भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1826

[ 23/9-17 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला करता है। रतिके गाढ़ होनेपर उसे 'प्रेम' कहते हैं। यह प्रेम ही भक्तिका फल, प्रयोजन और परमानन्दमय है॥ 9-13 ॥ शास्त्र प्रमाण :— भक्तिरसामृतसिन्धु (1/4/15-16)— आदौ श्रद्धा ततः साधुसङ्गोऽथ भजनक्रिया। ततोऽनर्थनिवृत्तिः स्यात् ततो निष्ठा रुचिस्ततः ॥ 14 ॥ अथासक्तिस्ततो भावस्ततः प्रेमाभ्युदञ्चति। साधकानामयं प्रेम्णः प्रादुर्भावे भवेत् क्रमः ॥ 15 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 14-15 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सर्वप्रथम श्रद्धा, उससे साधुसङ्ग, उससे भजनक्रिया, उससे अनर्थनिवृत्ति, उसके बाद निष्ठा, उससे रुचि और आसक्ति, —यहाँ तक साधन भक्ति होती है; उससे क्रमशः 'भाव' और अन्तमें 'प्रेम' उदित होता है। साधकोंके प्रेमोदयका यही क्रम जानना चाहिये॥ 14-15 ॥ अनुभाष्य— आदौ श्रद्धा (असति परिणामशीले वस्तुनि शिथिलानुरागः सन् अप्राकृते सच्चिदानन्दविग्रहे विष्णौ दृढ़विश्वासः), ततः (लब्धविश्वासात्) साधुसङ्गः (अप्राकृतबुद्ध्या गुरुवैष्णवचरणाश्रयः ततः कृष्णदीक्षादि-भजनरीतिशिक्षणं च), अथ (अतः श्रौतवर्त्मना तेषामानुगत्येन गुरुचरणान्तिके) भजनक्रिया (कृष्ण-भजनानुष्ठान), ततः (भजनानुष्ठानात्) अनर्थ-निवृत्तिः (परमार्थे प्रवृत्तौ तु तदितरविषयभोगनिवृत्तिः) स्यात् (भवति); ततः (विषयसङ्गत्यागादनन्तरं) निष्ठा ('शमो मन्निष्ठता बुद्धेः' इति भगवद्वचनात् अविक्षेपेण सातत्यं), ततः रुचिः (रागः), अथ (तदनन्तरं) आसक्तिः (स्वारसिकी रुचिः), ततः भावः (आदौ प्रेमाङ्कुरः), ततः प्रेमा (चरम-प्रयोजनम्) अभ्युदञ्चति (उदेति)—साधकानां प्रेम्णः प्रादुर्भावे (उदये) अयं क्रमः भवेत्। श्लोक-भावानुवाद—सर्वप्रथम श्रद्धा (अर्थात् असत् परिणामशील वस्तुओंमें अनुरागकी शिथिलता और अप्राकृत सच्चिदानन्दविग्रह विष्णुमें दृढ़ विश्वास), ऐसे विश्वासके साथ साधुसङ्ग (अर्थात् गुरुवैष्णवमें अप्राकृत बुद्धिसे उनका चरणाश्रय और फिर श्रीकृष्णदीक्षादि एवं भजनरीतिकी शिक्षा), तब श्रौतपन्थके आनुगत्यमें गुरुचरणोंमें रहकर भजनक्रिया (अर्थात् श्रीकृष्ण- भजनानुष्ठान), तब उस भजनानुष्ठानसे अनर्थ-निवृत्ति (अर्थात् परमार्थमें प्रवृत्ति और विषयभोगसे निवृत्ति) होती है। तब विषयसङ्गत्यागसे निष्ठा (अर्थात् 'शमो मन्निष्ठता बुद्धेः' इस भगवद्-वचनके अनुसार स्थिर-चित्तसे निरन्तर भजन), तब रुचि और उसके बाद आसक्ति (स्वारसिकी रुचि), तब भाव (प्रेमाङ्कुर), तब प्रेम (चरम-प्रयोजन)का उदय होता है। साधकोंमें प्रेमके उदय होनेका यह क्रम होता है॥ 14-15 ॥ श्रीभागवत-प्रमाण :— श्रीमद्भागवत (3/25/25)में— सतां प्रसङ्गान्मम वीर्यसंविदो भवन्ति हृत्कर्णरसायनाः कथाः। तज्जोषणादाश्वपवर्गवर्त्मनि श्रद्धारतिर्भक्तिरनुक्रमिष्यति ॥ 16 ॥ अनुवाद—साधुसङ्गमें हृदय और कानोंको रसपूर्ण लगनेवाली मेरी बलवती कथाओंकी आलोचना होती है। उन-उन कथाओंको श्रवण करते-करते अतिशीघ्र अपवर्ग पन्थरूप मुझमें पहले श्रद्धा, तत्पश्चात् रति और अन्तमें प्रेमभक्ति उदित होती है॥ 16 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 1/60 श्लोक देखें॥ 16 ॥ पूर्व अध्यायमें (1) साधन भक्तिके लक्षण वर्णित हुए; अब (2) भावभक्तिके लक्षणोंका वर्णन :— याँहार हृदये एइ भावाङ्कुर हय। ताँहाते एतेक चिह्न सर्वशास्त्रे कय॥ 17 ॥ अनुवाद—सभी शास्त्र ऐसा कहते हैं कि जिनके हृदयमें यह भाव अङ्कुरित होता है, उनमें निम्नलिखित लक्षण दिखलायी देते हैं॥ 17 ॥ अनुभाष्य—भावके अङ्कुरित होनेपर अर्थात् रतिके उदित होनेपर नौ लक्षण साधकोंमें देखे जाते हैं॥ 17 ॥ 380