श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1828, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 23/21–25 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
[बायाँ स्तम्भ]
हे विप्राः [भवन्तः] देवी (देवतारूपा) गङ्गा च ईशे धृतचित्तम् (ईश्वरार्पितचित्तं) तं (तथाभूतं) मा (माम्) उपयातं (शरणागतं) प्रतियन्तु (जानन्तु); द्विजोपसृष्टः (द्विज-प्रेरितः) कुहकः तक्षकः वा अलं दशतु, विष्णुकथा (विष्णुकथाः) गायत (यूयं कीर्त्तयत)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 21 ॥
(2) अव्यर्थकालत्व और (3) इन्द्रियतर्पण-विरक्ति :— कृष्णसम्बन्ध बिना काल व्यर्थ नाहि याय। भुक्ति, सिद्धि, इन्द्रियार्थ ताँरे नाहि भाय ॥ 22 ॥
**अनुवाद—**श्रीकृष्णसे सम्बन्धित क्रियाओंके अतिरिक्त जातरति भक्तोंका समय बिल्कुल भी व्यर्थ नहीं जाता। भोग, सिद्धि और इन्द्रियोंके सुखकी कोई भी वस्तु उन्हें अच्छी नहीं लगती ॥ 22 ॥
**अनुभाष्य—**जातरति भक्तके लिये ऐहिक अर्थात् इस भौम-जगत्के और पारलौकिक भोग अर्थात् स्वर्गसे लेकर सत्यलोक तकके भोग, अणिमादि सिद्धियाँ और इन्द्रियतृप्ति आदि कोई आकर्षण नहीं रखते और उन्हें इन सबसे कोई प्रयोजन भी नहीं है ॥ 22 ॥
समस्त इन्द्रियोंके द्वारा श्रीकृष्णसेवा करनेपर भी भावभक्तोंकी चिन्मयी चमत्कारमयी अतृप्ति :— हरिभक्तिसुधोदय (12/38)में— वाग्भिः स्तुवन्तो मनसा स्मरन्तस्तन्वा नमन्तोऽप्यनिशं न तृप्ताः। भक्ताः स्रवन्नेत्रजलाः समग्रमायुर्हरेरेव समर्पयन्ति ॥ 23 ॥
**अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 23 ॥
**अमृतप्रवाह भाष्य—**भक्तगण नेत्रोंमें अश्रुजलधाराके साथ-साथ वचनोंके द्वारा स्तव, मनके द्वारा स्मरण और शरीरके द्वारा नमस्कार करके भी तृप्त नहीं हो पाते। इस प्रकारकी क्रियाके द्वारा वे अपनी सम्पूर्ण आयु श्रीहरिमें समर्पण (अर्थात् उनके उद्देश्यसे व्यतीत) करते हैं ॥ 23 ॥
[दायाँ स्तम्भ]
अनुभाष्य— भक्ताः अनिशं (सर्वकालं) वाग्भिः स्तुवन्तः, मनसा स्मरन्तः, तन्वा नमन्तः अपि, न तृप्ताः [भवन्ति]; स्रवन्नेत्रजलाः (वाष्पविगलित-नयनाः सन्तः) समग्रम् आयुः हरेः (हरये) एव समर्पयन्ति। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 23 ॥
श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य विषय-भोगोंसे विरक्त भरतका दृष्टान्त :— श्रीमद्भागवत (5/14/43)में— यो दुस्त्यजान् दारसुतान् सुहृद्राज्यं हृदिस्पृशः। जहौ युवैव मलवदुत्तमःश्लोकलालसः ॥ 24 ॥
**अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 24 ॥
**अमृतप्रवाह भाष्य—**भरत महाराजने उत्तमःश्लोक श्रीकृष्णको प्राप्त करनेकी लालसासे युवावस्थामें ही हृदयग्राहिणी पत्नी, पुत्र, सुहृत् और राज्यादिका मलकी भाँति परित्याग किया था;—यही जातभाव व्यक्तिकी विरक्तिका लक्षण है ॥ 24 ॥
**अनुभाष्य—**श्रील शुकदेव परीक्षितसे महाभागवत भरतके शुद्धहरिभजनके आचरणरूपी गुण-महिमाका वर्णन कर रहे हैं,— यः (भरतः) उत्तमःश्लोकलालसः (उत्तमःश्लोके लालसा लम्पटत्वं यस्य सः कृष्णोत्कण्ठः सन्) हृदिस्पृशः (मनोज्ञान्) दुस्त्यजान् (दुष्परिहरान्) सुहृद्राज्यं (उभयोर्द्वन्द्वैक्यं) दारसुतान् युवैव मलवत् जहौ (परित्यक्तवान्) [तस्य आर्य्यभस्य अनुवर्त्म अन्यो नृपः नार्हतीति पूर्वेणान्वयः]। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। [पूर्व श्लोक (भाः 5/14/42)में वर्णित 'कोई भी राजा आज तक अपने मनके द्वारा भी ऋषभनन्दन राजर्षि भरतके मार्गका अनुसरण करनेमें समर्थ नहीं हुआ है।' वाक्यका इस श्लोकके साथ अन्वय करें।] ॥ 24 ॥
(4) मानशून्यता और (5) आशाबन्ध :— 'सर्वोत्तम' अपनाके 'हीन' करि' माने। 'कृष्ण कृपा करिबेन'—दृढ़ करि' माने ॥ 25 ॥
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