भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1791, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1791

बाईसवाँ अध्याय 22/64-71 ] द्वारा जब दृढ़ होती है, तब वह 'उत्तमाधिकारी' बन जायेगा। यहाँ तक भक्तिका अधिकारका निर्णय हुआ है, अब भक्तोंका विभाग कर रहे हैं। रति और प्रेमके तारतम्यसे 'भक्त', 'भक्ततर' और 'भक्ततम',—ये तीन प्रकारके विभाग हैं॥ 64-68 ॥ अनुभाष्य—(भःरःसिः पूःविः द्वितीय लहरीके 12 श्लोकमें) श्रीरूपगोस्वामिपादने लिखा है,— “यः शास्त्रादिष्वनिपुणः श्रद्धावान् स तु मध्यमः। यो भवेत् कोमलश्रद्धः स कनिष्ठो निगद्यते॥” मध्यमभक्त श्रद्धावान् होनेपर भी शास्त्रादिके तात्पर्यमें उतना कुशल नहीं होता और जो कोमल श्रद्धावाला है, वही कनिष्ठ है। कनिष्ठाधिकारी अभक्तोंके सङ्गसे श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें कोमल श्रद्धासे भी विच्युत हो सकता है। मध्यमाधिकारी शास्त्रादिके तात्पर्यके द्वारा अभक्त-सङ्गके कुफलसे तत्क्षणात् मुक्त नहीं हो पानेपर भी शास्त्रादि और भक्त-सङ्गके प्रभावसे दृढ़ता प्राप्त करता है। अभक्त-सङ्ग किसी भी प्रकारसे उत्तमाधिकारीकी श्रद्धाकी हानि नहीं कर सकता। श्रद्धाकी वृद्धिके साथ-साथ भक्तका अधिकार उन्नत होता है। अजात-रुचि (जिनकी रुचि अभी उत्पन्न नहीं हुई है, ऐसे) वैध-भक्तकी श्रद्धाके परिमाणानुसार रतिका (जातरुचि-भक्तकी श्रद्धाको ही 'रति' कहते हैं) तारतम्य होता है। रतिके तारतम्यके भेदसे प्रेमभक्तिरसका तारतम्य होता है। ग्यारहवें स्कन्धमें श्रीभगवान् और उद्धवके संवादमें भक्तोंका अधिकार लिखा गया है॥ 66-68॥ उत्तमाधिकारी अथवा महाभागवतका लक्षण :- श्रीमद्भागवत (11/2/45-47)में— सर्वभूतेषु यः पश्येद्भगवद्भावमात्मनः। भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः ॥ 69 ॥ अनुवाद—जो उत्तम भागवत होते हैं, वे सभी प्राणियोंमें आत्माके भी आत्मरूप भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रको ही देखते हैं और आत्माके आत्मस्वरूप श्रीकृष्णमें समस्त जीवोंको देख पाते हैं॥ 69 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 8/274 संख्या देखें ॥ 69 ॥ मध्यमाधिकारीके लक्षण :— ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च। प्रेम-मैत्री-कृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः ॥ 70 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 70 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो भक्त ईश्वरमें प्रेम, भक्तोंसे मैत्री, मूर्ख व्यक्तियोंके प्रति कृपा और विद्वेषी लोगोंके प्रति उपेक्षा करता है, वह—'मध्यम भक्त' है॥ 70 ॥ अनुभाष्य—श्रीनारद वसुदेवको भागवतधर्मके विषयमें बतलाते हुए विदेहराज निमि और नवयोगेन्द्रके संवादका वर्णन कर रहे हैं। निमिके द्वारा तीन प्रकारके भक्तों अथवा भागवतोंके लक्षण और आचरणके सम्बन्धमें जिज्ञासा करनेपर उसके उत्तरमें नवयोगेन्द्रोंमेंसे एक हवि-ऋषिने कहा— यः ईश्वरे (भगवति कृष्णे) प्रेमाणं करोति, तदधीनेषु (उत्तम-मध्यम-कनिष्ठाधिकारिषु भगवद्भक्तेषु) मैत्रीं (शुश्रूषाप्रणति- समादरादि-यथोचितसख्यतां) करोति, बालिशेषु (भक्त्यनभिज्ञेषु) कृपां करोति, द्विषत्सु (भगवद्भागवतविरोधिजनेषु) उपेक्षां करोति (वीतरागं प्रदर्शयति, तेषां सङ्गं सर्वथा वर्जयतीत्यर्थः), सः (भागवतः) 'मध्यमः' (मध्यमसंज्ञकः एवम्भूतस्य भेदस्य दर्शनात्)। श्लोक-भावानुवाद—जो भगवान् श्रीकृष्णसे प्रेम करता है, भगवद्भक्तोंसे यथोचित मैत्री अर्थात् उत्तम भक्तोंकी सेवा और उनके प्रति प्रणति, मध्यम और कनिष्ठ भक्तोंका समादर और प्रीति करता है, भक्तिसे अनभिज्ञ लोगोंपर कृपा करता है, भगवान् और भागवतोंके विरोधी लोगोंकी उपेक्षा करता है अर्थात् उनके प्रति कोई राग न दिखलाकर उनके सङ्गका सर्वथा वर्जन करता है, वह भक्त 'मध्यम' स्तरका कहलाता है (वह इस प्रकार भेद-दर्शन करता है)।॥ 70 ॥ कनिष्ठाधिकारीके लक्षण :— अर्चायामेव हरये पूजां यः श्रद्धयेहते। न तद्भक्तेषु चान्येषु स भक्तः प्राकृतः स्मृतः ॥ 71 ॥ । 345