाग्यवान् साधकोंका अपना-अपना स्वरूप प्रकाशित होता है। इसमें कल्पनाका, कृत्रिमताका या अन्य किसी प्रकारके उद्देश्यका स्थान नहीं है। जिनका हृदय निर्गुण है, उन्हींकी निर्गुण व्रजजनोंके आनुगत्यमें रुचि उत्पन्न होती है।” (विधि और राग-दैनिक नदिया प्रकाश) ॥148-149॥ रागानुगा-भक्तिकी संज्ञा :- भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/268)- विराजन्तीमभिव्यक्तां व्रजवासिजनादिषु। रागात्मिकामनुसृता या सा रागानुगोच्यते ॥ 150 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 150 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-व्रजवासिजनोंमें अभिव्यक्तरूपमें रागात्मिका-भक्ति विराजमान है। उस भक्तिकी अनुसृता (अनुगता) जो भक्ति है, वही 'रागानुगा' भक्ति है ॥ 150 ॥ अनुभाष्य- या व्रजवासिजनादिषु अभिव्यक्तां (सुप्रकाशितां यथा स्यात् तथा) विराजन्तीं (शोभमानां) रागात्मिकां (नित्यसिद्ध- व्रजजन-स्वभावगतां) भक्तिम् अनुसृता (अनुगता), सा 'रागानुगा" उच्यते। । 369
[ 22/150-153 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 150 ॥ भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/292) :- तत्तद्भावादिमाधुर्य्ये श्रुते धीर्यदपेक्षते । नात्र शास्त्रं न युक्तिञ्च तल्लोभोत्पत्तिलक्षणम् ॥ 151 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 151 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-व्रजवासियोंके भावादिके माधुर्यको श्रवण करनेमें बुद्धि जिस लोभकी अपेक्षा करती है, वही रागानुगा-भक्तिका अधिकार प्रदान करता है। शास्त्र अथवा युक्ति उस लोभकी उत्पत्तिका लक्षण नहीं है ॥ 151 ॥ अनुभाष्य- [जातरुचिमहाभागवतगुरुमुखात् श्रीमद्भागवत-पद्मपुराणादि- सिद्धशास्त्राद्वा] तत्तद्भावादिमाधुर्य्यं (व्रजवासिनां शान्तदास्य- सख्यवात्सल्यमधुर-रसाश्रितभावादीनां माधुर्य्यं) श्रुते (श्रवणेन अनुभूते सति) यत् (यस्य) धीः (बुद्धिः) अत्र (इह) शास्त्रं (विधि-वाक्यं) न, युक्तिं (विचारणं) च न अपेक्षते (परन्तु स्वतः स्वभावतः एव प्रवर्त्तते), तदेव लोभोत्पत्तिलक्षणं (रागोदयलक्षणम्)। श्लोक-भावानुवाद-जातरुचि महाभागवत गुरुके मुखसे श्रीमद्भागवत-पद्मपुराणादि सिद्धशास्त्रोंमें वर्णित व्रजवासियोंके शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य, मधुर-रसाश्रित भावोंके माधुर्यके विषयमें श्रवण और अनुभव करके जिसकी बुद्धि शास्त्र-वाक्यों और विचारोंकी अपेक्षा नहीं करती, अपितु स्वभावतः ही उसमें प्रवर्तित होती है, वही राग उदय होनेका लक्षण है॥ 151 ॥ अनर्थ-निवृत्ति होनेपर साधकदेहमें और सिद्धदेहमें रागानुगा-भक्तिका दो प्रकारका अनुशीलन :- बाह्य, अन्तर,—इहार दुइ त' साधन। ‘बाह्ये’ साधकदेहे करे श्रवण-कीर्त्तन ॥ 152 ॥ ‘मने’ निज-सिद्धदेह करिया भावन। रात्रि-दिने करे व्रजे कृष्णेर सेवन ॥ 153 ॥ अनुवाद-‘बाह्य’ और ‘आन्तरिक’—इन दो प्रकारसे रागानुगा भक्तिका अनुशीलन होता है। निज-सिद्धदेहकी अनुभूति होनेपर भी रागानुगा भक्त साधकदेहसे ‘बाहरसे’ श्रवण और कीर्तन करता है और ‘मनमें’ अपनी सिद्धदेहकी भावना करके रात-दिन व्रजमें श्रीकृष्णकी सेवा करता है॥ 152-153 ॥ अमृतानुकणा—“श्रीकृष्णसेवा-अप्राकृत कामदेवकी सेवा है—शुद्धचेतनकी अस्मिताके द्वारा भगवान्के चरणकमलोंकी नित्या अहैतुकी अप्रतिहता (नैरन्तर्यमयी) सेवा है। श्रीकृष्णसेवा अप्राकृत देहका कार्य है। आरोपके द्वारा या अन्तश्चिन्तित काल्पनिक मनोमय देहके द्वारा श्रीकृष्णसेवाकी बात हमारे गोस्वामियोंने कभी नहीं कही है। इस जगत्में स्थूल और लिङ्गदेहके द्वारा अप्राकृत वस्तुकी सेवा नहीं होती। जब हमारी अप्राकृत देहके द्वारा अप्राकृत वस्तुकी सेवा होती है, तभी बाह्य देहसे उसकी स्पन्दन क्रिया देखी जा सकती है। “अतः श्रीकृष्णनामादि न भवेत् ग्राह्यमिन्द्रियैः। सेवोन्मुखे हि जिह्वादौ स्वयमेव स्फुरत्यदः ॥”-इसके द्वारा हम अपने दुर्भाग्यकी पराकाष्ठाकी अधिक उपलब्धि कर सकते हैं। सम्बन्धज्ञानयुक्त अप्राकृत देहके द्वारा जब हम श्रीकृष्णसेवा करनेके लिये लोभी होते हैं, तब हमारी बाहरकी देह भी मायाकी पूजा न करके सदा वैकुण्ठ- नाम ग्रहणमें उत्कण्ठित होती है। किन्तु बाह्य जगत्की प्रतीति प्रबल रहनेपर हम जो याजन करनेका अभिमान करते हैं, वह निरर्थक है। इसके द्वारा यह नहीं कहा गया है कि भजनकी क्रियाको छोड़ देना होगा। अपितु यह कहा गया है कि अधिकारके अनुयायी होकर क्रमानुसार अग्रसर होना होगा। सद्गुरुके श्रीचरणाश्रयके बिना हमारी भजनक्रिया या अनर्थनिवृत्तिकी सम्भावना नहीं है। अनर्थनिवृत्ति न होनेपर श्रीकृष्णसेवामें नैरन्तर्य और रुचि आदि उपस्थित नहीं हो सकती। जिस दिन हम सेवक-विग्रह श्रीगुरुदेवको श्रीचैतन्यदेवसे अभिन्न जाननेकी उपलब्धि कर सकेंगे, उस दिन हम श्रीराधागोविन्दकी निभृतसेवा अपनी विभिन्न आत्मरतिसे 370
