भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1788

[ 22/55-59 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

साधुसङ्गकी महिमा :- श्रीमद्भागवत (1/18/13)में- तुलयाम लवेनापि न स्वर्गं नापुनर्भवम्। भगवत्सङ्गिसङ्गस्य मर्त्यानां किमुताशिषः॥ 55॥

अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 55॥

अमृतप्रवाह भाष्य-भगवान्के सङ्गीके सङ्गके द्वारा जीवका जो असीम मङ्गल होता है, उसके साथ स्वर्ग अथवा मोक्षकी बिल्कुल भी तुलना नहीं की जा सकती (अति तुच्छ धन-वैभवादिके सम्बन्धमें तो क्या कहना?)॥ 55॥

अनुभाष्य-शौनकादि ऋषि यज्ञानुष्ठान आदि तुच्छ कर्मकाण्डमें स्वयंके व्यर्थके परिश्रमका उल्लेख करके महाभागवत हरिकथा-कीर्तनकारी श्रीसूतके सङ्गके माहात्म्यका वर्णन कर रहे हैं-

(हे सूत,) भगवत्सङ्गिसङ्गस्य (भगवत्सङ्गी हरिजनः तस्य सङ्गस्य) लवेन (अत्यल्पक्षणेन) अपि स्वर्गम् (आदर्शसुख-भोगस्थानं) न तुलयाम (तुल्यं न पश्याम), अपुनर्भवं (मोक्षं वा) न [तुलयाम]; मर्त्यानां (प्राकृतदेवविप्रराजन्वादीनाम्) आशिषः (अतितुच्छाः वित्त-वैभवाद्याः) किमुत (किं वक्तव्यं, नैव तुलयामेत्यर्थः)।

श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 55॥

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥ 58॥

अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 57-58॥

अमृतप्रवाह भाष्य-(हे अर्जुन,) तुम मेरे अत्यन्त आत्मीय (प्रिय) हो, इसलिये तुम्हें तुम्हारे हितके लिये सर्वगुह्यतम (सबसे गोपनीय) सर्वश्रेष्ठ उपदेश दे रहा हूँ,-तुम अपना मन पूर्णरूपसे मुझमें लगा दो, मेरे भक्त बनो और मेरा ही अर्चन करो और मेरे शरणागत होवो, तब तुम मुझे निश्चय ही प्राप्त करोगे। तुम मेरे अत्यन्त प्रिय हो, इसलिये मैंने अपनी इस प्रतिज्ञा-वाक्यको तुमसे कहा है॥ 57-58॥

अनुभाष्य- हे अर्जुन, मे (मम) सर्वगुह्यतमम् (अत्यन्तगोप्यं) परमं वचः (वाक्यं) भूयः (पुनः) शृणु; (यतः) मे (मम) दृढम् (अत्यन्तम्) इष्टः (प्रियतमः) असि, ततः (तस्माद्धेतोः) ते (तव) हितं (मङ्गलं) वक्ष्यामि (कथयामि)-[त्वं] मन्मना (मच्चित्तः) मद्भक्तः (मद्भजनशीलः) मद्याजी (मदर्चनशीलः) भव, माम् (अन्यप्राकृतदेवादीन् परित्यज्य अप्राकृतं मां कृष्णरूपम् एव) नमस्कुरु [एवं वर्तमानस्त्वं मत्प्रसादात् शुद्धभक्त्या] माम् एव एष्यसि (प्राप्स्यसि) [अत्र च संशयं मा कार्षीः]; त्वं हि मे प्रियः असि, (अतः) सत्यं (यथा भवति एवं) ते (तुभ्यम्) अहं प्रतिजाने (प्रतिज्ञां करोमि)।

श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 57-58॥

गीताकी शिक्षा :- कृष्ण कृपालु अर्जुनेरे लक्ष्य करिया। जगतेरे राखियाछेन उपदेश दिया॥ 56॥

अनुवाद-श्रीकृष्ण इतने कृपालु हैं कि उन्होंने अर्जुनको लक्ष्य करके अपने उपदेशोंको प्रदान करके जगत्की रक्षा की है॥ 56॥

पहले कर्मज्ञानयोगादिको अभिधेय कहनेपर भी, सबसे अन्तिम आज्ञा श्रीकृष्णभक्ति ही एकमात्र अभिधेय और विधि :- पूर्व आज्ञा,-वेद-धर्म, कर्म, योग, ज्ञान। सब साधि' अवशेषे एइ आज्ञा-बलवान्॥ 59॥

श्रीकृष्णप्राप्तिके उद्देश्यसे ही सभी क्रियाएँ करना कर्त्तव्य :- श्रीमद्भगवद्गीता (18/64-65)- सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः। इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्॥ 57॥

अनुवाद-श्रीकृष्णने भगवद्-गीतामें पहले वेद-धर्म, कर्म, योग और ज्ञान आदिके भली-भाँति पालन करनेका उपदेश प्रदान किया है, किन्तु उनके द्वारा दिया गया उपरोक्त अन्तिम उपदेश सबसे बलवान है और अन्य सभी उपदेशोंसे ऊपर है॥ 59॥

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