श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1811, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबाइसवाँ अध्याय 22/136-140 ] तर्पणम्। होमो दैवो बलिर्भौतो नृयज्ञोऽतिथिपूजनम्॥" होमके द्वारा देवयज्ञ, अध्यापनके द्वारा ब्रह्मयज्ञ अथवा ऋषि-यज्ञ, तर्पणके द्वारा पितृयज्ञ, बलिके द्वारा भूतयज्ञ और अतिथि पूजाके द्वारा नृयज्ञ (मनुष्ययज्ञ) सम्पन्न होता है॥136॥ वैधी भक्तिके अधिकारीके लिये पाँच प्रकारके यज्ञादि कर्मकाण्डकी अनावश्यकता :- श्रीमद्भागवत (11/5/41)में- देवर्षिभूताप्तनॄणां पितॄणां न किङ्करो नायमृणी च राजन्। सर्वात्मना यः शरणं शरण्यं गतो मुकुन्दं परिहृत्य कर्त्तम्॥137॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥137॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो सांसारिक कर्त्तव्योंको पूर्णरूपसे त्याग करके सम्पूर्णरूपमें शरण लेने योग्य श्रीमुकुन्दके शरणागत हुए हैं, हे राजन्, वे देवताओं, ऋषियों, अन्य प्राणियों, आत्मीयजनों, मनुष्यों, पितरोंके ऋणी नहीं रह जाते। तात्पर्य यह है कि मनुष्य जन्म लेनेके साथ ही इन सबके ऋणोंसे ऋणी बन जाता है और शास्त्रोंके मतानुसार बहुत प्रकारके कर्त्तव्यानुष्ठानके द्वारा इन सब ऋणोंको चुकाता है। किन्तु जो समस्त प्रकारकी कामनाओंका परित्याग करके श्रीकृष्णके चरणोंमें शरणागत होता है, उसके ये सब ऋण उपयुक्त कर्मानुष्ठान नहीं करनेपर भी चुक जाते हैं॥137॥ अनुभाष्य-श्रीनारदने श्रीवसुदेवसे भागवतधर्मका वर्णन करते हुए विदेहराज निमि और नवयोगेन्द्रके संवादका वर्णन किया था। पहले आठ योगेन्द्रोंके द्वारा क्रमशः राजा निमिके प्रश्नोंका उत्तर देनेके करभाजन ऋषि निमिको भगवान् विष्णुके चार युगावतारोंके वर्ण-भेद और उपासना-भेद तथा भारतके विभिन्न स्थानोंपर भविष्यमें वैष्णवोंके आविर्भावका वर्णन करके अन्तमें श्रीकृष्णके एकान्त शरणागतोंकी महिमाको निम्नलिखित दो श्लोकोंमें बतला रहे हैं,- हे राजन् यः (जनः) कर्त्तं (भेदं, कृत्यं स्वधर्मं वा) परिहृत्य (परित्यज्य) सर्वात्मना (कायेन मनसा वाचा) शरण्यं (सर्वाश्रयं) मुकुन्दं शरणं गतः, (सः) अयं देवर्षिभूताप्तनॄणां (देवानाम् ऋषीणां भूतानाम् आप्तानां पोष्य-कुटुम्बिनां नॄणां) पितॄणां न किङ्करः (बाध्यः) न ऋणी च [अतः भक्तिमार्गाश्रितस्य फलकामि-कर्मिवत् पञ्चयज्ञानुष्ठानस्यावश्यकता नास्त्येवेत्यर्थः]। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। [इसलिये भक्तिमार्गके आश्रितको फलकामी कर्मियोंकी भाँति पञ्च-यज्ञोंके अनुष्ठानकी आवश्यकता नहीं है-यह अर्थ है]॥137॥ वैष्णव कभी भी पापी नहीं होता अथवा पापी कभी भी वैष्णव नहीं हो सकता :- विधि-धर्म छाड़ि' भजे कृष्णेर चरण। निषिद्ध पापाचारे तार कभु नहे मन॥138॥ दैववश साधकसे पाप होनेपर भी श्रीकृष्णकी कृपासे उसकी सम्पूर्ण पाप-निवृत्ति :- अज्ञाने वा हय यदि 'पाप' उपस्थित। कृष्ण ताँरे शुद्ध करे, ना कराय प्रायश्चित॥139॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥138-139॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो वैदिक विधिके अन्तर्गत सभी प्रकारके धर्मोंका पूर्ण त्याग करके निष्किञ्चन होकर भजन करता है, उसकी स्वाभाविक रूपसे किसी निषिद्ध पापाचारमें मति नहीं होती, यदि किसी कारणसे पाप उपस्थित भी होता है अर्थात् पाप कार्य हो जाता है, श्रीकृष्ण उससे कोई प्रायश्चित कराये बिना ही शुद्ध कर देते हैं॥138-139॥ अन्तर्यामी-चैत्यगुरुरूपमें पाप-शोधन :- श्रीमद्भागवत (11/5/42)में- स्वपादमूलं भजतः प्रियस्य त्यक्तान्यभावस्य हरिः परेशः। विकर्म यच्चोत्पतितं कथञ्चित् धुनोति सर्वं हृदि सन्निविष्टः॥140॥ । 365