श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1794, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 22/79-80 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य—किसी समय राजर्षि भरतके पिता भगवान् ऋषभदेवने ब्रह्मावर्त्तमें उपस्थित होकर ऋषियोंके निकट उपदेश श्रवणमें रत पुत्रोंको मोक्षधर्म और पारमहंस्य-धर्मका वर्णन किया था— [तत्त्वकोविदाः] महत्सेवां (वैष्णवपरिचर्यां) विमुक्तेः (संसारबन्धनस्य) द्वारं (मोचनहेतुम्) आहुः (कथयन्ति) योषितां सङ्गिसङ्गं (स्त्रीसङ्गिविषयिणां भोक्तॄणां सङ्गं) तमोद्वारं (संसारस्य नरकस्य वा, द्वारं हेतुम् आहुः); [तत्र] ये समचित्ताः (समदर्शिनः पण्डिताः) प्रशान्ताः (शुद्धचित्ताः) विमन्यवः (क्रोधरहिताः) सुहृदः (बान्धवाः) साधवः (परदोषादर्शिनः), ते महान्तः [ज्ञेयाः]। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 79 ॥ साधुसङ्गके माहात्म्यका वर्णन; साधुसङ्गके फलसे ही श्रीकृष्णसेवाकी प्राप्ति :- कृष्णभक्ति-जन्ममूल हय 'साधुसङ्ग' । कृष्णप्रेम जन्मे, तँहो पुनः मुख्य अङ्ग ॥ 80 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 80 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—साधुसङ्ग यद्यपि प्रथमावस्थामें श्रीकृष्णभक्तिके उत्पन्न होनेका मूल कारण है, तथापि श्रीकृष्णप्रेम उत्पन्न होनेपर भी वही साधुसङ्ग ही पुनः प्रेमके मुख्य अङ्गमें गिना जाता है ॥ 80 ॥ अमृतानुकणा—साधुसङ्ग ही भक्तिराज्यमें प्रवेशका एकमात्र उपायस्वरूप है—'भक्तिस्तु भगवद्भक्तसङ्गेन परिजायते।' (वृहन्नारदीय पुराण)। “जिसका अपना स्वभाव अत्यन्त लुप्तप्राय है, उसको कौन जाग्रत करेगा? कर्म, ज्ञान और वैराग्यकी चेष्टासे वह जाग्रत नहीं होगा, इसलिये जिसका किसी सौभाग्यसे निज-स्वभाव जाग्रत होता है, उनके (अर्थात् भगवद्भक्तोंके) सङ्गबलसे ही जीवका गुप्तप्राय निज-स्वभाव जाग्रत हो सकता है। इस विषयमें दो घटनाओंका होना आवश्यक है। जो निज-स्वभावको जाग्रत करनेकी इच्छा करते हैं, वे पूर्व भक्ति-उन्मुखी सुकृतिके द्वारा कुछ परिमाणमें शरणागति लक्षणवाली श्रद्धा प्राप्त करते हैं—यह एक घटना है। उस सुकृतिके बलसे उनको किसी उपयुक्त साधुका सङ्ग होता है—यह दूसरी घटना है।” (दशमूल-निर्याास)। उसके बाद साधुसङ्गसे ही श्रवण-कीर्त्तनादि समस्त भजनक्रिया आरम्भ होती है, अन्यथा यह सम्भव नहीं है। इसलिये श्रद्धाको श्रीकृष्णभक्ति-लताका अङ्कुर कहनेपर साधुसङ्गको उसका मूल कहना होगा— “आदौ श्रद्धा ततः साधुसङ्गोऽथ भजनक्रिया। ततोऽनर्थनिवृत्तिः स्यात् ततो निष्ठा रुचिस्ततः॥ अथासक्तिस्ततो भावस्ततः प्रेमाभ्युदञ्चति। साधकानामयं प्रेम्णः प्रादुर्भावे भवेत् क्रमः॥” [अर्थात् “सर्वप्रथम श्रद्धा, तदनन्तर साधुसङ्ग, उसके पश्चात् भजनक्रिया, तदनन्तर अनर्थनिवृत्ति, उसके पश्चात् निष्ठा, तदनन्तर रुचि और उसके बाद आसक्ति, तत्पश्चात् भाव और भावके बादमें प्रेमका उदय होता है। साधकोंके हृदयमें प्रेम उत्पन्न होनेका यह क्रम निरूपित हुआ है।”] साधुसङ्गके बिना कोई जब भी अपनी कपोल- कल्पनासे उत्पन्न उपायका सहारा लेगा, तभी माया श्रीकृष्णभक्तिका छल करके उसको भक्तिमार्गसे भ्रष्ट करा देगी और फलभोगवादी-कर्मी, अथवा अभेद- ब्रह्मानुसन्धानपरक ज्ञानी, अथवा सहजिया, सखीभेकी, कर्मजड़-स्मार्त्तबुद्धिपर गोसाईं, आउल, बाउल आदि श्रीकृष्ण बहिर्मुख दलमें शामिल करा देगी। साधुसङ्ग ही भक्तिप्रतिकूल मार्गके अनुसरणकी प्रवृत्तिके मूलको काटनेवाला है। साधुओंके प्रकृष्ट सङ्गमें ही श्रीभगवान्की हृदय और कानोंको रसायन लगनेवाली कथाओंकी चर्चा होती है। उन कथाओंको सुनते-सुनते अविद्यानिवृत्ति मार्गस्वरूप भगवान्के चरणकमलोंमें क्रमशः साधनभक्ति, भावभक्ति और अन्तमें प्रेमभक्ति प्राप्त होती है। प्रेमभक्ति प्राप्त होनेके बाद भी साधुसङ्ग पुनः प्रेमके मुख्य अङ्गके रूपमें ही निर्णित हुआ है, इसलिये साधुसङ्गके नित्य होनेकी घोषणा की गयी है। इसका तात्पर्य यह है कि भक्तिकल्पलताके आश्रित साधकभक्त साधुसङ्गके द्वारा परम प्राप्य प्रेमफल प्राप्त करनेके बाद 348 ।