श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1793, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबाईसवाँ अध्याय [ 22/75-79 ] सर्वोपकारक, शान्त, कृष्णैकशरण। अकाम, निरीह, स्थिर, विजित-षड्गुण ॥ 76 ॥ मितभुक्, अप्रमत्त, मानद, अमानी। गम्भीर, करुण, मैत्र, कवि, दक्ष, मौनी ॥ 77 ॥ **अनुवाद—**श्रीकृष्णभक्त कृपाकी मूर्ति होता है। वह किसीसे भी वैर भाव नहीं रखता और उसके जीवनका सार है सत्य। वह समदर्शी, निर्दोष, दानी, मधुरस्वभाव और पवित्र होता है। वह धनादिके संग्रहसे सर्वथा दूर रहता है। वह सभीका उपकार करनेवाला, शान्त (निष्काम) और श्रीकृष्णमें पूर्ण शरणागत होता है। वह समस्त जागतिक कामनाओंसे रहित, किसी भी जागतिक वस्तुके लिये चेष्टारहित और भक्तिमें स्थिर रहता है। भूख-प्यास, शोक-मोह और जन्म-मृत्यु—ये छहों उसके वशमें रहते हैं। वह परिमित भोग स्वीकार करता है और प्रमादरहित (सावधान) होता है। वह दूसरोंको सम्मान देनेवाला और अपने सम्मानकी अभिलाषासे रहित होता है। वह गम्भीर स्वभावका होता है और उसके हृदयमें करुणा भरी होती है। वह सभीके साथ मित्रताका व्यवहार करता है, मेरे तत्त्वका उसे यथार्थ ज्ञान होता है और वह मेरे सम्बन्धकी बातें दूसरोंको समझानेमें बड़ा निपुण होता है। वह मौनी अर्थात् सदा श्रीकृष्णकथा ही कहता और सांसारिक विषयोंमें सदा मौन होता है॥ 75-77 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'कृपालु'से लेकर 'मौनी' तक गुणसमूह—वैष्णवोंके विशेष लक्षण हैं॥ 75-77 ॥ प्रमाण :— श्रीमद्भागवत (3/25/21)में— तितिक्षवः कारुणिकाः सुहृदः सर्वदेहिनाम्। अजातशत्रवः शान्ताः साधवः साधुभूषणाः ॥ 78 ॥ **अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 78 ॥ **अमृतप्रवाह भाष्य—**समस्त साधुओंमें सहनशीलता, जीवोंके दुःखमें दयार्द्र होना, प्राणिमात्रका ही नित्य मङ्गलविधान करना, सबको ही भगवान्के सेवक जानकर किसीको भी शत्रु नहीं मानना, निष्काम इसलिये शान्त होना—इन गुणोंसे युक्त होते हैं और ये गुण ही साधुओंके भूषण होते हैं॥ 78 ॥ **अनुभाष्य—**शौनक आदि ऋषियोंके द्वारा भगवान् कपिलदेवकी लीलाकथाकी जिज्ञासा करनेपर महाभागवत सूत उन्हें व्यास-सखा भगवान् मैत्रेयके द्वारा पूर्वकालमें विदुरके समक्ष वर्णित इस आत्मतत्त्व और भगवान् कपिल और देवहूतिके संवादका प्रसङ्ग वर्णन कर रहे हैं, कपिलदेव असद् वस्तुमें आसक्तिको ही जीवके बन्धनका कारण और सद्-वस्तुमें आसक्तिको ही मोक्षके द्वारके रूपमें वर्णन करके सद्वस्तु साधुओंके पहले 'तटस्थ', बादमें 'स्वरूप'-लक्षण बतला रहे हैं— (साधूनां लक्षणमाह—) तितिक्षवः (सहिष्णवः) कारुणिकाः (दयार्द्रचित्ताः) सर्वदेहिनां (सर्वजीवानां) सुहृदः (बान्धवाः) अजातशत्रवः (निर्वैराः) शान्ताः (निष्कामाः) साधुभूषणाः (साधु सुशीलं, तदेव भूषणं येषां ते) साधवः (शास्त्रानुवर्तिनः)। **श्लोक-भावानुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 78 ॥ महत् या वैष्णवोंकी सेवासे ही मायासे छुटकारा; स्त्री-सङ्गीकी सेवासे संसार-बन्धन और नरककी प्राप्ति :— (श्रीमद्भागवत 5/5/2)में— महत्सेवां द्वारमाहुर्विमुक्ते- स्तमोद्वारं योषितां सङ्गिसङ्गम्। महान्तस्ते समचित्ताः प्रशान्ता विमन्यवः सुहृदः साधवो ये ॥ 79 ॥ **अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 79 ॥ **अमृतप्रवाह भाष्य—**पण्डित लोग महत्-सेवाको ही वास्तविक मुक्तिका द्वार-स्वरूप और स्त्रियोंके प्रति जिनकी आसक्ति है, उनके सङ्गको ही तमोगुणका द्वार कहते हैं। जो साधु हैं, वे भगवान्में निष्ठायुक्त, समदर्शी, प्रशान्त, क्रोधरहित और सभीका मङ्गल करनेवाले हैं॥ 79 ॥ । 347