बाइसवाँ अध्याय 22/152-153 ] कर सकेंगे।”-(श्रील प्रभुपादकी वक्तृता, साप्ताहिक 'गौड़ीय' ३रा वर्ष 40 संख्या) “मने निज सिद्धदेह करिया भावन”-यहाँपर 'भावना'-शब्दसे मानवके सङ्कल्प-विकल्पात्मक धर्मयुक्त प्राकृत मनके द्वारा स्वतन्त्र चिन्ताप्रणालीको नहीं समझना चाहिये। क्योंकि, श्रीरूपगोस्वामीने कहा है, - 'व्यतीत्य भावनावर्त्म यश्चमत्कारकारभूः। हृदि सत्त्वोज्ज्वले बाढं स्वदते स रसो मतः॥” (भःरःसिः) - भावनाके पथका अतिक्रम करके अतिशय चमत्कारिकताके आधारस्वरूप जो स्थायीभाव शुद्धसत्त्वसे परिमार्जित उज्ज्वल-हृदयमें आस्वादित होता है, उसे ही 'रस' कहा जाता है। इसलिये विशुद्धसत्त्व-वृत्तिके द्वारा ही अधोक्षज श्रीराधाकृष्णका ध्यान सम्भव है। अधोक्षज-वस्तु- प्राणी-जगत्के भोगोन्मुख जड़ेन्द्रियोंसे अतीत है- 'नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः।' (गीता 7/25)। वह केवल सेवोन्मुख निर्मल चित्तमें ही प्रकाशित होती है। “भक्तियोगेन मनसि सम्यक् प्रणिहितेऽमले। अपश्यत् पुरुषं पूर्णं मायाञ्च तदपाश्रयाम्॥” (भाः 1/7/4) शुद्धभक्तियोगके प्रभावसे शुद्ध हुए मनके समाहित होनेपर श्रीव्यासदेवने स्वरूपशक्तियुक्त पूर्णपुरुष श्रीकृष्णके दर्शन किये थे। इसलिये ही गौरपार्षद ठाकुर श्रीनरोत्तमदासने कहा है, - “विषय छाड़िया कब शुद्ध हवे मन। कब हाम हेरिब श्रीवृन्दावन ॥” जड़विषयोंमें आविष्ट अशुद्ध मनमें कभी भी पूर्णपुरुषकी उपलब्धि नहीं हो सकती, क्योंकि (बद्धजीवकी) चिन्ता जड़को अतिक्रम नहीं कर सकती। उपासनाको चिन्ता कहनेपर, केवल जड़से ही उत्पन्न कल्पनाको उपासना कहना होगा। सामान्य मानवसत्तामें जड़ और चिन्ताके अतिरिक्त और कुछ लक्षित नहीं होता। जड़, जड़चिन्ता और अजड़चिन्तारूप निर्विशेषभाव-इन तीनों सामान्यतः लक्षित तत्त्वोंको पार करके जीवकी सिद्धसत्ताका अनुसन्धान करो। तभी चिन्मय उपासना लक्षित होगी। उस चिन्मय उपासनाका नाम 'रस' है। (श्रीचैतन्य-शिक्षामृत 7/2) “दिव्यज्ञान या दीक्षाकी सिद्धिमें अप्राकृत देह या चिदानन्दमय सिद्धदेह श्रीगुरुपादपद्मकी कृपासे प्रकाशित होती है। “दीक्षाकाले भक्त करे आत्मसमर्पण। सेइकाले कृष्ण तारे करे आत्मसम॥ सेइ देह करे तार चिदानन्दमय। आप्राकृत देहे ताँर चरण भजय॥” तभी साधक उस सिद्धदेहकी भावनाकी योग्यता प्राप्त करता है और बाहरसे निरन्तर श्रवण-कीर्तनादि करता है। सिद्धदेह पूर्ण सेवोन्मुखताके साथ साथ ही प्रकाशित होती है और वह श्रीवार्षभानवीके अभिन्न तनु श्रीगुरुपादपद्मकी कृपाके बलसे ही प्राप्त होती है। गुरुवर्गकी वाणीमें देखा जाता है-अन्य सब भाव दूर होनेपर नित्यसिद्ध व्रजगोपीभावका स्वाभावरूपमें प्रकट होना ही 'गोपीगर्भसे जन्मलाभ' है। अर्चनमार्गमें जिस प्रकार भूतशुद्धि होनेके बाद ही अर्चनका अधिकार होता है, अप्राकृत भावमार्गमें भी उसी प्रकार अन्य भावोंका परित्याग करके व्रजगोपीभाव प्राप्त करने तक या गोपीगृहमें जन्मलाभ न करने तक श्रीराधागोविन्दकी भावसेवामें अधिकार प्राप्त नहीं होता है। 'गुप्'-धातुका अर्थ होता है, रक्षा करना। श्रीकृष्ण निर्मल चेतनकी नित्यसिद्ध वृत्तिका संरक्षण करते हैं अर्थात् चेतनकी नित्यसेवाप्रवृत्तिके विषय होकर वे 'गोपीनाथ' और निर्मल चेतनकी सेवावृत्तिका विग्रहसमूह ही 'गोपी' है। उस गोपीके गर्भसे अर्थात् श्रीकृष्णकी एकमात्र संरक्षित-सत्त्वस्वरूप सेवावृत्तिके अन्दरमें जीवकी चेतनवृत्ति अवस्थित न होनेपर कोई श्रीराधामाधवकी सेवाका अधिकार प्राप्त नहीं कर सकता। ('सिद्ध'-दैनिक नदिया प्रकाश) “इस जड़जगत्में 'नित्य साधक' जड़ देहमें वास करनेपर भी भावनामार्गमें श्रीगुरुकी कृपासे नित्यसिद्धदेहकी भावना करेंगे। उस देहमें अष्टकालीय मानसी सेवा चिन्ता करते-करते स्वरूपसिद्धि होनेसे उनमें अभिमान उत्पन्न होगा।” (श्रीचैतन्य-शिक्षामृत 6/5)। यहाँपर 'नित्य साधक' किसको कहा गया है? “साधक दो प्रकारके । 371
[ 22/152-156 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला हैं—प्राथमिक और नित्य। 'प्राथमिक' साधकगण नाम संख्याकी वृद्धि करते-करते (क्रमशः) नामकीर्तनमें नैरन्तर्य प्राप्त करते हैं। नैरन्तर्य प्राप्त करके वे 'नित्य साधक' हो जाते हैं। 'प्राथमिक' साधकोंकी अविद्यारूपी पित्तरोगसे तप्त-रसनाकी नाममें 'रुचि' नहीं होती। तुलसीमालापर संख्यापूर्वक निरन्तर नाम करते-करते (अन्तमें) नैरन्तर्य-सिद्धि या 'नित्य'-अवस्थामें नाममें आदर होता है। इस अवस्थामें नामोच्चारण-रहित होनेपर अच्छा नहीं लगता। आदरके सहित निरन्तर नाम करते-करते नाममें परमास्वाद उत्पन्न होता है। उस समय पाप, पापबीज और इस सबका मूल जो अविद्या-अभिनिवेश है, वह स्वयं दूर हो जाता है और नरस्वभावके जो समस्त अनर्थ हैं, वे क्रमशः दूर हो जाते हैं और नामका परमानन्दमय स्वरूप-साक्षात्कार होता है।"-(श्रीचैतन्य-शिक्षामृत 6/4)। इसलिये नाममें रुचिप्राप्त, नामानुशीलनके प्रभावसे अविद्या-अभिनिवेशसे मुक्त और निवृत्त-अनर्थ एवं श्रीनामके स्वरूप-अनुभवकारी 'नित्य साधक' रागानुगा भक्तिमें अधिकारी होते हैं। वे श्रीगुरुकी कृपासे युगपत् (एक साथ) बाह्य साधकदेहसे अनुक्षण श्रवण-कीर्तन और भीतरमें अपनी सिद्धदेहसे श्रीराधाकृष्णकी सेवा करनेमें समर्थ होते हैं। किन्तु श्रीनाममें अजातरुचि (जिनकी रुचि जाग्रत नहीं हुई), प्राकृत-अभिनिवेशयुक्त और अनर्थयुक्त 'प्राथमिक' साधकोंके लिये उस प्रकारकी चेष्टा नितान्त ही अनधिकार-चर्चा है और कष्टकल्पना मात्र है॥ 152-153 ॥ अनुभाष्य— अत्र (रागानुगा-भक्तिसाधने) तद्भावलिप्सुना (तत् तस्य व्रजस्थितस्य निजाभीष्टस्य कृष्णप्रेष्ठस्य गुरोः यः भावः तस्य लिप्सुना तदनुगमनेन निजायत्तीकर्त्तुमिच्छुना) साधकरूपेण (साधकशरीरे कीर्त्तनाख्यभक्त्याश्रितेन) सिद्धरूपेण (स्वरूपसिद्धौ नित्यसेवनोपयोगि-मानसदेहेन) च व्रजलोकानुसारतः (तदनुराणि-व्रजजनानुगत्येन) सेवा हि कार्या (करणीया)। श्लोक-भावानुवाद-रागानुगा-भक्तिसाधनमें व्रजमें स्थित निजाभीष्ट श्रीकृष्णके अति प्रिय गुरुका जो भाव है, उसके लोभसे उनके आनुगत्यमें स्वयं वैसी सेवा करनेके इच्छुक साधक शरीरसे कीर्त्तनाख्य भक्तिका आश्रय और सिद्ध-स्वरूपसे नित्यसेवोपयोगी मानस-देहसे व्रजवासियोंके अनुसार सेवा कार्य करेंगे।। 154 ॥ रागानुग-भक्तकी सब समय गुरुके आनुगत्यमें अपनी अभीष्ट सिद्धसेवा :- निजाभीष्ट कृष्णप्रेष्ठ पाछे त' लागिया। निरन्तर सेवा करे अन्तर्मना हञा ॥ 155 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 155 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-व्रजवासी भक्तगण ही श्रीकृष्णके प्रियतम हैं; उनमेंसे जो जिस व्रजभक्तके माधुर्यके कारण लोभपूर्वक उसके अनुगमन (आनुगत्य)में अभीष्ट सेवाकी कामना करते हैं, वे उनके पीछे-पीछे रहकर अन्तर्मना होकर निरन्तर श्रीकृष्णसेवा करते हैं॥ 155 ॥ शास्त्र-प्रमाण :- भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/295)— सेवा साधकरूपेण सिद्धरूपेण चात्र हि। तद्भावलिप्सुना कार्या व्रजलोकानुसारतः॥ 154 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 154 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-रागात्मिका-भक्तिमें जिनका लोभ होता है, वे व्रजवासियोंके कार्योंके अनुसार साधकरूपमें बाहरसे और सिद्धरूपमें भीतरमें सेवा करते हैं॥ 154 ॥ अनर्थ-निवृत्ति प्राप्त रागानुग-भक्तका निर्जनमें अभीष्टका स्मरणादि :- भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/294)— कृष्णं स्मरन् जनञ्चास्य प्रेष्ठं निजसमीहितम्। तत्तत्कथा-रतश्चासौ कुर्याद्वासं व्रजे सदा ॥ 156 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 156 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्ण और उनके निज-निर्वाचित प्रियतमजनोंको सदा स्मरण करते हुए उन-उन कथाओंमें रत होकर सर्वदा व्रजमें वास करेंगे। शरीरसे व्रजवास 372 ।
बाइसवाँ अध्याय [22/156-159 ]
करनेमें असमर्थ होनेपर, मन-ही-मनमें ही व्रजवास करेंगे॥ 156॥
अनुभाष्य— कृष्णं च अस्य (कृष्णस्य) प्रेष्ठं (प्रियतमं) निजसमीहितं (निजाभीष्टं जनं) च स्मरन् असौ (साधकः) तत्तत्कथारतः (तत्तद्रसोचित-कथानुरक्तः सन्) सदा (नित्यकालं) व्रजे (नन्दनन्दन-सेवामय-वृन्दावने) वासं कुर्यात् (स्थूलशरीरे मनसापि वा नित्यनिवासं स्थापयेत्—कृष्णभजनविहीनस्य धामवासः प्राकृत-विषय-भोग-विमूढ़स्य कदापि न भवति, परन्तु नित्यभजनशीलस्य लौकिकदृष्ट्या अन्यत्रावस्थानेऽपि अहरहः नित्यधामवास एव स्यादिति भावार्थः)।
श्लोक-भावानुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें। (श्रीकृष्ण-भजनविहीन प्राकृत विषयभोगी विमूढ़ व्यक्तिका धाममें रहनेपर भी धामवास नहीं होता, परन्तु नित्य भजनशील भक्तका लौकिक दृष्टिसे धामसे बाहर अन्यत्र रहनेपर भी दिन-रात नित्यधामवास होता है।)॥ 156॥
रागानुग-भक्तोंकी चार रसोंमें श्रीकृष्णसेवा, शान्तरसमें विद्यमानता नहीं :- दास-सखा-पित्रादि-प्रेयसीर गण। रागमार्गे निज-निज-भावेर गणन ॥ 157 ॥
अनुवाद— श्रीनन्दनन्दनके भक्तोंमें कोई दास भावसे, तो कोई सखा भावसे, तो कोई वात्सल्य (पिता-मातादि) भावसे और कोई प्रेयसीके भावसे उन्हें प्रेम करते हैं। रागमार्गमें वे अपने-अपने भावके अनुरूप प्रवृत्त होते हैं॥ 157॥
रागानुग-भक्त श्रीकृष्णके साथ चार रसोंमें सम्बन्धयुक्त और अनन्यभक्त हैं तथा काल और प्रकृतिसे अतीत हैं :- श्रीमद्भागवत (3/25/38)में— न कर्हिचिन्मत्पराः शान्तरूपे नङ्क्ष्यन्ति नो मेऽनिमिषो लेढ़ि हेतिः। येषामहं प्रिय आत्मा सुतश्च सखा गुरुः सुहृदो दैवमिष्टम्॥ 158 ॥
अनुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 158 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य— मैं ही जिनका प्रिय, आत्मा, पुत्र, सखा, गुरु, सुहृत्, देव और इष्ट हूँ, वे सदैव मेरे परायण रहते हैं। हे शान्तरूपे माता, मेरा कालचक्र उनका कभी भी नाश नहीं करता ॥ 158 ॥
अनुभाष्य— भगवान् मैत्रेय-ऋषि विदुरको कपिल-देवहूतिके संवादका वर्णन कर रहे हैं। देवहूतिके द्वारा भगवान् कपिलदेवसे भगवद्भक्तियोग और आत्मतत्त्वकी जिज्ञासा करनेपर, उन्होंने सांख्ययोग-नामसे प्रसिद्ध शुद्धभक्तियोगका वर्णन करते हुए सर्वप्रथम भक्तिको सर्वश्रेष्ठ अभिधेय बतलाकर शुद्धभक्त हरिजनोंका माहात्म्य बतला रहे हैं,—
[हे मात:,] शान्तरूपे (मन्निष्ठामयि, शान्तं विकाररहितं शुद्धसत्त्वं रूपं यस्मिन् तद्रूपे नित्यधाम्नि वैकुण्ठे वा) येषां (भक्तानाम्) अहं प्रियः (प्रेमपात्रं), सुतः (स्नेहविषयः), आत्मा (प्रेष्ठः), सखा (विश्वासास्पदं), गुरुः (उपदेष्टा), सुहृदः (हितकारी), इष्टं देवं (पूज्यः) [ते एव मद्भक्ताः, अतः मया रक्षमाणाः] कर्हिचित् (कदाचिदपि) न नङ्क्ष्यति (निर्विशेषाः, भोग्यहीना न भवन्ति यतः) अनिमिषः (कालः) मे (मदीयः) हेतिः (कालचक्रं) न लेढ़ि (तान् न ग्रसते)।
श्लोक-भावानुवाद— [हे माते!] मुझमें निष्ठायुक्त शुद्धसत्त्वमय नित्यधाम वैकुण्ठमें जो भक्त हैं, मैं उनका प्रेमका पात्र, पुत्र (स्नेहका विषय), आत्मा (प्रियतम), सखा (विश्वासास्पद), गुरु (उपदेष्टा), सुहृत् (हितकारी) और इष्टदेव (पूज्य) हूँ। [वे मेरे भक्त मेरे द्वारा रक्षित हैं, इसलिये] वे कदापि भोग्यहीन नहीं होते [प्राकृत स्वर्गादि नाशवान् हैं, परन्तु वैकुण्ठमें भोग्यवस्तुके नष्ट होनेकी कोई आशङ्का नहीं है]। मेरा कालचक्र भी उनको ग्रास करनेमें असमर्थ है॥ 158॥
रागानुग भक्तोंको प्रणाम :- भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/308)— पतिपुत्रसुहृद्भ्रातृपितृवन्मित्रवद्धरिम्। ये ध्यायन्ति सदोद्युक्तास्तेभ्योऽपीह नमो नमः ॥ 159 ॥
अनुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 159 ॥
