श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 22/150-153 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 150 ॥ भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/292) :- तत्तद्भावादिमाधुर्य्ये श्रुते धीर्यदपेक्षते । नात्र शास्त्रं न युक्तिञ्च तल्लोभोत्पत्तिलक्षणम् ॥ 151 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 151 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-व्रजवासियोंके भावादिके माधुर्यको श्रवण करनेमें बुद्धि जिस लोभकी अपेक्षा करती है, वही रागानुगा-भक्तिका अधिकार प्रदान करता है। शास्त्र अथवा युक्ति उस लोभकी उत्पत्तिका लक्षण नहीं है ॥ 151 ॥ अनुभाष्य- [जातरुचिमहाभागवतगुरुमुखात् श्रीमद्भागवत-पद्मपुराणादि- सिद्धशास्त्राद्वा] तत्तद्भावादिमाधुर्य्यं (व्रजवासिनां शान्तदास्य- सख्यवात्सल्यमधुर-रसाश्रितभावादीनां माधुर्य्यं) श्रुते (श्रवणेन अनुभूते सति) यत् (यस्य) धीः (बुद्धिः) अत्र (इह) शास्त्रं (विधि-वाक्यं) न, युक्तिं (विचारणं) च न अपेक्षते (परन्तु स्वतः स्वभावतः एव प्रवर्त्तते), तदेव लोभोत्पत्तिलक्षणं (रागोदयलक्षणम्)। श्लोक-भावानुवाद-जातरुचि महाभागवत गुरुके मुखसे श्रीमद्भागवत-पद्मपुराणादि सिद्धशास्त्रोंमें वर्णित व्रजवासियोंके शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य, मधुर-रसाश्रित भावोंके माधुर्यके विषयमें श्रवण और अनुभव करके जिसकी बुद्धि शास्त्र-वाक्यों और विचारोंकी अपेक्षा नहीं करती, अपितु स्वभावतः ही उसमें प्रवर्तित होती है, वही राग उदय होनेका लक्षण है॥ 151 ॥ अनर्थ-निवृत्ति होनेपर साधकदेहमें और सिद्धदेहमें रागानुगा-भक्तिका दो प्रकारका अनुशीलन :- बाह्य, अन्तर,—इहार दुइ त' साधन। ‘बाह्ये’ साधकदेहे करे श्रवण-कीर्त्तन ॥ 152 ॥ ‘मने’ निज-सिद्धदेह करिया भावन। रात्रि-दिने करे व्रजे कृष्णेर सेवन ॥ 153 ॥ अनुवाद-‘बाह्य’ और ‘आन्तरिक’—इन दो प्रकारसे रागानुगा भक्तिका अनुशीलन होता है। निज-सिद्धदेहकी अनुभूति होनेपर भी रागानुगा भक्त साधकदेहसे ‘बाहरसे’ श्रवण और कीर्तन करता है और ‘मनमें’ अपनी सिद्धदेहकी भावना करके रात-दिन व्रजमें श्रीकृष्णकी सेवा करता है॥ 152-153 ॥ अमृतानुकणा—“श्रीकृष्णसेवा-अप्राकृत कामदेवकी सेवा है—शुद्धचेतनकी अस्मिताके द्वारा भगवान्के चरणकमलोंकी नित्या अहैतुकी अप्रतिहता (नैरन्तर्यमयी) सेवा है। श्रीकृष्णसेवा अप्राकृत देहका कार्य है। आरोपके द्वारा या अन्तश्चिन्तित काल्पनिक मनोमय देहके द्वारा श्रीकृष्णसेवाकी बात हमारे गोस्वामियोंने कभी नहीं कही है। इस जगत्में स्थूल और लिङ्गदेहके द्वारा अप्राकृत वस्तुकी सेवा नहीं होती। जब हमारी अप्राकृत देहके द्वारा अप्राकृत वस्तुकी सेवा होती है, तभी बाह्य देहसे उसकी स्पन्दन क्रिया देखी जा सकती है। “अतः श्रीकृष्णनामादि न भवेत् ग्राह्यमिन्द्रियैः। सेवोन्मुखे हि जिह्वादौ स्वयमेव स्फुरत्यदः ॥”-इसके द्वारा हम अपने दुर्भाग्यकी पराकाष्ठाकी अधिक उपलब्धि कर सकते हैं। सम्बन्धज्ञानयुक्त अप्राकृत देहके द्वारा जब हम श्रीकृष्णसेवा करनेके लिये लोभी होते हैं, तब हमारी बाहरकी देह भी मायाकी पूजा न करके सदा वैकुण्ठ- नाम ग्रहणमें उत्कण्ठित होती है। किन्तु बाह्य जगत्की प्रतीति प्रबल रहनेपर हम जो याजन करनेका अभिमान करते हैं, वह निरर्थक है। इसके द्वारा यह नहीं कहा गया है कि भजनकी क्रियाको छोड़ देना होगा। अपितु यह कहा गया है कि अधिकारके अनुयायी होकर क्रमानुसार अग्रसर होना होगा। सद्गुरुके श्रीचरणाश्रयके बिना हमारी भजनक्रिया या अनर्थनिवृत्तिकी सम्भावना नहीं है। अनर्थनिवृत्ति न होनेपर श्रीकृष्णसेवामें नैरन्तर्य और रुचि आदि उपस्थित नहीं हो सकती। जिस दिन हम सेवक-विग्रह श्रीगुरुदेवको श्रीचैतन्यदेवसे अभिन्न जाननेकी उपलब्धि कर सकेंगे, उस दिन हम श्रीराधागोविन्दकी निभृतसेवा अपनी विभिन्न आत्मरतिसे 370