श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1829, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेइसवाँ अध्याय 23/25-29 ] अनुवाद—जातरति भक्त 'सर्वोत्तम' होनेपर भी स्वयंको सबसे 'हीन' मानता है। 'श्रीकृष्ण अवश्य ही कृपा करेंगे'—उसका यह दृढ़ विश्वास है॥25॥ अमानी होनेका दृष्टान्त :— पद्मपुराण-वाक्य— हरौ रतिं वहन्नेषो नरेन्द्राणां शिखामणिः। भिक्षामटन्नरिपुरे श्वपाकमपि वन्दते॥26॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥26॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हरिमें रतियुक्त होकर ये राजशिरोमणि (सम्राट) शत्रुके राज्यमें भिक्षा करते हुए चण्डालकी भी वन्दना कर रहे हैं॥26॥ अनुभाष्य— नरेन्द्राणां शिखामणिः (नृपकुलचूड़ामणिः) एषः हरौ रतिं वहन् (पोषयन्) अरिपुरे (शत्रुनिवासे) भिक्षां अटन् (तदर्थं परिभ्रमन्) श्वपाकं (सुनीचम्) अपि वन्दते। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥26॥ आशाबन्धयुक्तकी उक्ति :— भक्तिरसामृतसिन्धु (1/3/35)— श्रीरूप गोस्वामीके द्वारा उद्धृत श्रीसनातन-प्रभुका वाक्य— न प्रेमा श्रवणादिभक्तिरपि वा योगोऽथवा वैष्णवो ज्ञानं वा शुभकर्म वा कियदहो सज्जातिरप्यस्ति वा। हीनाथाधिकसाधके त्वयि तथाप्यच्छेद्यमूला सती हे गोपीजनवल्लभ व्यथयते हा हा मदाशैव माम्॥27॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥27॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मुझमें प्रेम, श्रवणादि भक्ति, विष्णु-भक्तियोग, ज्ञान अथवा शुभकर्म अथवा सद्जाति कुछ भी नहीं है। हे गोपीजनवल्लभ, आप अकिञ्चनके ऊपर कृपा करनेवाले हैं, इसलिये मेरे हृदयमें सदा आपके प्रति जो अटूट श्रद्धा आशा है, वह मुझे निरन्तर व्यथित करती रहती है॥27॥ अनुभाष्य— [मम] प्रेमा वा, श्रवणादिभक्तिः अपि, अथवा वैष्णवः (विष्णुध्यानमयः) योगः (शुद्धभक्तियोगः), ज्ञानं (ब्रह्मनिष्ठं) वा, शुभकर्म (दैववर्णाश्रमादिरूपं) वा, अहो (खेदे) कियत् सज्जातिः (सद्वंशजातसम्मानम्) अपि वा न अस्ति, हे गोपीजनवल्लभ, हीनाथाधिकसाधके (हीनजने योग्यतापरिमाणाधिकफलदातरि) त्वयि अच्छेद्यमूला (सर्वथैव अविच्छेद्या) सती (शुद्धा) हा हा मत् आशा (मम आशा) मां व्यथयते एव। श्लोक-भावानुवाद—मुझमें प्रेम अथवा श्रवणादि भक्ति अथवा विष्णुध्यानमय शुद्धभक्तियोग, या ब्रह्मनिष्ठ ज्ञान अथवा दैववर्णाश्रमादिरूप शुभकर्म अथवा अहो ! सद्-वंशजात सम्मान भी नहीं है। हे गोपीजनवल्लभ ! हीनजनोंको उनकी योग्यताके परिमाणसे भी अधिक फल देनेवाले आपमें मेरी अटूट आशा है। हा ! हा ! मेरी आशा मुझे व्यथित कर रही है॥27॥ (6) समुत्कण्ठा और (7) नामगानमें सदा रुचि :— समुत्कण्ठा हय सदा लालसा-प्रधान। नाम-गाने सदा रुचि, लय कृष्णनाम॥28॥ अनुवाद—जातरति भक्तकी श्रीकृष्णका सान्निध्य प्राप्त करनेकी तीव्र लालसा उसकी समुत्कण्ठाका लक्षण है। नाम-गानमें सदा रुचि रहनेके कारण वह सदैव श्रीकृष्णनामका कीर्तन करता है॥28॥ समुत्कण्ठामें भक्तकी उक्ति :— श्रीकृष्णकर्णामृत (32) में उद्धृत बिल्वमङ्गलवाक्य— त्वच्छैशवं त्रिभुवनाद्भुतमित्यवेहि मच्चापलञ्च तव वा मम वाधिगम्यम्। तत् किं करोमि विरलं मुरलीविलासि मुग्धः मुखाम्बुजमुदीक्षितुमीक्षणाभ्याम्॥29॥ अनुवाद—हे वंशीविलासी कृष्ण ! तुम्हारा शैशव (कैशोर) माधुर्य त्रिभुवनमें अद्भुत है। मेरे चापल्यको तुम जानते हो और मैं जानती हूँ, इसे और कोई नहीं जानता है। इन दो नेत्रोंके द्वारा निर्जन स्थानमें तुम्हारे मुखकमलके दर्शन करनेके लिये अब मैं क्या करूँ ? ॥29॥ । 383