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[ 22/159-163 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अमृतप्रवाह भाष्य—पति, पुत्र, सुहृत्, भाई, पिता, मित्रादिके रूपमें श्रीहरिका जो सदा उत्साहपूर्वक ध्यान करते हैं, उन्हें बारम्बार नमस्कार है ॥ 159 ॥ अनुभाष्य— इह (अस्मिन् जगति) ये (भक्ताः जनाः) सदा उद्युक्ताः (उत्साहयुक्ताः सन्तः) हरिं (भगवन्तं) पतिपुत्रसुहृद्भ्रातृपितृवत् मित्रवत् च ध्यायन्ति, तेभ्यः अपि नमः नमः। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 159 ॥ प्रतिक्षण गुरुके आनुगत्यमें निर्दिष्ट अभीष्टसेवासे ही रागानुग-साधककी सिद्धि अथवा भावभक्तिकी प्राप्ति :- एइमत करे येबा रागानुगा-भक्ति। कृष्णेर चरणे ताँर उपजाय 'प्रीति' ॥ 160 ॥ अनुवाद—जो इस प्रकार रागानुगा-भक्तिका पालन करता है, उसकी श्रीकृष्णके चरणोंमें 'प्रीति' उत्पन्न होती है॥ 160 ॥ अनुभाष्य—जो 'इस प्रकार' अर्थात् बाहरसे साधकदेहमें सुनी हुई हरिकथाकी कीर्तनके द्वारा सेवा और मनमें श्रीकृष्ण-सेवोपयोगी अपने रसके अनुकूल सिद्धदेहसे सदा व्रजमें श्रीराधाकृष्णकी सेवा करते हैं, वे शास्त्र अथवा गुरुके शासनके बलसे वैधीभक्तिके बदले अपनी स्वाभाविक जातरुचिके प्रभावसे रागानुग-पथपर चलते- चलते श्रीकृष्णके चरणोंमें प्रगाढ़ प्रीति प्राप्त करते हैं। रागानुग-मार्गमें ही रति अथवा भावके प्रभावसे श्रीकृष्ण वशीभूत होते हैं और तभी श्रीकृष्णप्रेमसेवाकी प्राप्ति होती है ॥ 159-160 ॥ बाइसवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। (2) 'साध्य' भावभक्ति अथवा रतिका वर्णन :- श्रीकृष्णप्रेमकी अस्फुट अवस्था ही श्रीकृष्णको आकर्षित करनेवाली 'भावभक्ति' अथवा 'रति'- प्रीत्यङ्कुरे 'रति', 'भाव'-हय दुइ नाम। याहा हैते वश हन श्रीभगवान् ॥ 161 ॥ अनुवाद—प्रीतिके अङ्कुरके रति और भाव—ये दो नाम हैं। इनके द्वारा श्रीभगवान् वशीभूत हो जाते हैं॥ 161 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'प्रीत्यङ्कुरे 'रति', 'भाव'-हय दुइ नाम'-प्रेमके अथवा प्रीतिके अङ्कुरके दो नाम हैं अर्थात् 'रति' और 'भाव' ॥ 160-161 ॥ बाइसवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। भाव अथवा रतिके उदित होने तक ही 'साधन'रूप 'अभिधेय'; उसीसे 'प्रयोजन'की प्राप्ति :- याहा हैते पाइ कृष्णेर प्रेमेर सेवन। एइत' कहिलुँ 'अभिधेय' विवरण ॥ 162 ॥ अनुवाद—जिससे श्रीकृष्णकी प्रेम-सेवाकी प्राप्ति होती है, मैंने तुम्हें उसी 'अभिधेय'के विषयमें बतलाया है ॥ 162 ॥ अभिधेय साधनभक्ति संक्षेपमें वर्णित :- अभिधेय, साधन-भक्ति एबे कहिलुँ सनातन। संक्षेपे कहिलुँ, विस्तार ना याय वर्णन॥"163 ॥ अनुवाद—हे सनातन, मैंने अभिधेय साधन-भक्तिका संक्षेपमें वर्णन किया है, क्योंकि विस्तारसे इसका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ 163 ॥ 374 |
बाइसवाँ अध्याय 22/164-165 ] साधनभक्तिके श्रवणसे श्रीकृष्णप्रेमका उदय :- इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे अभिधेय- अभिधेय साधनभक्ति सुने येइ जन। भक्तितत्त्वविचारो नाम द्वाविंशः परिच्छेदः। अचिरात् पाय सेइ कृष्णप्रेमधन॥ 164॥ अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी अनुवाद-जो भी व्यक्ति इस अभिधेय साधनभक्तिके कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका विषयमें सुनता है, उसे अतिशीघ्र श्रीकृष्णप्रेमधनकी वर्णन कर रहा है॥ 165 ॥ प्राप्ति होती है॥ 164॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें अभिधेयभक्तितत्त्वविचार- चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥ 165 ॥ नामक बाइसवें अध्यायका अनुवाद समाप्त। । 375
श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
376 ।
तेइसवाँ अध्याय कथासार—महाप्रभुने इसके बाद श्रीसनातनसे भावके लक्षण, प्रेमके और प्रेमके उत्पन्न होनेके लक्षण और उदित-भाव (जिनमें भाव उदित हो गया है, ऐसे) व्यक्तियोंके व्यवहार-लक्षण वर्णन करके प्रेम जिस क्रमसे 'महाभाव' होता है, उसका तथा पाँच प्रकारकी रतिकी व्याख्यासे उस-उस रसकी व्याख्या, रसकी स्थिति और शृङ्गार रसका सर्वोत्कर्ष संस्थापन एवं उसके स्वकीय-परकीय-भेदसे विविध होनेका वर्णन किया। महाप्रभुने श्रीकृष्णके चौंसठ गुणोंकी व्याख्या, राधिकाके पच्चीस गुणोंकी व्याख्या और श्रीकृष्णभक्तिरसके अधिकारीका स्वरूप और अष्टाङ्ग-लक्षणोंका वर्णन किया। महाप्रभुने श्रीसनातनको भागवतके गूढ़ सिद्धान्त, हरिवंशमें लिखित गोलोककी नित्यलीला, केशावतारकी विरुद्ध-व्याख्या और शुद्ध व्याख्या—इन समस्त शिक्षाओंको प्रदान करके श्रीसनातनके मस्तकपर हस्त अर्पण करके उनमें शक्तिका सञ्चार किया। —(अमृतप्रवाह भाष्य) अनर्पितचर-नामप्रेमप्रदाता महावदान्य श्रीगौरको प्रणाम :— चिरादत्तं निज-गुप्तवित्तं स्वप्रेम-नामामृतमत्युदारः। आपामरं यो विततार गौरः कृष्णो जनेभ्यस्तमहं प्रपद्ये ॥ 1 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अपने प्रेमनामामृतरूपी गुप्त धन,—जिसे इससे पूर्व और किसीको भी नहीं दिया गया था, उसे ही—अति उदार स्वभाववाले जिन श्रीगौरकृष्णने आ-पामर (पवित्रसे लेकर पतित तक, सभी) व्यक्तियोंको वितरण किया था, उनके प्रति मैं शरणागत होता हूँ॥1॥ अनुभाष्य— अत्युदारः (महावदान्यः) यः गौरः कृष्णः चिरात् अदत्तम् (अनर्पितचरं) निजगुप्तवित्तं (स्वकीय-गूढ़रहस्यात्मकधनं) स्वप्रेमनामामृतम् आपामरं (साध्वसाध्वधिकार-निर्विशेषेण) जनेभ्यः विततार (अर्पयामास), तं (गौरकृष्णम्) अहं प्रपद्ये (शरणं यामि)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥ जय जय गौरचन्द्र जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ 2 ॥ अनुवाद—श्रीगौरचन्द्रकी जय हो, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, सभी गौर- भक्तोंकी जय हो॥2॥ श्रीसनातन-शिक्षा—(3) प्रयोजन (श्रीकृष्णप्रेम)-वर्णन :— अभिधेय 'साधनभक्ति'के फलसे प्रयोजनरूप 'साध्य'- प्रेमभक्ति :— “एबे शुन भक्तिफल ‘प्रेम’ प्रयोजन। याहार श्रवणे हय भक्तिरस-ज्ञान ॥ 3 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“हे सनातन, अब तुम भक्तिके फल 'प्रेम'रूपी प्रयोजनके विषयमें सुनो। जिसे सुननेसे भक्तिरसका ज्ञान होता है॥3॥ भाव अथवा रति—प्रेमकी तरल अथवा अङ्कुरावस्था; गाढ़ अथवा पक्व अवस्थामें वही 'प्रेम' :— कृष्णे रति गाढ़ हैले 'प्रेम'-अभिधान। कृष्णभक्ति-रसेर सेइ 'स्थायिभाव'-नाम ॥ 4 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके प्रति रतिके गाढ़ होनेपर वह । 377
