श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1814, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 22/148–149 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला रागानुगा-भक्तकी प्रकृति अथवा लक्षण :- लोभे व्रजवासीर भावे करे अनुगति। शास्त्रयुक्ति नाहि माने—रागानुगार प्रकृति ॥ 149 ॥ अनुवाद—व्रजवासियोंके भावोंके प्रति लुब्ध होकर जो उनके भावोंका अनुगमन करता है, वह रागानुग भक्त शास्त्र-वचनों और युक्तियोंकी अपेक्षा नहीं करता, यही रागानुग भक्तका स्वभाव है॥ 149 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'अनुगति'—अनुगमन॥ 149 ॥ अनुभाष्य—व्रजवासियोंके भावोंके प्रति लुब्ध होकर उनके भावों और इच्छाओंका अनुगमन करना ही रागानुग भक्तोंकी स्वाभाविकी प्रवृत्ति होती है। जातरुचि भक्त स्वाभाविक रूपमें ही शास्त्रकी युक्तियोंमें सुनिपुण होते हैं, उनकी नित्यसिद्ध रुचिके विरुद्धमें अन्य व्यक्तिके द्वारा शास्त्रयुक्तिको प्रदर्शित करनेपर भी वे उसे स्वीकार नहीं करते। जानने योग्य बात यह है कि प्राकृत-सहजिया आदि कुपथ-आश्रित सम्प्रदायके लोग वास्तवमें अजातरुचि होनेपर भी रागानुगाभिमानमें भक्तिग्रन्थोंकी चर्चा और श्रीरूपानुग पथका परित्याग करके अवैध-स्त्रीलम्पट और मूर्खजनोंके योग्य सांसारिक रुचिको ही बढ़ाकर अपना सर्वनाश किया करते हैं। वे वञ्चित और दुर्भागे हैं॥ 149 ॥ अमृतानुकणा—'प्रीति या आनन्दके वशीभूत होकर ही जीव अपने-अपने कार्योंमें प्रवृत्त होते हैं। पण्डितगण इस प्रीतिको चित्त और विषयका बन्धनसूत्र बतलाते हैं। प्रीतिरूप बन्धनसूत्र विषयके जिस अंशका आश्रय करके रहता है, उसका नाम 'रञ्जकता धर्म' है और चित्तके जिस अंशको आश्रय करके रहता है, उसका नाम 'राग' है। विषयके नाम, रूप, गुण और क्रियागत जो सौन्दर्य या चमत्कारिता है, उसको 'रञ्जकता धर्म' कहते हैं। विचार करनेसे पूर्व ही विषयके सौन्दर्यको देखते ही चित्त जिस प्रवृत्तिके द्वारा उस पदार्थकी ओर दौड़ता है, वही 'राग' है। रागकार्यमें विचारकी आवश्यकता नहीं रहनेपर पण्डितगण उसको 'सिद्धवृत्तिस्वरूप' कहते हैं। राग जिस वस्तुके प्रति धावित होता है, उसको उसका 'इष्टविषय' कहते हैं। नित्य और अनित्य भेदसे रागके इष्टविषय दो प्रकारके हैं। नित्य इष्टविषयके प्रति राग जब धावित होता है, तब उसको 'वैकुण्ठराग' और अनित्य इष्टविषयके प्रति जब धावित होता है, तब उसको 'जड़राग' कहा जाता है। जीवके चित्तमें स्थित राग एक ही तत्त्व होनेके कारण वैकुण्ठराग और जड़रागमें विषयकी भिन्नता है, रागकी भिन्नता नहीं है।" ('रागरहस्य'—साप्ताहिक 'गौड़ीय' 3रा वर्ष 38 संख्या) जड़राग विद्यमान होनेपर कर्त्तव्य बुद्धिके द्वारा अर्थात् शास्त्रविधि और युक्तिसे प्रेरित होकर जो इष्टसाधन प्रणाली है, उसका नाम 'वैधीभक्ति' है। जबतक 'रति'का उदय नहीं होता है, तबतक वैधी भक्तिमें अधिकार है। रतिके उदय होनेपर वह 'वैकुण्ठराग'में पर्यवसित होता है। वैकुण्ठराग उसके इष्टविषयके वैशिष्ट्यके अनुसार ऐश्वर्यपर और माधुर्यपर भेदसे दो प्रकारका होता है। व्रजवासियोंका श्रीकृष्णके प्रति जो राग है, वह केवल माधुर्यपर और ऐश्वर्यगन्धविहीन है। श्रीकृष्णके प्रति उनके उस रागमें आत्मसुखकी इच्छाकी गन्धमात्र भी नहीं रहती और तारतम्यके अनुसारसे वह सर्वश्रेष्ठ है। इसलिये व्रजवासियोंके परम, विशुद्ध वैकुण्ठरागको ही मुख्यत: 'रागात्मिका भक्ति' कहा जाता है। उस विषयमें शास्त्रके वर्णनको श्रवणकर उनके रागके प्रति जो लोभ उत्पन्न होता है (अर्थात् किसी विशेष रागमें लोभमात्र उत्पन्न होता है, परन्तु स्वयं वह विशेष राग उत्पन्न नहीं होता), उसके द्वारा जो भक्ति होती है, उसको 'रागानुगा भक्ति' कहते हैं। वहाँपर शास्त्रविधि और युक्तिके विषयमें उपयुक्त ज्ञान रहनेपर भी वह उक्त भक्तिका उत्तेजक नहीं है, परन्तु यथार्थ विषयमें लोभ ही उसका उत्तेजक है। “ततश्च तादृशलोभोवतो भक्तस्य लोभनीय-तद्भाव- प्राप्त्युपाय-जिज्ञासायां सत्यां शास्त्रयुक्त्यपेक्षा स्यात्। यथा दुग्धादिषु लोभे सति कथं मे दुग्धादिकं भवेदिति तदुपायजिज्ञासायां तदभिज्ञाप्तजन-कृतोपदेशवाक्यापेक्षा 368 |