भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1812, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1812

[ 22/140–142 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

[बायाँ स्तम्भ]

अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 140 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो अन्यभावको पूर्णरूपसे त्याग करके स्वयं श्रीहरिके चरणकमलोंका भजन करते हैं, श्रीकृष्णके प्रिय उन व्यक्तियोंके द्वारा यदि कभी पापका आचरण होता है, तो परमेश्वर श्रीहरि उनके हृदयमें वास करते हुए उनके उस पापको विनष्ट कर देते हैं॥ 140 ॥ अनुभाष्य— स्वपादमूलं (निजपादपल्लवं) भजतः (सेवनकारिणः) प्रियस्य (प्रेमवतः) त्यक्तान्यभावस्य (त्यक्तः भगवतः हरेः शुद्धनिष्कामसेवनात् अन्यस्मिन् देहादौ देवान्तरे वा भावः येन तस्य, अनन्यभक्तिपरायणस्य तस्य) कथञ्चित् (प्रमादिना) विकर्म (निषिद्धं कर्म) उत्पतितं (दुर्दैवात् अनुष्ठितं भवेत्) [तत् अपि] सर्वं परेशः हरिः हृदि सन्निविष्टः (अन्तर्यामिरूपेण स्थितः) धुनोति (विनाशयति)। श्लोक-भावानुवाद—भगवान् श्रीहरिके चरणकमलोंकी सेवा करनेवाले प्रिय भक्त जो उनकी शुद्ध निष्कामसेवाके अतिरिक्त अन्य देहादि और देवताओंके प्रति भावोंको त्यागकर अनन्यभक्तिपरायण हैं, उनसे कभी प्रमादवश दुर्भाग्यसे कोई निषिद्ध कर्म हो जाता है, तो परमेश्वर श्रीहरि अन्तर्यामी रूपमें स्थित रहकर उनके उस पापका विनाश कर देते हैं॥ 140 ॥ मनोधर्म ज्ञान और वैराग्य कभी भी आत्मधर्म भक्तिके अङ्ग नहीं, भक्तिके अनुगामी दो पुत्र मात्र :— ज्ञान-वैराग्यादि—भक्तिर कभु नहे 'अङ्ग'। अहिंस-यम-नियमादि बुले कृष्णभक्त-सङ्ग॥ 141 ॥ अनुवाद—ज्ञान-वैराग्यादि कभी भी 'भक्ति'के अङ्ग नहीं हैं। अहिंसा-यम-नियमादि सद्गुण स्वयं ही श्रीकृष्ण- भक्तके साथ चलते हैं॥ 141 ॥ अनुभाष्य—अनेक लोग भ्रान्तिवशतः सोचते हैं कि ज्ञान और कर्मके लिये वैराग्य ही शुद्धभक्तिका सोपान (सीढ़ी) है, वास्तवमें ऐसा निश्चित रूपमें नहीं है। ज्ञान अथवा कर्मसे उत्पन्न वैराग्य निज-स्वरूपको लक्ष्य


[दायाँ स्तम्भ]

नहीं करता और यह अनित्य-अवस्थाका परिणामशील एक धर्म है, इसलिये वह नित्य श्रीकृष्णदास्यका अङ्ग नहीं है। कर्म और ज्ञानका फल परिणामशील अनित्य- अनुभूतिका एक विकार है एवं भोग और मोक्ष ही उसकी परिणति हैं, इसलिये नित्यभक्तिके साथ उसका कोई भी सम्बन्ध नहीं है। ज्ञान अथवा वैराग्य परित्यक्त होनेपर (छोड़नेपर) ही शुद्धभक्ति हो सकती है। श्रीकृष्णभक्त स्वभावसे ही हिंसाशून्य, संयमशाली और नियमोंमें रत रहते हैं। उन्हें इन सब गुणोंको अर्जित नहीं करना पड़ता॥ 141 ॥ भक्तिके बिना ज्ञान-वैराग्यसे श्रेयलाभ नहीं होता :— श्रीमद्भागवत (11/20/31)— तस्मान्मद्भक्तियुक्तस्य योगिनो वै मदात्मनः। न ज्ञानं न च वैराग्यं प्रायः श्रेयो भवेदिह ॥ 142 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 142 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मेरे प्रति भक्तियुक्त, मुझमें एकान्तिक चित्तवाले प्रिय योगीके लिये ज्ञानचेष्टा और वैराग्यचेष्टा प्रायः ही श्रेयस्कर नहीं होती। तात्पर्य यह है कि भक्ति स्वाभावतः स्वतन्त्र है; ज्ञान-वैराग्य-योगादि प्राथमिक अवस्थामें उसके लिये किञ्चित् उपयोगी होनेपर भी भक्तिके अङ्गोंमें नहीं गिने जाते॥ 142 ॥ अनुभाष्य—श्रीमद् उद्धवने श्रीकृष्णसे विधि और निषेधात्मक भगवद्-आज्ञारूप वेदवाक्योंसे जीवोंकी भोग-बुद्धिकी उत्पत्ति, पुनः उन्हीं वेदवाक्योंके द्वारा ही भोगबुद्धिके विनाशके विषयमें श्रवण करके उनसे जीवकी बुद्धि-भ्रान्ति अथवा मोहको दूर करनेके उपायकी जिज्ञासा की। भगवान्ने सर्वप्रथम कर्म, ज्ञान और भक्तिमार्गके तारतम्य (छोटे-बड़े होनेका) वर्णन करनेके बाद भक्तिकी सर्वश्रेष्ठताका वर्णन किया,— तस्मात् (भक्तेः सर्वोपाधि-विनिर्मुक्तत्वात्) वै (निश्चितं) मद्भक्तियुक्तस्य मदात्मनः (मयि कृष्णे आत्मा मनः यस्य तस्य) योगिनः (भक्तियोगयुक्तस्य जनस्य) इह न ज्ञानं, न च वैराग्यं प्रायः श्रेयः (निःश्रेयसकारणं) भवेत्।

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