[ 23/4-7 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला ‘प्रेम’ कहलाती है। उस प्रेमको श्रीकृष्णभक्ति रसका ‘स्थायीभाव’ कहते हैं॥4॥ भावकी संज्ञा; स्वरूप और तटस्थ-लक्षण :- भक्तिरसामृतसिन्धु (1/3/1)— शुद्धसत्त्वविशेषात्मा प्रेम-सूर्यांशु-साम्यभाक्। रुचिभिश्चित्तमासृण्यकृदसौ भाव उच्यते ॥5॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥5॥ अमृतप्रवाह भाष्य—प्रेमसूर्यका (जो) किरण-स्थानीय विशुद्धसत्त्वस्वरूप है, (और) रुचिके द्वारा चित्तको जो तत्त्व द्रवीभूत करता है, उसको ही ‘भाव’ कहते हैं॥5॥ अनुभाष्य— शुद्धसत्त्वविशेषात्मा (भगवतः कृष्णस्य सर्वप्रकाशक- संविदाख्य-स्वरूपशक्तिवृत्तिरूपः शुद्धसत्त्वविशेषः, स एव आत्मा तन्नित्यप्रियजनाधिष्ठानतया नित्यसिद्धं स्वरूपं यस्य सः) प्रेमसूर्यांशु-साम्यभाक् (प्रेमरूप-सूर्यकिरणसादृश्ययुक्तः—प्रेमणः अत्र प्रथमच्छविरूपः) रुचिभिः (प्राप्त्यभिलाष-सकर्त्तृकानुकूल्याभिलाष- सौहार्द्दाभिलाषैः) चित्तमासृण्यकृत् (चित्तार्द्रता-सम्पादकः) असौ भावः (प्रेमाङ्कुररूपः) उच्यते। श्लोक-भावानुवाद—भगवान् श्रीकृष्णकी सर्वप्रकाशक संवित् नामक जो स्वरूपकी वृत्ति है, वह शुद्धसत्त्वविशेष ही प्रेमाभक्तिका आश्रय या आत्मा है। यह प्रेम श्रीकृष्णके नित्य प्रियजनोंमें स्थित रहता है, अतः प्रेमका स्वरूप नित्यसिद्ध है। ऐसे प्रेमरूप सूर्यकी किरणोंके समान भाव माना गया है। निष्कर्षतः भाव प्रेमकी प्रथम छविरूप है। वह प्रियकी प्राप्तिकी अभिलाषा, उस प्राप्ति हो जानेपर प्राप्तिसे उत्पन्न (सकर्त्तृक) आनुकूल्यकी अभिलाषा और सौहार्दकी अभिलाषा, इन तीन रुचियोंसे सामाजिकके चित्तमें आर्द्रता सम्पादित कर देता है, इसी प्रेमाङ्कुरको भाव कहते हैं॥5॥ प्रेमके लक्षणका वर्णन :— एइ दुइ,—भावेर 'स्वरूप', 'तटस्थ' लक्षण। प्रेमेर लक्षण एबे शुन, सनातन ॥6॥ अनुवाद—भावके ये दो ‘स्वरूप’ और ‘तटस्थ’ लक्षण हैं। हे सनातन, अब तुम प्रेमके लक्षण सुनो॥6॥ अमृतप्रवाह भाष्य—शुद्धसत्त्वस्वरूप ही भावका ‘स्वरूप’-लक्षण है; रुचिके द्वारा चित्तको जो द्रवीभूत करता है,—यह भावका ‘तटस्थ’-लक्षण है॥6॥ अनुभाष्य— ‘एइ दुइ’—श्लोकमें लिखित (1) शुद्धसत्त्वविशेषात्मादि—भावका स्वरूप-लक्षण है, (2) रुचिके द्वारा चित्तका द्रवीभूत होना—भावका तटस्थ-लक्षण है। 'दुइ भावेर'—[भःरःसिः 1/3/6]— 'साधनाभिनिवेशेन कृष्ण-तद्भक्तयोस्तथा। प्रसादेनातिधन्यानां भावो द्वेधाभिजायते॥” [अर्थात् “महासौभाग्यशाली व्यक्तियोंमें दो प्रकारसे भाव उत्पन्न होता है—] (1) साधनमें अभिनिवेशसे उत्पन्न भाव, (2) श्रीकृष्ण और उनके भक्तोंकी कृपासे उत्पन्न भाव।”] और कोई-कोई उक्त दो भावोंके ‘केवला’ और ‘मिश्रा’ अर्थ करते हैं; किन्तु यह अर्थ यहाँ सङ्गत नहीं है, पहले कहा गया अर्थ ही सङ्गत है॥6॥ प्रेमकी संज्ञा :— भक्तिरसामृतसिन्धु (1/4/1)— सम्यङ्मसृणितस्वान्तो ममत्वातिशयाङ्कितः। भावः स एव सान्द्रात्मा बुधैः प्रेमा निगद्यते ॥7॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥7॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जब वह भाव चित्तको सम्पूर्ण रूपसे द्रवीभूत करके अत्यन्त ममताके द्वारा जाना जाता है और स्वयं गाढ़स्वरूप होता है, तब उसको पण्डितगण ‘प्रेम’ कहकर बुलाते हैं॥7॥ अनुभाष्य— सम्यक् मसृणितस्वान्तः (मसृणितः आर्दीकृतं स्वान्तं यस्मात्) सः ममत्वातिशयाङ्कितः (ममत्वातिशययुक्तः—इति तटस्थ- 378 ।
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तेइसवाँ अध्याय [379] 23/7-13 ] [बायाँ स्तम्भ] लक्षणद्वय-विशिष्टः यः) सान्द्रात्मा (इति स्वरूपलक्षणयुक्त) भावः स एव बुधैः 'प्रेमा' निगद्यते (कथ्यते)। श्लोक-भावानुवाद-चित्तको सम्पूर्ण रूपसे द्रवीभूत करके अत्यन्त ममतायुक्त-इन दो तटस्थ लक्षणोंसे युक्त और स्वयं गाढ़स्वरूप-इस स्वरूप लक्षणयुक्त होता है, तब उस भावको पण्डितगण 'प्रेम' कहते हैं॥7॥ पञ्चरात्रके मतानुसार प्रेमकी संज्ञा :- भक्तिरसामृतसिन्धु (1/4/2)में उद्धृत नारदपञ्चरात्र-वचन :- अनन्यममता विष्णौ ममता प्रेमसङ्गता। भक्तिरित्युच्यते भीष्मप्रह्लादोद्धवनारदैः ॥8॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥8॥ अमृतप्रवाह भाष्य-विष्णुमें अनन्य-ममता अर्थात् विष्णु ही एकमात्र ममताके पात्र हैं, और कोई भी नहीं है, ऐसी प्रेमसङ्गत ममताको भीष्म, प्रह्लाद, उद्धव और नारद आदि वैष्णवगण (प्रेम) 'भक्ति' कहते हैं॥8॥ अनुभाष्य- विष्णौ (भगवति) [या] प्रेमसङ्गता (प्रेमयुक्ता) अनन्य-ममता (ऐकान्तिकी सम्बन्धमयी) भीष्मप्रह्लादोद्धवनारदैः (भक्तैः) [सा] भक्तिः (भावः) उच्यते। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥8॥ प्रेमभक्ति-प्राप्तिका क्रम; सर्वप्रथम 'श्रद्धा' से 'आसक्ति' तक अभिधेय 'साधनभक्ति' और बादमें रति अथवा 'भावभक्ति'का उदय; रतिके घनीभूत होनेपर प्रयोजन 'प्रेमभक्ति' :- कोन भाग्ये कोन जीवेर 'श्रद्धा' यदि हय। तबे सेइ जीव 'साधुसङ्ग' करय॥9॥ साधुसङ्ग हैते हय 'श्रवण-कीर्त्तन'। साधनभक्त्ये हय 'सर्वानर्थनिवर्त्तन' ॥ 10 ॥ अनर्थनिवृत्ति हैले भक्ति 'निष्ठा' हय। निष्ठा हैते श्रवणाद्ये 'रुचि' उपजाय ॥11॥ रुचि हैते भक्ति हय 'आसक्ति' प्रचुर। आसक्ति हैते चित्ते जन्मे कृष्णे प्रीत्यङ्कुर ॥12॥ [दायाँ स्तम्भ] सेइ 'रति' गाढ़ हैले धरे 'प्रेम'-नाम। सेइ प्रेमा-'प्रयोजन' सर्वानन्द-धाम ॥ 13 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 9-13॥ अमृतप्रवाह भाष्य-किसी भक्ति-उन्मुखी सुकृतिके बलसे किसी जीवकी यदि अनन्य-भक्तिके प्रति श्रद्धा उत्पन्न होती है, तब वह जीव शुद्धभक्तरूपी साधुका सङ्ग करता है। उस साधुसङ्गसे ही श्रवण-कीर्तन होता है। श्रवण और कीर्तन जितने परिमाणमें होता है, साधनभक्तिमें उसी परिमाणमें सब अनर्थ दूर होते रहते हैं। श्रद्धाके उदयकालसे ही श्रवण और कीर्तनके द्वारा स्थूल-स्थूल अनर्थोंके दूर होनेपर श्रद्धा ही अनन्यभक्तिके प्रति 'निष्ठा'रूपमें उदित होती है; निष्ठा ही क्रमशः 'रुचि' हो जाती है। उस रुचिसे बादमें 'आसक्ति' उत्पन्न होती है। आसक्तिके निर्मल होनेपर श्रीकृष्ण प्रीतिका अङ्कुर-स्वरूप 'भाव' अथवा 'रति' होती है। वही रति गाढ़ होनेपर ही 'प्रेम'-नाम प्राप्त करती है। वही प्रेम ही सर्वानन्दधामस्वरूप 'प्रयोजन'-तत्त्व है॥9-13॥ अनुभाष्य- 'साधनभक्ति'-सर्वप्रथम साधककी श्रद्धा, उसके फलसे साधुसङ्ग अथवा गुरुपादाश्रय, उसके साथ-साथ भजनक्रिया, उसके फलसे अनर्थ-निवृत्ति, उसके फलसे निष्ठा अथवा स्थिर-चित्तसे निरन्तर भजन, उसके फलस्वरूप रुचि, उसके फलस्वरूप आसक्ति अथवा स्वारसिकी रुचि। साधन-भक्तिसे आसक्तिके फलस्वरूप जिस 'साध्य' रतिका उदय होता है, वही 'भाव' कहलाती है। 'भावभक्ति'-प्रेमसूर्यकिरणसदृश और रुचिके द्वारा चित्तको द्रवीभूत कर देनेवाली प्रेमकी प्रथम अङ्कुरावस्थाको ही 'भावभक्ति' कहते हैं। प्रेमसे पूर्व 'भाव' कहलाती है और बादमें उत्कृष्ट पक्व (पक जानेपर) अथवा परिणत होनेपर 'प्रेमभक्ति' कहलाती है। इसलिये 'प्रेमसूर्याशुसाम्यभाक्'-शब्दमें 'भाव' और 'प्रेम' भक्तिका तारतम्य लिखा है। जिसमें रति उत्पन्न हो गयी है, ऐसा जातरति भक्त उत्कृष्ट होकर क्रमशः प्रेमभक्ति प्राप्त । 379
[ 23/9-17 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला करता है। रतिके गाढ़ होनेपर उसे 'प्रेम' कहते हैं। यह प्रेम ही भक्तिका फल, प्रयोजन और परमानन्दमय है॥ 9-13 ॥ शास्त्र प्रमाण :— भक्तिरसामृतसिन्धु (1/4/15-16)— आदौ श्रद्धा ततः साधुसङ्गोऽथ भजनक्रिया। ततोऽनर्थनिवृत्तिः स्यात् ततो निष्ठा रुचिस्ततः ॥ 14 ॥ अथासक्तिस्ततो भावस्ततः प्रेमाभ्युदञ्चति। साधकानामयं प्रेम्णः प्रादुर्भावे भवेत् क्रमः ॥ 15 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 14-15 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सर्वप्रथम श्रद्धा, उससे साधुसङ्ग, उससे भजनक्रिया, उससे अनर्थनिवृत्ति, उसके बाद निष्ठा, उससे रुचि और आसक्ति, —यहाँ तक साधन भक्ति होती है; उससे क्रमशः 'भाव' और अन्तमें 'प्रेम' उदित होता है। साधकोंके प्रेमोदयका यही क्रम जानना चाहिये॥ 14-15 ॥ अनुभाष्य— आदौ श्रद्धा (असति परिणामशीले वस्तुनि शिथिलानुरागः सन् अप्राकृते सच्चिदानन्दविग्रहे विष्णौ दृढ़विश्वासः), ततः (लब्धविश्वासात्) साधुसङ्गः (अप्राकृतबुद्ध्या गुरुवैष्णवचरणाश्रयः ततः कृष्णदीक्षादि-भजनरीतिशिक्षणं च), अथ (अतः श्रौतवर्त्मना तेषामानुगत्येन गुरुचरणान्तिके) भजनक्रिया (कृष्ण-भजनानुष्ठान), ततः (भजनानुष्ठानात्) अनर्थ-निवृत्तिः (परमार्थे प्रवृत्तौ तु तदितरविषयभोगनिवृत्तिः) स्यात् (भवति); ततः (विषयसङ्गत्यागादनन्तरं) निष्ठा ('शमो मन्निष्ठता बुद्धेः' इति भगवद्वचनात् अविक्षेपेण सातत्यं), ततः रुचिः (रागः), अथ (तदनन्तरं) आसक्तिः (स्वारसिकी रुचिः), ततः भावः (आदौ प्रेमाङ्कुरः), ततः प्रेमा (चरम-प्रयोजनम्) अभ्युदञ्चति (उदेति)—साधकानां प्रेम्णः प्रादुर्भावे (उदये) अयं क्रमः भवेत्। श्लोक-भावानुवाद—सर्वप्रथम श्रद्धा (अर्थात् असत् परिणामशील वस्तुओंमें अनुरागकी शिथिलता और अप्राकृत सच्चिदानन्दविग्रह विष्णुमें दृढ़ विश्वास), ऐसे विश्वासके साथ साधुसङ्ग (अर्थात् गुरुवैष्णवमें अप्राकृत बुद्धिसे उनका चरणाश्रय और फिर श्रीकृष्णदीक्षादि एवं भजनरीतिकी शिक्षा), तब श्रौतपन्थके आनुगत्यमें गुरुचरणोंमें रहकर भजनक्रिया (अर्थात् श्रीकृष्ण- भजनानुष्ठान), तब उस भजनानुष्ठानसे अनर्थ-निवृत्ति (अर्थात् परमार्थमें प्रवृत्ति और विषयभोगसे निवृत्ति) होती है। तब विषयसङ्गत्यागसे निष्ठा (अर्थात् 'शमो मन्निष्ठता बुद्धेः' इस भगवद्-वचनके अनुसार स्थिर-चित्तसे निरन्तर भजन), तब रुचि और उसके बाद आसक्ति (स्वारसिकी रुचि), तब भाव (प्रेमाङ्कुर), तब प्रेम (चरम-प्रयोजन)का उदय होता है। साधकोंमें प्रेमके उदय होनेका यह क्रम होता है॥ 14-15 ॥ श्रीभागवत-प्रमाण :— श्रीमद्भागवत (3/25/25)में— सतां प्रसङ्गान्मम वीर्यसंविदो भवन्ति हृत्कर्णरसायनाः कथाः। तज्जोषणादाश्वपवर्गवर्त्मनि श्रद्धारतिर्भक्तिरनुक्रमिष्यति ॥ 16 ॥ अनुवाद—साधुसङ्गमें हृदय और कानोंको रसपूर्ण लगनेवाली मेरी बलवती कथाओंकी आलोचना होती है। उन-उन कथाओंको श्रवण करते-करते अतिशीघ्र अपवर्ग पन्थरूप मुझमें पहले श्रद्धा, तत्पश्चात् रति और अन्तमें प्रेमभक्ति उदित होती है॥ 16 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 1/60 श्लोक देखें॥ 16 ॥ पूर्व अध्यायमें (1) साधन भक्तिके लक्षण वर्णित हुए; अब (2) भावभक्तिके लक्षणोंका वर्णन :— याँहार हृदये एइ भावाङ्कुर हय। ताँहाते एतेक चिह्न सर्वशास्त्रे कय॥ 17 ॥ अनुवाद—सभी शास्त्र ऐसा कहते हैं कि जिनके हृदयमें यह भाव अङ्कुरित होता है, उनमें निम्नलिखित लक्षण दिखलायी देते हैं॥ 17 ॥ अनुभाष्य—भावके अङ्कुरित होनेपर अर्थात् रतिके उदित होनेपर नौ लक्षण साधकोंमें देखे जाते हैं॥ 17 ॥ 380
