भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1827

तेइसवाँ अध्याय 23/18-21 ] भक्तिरसामृतसिन्धु (1/3/25-26)— क्षान्तिरव्यर्थकालत्वं विरक्तिर्मानशून्यता। आशाबन्धः समुत्कण्ठा नामगाने सदा रुचिः ॥ 18 ॥ आसक्तिस्तद्गुणाख्याने प्रीतिस्तद्वसतिस्थले। इत्यादयोऽनुभावाः स्युर्जातभावाङ्कुरे जने ॥ 19 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 18-19 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—क्षान्ति अर्थात् क्षमा, अव्यर्थ- कालत्व अर्थात् काल वृथा न जाय—ऐसा प्रयत्न, विरक्ति अर्थात् श्रीकृष्ण सम्बन्धविहीन अन्य वस्तुओंके प्रति वैराग्य, मानशून्यता अर्थात् सम्मान पाने योग्य होनेपर भी सम्मानकी इच्छा नहीं करना, आशाबन्ध, समुत्कण्ठा, श्रीकृष्णनाम-गानमें सदा रुचि, श्रीकृष्णके गुणोंके वर्णनमें आसक्ति, श्रीकृष्णके वासस्थानमें प्रीति,— इस प्रकार ये सभी अनुभाव भावाङ्कुरके उत्पन्न होनेपर मनुष्यके स्वभावमें लक्षित होते हैं ॥ 18-19 ॥ अनुभाष्य— जातभावाङ्कुरे जने (जातरुचौ भक्ते) क्षान्तिः (क्षोभहेतौ प्राप्ते सति अक्षुभितात्मता), अव्यर्थकालत्वं (कृष्ण-सम्बन्धवस्तुनि एव केवलकालक्षेपः) विरक्तिः (कृष्णोतरवस्तुनि वीतस्पृहा), मानशून्यता (उत्कृष्टत्वेऽपि अमानित्वम्), आशाबन्धः (भगवतः दृढ़प्राप्ति-सम्भावना), समुत्कण्ठा (निजाभीष्टलाभाय गुरुलुब्धता), नामगाने सदा रुचिः, तद्गुणाख्याने आसक्तिः, तद्वसतिस्थले प्रीतिः—इत्यादयः 'अनुभावाः' स्युः (वर्त्तन्ते)। श्लोक-भावानुवाद—जात-भावाङ्कुर भक्तमें क्षान्ति अर्थात् क्षोभ उत्पन्न होनेका कारण होनेपर भी क्षुभित नहीं होना, श्रीकृष्ण-सम्बन्धी वस्तुओंके लिये समस्त काल व्यतीत करना, श्रीकृष्णसे इतर वस्तुओंकी स्पृहासे विहीन, उत्कृष्ट होनेपर भी अमानी होना, भगवद्- प्राप्तिकी दृढ़ आशा, निज-अभीष्ट प्राप्तिमें भारी लोभ, श्रीकृष्णनाम-गानमें सदा रुचि, उनके गुणोंके वर्णनमें आसक्ति, उनकी वास-स्थलीमें प्रीति आदि 'अनुभाव' लक्षित होते हैं ॥ 18-19 ॥ श्लोककी व्याख्या—(1) क्षान्ति अथवा क्षोभरहित्य :- एइ नव प्रीत्यङ्कुर याँर चित्ते हय। प्राकृत-क्षोभे ताँर क्षोभ नाहि हय ॥ 20 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 20 ॥ अनुभाष्य—पूर्वलिखित नौ प्रकारका प्रीतिका अङ्कुर भाव जिसके चित्तमें उदित होता है, इस भौतिक संसारमें उसके लिये किसी प्रकारकी असुविधाका विषय उपस्थित होनेपर भी उसको वह कुछ भी मानता नहीं है ॥ 20 ॥ श्रीमद्भागवत (1/19/15)— तं मोपयातं प्रतियन्तु विप्रा गङ्गा च देवी धृतचित्तमीशे। द्विजोपसृष्टः कुहकस्तक्षको वा दशतवलं गायत विष्णुगाथाः ॥ 21 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 21 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे ब्राह्मणों ! अब मैंने अपने चित्तको भगवान्के चरणोंमें समर्पित कर दिया है। आपलोग और गङ्गादेवी शरणागत जानकर मुझपर कृपा करें। अब ब्राह्मणकुमारके शापसे प्रेरित तक्षक ही हो अथवा कोई दूसरा भी कपटसे तक्षकका रूप धारणकर अपनी इच्छासे मुझे डस ले, इसकी मुझे तनिक भी चिन्ता नहीं है। आपलोग भगवान् श्रीहरिकी रसमयी कथाका गान कीजिये ॥ 21 ॥ अनुभाष्य—शमीक-ऋषिके पुत्र शृङ्गीके शापको सुनकर गङ्गाके तटपर आमरण अनशनका सङ्कल्प लेकर महाराज परीक्षित श्रीकृष्ण चिन्तामें रत हुए थे। उस समय उनके निकट बहुतसे ऋषि आकर उपस्थित हुए। महाराज परीक्षित उनका विधि-अनुसार सत्कार करके, ब्राह्मणके शापको हरिकथाके श्रवणका सुयोग प्रदान करनेवाले मङ्गलमय वरके रूपमें वर्णन करके ऋषियोंसे सर्वक्षण हरिकथाका वर्णन करनेका अनुरोध कर रहे हैं,- । 381