श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1815, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबाइसवाँ अध्याय 22/148-150 ] स्यात्।” (रागवर्त्म-चन्द्रिका) - बादमें इस प्रकार लोभसे युक्त भक्त जब श्रीकृष्ण परिकरोंके भावप्राप्तिके उपायोंके जिज्ञासु होते हैं, तब उस अवस्थामें शास्त्र और उसके अनुकूल युक्तिकी व्यवस्था देखी जाती है। जैसे, किसी व्यक्तिको यदि दूध पीनेके लिये लोभ हुआ है, तब किस प्रकारसे दूध प्राप्त होगा, इस उपायको जाननेके लिये उसमें जिज्ञासा उत्पन्न होती है और उस समय उस व्यक्तिके लिये एक विश्वसनीय जानकार व्यक्तिके द्वारा उपदेश-वाक्यकी अपेक्षा देखी जाती है। उसी प्रकार भावके लिये लोभी व्यक्तियोंके लिये भी शास्त्रमें कहे गये उपदेशोंकी अपेक्षा दिखलायी देती है। इसलिये लोभ उत्पत्तिके लिये यद्यपि शास्त्रादिकी कोई अपेक्षा नहीं है, तथापि अभीष्ट भावके पानेके लिये शास्त्रोंके उपदेशकी अवश्य ही अपेक्षा है, ऐसा जानना होगा। इसलिये वैधी साधनभक्तिके जो समस्त अङ्ग हैं, रागानुगा भक्ति उन सभी अङ्गोंको स्वीकार करती है। “वस्तुतस्तु लोभ-प्रवर्तितं विधिमार्गेण सेवनमेव रागमार्ग उच्यते, विधिप्रवर्तितं विधिमार्गेण सेवनञ्च विधिमार्ग इति। विधिविनाभूतं सेवनं तु श्रुतिस्मृतिर्यादिवाक्यादुत्पातप्रापकमेव।” (रागवर्त्म चन्द्रिका) - वस्तुतः लोभके द्वारा प्रवृत्त होनेपर विधिमार्गके अनुसार सेवा ही 'रागमार्ग'रूपमें कही गयी है और शास्त्रविधि-हेतु अर्थात् कर्त्तव्यबुद्धिसे प्रवृत्त होनेपर विधिमार्गमें जो सेवा है, उसे 'विधिमार्ग' कहा गया है। किन्तु शास्त्रविधिके बिना सेवा भक्तिरसामृतसिन्धु ग्रन्थमें उल्लिखित “श्रुति-स्मृति-पुराणादि-पञ्चरात्र-विधिं बिना। ऐकान्तिकी हरेर्भक्तिरुत्पातायैव कल्पते।” - इस वाक्यके अनुसार वह उत्पातका कारण होती है। “रागभक्तगण जातरुचि हैं-उनकी स्वभावतः ही शास्त्रयुक्तिमें सुनिपुणता होती है। अजातरुचि व्यक्तिका शास्त्रसिद्धान्तमें सम्पूर्ण अनिपुण और उच्छृङ्खल होकर रागानुगाका अभिमान करना कपटतामात्र है। इस कपटमयी प्राकृत-अभिनिवेशमयी रुचिको रागमयी भक्तिमें लोभ नहीं समझना चाहिये, क्योंकि वह वास्तवमें सम्भोग- स्पृहासे दोषयुक्त है। वैधीभक्तिके द्वारा चित्त निर्मल होनेपर यदि अहैतुक हरि-गुरु-वैष्णव-कृपासे किसी सौभाग्यवानमें रागमय लोभ स्वतः प्रकाशित होता है, तभी उसका रागानुगा भक्तिमें अधिकार उत्पन्न होता है। कोई कृत्रिमरूपसे इच्छा करनेपर या गानके बलसे रागानुगा भक्त नहीं हो सकता। मूर्खता, उच्छ्र कल्पना, निषिद्धाचार, शास्त्र-उल्लंघन या व्यभिचार- रागानुगा भक्ति या लोभमयी श्रद्धा नहीं है। पुरुषाभिमानी व्यक्ति रागभजन नहीं कर सकता। महत् व्यक्तिकी कृपा होनेपर ही यह पुरुषाभिमान दूर होता है और श्रीपुरुषोत्तमकी प्रकृति होनेका अभिमान जाग्रत होता है। अनर्थ सङ्कुचित होनेपर निर्मल आत्मा या शुद्धजीवस्वरूपमें जो स्वतःसिद्ध रागमय सेवा-भाव प्रकाशित होता है, उसमें अपने-अपने शुद्धस्वरूपके रसभेदसे रागात्मिक व्रजवासियोंके नित्यसिद्ध-भावके प्रति रागानुगा निष्ठा प्रकट होती है। तब श्रीगुरुकृपाके बलसे परम सौभाग्यवान् साधकोंका अपना-अपना स्वरूप प्रकाशित होता है। इसमें कल्पनाका, कृत्रिमताका या अन्य किसी प्रकारके उद्देश्यका स्थान नहीं है। जिनका हृदय निर्गुण है, उन्हींकी निर्गुण व्रजजनोंके आनुगत्यमें रुचि उत्पन्न होती है।” (विधि और राग-दैनिक नदिया प्रकाश) ॥148-149॥ रागानुगा-भक्तिकी संज्ञा :- भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/268)- विराजन्तीमभिव्यक्तां व्रजवासिजनादिषु। रागात्मिकामनुसृता या सा रागानुगोच्यते ॥ 150 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 150 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-व्रजवासिजनोंमें अभिव्यक्तरूपमें रागात्मिका-भक्ति विराजमान है। उस भक्तिकी अनुसृता (अनुगता) जो भक्ति है, वही 'रागानुगा' भक्ति है ॥ 150 ॥ अनुभाष्य- या व्रजवासिजनादिषु अभिव्यक्तां (सुप्रकाशितां यथा स्यात् तथा) विराजन्तीं (शोभमानां) रागात्मिकां (नित्यसिद्ध- व्रजजन-स्वभावगतां) भक्तिम् अनुसृता (अनुगता), सा 'रागानुगा" उच्यते। । 369