भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 1787

बाइसवाँ अध्याय 22/52–54 ]

रजमें अभिषिक्त हुए बिना भगवान्की भक्ति तपस्याके द्वारा, वैदिक अर्चनादिके द्वारा, संन्यास-पालनके द्वारा, गृहस्थ-धर्मके पालनके द्वारा, वेदपाठके द्वारा अथवा जल-अग्नि-सूर्य [आदिकी उपासना] के द्वारा कभी भी प्राप्त नहीं होती ॥ 52 ॥ अनुभाष्य—सिन्धुसौवीरके राजा रहूगणके द्वारा ब्राह्मणकुलमें जन्में अवधूत भरतके मुखसे तत्त्वज्ञानका श्रवण करते समय उन्हें प्रणाम करके दुर्बोध अध्यात्म- योगकी सुबोधरूपमें व्याख्या करनेकी प्रार्थना करनेपर, ब्राह्मणवेषी महाभागवत परमहंस भरत रहूगणको पहले अविद्या और उसके विनाशक शुद्धज्ञानमयविग्रह भगवान् वासुदेवकी कथा सुनाकर बादमें भगवद्-प्राप्तिके उपायका वर्णन कर रहे हैं— हे रहूगण, महत्पादरजोऽभिषेकं (शुद्धकृष्णभक्तपदरेणुना अभिषेकनं) बिना (ऋते) एतत् (अप्राकृतं वासुदेवात्मक-भगवत्तत्त्वं) तपसा (वानप्रस्थधर्मेण) न, इज्यया (वैदिककर्मणा देवार्चनेनेत्यर्थः) च न, निर्वपणात् (योषित्सङ्गराहित्यात् संन्यासात् इत्यर्थः) न, गृहात् (योषित्सङ्गमूलकगृहमेध-यज्ञ-चालनात्) वा न, छन्दसा (वेदाभ्यासेन) न, जलाग्निसूर्यैः (तत्तदुपासितैः) न याति (न प्राप्नोति) एव। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 52 ॥

महत् अथवा शुद्ध वैष्णवकी कृपासे ही अनर्थनाश और उसके फलस्वरूप विष्णुपदकी प्राप्ति :— श्रीमद्भागवत (7/5/32)में— नैषां मतिस्तावदुरुक्रमाङ्घ्रिं स्पृशत्यनर्थापगमो यदर्थः। महीयसां पादरजोऽभिषेकं निष्किञ्चनानां न वृणीत यावत् ॥ 53 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 53 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जब तक मनुष्योंकी मति निष्किञ्चन भगवद्भक्तोंकी पदधूलिके द्वारा अभिषिक्त नहीं होती, तब तक वह अनर्थनाशक श्रीकृष्णचरणकमलोंका स्पर्श नहीं कर पाती ॥ 53 ॥

अनुभाष्य—देवर्षि नारद धर्मराज युधिष्ठिरको प्रह्लादके उपाख्यानका वर्णन कर रहे हैं। हिरण्यकशिपुके प्रश्नके उत्तरमें महाभागवत प्रह्लादने विष्णुकी नवधा भक्तिको ही एकमात्र सर्वश्रेष्ठ पाण्डित्य और शिक्षारूपमें वर्णन किया। इस बातसे क्रु षण्ड-अमर्ककी तीव्र भर्त्सना की। तब षण्ड-अमर्कने प्रह्लादकी स्वाभाविकी मतिको ही उनकी विष्णुभक्तिका कारण बतलाकर अपने ऊपर लगाये दोषका निवारण किया। तब हिरण्यकशिपुने प्रह्लादसे उनकी ऐसी वैष्णवी मतिका कारण बतलानेके लिये कहा। किन्तु प्रह्लाद उसके सम्बन्धमें कुछ भी नहीं कहकर विष्णुभक्ति- विरोधी गृहव्रती लोगोंके बन्धन और मोक्षका उपाय बतला रहे हैं— निष्किञ्चनानां (निरस्तसकलविषयाभिमानानां) महीयसां (महत्तमानां वैष्णवानां) पादरजोऽभिषेकं (पदरजसा अभिषेकनं लेपनं) यावत् न वृणीत (कुर्वीत), तावत् [श्रुतिवाक्यतो ज्ञातोऽपि] एषां (गृहव्रतानां) मतिः (प्रवृत्तिः) उरुक्रमाङ्घ्रिम् (उरुक्रमस्य पदं) न स्पृशति (न प्राप्नोति असम्भावनादिभिर्विहन्यते इत्यर्थः); अनर्थापगमः (अनर्थस्य असदवग्रहस्य, तत्पदस्पर्शविघ्नस्य संसारस्येत्यर्थः अपगमः विनाशः) यदर्थः (यस्याः अङ्घ्रिस्पर्शिन्‍याः मतेः अर्थं फलं, महदनुग्रहाभावान्न तत्त्वनिश्चयः नापि मोक्षस्तेषामित्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 53 ॥

साधुके आधे क्षणके सङ्गके फलसे ही जीवकी चिद्-वृत्ति श्रीकृष्ण-सेवाका प्रबोध और साध्यकी प्राप्ति :— 'साधुसङ्ग' 'साधुसङ्ग'—सर्वशास्त्रे कय। लवमात्र साधुसङ्गे सर्वसिद्धि हय ॥ 54 ॥ अनुवाद—इसलिये सभी शास्त्र 'साधुसङ्ग', 'साधुसङ्ग' करनेके लिये कहते हैं, क्योंकि लवमात्रके (पलक झपकनेके समयके) साधुसङ्गसे सर्वसिद्धिकी प्राप्ति होती है ॥ 54 ॥ अनुभाष्य—'लव'—निमेषकाल, सवा ग्यारह 'लव'का एक सैकेण्ड होता है ॥ 54 ॥

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