भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1789

बाइसवाँ अध्याय 22/60-63 ] सभी धर्मोंको छोड़कर श्रीकृष्ण भजनकी चेष्टा :- एइ आज्ञाबले भक्तरे 'श्रद्धा' यदि हय। सर्वकर्म त्याग करि' से कृष्णेरे भजय ॥ 60 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके इस उपदेशके बलमें यदि किसी भक्तकी 'श्रद्धा' होती है, तब वह भक्त सब प्रकारके कर्मोंका त्याग करके श्रीकृष्णका ही भजन करता है॥ 60॥ श्रीमद्भागवत (11/20/9) :— तावत् कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता। मत्कथाश्रवणादौ वा श्रद्धा यावन्न जायते ॥ 61 ॥ अनुवाद—जब तक कर्ममार्गमें निर्वेद (वैराग्य) उदित न हो, अथवा मेरी कथा-श्रवणादिमें श्रद्धा उत्पन्न न हो, तब तक नित्य-नैमित्तिकादि कर्म करने चाहिये ॥ 61 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 9/266 संख्या देखें ॥ 61 ॥ श्रद्धाकी संज्ञा :- 'श्रद्धा'-शब्दे विश्वास कहे सुदृढ़ निश्चय। कृष्णे भक्ति कैले सर्वकर्म कृत हय ॥ 62 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 62 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'श्रीकृष्ण भक्ति करनेसे सब कार्य करना हो जाता है'—ऐसे सुदृढ़ निश्चयात्मक विश्वासको भक्तिका अधिकार प्रदान करनेवाली 'श्रद्धा' कहते हैं ॥ 62 ॥ अनुभाष्य—सुदृढ़ निश्चयात्मक विश्वासको 'श्रद्धा' कहते हैं; श्रीकृष्णकी सेवा करनेसे संसारके समस्त पितरों-प्रणियों-देवोंके ऋणको चुकानेके लिये कुछ भी करनेकी आवश्यकता नहीं रहती। बद्धजीव भोगोंकी सामग्री जुटानेके लिये कर्म करता है। भगवद्भक्तिके उदित होनेपर कर्मफलके लिये चेष्टा नहीं करनी पड़ती। कर्मफलकी सबसे उत्तम प्राप्य वस्तु 'वैराग्य' सदैव भक्तोंमें आनुषङ्गिक रूपमें रहता है॥ 62॥ श्रीकृष्णके पूजनसे ही सभीकी पूजा :— श्रीमद्भागवत (4/31/14)— यथा तरोर्मूलनिषेचनेन तृप्यन्ति तत्स्कन्धभुजोपशाखाः। प्राणोपहाराच्च यथेन्द्रियाणां तथैव सर्वार्हणमच्युतेज्या ॥ 63 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 63 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिस प्रकार वृक्षकी जड़में जल सींचनेसे, उस वृक्षके स्कन्ध, भुजाएँ, उपशाखाएँ आदि सभी तृप्त हो जाते हैं अथवा प्राणोंकी तृप्तिसे ही जिस प्रकार सभी इन्द्रियोंकी तृप्ति होती है, उसी प्रकार श्रीकृष्णकी पूजा करनेसे ही समस्त देवताओंकी पूजा हो जाती है ॥ 63 ॥ अनुभाष्य—प्रजापति दक्षके पुत्र प्रचेतागणोंके द्वारा अपने गुरुदेव देवर्षि श्रीनारदके दर्शन करके उनसे पुनः आत्मतत्त्व अर्थात् श्रीहरिकी कथाका कीर्तन करनेका अनुरोध करनेपर श्रीनारद सर्वभूतात्मा श्रीहरिके माहात्म्यका वर्णन कर रहे हैं— यथा तरोः (वृक्षस्य) मूलनिषेचनेन (पाददेशे जलप्रक्षेपेण) तत्स्कन्धभुजोपशाखाः (स्कन्धादिपत्रपुष्पाद्यन्तानि सर्वाणि वृक्षाङ्गानि) तृप्यन्ति [न तु मूलसेकं बिना ताः स्वस्वनिषेचनेन], यथा प्राणोपहारात् (प्राणस्य उपहारः भोजनं तस्मात्) इन्द्रियाणां च तृप्तिः [न तु तत्तदिन्द्रियेषु पृथक् पृथगन्नलेपनेन], तथा अच्युतेज्या (भगवतः विष्णोः अर्चनम्) एव सर्वार्हणं (सकल-देवताराधनं, न हि पृथगुपासनायामावश्यकतास्तीत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद—जिस प्रकार वृक्षकी जड़में जल सींचनेसे, उस वृक्षके स्कन्ध, भुजाएँ, उपशाखाएँ आदि सभी तृप्त हो जाते हैं [न कि जड़को सींचनेके बदले स्कन्ध, शाखाओं आदिको सींचनेपर] अथवा प्राणोंकी तृप्तिसे ही जिस प्रकार सभी इन्द्रियोंकी तृप्ति होती है [न कि इन्द्रियोंको पृथक् पृथक् रूपसे आहार देनेपर], उसी प्रकार श्रीकृष्णकी पूजा करनेसे ही समस्त देवताओंकी पूजा हो जाती है अर्थात् उनकी पृथक् । 343