तेइसवाँ अध्याय 23/18-21 ] भक्तिरसामृतसिन्धु (1/3/25-26)— क्षान्तिरव्यर्थकालत्वं विरक्तिर्मानशून्यता। आशाबन्धः समुत्कण्ठा नामगाने सदा रुचिः ॥ 18 ॥ आसक्तिस्तद्गुणाख्याने प्रीतिस्तद्वसतिस्थले। इत्यादयोऽनुभावाः स्युर्जातभावाङ्कुरे जने ॥ 19 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 18-19 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—क्षान्ति अर्थात् क्षमा, अव्यर्थ- कालत्व अर्थात् काल वृथा न जाय—ऐसा प्रयत्न, विरक्ति अर्थात् श्रीकृष्ण सम्बन्धविहीन अन्य वस्तुओंके प्रति वैराग्य, मानशून्यता अर्थात् सम्मान पाने योग्य होनेपर भी सम्मानकी इच्छा नहीं करना, आशाबन्ध, समुत्कण्ठा, श्रीकृष्णनाम-गानमें सदा रुचि, श्रीकृष्णके गुणोंके वर्णनमें आसक्ति, श्रीकृष्णके वासस्थानमें प्रीति,— इस प्रकार ये सभी अनुभाव भावाङ्कुरके उत्पन्न होनेपर मनुष्यके स्वभावमें लक्षित होते हैं ॥ 18-19 ॥ अनुभाष्य— जातभावाङ्कुरे जने (जातरुचौ भक्ते) क्षान्तिः (क्षोभहेतौ प्राप्ते सति अक्षुभितात्मता), अव्यर्थकालत्वं (कृष्ण-सम्बन्धवस्तुनि एव केवलकालक्षेपः) विरक्तिः (कृष्णोतरवस्तुनि वीतस्पृहा), मानशून्यता (उत्कृष्टत्वेऽपि अमानित्वम्), आशाबन्धः (भगवतः दृढ़प्राप्ति-सम्भावना), समुत्कण्ठा (निजाभीष्टलाभाय गुरुलुब्धता), नामगाने सदा रुचिः, तद्गुणाख्याने आसक्तिः, तद्वसतिस्थले प्रीतिः—इत्यादयः 'अनुभावाः' स्युः (वर्त्तन्ते)। श्लोक-भावानुवाद—जात-भावाङ्कुर भक्तमें क्षान्ति अर्थात् क्षोभ उत्पन्न होनेका कारण होनेपर भी क्षुभित नहीं होना, श्रीकृष्ण-सम्बन्धी वस्तुओंके लिये समस्त काल व्यतीत करना, श्रीकृष्णसे इतर वस्तुओंकी स्पृहासे विहीन, उत्कृष्ट होनेपर भी अमानी होना, भगवद्- प्राप्तिकी दृढ़ आशा, निज-अभीष्ट प्राप्तिमें भारी लोभ, श्रीकृष्णनाम-गानमें सदा रुचि, उनके गुणोंके वर्णनमें आसक्ति, उनकी वास-स्थलीमें प्रीति आदि 'अनुभाव' लक्षित होते हैं ॥ 18-19 ॥ श्लोककी व्याख्या—(1) क्षान्ति अथवा क्षोभरहित्य :- एइ नव प्रीत्यङ्कुर याँर चित्ते हय। प्राकृत-क्षोभे ताँर क्षोभ नाहि हय ॥ 20 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 20 ॥ अनुभाष्य—पूर्वलिखित नौ प्रकारका प्रीतिका अङ्कुर भाव जिसके चित्तमें उदित होता है, इस भौतिक संसारमें उसके लिये किसी प्रकारकी असुविधाका विषय उपस्थित होनेपर भी उसको वह कुछ भी मानता नहीं है ॥ 20 ॥ श्रीमद्भागवत (1/19/15)— तं मोपयातं प्रतियन्तु विप्रा गङ्गा च देवी धृतचित्तमीशे। द्विजोपसृष्टः कुहकस्तक्षको वा दशतवलं गायत विष्णुगाथाः ॥ 21 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 21 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे ब्राह्मणों ! अब मैंने अपने चित्तको भगवान्के चरणोंमें समर्पित कर दिया है। आपलोग और गङ्गादेवी शरणागत जानकर मुझपर कृपा करें। अब ब्राह्मणकुमारके शापसे प्रेरित तक्षक ही हो अथवा कोई दूसरा भी कपटसे तक्षकका रूप धारणकर अपनी इच्छासे मुझे डस ले, इसकी मुझे तनिक भी चिन्ता नहीं है। आपलोग भगवान् श्रीहरिकी रसमयी कथाका गान कीजिये ॥ 21 ॥ अनुभाष्य—शमीक-ऋषिके पुत्र शृङ्गीके शापको सुनकर गङ्गाके तटपर आमरण अनशनका सङ्कल्प लेकर महाराज परीक्षित श्रीकृष्ण चिन्तामें रत हुए थे। उस समय उनके निकट बहुतसे ऋषि आकर उपस्थित हुए। महाराज परीक्षित उनका विधि-अनुसार सत्कार करके, ब्राह्मणके शापको हरिकथाके श्रवणका सुयोग प्रदान करनेवाले मङ्गलमय वरके रूपमें वर्णन करके ऋषियोंसे सर्वक्षण हरिकथाका वर्णन करनेका अनुरोध कर रहे हैं,- । 381
[ 23/21–25 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
[बायाँ स्तम्भ]
हे विप्राः [भवन्तः] देवी (देवतारूपा) गङ्गा च ईशे धृतचित्तम् (ईश्वरार्पितचित्तं) तं (तथाभूतं) मा (माम्) उपयातं (शरणागतं) प्रतियन्तु (जानन्तु); द्विजोपसृष्टः (द्विज-प्रेरितः) कुहकः तक्षकः वा अलं दशतु, विष्णुकथा (विष्णुकथाः) गायत (यूयं कीर्त्तयत)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 21 ॥
(2) अव्यर्थकालत्व और (3) इन्द्रियतर्पण-विरक्ति :— कृष्णसम्बन्ध बिना काल व्यर्थ नाहि याय। भुक्ति, सिद्धि, इन्द्रियार्थ ताँरे नाहि भाय ॥ 22 ॥
**अनुवाद—**श्रीकृष्णसे सम्बन्धित क्रियाओंके अतिरिक्त जातरति भक्तोंका समय बिल्कुल भी व्यर्थ नहीं जाता। भोग, सिद्धि और इन्द्रियोंके सुखकी कोई भी वस्तु उन्हें अच्छी नहीं लगती ॥ 22 ॥
**अनुभाष्य—**जातरति भक्तके लिये ऐहिक अर्थात् इस भौम-जगत्के और पारलौकिक भोग अर्थात् स्वर्गसे लेकर सत्यलोक तकके भोग, अणिमादि सिद्धियाँ और इन्द्रियतृप्ति आदि कोई आकर्षण नहीं रखते और उन्हें इन सबसे कोई प्रयोजन भी नहीं है ॥ 22 ॥
समस्त इन्द्रियोंके द्वारा श्रीकृष्णसेवा करनेपर भी भावभक्तोंकी चिन्मयी चमत्कारमयी अतृप्ति :— हरिभक्तिसुधोदय (12/38)में— वाग्भिः स्तुवन्तो मनसा स्मरन्तस्तन्वा नमन्तोऽप्यनिशं न तृप्ताः। भक्ताः स्रवन्नेत्रजलाः समग्रमायुर्हरेरेव समर्पयन्ति ॥ 23 ॥
**अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 23 ॥
**अमृतप्रवाह भाष्य—**भक्तगण नेत्रोंमें अश्रुजलधाराके साथ-साथ वचनोंके द्वारा स्तव, मनके द्वारा स्मरण और शरीरके द्वारा नमस्कार करके भी तृप्त नहीं हो पाते। इस प्रकारकी क्रियाके द्वारा वे अपनी सम्पूर्ण आयु श्रीहरिमें समर्पण (अर्थात् उनके उद्देश्यसे व्यतीत) करते हैं ॥ 23 ॥
[दायाँ स्तम्भ]
अनुभाष्य— भक्ताः अनिशं (सर्वकालं) वाग्भिः स्तुवन्तः, मनसा स्मरन्तः, तन्वा नमन्तः अपि, न तृप्ताः [भवन्ति]; स्रवन्नेत्रजलाः (वाष्पविगलित-नयनाः सन्तः) समग्रम् आयुः हरेः (हरये) एव समर्पयन्ति। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 23 ॥
श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य विषय-भोगोंसे विरक्त भरतका दृष्टान्त :— श्रीमद्भागवत (5/14/43)में— यो दुस्त्यजान् दारसुतान् सुहृद्राज्यं हृदिस्पृशः। जहौ युवैव मलवदुत्तमःश्लोकलालसः ॥ 24 ॥
**अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 24 ॥
**अमृतप्रवाह भाष्य—**भरत महाराजने उत्तमःश्लोक श्रीकृष्णको प्राप्त करनेकी लालसासे युवावस्थामें ही हृदयग्राहिणी पत्नी, पुत्र, सुहृत् और राज्यादिका मलकी भाँति परित्याग किया था;—यही जातभाव व्यक्तिकी विरक्तिका लक्षण है ॥ 24 ॥
**अनुभाष्य—**श्रील शुकदेव परीक्षितसे महाभागवत भरतके शुद्धहरिभजनके आचरणरूपी गुण-महिमाका वर्णन कर रहे हैं,— यः (भरतः) उत्तमःश्लोकलालसः (उत्तमःश्लोके लालसा लम्पटत्वं यस्य सः कृष्णोत्कण्ठः सन्) हृदिस्पृशः (मनोज्ञान्) दुस्त्यजान् (दुष्परिहरान्) सुहृद्राज्यं (उभयोर्द्वन्द्वैक्यं) दारसुतान् युवैव मलवत् जहौ (परित्यक्तवान्) [तस्य आर्य्यभस्य अनुवर्त्म अन्यो नृपः नार्हतीति पूर्वेणान्वयः]। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। [पूर्व श्लोक (भाः 5/14/42)में वर्णित 'कोई भी राजा आज तक अपने मनके द्वारा भी ऋषभनन्दन राजर्षि भरतके मार्गका अनुसरण करनेमें समर्थ नहीं हुआ है।' वाक्यका इस श्लोकके साथ अन्वय करें।] ॥ 24 ॥
(4) मानशून्यता और (5) आशाबन्ध :— 'सर्वोत्तम' अपनाके 'हीन' करि' माने। 'कृष्ण कृपा करिबेन'—दृढ़ करि' माने ॥ 25 ॥
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तेइसवाँ अध्याय 23/25-29 ] अनुवाद—जातरति भक्त 'सर्वोत्तम' होनेपर भी स्वयंको सबसे 'हीन' मानता है। 'श्रीकृष्ण अवश्य ही कृपा करेंगे'—उसका यह दृढ़ विश्वास है॥25॥ अमानी होनेका दृष्टान्त :— पद्मपुराण-वाक्य— हरौ रतिं वहन्नेषो नरेन्द्राणां शिखामणिः। भिक्षामटन्नरिपुरे श्वपाकमपि वन्दते॥26॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥26॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हरिमें रतियुक्त होकर ये राजशिरोमणि (सम्राट) शत्रुके राज्यमें भिक्षा करते हुए चण्डालकी भी वन्दना कर रहे हैं॥26॥ अनुभाष्य— नरेन्द्राणां शिखामणिः (नृपकुलचूड़ामणिः) एषः हरौ रतिं वहन् (पोषयन्) अरिपुरे (शत्रुनिवासे) भिक्षां अटन् (तदर्थं परिभ्रमन्) श्वपाकं (सुनीचम्) अपि वन्दते। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥26॥ आशाबन्धयुक्तकी उक्ति :— भक्तिरसामृतसिन्धु (1/3/35)— श्रीरूप गोस्वामीके द्वारा उद्धृत श्रीसनातन-प्रभुका वाक्य— न प्रेमा श्रवणादिभक्तिरपि वा योगोऽथवा वैष्णवो ज्ञानं वा शुभकर्म वा कियदहो सज्जातिरप्यस्ति वा। हीनाथाधिकसाधके त्वयि तथाप्यच्छेद्यमूला सती हे गोपीजनवल्लभ व्यथयते हा हा मदाशैव माम्॥27॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥27॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मुझमें प्रेम, श्रवणादि भक्ति, विष्णु-भक्तियोग, ज्ञान अथवा शुभकर्म अथवा सद्जाति कुछ भी नहीं है। हे गोपीजनवल्लभ, आप अकिञ्चनके ऊपर कृपा करनेवाले हैं, इसलिये मेरे हृदयमें सदा आपके प्रति जो अटूट श्रद्धा आशा है, वह मुझे निरन्तर व्यथित करती रहती है॥27॥ अनुभाष्य— [मम] प्रेमा वा, श्रवणादिभक्तिः अपि, अथवा वैष्णवः (विष्णुध्यानमयः) योगः (शुद्धभक्तियोगः), ज्ञानं (ब्रह्मनिष्ठं) वा, शुभकर्म (दैववर्णाश्रमादिरूपं) वा, अहो (खेदे) कियत् सज्जातिः (सद्वंशजातसम्मानम्) अपि वा न अस्ति, हे गोपीजनवल्लभ, हीनाथाधिकसाधके (हीनजने योग्यतापरिमाणाधिकफलदातरि) त्वयि अच्छेद्यमूला (सर्वथैव अविच्छेद्या) सती (शुद्धा) हा हा मत् आशा (मम आशा) मां व्यथयते एव। श्लोक-भावानुवाद—मुझमें प्रेम अथवा श्रवणादि भक्ति अथवा विष्णुध्यानमय शुद्धभक्तियोग, या ब्रह्मनिष्ठ ज्ञान अथवा दैववर्णाश्रमादिरूप शुभकर्म अथवा अहो ! सद्-वंशजात सम्मान भी नहीं है। हे गोपीजनवल्लभ ! हीनजनोंको उनकी योग्यताके परिमाणसे भी अधिक फल देनेवाले आपमें मेरी अटूट आशा है। हा ! हा ! मेरी आशा मुझे व्यथित कर रही है॥27॥ (6) समुत्कण्ठा और (7) नामगानमें सदा रुचि :— समुत्कण्ठा हय सदा लालसा-प्रधान। नाम-गाने सदा रुचि, लय कृष्णनाम॥28॥ अनुवाद—जातरति भक्तकी श्रीकृष्णका सान्निध्य प्राप्त करनेकी तीव्र लालसा उसकी समुत्कण्ठाका लक्षण है। नाम-गानमें सदा रुचि रहनेके कारण वह सदैव श्रीकृष्णनामका कीर्तन करता है॥28॥ समुत्कण्ठामें भक्तकी उक्ति :— श्रीकृष्णकर्णामृत (32) में उद्धृत बिल्वमङ्गलवाक्य— त्वच्छैशवं त्रिभुवनाद्भुतमित्यवेहि मच्चापलञ्च तव वा मम वाधिगम्यम्। तत् किं करोमि विरलं मुरलीविलासि मुग्धः मुखाम्बुजमुदीक्षितुमीक्षणाभ्याम्॥29॥ अनुवाद—हे वंशीविलासी कृष्ण ! तुम्हारा शैशव (कैशोर) माधुर्य त्रिभुवनमें अद्भुत है। मेरे चापल्यको तुम जानते हो और मैं जानती हूँ, इसे और कोई नहीं जानता है। इन दो नेत्रोंके द्वारा निर्जन स्थानमें तुम्हारे मुखकमलके दर्शन करनेके लिये अब मैं क्या करूँ ? ॥29॥ । 383