भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1825

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तेइसवाँ अध्याय [379] 23/7-13 ] [बायाँ स्तम्भ] लक्षणद्वय-विशिष्टः यः) सान्द्रात्मा (इति स्वरूपलक्षणयुक्त) भावः स एव बुधैः 'प्रेमा' निगद्यते (कथ्यते)। श्लोक-भावानुवाद-चित्तको सम्पूर्ण रूपसे द्रवीभूत करके अत्यन्त ममतायुक्त-इन दो तटस्थ लक्षणोंसे युक्त और स्वयं गाढ़स्वरूप-इस स्वरूप लक्षणयुक्त होता है, तब उस भावको पण्डितगण 'प्रेम' कहते हैं॥7॥ पञ्चरात्रके मतानुसार प्रेमकी संज्ञा :- भक्तिरसामृतसिन्धु (1/4/2)में उद्धृत नारदपञ्चरात्र-वचन :- अनन्यममता विष्णौ ममता प्रेमसङ्गता। भक्तिरित्युच्यते भीष्मप्रह्लादोद्धवनारदैः ॥8॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥8॥ अमृतप्रवाह भाष्य-विष्णुमें अनन्य-ममता अर्थात् विष्णु ही एकमात्र ममताके पात्र हैं, और कोई भी नहीं है, ऐसी प्रेमसङ्गत ममताको भीष्म, प्रह्लाद, उद्धव और नारद आदि वैष्णवगण (प्रेम) 'भक्ति' कहते हैं॥8॥ अनुभाष्य- विष्णौ (भगवति) [या] प्रेमसङ्गता (प्रेमयुक्ता) अनन्य-ममता (ऐकान्तिकी सम्बन्धमयी) भीष्मप्रह्लादोद्धवनारदैः (भक्तैः) [सा] भक्तिः (भावः) उच्यते। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥8॥ प्रेमभक्ति-प्राप्तिका क्रम; सर्वप्रथम 'श्रद्धा' से 'आसक्ति' तक अभिधेय 'साधनभक्ति' और बादमें रति अथवा 'भावभक्ति'का उदय; रतिके घनीभूत होनेपर प्रयोजन 'प्रेमभक्ति' :- कोन भाग्ये कोन जीवेर 'श्रद्धा' यदि हय। तबे सेइ जीव 'साधुसङ्ग' करय॥9॥ साधुसङ्ग हैते हय 'श्रवण-कीर्त्तन'। साधनभक्त्ये हय 'सर्वानर्थनिवर्त्तन' ॥ 10 ॥ अनर्थनिवृत्ति हैले भक्ति 'निष्ठा' हय। निष्ठा हैते श्रवणाद्ये 'रुचि' उपजाय ॥11॥ रुचि हैते भक्ति हय 'आसक्ति' प्रचुर। आसक्ति हैते चित्ते जन्मे कृष्णे प्रीत्यङ्कुर ॥12॥ [दायाँ स्तम्भ] सेइ 'रति' गाढ़ हैले धरे 'प्रेम'-नाम। सेइ प्रेमा-'प्रयोजन' सर्वानन्द-धाम ॥ 13 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 9-13॥ अमृतप्रवाह भाष्य-किसी भक्ति-उन्मुखी सुकृतिके बलसे किसी जीवकी यदि अनन्य-भक्तिके प्रति श्रद्धा उत्पन्न होती है, तब वह जीव शुद्धभक्तरूपी साधुका सङ्ग करता है। उस साधुसङ्गसे ही श्रवण-कीर्तन होता है। श्रवण और कीर्तन जितने परिमाणमें होता है, साधनभक्तिमें उसी परिमाणमें सब अनर्थ दूर होते रहते हैं। श्रद्धाके उदयकालसे ही श्रवण और कीर्तनके द्वारा स्थूल-स्थूल अनर्थोंके दूर होनेपर श्रद्धा ही अनन्यभक्तिके प्रति 'निष्ठा'रूपमें उदित होती है; निष्ठा ही क्रमशः 'रुचि' हो जाती है। उस रुचिसे बादमें 'आसक्ति' उत्पन्न होती है। आसक्तिके निर्मल होनेपर श्रीकृष्ण प्रीतिका अङ्कुर-स्वरूप 'भाव' अथवा 'रति' होती है। वही रति गाढ़ होनेपर ही 'प्रेम'-नाम प्राप्त करती है। वही प्रेम ही सर्वानन्दधामस्वरूप 'प्रयोजन'-तत्त्व है॥9-13॥ अनुभाष्य- 'साधनभक्ति'-सर्वप्रथम साधककी श्रद्धा, उसके फलसे साधुसङ्ग अथवा गुरुपादाश्रय, उसके साथ-साथ भजनक्रिया, उसके फलसे अनर्थ-निवृत्ति, उसके फलसे निष्ठा अथवा स्थिर-चित्तसे निरन्तर भजन, उसके फलस्वरूप रुचि, उसके फलस्वरूप आसक्ति अथवा स्वारसिकी रुचि। साधन-भक्तिसे आसक्तिके फलस्वरूप जिस 'साध्य' रतिका उदय होता है, वही 'भाव' कहलाती है। 'भावभक्ति'-प्रेमसूर्यकिरणसदृश और रुचिके द्वारा चित्तको द्रवीभूत कर देनेवाली प्रेमकी प्रथम अङ्कुरावस्थाको ही 'भावभक्ति' कहते हैं। प्रेमसे पूर्व 'भाव' कहलाती है और बादमें उत्कृष्ट पक्व (पक जानेपर) अथवा परिणत होनेपर 'प्रेमभक्ति' कहलाती है। इसलिये 'प्रेमसूर्याशुसाम्यभाक्'-शब्दमें 'भाव' और 'प्रेम' भक्तिका तारतम्य लिखा है। जिसमें रति उत्पन्न हो गयी है, ऐसा जातरति भक्त उत्कृष्ट होकर क्रमशः प्रेमभक्ति प्राप्त । 379