श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1790, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 22/63-68 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला रूपसे उपासना करनेकी आवश्यकता नहीं है—यह अर्थ है॥ 63 ॥ भक्तिके अधिकारी (तीन प्रकारके भक्तिके अधिकारियोंका) निर्णय और भेद :- श्रद्धावान् जन हय भक्ति-अधिकारी। 'उत्तम', 'मध्यम', 'कनिष्ठ'—श्रद्धा-अनुसारी॥ 64 ॥ अनुवाद—श्रद्धावान् व्यक्ति ही भक्तिके अधिकारी हैं। श्रद्धाके अनुसार ही वे 'उत्तम', 'मध्यम' और 'कनिष्ठ' अधिकारके भक्त होते हैं॥ 64 ॥ अनुभाष्य—श्रद्धावान् अर्थात् जो श्रीकृष्णको केवल वास्तव-वस्तु, नित्यसत्य और परमार्थ जानता है। जिसका श्रीकृष्णमें ऐसा सुदृढ़-निश्चयात्मक विश्वास है, वही भक्तिका अधिकारी होता है। भक्तके विश्वासकी निश्चयात्मक दृढ़ताके तारतम्यसे ही उत्तम, मध्यम और कनिष्ठ अधिकारका निर्णय होता है॥ 64 ॥ (1) उत्तम-अधिकारीकी संज्ञा :- शास्त्रयुक्त्ये सुनिपुण, दृढ़श्रद्धा याँर। 'उत्तम-अधिकारी' सेइ तारय संसार॥ 65 ॥ अनुवाद—जो भक्त शास्त्रों और शास्त्रोंकी युक्तियोंमें अत्यन्त निपुण है और जिसकी श्रीकृष्णमें दृढ़ श्रद्धा है, वह 'उत्तम-अधिकारी' है। वह सारे संसारका उद्धार कर सकता है॥ 65 ॥ अनुभाष्य—(भःरःसिः पूःविः द्वितीय लहरी वैधीभक्तिके वर्णनमें श्लोक 11)में श्रीरूपगोस्वामिपादने लिखा है— “शास्त्रे युक्तौ च निपुणः सर्वथा दृढ़ निश्चयः। प्रौढ़ाश्रद्धोऽधिकारी यः स भक्तावुत्तमो मतः॥” अर्थात् “भक्ति-शास्त्रोंमें दक्ष और उसके अतिरिक्त अन्यान्य मार्गोंके खण्डनमें दृढ़ युक्तिमें प्रवीण,—ऐसे प्रौढ़ श्रद्धावाले व्यक्ति ही भक्तोंमें 'उत्तम-अधिकारी' हैं॥”65॥ (2) मध्यम-अधिकारीकी संज्ञा :- शास्त्र-युक्ति नाहि जाने दृढ़, श्रद्धावान्। 'मध्यम-अधिकारी' सेइ महाभाग्यवान्॥ 66 ॥ अनुवाद—जो शास्त्रोंकी युक्तियोंको भली-भाँति नहीं जानता, किन्तु दृढ़ श्रद्धावान् है, वह महाभाग्यवान् व्यक्ति 'मध्यम-अधिकारी' है॥ 66 ॥ (3) कनिष्ठ-अधिकारीकी संज्ञा :- याहार कोमल श्रद्धा, से 'कनिष्ठ' जन। क्रमे क्रमे तैं हो भक्त हइबे 'उत्तम'॥ 67 ॥ अनुवाद—जिसकी श्रद्धा कोमल और आसानीसे बदलनेवाली है, वह कनिष्ठ-अधिकारी है। परन्तु भक्तिकी प्रक्रियाका पालन करनेपर क्रमशः वह भी 'उत्तम' भक्तके स्तरपर पहुँच जाता है॥ 67 ॥ भक्तके तारतम्यका कथन :- रति-प्रेम-तारतम्ये भक्त—तर-तम। एकादश स्कन्धे तार करियाछे लक्षण॥ 68 ॥ अनुवाद—रति और प्रेमके तारतम्यसे भक्तोंमें भी तारतम्य होता है। श्रीमद्भागवतके ग्यारहवें स्कन्धमें इसके लक्षण बतलाये गये हैं॥ 68 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पहले कहे गये मतानुसार जिनके हृदयमें श्रद्धा हुई है, वे ही भक्तिके अधिकारी हैं। वे श्रद्धावान् व्यक्ति-'उत्तम', 'मध्यम' और 'कनिष्ठ'के भेदसे तीन प्रकारके हैं। जो शास्त्र और युक्तिमें दक्ष होकर दृढ़ श्रद्धावान् हुए हैं, वे—'उत्तमाधिकारी' हैं। जो दृढ़ शास्त्रयुक्ति नहीं जानते, किन्तु श्रद्धावान् हैं, वे—'मध्यमाधिकारी' हैं। जिनकी श्रद्धा दृढ़ नहीं हुई, वे 'कनिष्ठाधिकारी' हैं। इन तीन प्रकारके विभागके द्वारा भक्तोंका विभाग हुआ है, केवल ऐसा नहीं है, शुद्धभक्तिके अधिकारी व्यक्तिका भी विभाग हुआ है। 'कनिष्ठ-श्रद्धावान्' केवल 'श्रीकृष्ण भक्ति करना अच्छा है'—इतना ही विश्वास करता है, किन्तु शुद्धभक्ति क्या है और भक्तिके तटस्थ लक्षणोंके द्वारा सिद्ध प्रक्रिया क्या है, वह उसे नहीं जानता। इसलिये कोमल श्रद्धावालोंके हृदयमें ज्ञान-कर्मका मिश्रित भाव पाया जाता है। उसके दूर होनेपर साधक 'मध्यमाधिकारी' बन जाता है। पुनः वह मध्यमाधिकारवाली श्रद्धा शास्त्रयुक्तिके 344 ।