श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1817, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबाइसवाँ अध्याय 22/152-153 ] कर सकेंगे।”-(श्रील प्रभुपादकी वक्तृता, साप्ताहिक 'गौड़ीय' ३रा वर्ष 40 संख्या) “मने निज सिद्धदेह करिया भावन”-यहाँपर 'भावना'-शब्दसे मानवके सङ्कल्प-विकल्पात्मक धर्मयुक्त प्राकृत मनके द्वारा स्वतन्त्र चिन्ताप्रणालीको नहीं समझना चाहिये। क्योंकि, श्रीरूपगोस्वामीने कहा है, - 'व्यतीत्य भावनावर्त्म यश्चमत्कारकारभूः। हृदि सत्त्वोज्ज्वले बाढं स्वदते स रसो मतः॥” (भःरःसिः) - भावनाके पथका अतिक्रम करके अतिशय चमत्कारिकताके आधारस्वरूप जो स्थायीभाव शुद्धसत्त्वसे परिमार्जित उज्ज्वल-हृदयमें आस्वादित होता है, उसे ही 'रस' कहा जाता है। इसलिये विशुद्धसत्त्व-वृत्तिके द्वारा ही अधोक्षज श्रीराधाकृष्णका ध्यान सम्भव है। अधोक्षज-वस्तु- प्राणी-जगत्के भोगोन्मुख जड़ेन्द्रियोंसे अतीत है- 'नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः।' (गीता 7/25)। वह केवल सेवोन्मुख निर्मल चित्तमें ही प्रकाशित होती है। “भक्तियोगेन मनसि सम्यक् प्रणिहितेऽमले। अपश्यत् पुरुषं पूर्णं मायाञ्च तदपाश्रयाम्॥” (भाः 1/7/4) शुद्धभक्तियोगके प्रभावसे शुद्ध हुए मनके समाहित होनेपर श्रीव्यासदेवने स्वरूपशक्तियुक्त पूर्णपुरुष श्रीकृष्णके दर्शन किये थे। इसलिये ही गौरपार्षद ठाकुर श्रीनरोत्तमदासने कहा है, - “विषय छाड़िया कब शुद्ध हवे मन। कब हाम हेरिब श्रीवृन्दावन ॥” जड़विषयोंमें आविष्ट अशुद्ध मनमें कभी भी पूर्णपुरुषकी उपलब्धि नहीं हो सकती, क्योंकि (बद्धजीवकी) चिन्ता जड़को अतिक्रम नहीं कर सकती। उपासनाको चिन्ता कहनेपर, केवल जड़से ही उत्पन्न कल्पनाको उपासना कहना होगा। सामान्य मानवसत्तामें जड़ और चिन्ताके अतिरिक्त और कुछ लक्षित नहीं होता। जड़, जड़चिन्ता और अजड़चिन्तारूप निर्विशेषभाव-इन तीनों सामान्यतः लक्षित तत्त्वोंको पार करके जीवकी सिद्धसत्ताका अनुसन्धान करो। तभी चिन्मय उपासना लक्षित होगी। उस चिन्मय उपासनाका नाम 'रस' है। (श्रीचैतन्य-शिक्षामृत 7/2) “दिव्यज्ञान या दीक्षाकी सिद्धिमें अप्राकृत देह या चिदानन्दमय सिद्धदेह श्रीगुरुपादपद्मकी कृपासे प्रकाशित होती है। “दीक्षाकाले भक्त करे आत्मसमर्पण। सेइकाले कृष्ण तारे करे आत्मसम॥ सेइ देह करे तार चिदानन्दमय। आप्राकृत देहे ताँर चरण भजय॥” तभी साधक उस सिद्धदेहकी भावनाकी योग्यता प्राप्त करता है और बाहरसे निरन्तर श्रवण-कीर्तनादि करता है। सिद्धदेह पूर्ण सेवोन्मुखताके साथ साथ ही प्रकाशित होती है और वह श्रीवार्षभानवीके अभिन्न तनु श्रीगुरुपादपद्मकी कृपाके बलसे ही प्राप्त होती है। गुरुवर्गकी वाणीमें देखा जाता है-अन्य सब भाव दूर होनेपर नित्यसिद्ध व्रजगोपीभावका स्वाभावरूपमें प्रकट होना ही 'गोपीगर्भसे जन्मलाभ' है। अर्चनमार्गमें जिस प्रकार भूतशुद्धि होनेके बाद ही अर्चनका अधिकार होता है, अप्राकृत भावमार्गमें भी उसी प्रकार अन्य भावोंका परित्याग करके व्रजगोपीभाव प्राप्त करने तक या गोपीगृहमें जन्मलाभ न करने तक श्रीराधागोविन्दकी भावसेवामें अधिकार प्राप्त नहीं होता है। 'गुप्'-धातुका अर्थ होता है, रक्षा करना। श्रीकृष्ण निर्मल चेतनकी नित्यसिद्ध वृत्तिका संरक्षण करते हैं अर्थात् चेतनकी नित्यसेवाप्रवृत्तिके विषय होकर वे 'गोपीनाथ' और निर्मल चेतनकी सेवावृत्तिका विग्रहसमूह ही 'गोपी' है। उस गोपीके गर्भसे अर्थात् श्रीकृष्णकी एकमात्र संरक्षित-सत्त्वस्वरूप सेवावृत्तिके अन्दरमें जीवकी चेतनवृत्ति अवस्थित न होनेपर कोई श्रीराधामाधवकी सेवाका अधिकार प्राप्त नहीं कर सकता। ('सिद्ध'-दैनिक नदिया प्रकाश) “इस जड़जगत्में 'नित्य साधक' जड़ देहमें वास करनेपर भी भावनामार्गमें श्रीगुरुकी कृपासे नित्यसिद्धदेहकी भावना करेंगे। उस देहमें अष्टकालीय मानसी सेवा चिन्ता करते-करते स्वरूपसिद्धि होनेसे उनमें अभिमान उत्पन्न होगा।” (श्रीचैतन्य-शिक्षामृत 6/5)। यहाँपर 'नित्य साधक' किसको कहा गया है? “साधक दो प्रकारके । 371