भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1830

[ 23/29-35 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य—मध्यलीला 2/61 संख्या देखें॥ 29 ॥ नामगानका दृष्टान्त :— भक्तिरसामृतसिन्धु (1/3/38)— रोदनबिन्दुमकरन्दस्यन्दि-दृगिन्दीवराद्य गोविन्द। तव मधुरस्वरकण्ठी गायति नामावलीं बाला॥ 30 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 30 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे गोविन्द, यह अति अल्प आयुवाली राधिका (या चन्द्रावली) आज अपने नयनकमलोंमें अश्रु भरकर मधुरकण्ठसे आपकी नामावलीका गान कर रही है॥ 30 ॥ अनुभाष्य— हे गोविन्द, अद्य रोदनबिन्दुमकरन्द-स्यन्दि-दृगिन्दीवरा (रोदनबिन्दवः एव मकरन्दाः पुष्परसाः ते स्यन्दन्ति दृशौ इव इन्दीवरौ नीलपद्मनेत्राभ्यां यस्याः सा) मधुरस्वरकण्ठि (सौस्वर्यवती) बाला (राधिका) तव नामावलीं गायति। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 30 ॥ (8) श्रीकृष्णके गुणोंके वर्णनमें आसक्ति और (9) श्रीकृष्णके वासस्थानमें प्रीति :— कृष्णगुणाख्याने करे सर्वदा आसक्ति। कृष्णलीला-स्थाने करे सर्वदा वसति॥ 31 ॥ अनुवाद—भावदशामें भक्त आसक्त होकर श्रीकृष्णके गुणोंका वर्णन करता रहता है और वह सदा श्रीकृष्णकी लीला-स्थलियोमें वास करता है॥ 31 ॥ श्रीकृष्णके माधुर्यका वर्णन :— श्रीकृष्णकर्णामृत (92)में बिल्वमङ्गलवाक्य— मधुरं मधुरं वपुरस्य विभो- मधुरं मधुरं वदनं मधुरम्। मधुगन्धि मृदुस्मितमेतदहो मधुरं मधुरं मधुरं मधुरम्॥ 32 ॥ अनुवाद—इन श्रीकृष्णका शरीर मधुर है, इनका मुख भी मधुर है और इनका मधु-सुगन्धयुक्त मृदुहास्य और भी मधुर है; अहो ! इनका सब कुछ ही मधुर है॥ 32 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 21/136 संख्या देखें॥ 32 ॥ श्रीकृष्णके प्रिय वास-स्थानमें प्रीतिका दृष्टान्त :— भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/156)— कदाहं यमुनातीरे नामानि तव कीर्त्तयन्। उद्बाष्पः पुण्डरीकाक्ष रचयिष्यामि ताण्डवम् ॥ 33 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 33 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे पुण्डरीकाक्ष, मैं कब आपके नामका कीर्तन करते-करते अश्रुपूर्णनेत्रोंसे युक्त होकर यमुनाके तटपर नृत्य करूँगा॥ 33 ॥ अनुभाष्य— हे पुण्डरीकाक्ष, कदा अहं यमुनातीरे (कालिन्दीतटे) तव नामानि कीर्त्तयन्, उद्बाष्पः (अश्रुपूर्णनेत्रः सन्) ताण्डवं [नृत्यं] रचयिष्यामि (करिष्यामि)? श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 33 ॥ अब (3) प्रेमभक्तिके लक्षणोंका वर्णन :— कृष्णेर रतिर चिह्न एइ कैलुँ विवरण। कृष्णप्रेमेर चिह्न एबे शुन, सनातन॥ 34 ॥ अनुवाद—हे सनातन, मैंने श्रीकृष्णके प्रति होनेवाली रतिके लक्षणोंके विषयमें बतलाया, अब तुम श्रीकृष्णप्रेमके लक्षणोंके विषयमें श्रवण करो॥ 34 ॥ श्रीकृष्णप्रेमिक वैष्णव अथवा शुद्धभक्त-प्राकृत सर्वश्रेष्ठ सूक्ष्मदर्शी समालोचकोंके लिये भी दुर्बोध्य :— याँर चित्ते कृष्णप्रेमा करये उदय। ताँर वाक्य, क्रिया, मुद्रा विज्ञेह ना बुझय ॥ 35 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥ 35 ॥ अनुभाष्य—जातप्रेम भक्तके वचन, क्रिया और मुद्रा (भावभङ्गिमा)को विचक्षण (दक्ष) पण्डित भी समझनेमें समर्थ नहीं होते॥ 35 ॥ 384 |