भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1792

[ 22/71–75 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥71॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो लौकिक और पारिवारिक प्रथाके अनुसार परम्परागत श्रद्धाके साथ अर्चा-मूर्तिमें श्रीहरिकी पूजा करते हैं, परन्तु शास्त्र-अनुशीलनके द्वारा शुद्धभक्तितत्त्वको नहीं जाननेके कारण हरिभक्तोंकी पूजा नहीं करते, वे—'प्राकृत भक्त' हैं अर्थात् उन्होंने अभी भक्तिपर्व आरम्भ मात्र ही किया है। उन्हें 'भक्तप्राय' अथवा 'वैष्णवाभास' शब्दोंके द्वारा सम्बोधित किया जाता है॥71॥ तात्पर्य यह है कि जब कोई ईश्वरके प्रति 'प्रेम', भक्तोंके प्रति 'मैत्री', मूर्ख लोगोंके प्रति 'कृपा' और भगवद्-विद्वेषी और भगवद्भक्त-विद्वेषीकी 'उपेक्षा' कर सकता है, तभी वह शुद्धभक्तरूपमें 'मध्यमभक्त'में गिना जाता है। बादमें भजन करते-करते जब वह सभी प्राणियोंमें अपने सम्बन्धसे भगवद्भाव और आत्मस्वरूप भगवद्-पदार्थमें समस्त प्राणियोंकी विद्यमानता देखता है, तब उसका ईश्वर, उनके अधीन व्यक्ति (भक्त), मूर्ख और विद्वेषीके प्रति भेदभाव नहीं रहता; उस अवस्थामें वह 'भागवतोत्तम' कहलाता है॥69-71॥ अनुभाष्य— यः हरये (भगवते गुरवे आत्मानं निवेद्य) अर्चायां (श्रीविग्रहे) श्रद्धया (दीक्षितः सन् मिश्रत्वेन भक्त्याभासेन पाञ्चरात्रिकविधानेन) पूजाम् ईहते (करोति), तद्भक्तेषु (हरिजनेषु) पूजां न [ईहते भक्ततारतम्यज्ञानाभावात्] अन्येषु च (हरिविमुखसङ्गं च वर्ज्जयतीत्यर्थः), स भक्तः प्राकृतः (कनिष्ठः वैष्णवप्रायः, न तु शुद्ध इत्यर्थः) स्मृतः (कथितः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥71॥ शुद्धभक्त श्रीकृष्णके सभी गुणोंसे विभूषित :— सर्व महागुणगण वैष्णव-शरीरे। कृष्णभक्ते कृष्णेर गुण सकलि सञ्चारे॥72॥ अनुवाद—वैष्णवोंमें समस्त महान गुण विराज करते हैं। श्रीकृष्णके भक्तोंमें श्रीकृष्णके समस्त गुण स्वतः ही सञ्चारित होते हैं॥72॥ अनुभाष्य—श्रीभगवान् विष्णु ही भक्तोंकी एकमात्र उपास्य-वस्तु हैं; भगवद्-गुणसमूह भक्तोंकी ही सम्पत्ति हैं। भगवान्की समस्त गुणराशि शुद्धभक्तमें सञ्चारित होती है॥72॥ शुद्धवैष्णव—सर्वमहागुणोंसे गुणी, अवैष्णव—सर्वथा गुणहीन :— (श्रीमद्भागवत 5/18/12)— यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिञ्चना सर्वैर्गुणैस्तत्र समासते सुराः। हरावभक्तस्य कुतो महद्गुणा मनोरथेनासति धावतो बहिः॥73॥ अनुवाद—श्रीकृष्णमें जिनकी केवला भक्ति है, उन व्यक्तियोंमें समस्त गुणोंके सहित देवता वास करते हैं। हरिभक्तिविहीन व्यक्तियोंका मन सदा असत् बाह्य विषयोंमें दौड़ता रहता है, इसलिये उनमें महद्गुणोंका होना असम्भव है॥73॥ अनुभाष्य—श्रीशुकदेव परीक्षितसे 'भद्रश्रवा' नामक वर्षपति और उनके सेवकोंके द्वारा किये गये भगवान् श्रीनृसिंह और उनके शुद्धभक्तोंके स्तवगानका वर्णन कर रहे हैं। आदिलीला 8/58 संख्या देखें॥73॥ वैष्णवोंके छब्बीस गुण अथवा लक्षणोंका वर्णन :— सेइ सब गुण हय वैष्णव-लक्षण। सब कहा ना याय, करि दिग्दर्शन॥74॥ अनुवाद—वे सब गुण ही वैष्णवके लक्षण हैं। वैष्णवके समस्त गुणोंका वर्णन नहीं किया जा सकता, इसलिये मैं उनका केवल दिग्दर्शन ही करा रहा हूँ॥74॥ उनमेंसे श्रीकृष्णके प्रति शरणागति ही 'स्वरूप' लक्षण, अन्य सभी 'तटस्थ' लक्षण :— कृपालु, अकृतद्रोह, सत्यसार, सम। निर्दोष, वदान्य, मृदु, शुचि, अकिञ्चन॥75॥ 346 |