श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 22/48-52 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला कवि (विद्वान) भी आपकी स्मृतिजनित आनन्दके द्वारा आपके प्रति कृतज्ञता स्वीकार करनेमें समर्थ नहीं हो पाते, क्योंकि आप अपार कृपावशतः देहधारी जीवके समस्त अशुभोंके नाश और स्वगति प्रकाश करनेके लिये बाहरसे आचार्यरूपमें एवं भीतरसे अन्तर्यामीरूपमें अवस्थित हैं॥48॥ अनुभाष्य-आदिलीला 1/48 संख्या देखें॥48॥ दीक्षाके बाद सम्बन्धज्ञान और अभिधेयके फलसे अनर्थनिवृत्ति, रुचि, आसक्ति और प्राप्य-प्रयोजनकी प्राप्ति :- साधुसङ्गे कृष्णभक्त्ये श्रद्धा यदि हय। भक्तिफल 'प्रेम' हय, संसार याय क्षय॥49॥ अनुवाद-साधुसङ्गके प्रभावसे जब श्रीकृष्णभक्तिमें श्रद्धा होती है, तभी भक्तिके फल 'प्रेम'की प्राप्ति होती है और संसार क्षय हो जाता है॥49॥ श्रद्धावान् भक्तियोगी अतिभोगी अथवा अतित्यागी नहीं :- श्रीमद्भागवत (11/20/8)- यदृच्छया मत्कथादौ जातश्रद्धस्तु यः पुमान्। न निर्विण्णो नातिसक्तो भक्तियोगोऽस्य सिद्धिदः॥50॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥50॥ अमृतप्रवाह भाष्य-किसी भाग्यके उदित होनेपर जो पुरुष मेरी कथाके प्रति श्रद्धावान् होता है और वह अत्यन्त वैरागी अथवा फल्गुवैरागी भी नहीं होता एवं संसारमें अति आसक्त भी नहीं होता, उसीको ही भक्तियोग प्रेमभक्तिरूपी सिद्धि प्रदान किया करता है॥50॥ अनुभाष्य-श्रीउद्धवको तीन प्रकारके योगोंकी बात बतलाते हुए भगवान् श्रीकृष्ण भक्तियोगके अधिकारीका निर्णय कर रहे हैं- यदृच्छया (केनापि भाग्योदयेन) यः पुमान् मत्कथादौ (भगवत्कथा-श्रवण-कीर्तनादौ) तु जातश्रद्धः, [अथच] निर्विण्णः (अतिविरक्तः फल्गुवैराग्याश्रितः) न, अतिसक्तः (संसारे अत्यभिनिविष्टः) च न, अस्य (श्रद्धालोर्जनस्य एव) भक्तियोगः सिद्धिदः (अभीष्टप्रदः भवति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥50॥ गुरु और वैष्णव अथवा साधुकी कृपासे ही अनर्थनिवृत्ति और शुद्धभक्तिकी प्राप्ति :- महत्-कृपा बिना कोन कर्मे 'भक्ति' नय। कृष्णभक्ति दूरे रहु, संसार नहे क्षय॥51॥ अनुवाद-महत् अर्थात् शुद्ध श्रीकृष्णभक्तकी कृपाके बिना किसी भी प्रकारका कोई भी कार्य करनेपर किसीमें 'भक्ति' उत्पन्न नहीं हो सकती, श्रीकृष्ण भक्तिकी बातको तो छोड़ो, किसीके संसारका भी क्षय नहीं हो सकता॥51॥ अनुभाष्य-कर्मकाण्डीय किसी प्राकृत सुकृतिके द्वारा अप्राकृत श्रीकृष्णभक्ति नहीं होती। एकमात्र श्रीकृष्णभक्तकी कृपाके अतिरिक्त अप्राकृत श्रीकृष्णभक्तिके उदित होनेकी सम्भावना नहीं है। श्रीकृष्णभक्तिकी बात तो दूर है, प्राकृतबुद्धिरूपी संसार तक भी नष्ट नहीं होता। श्रीकृष्णभक्तके अतिरिक्त अन्य किसी भी जीवमें महानताकी सम्भावना नहीं होती। श्रीकृष्णभक्त ही एकमात्र अप्राकृत हैं। प्राकृत-दर्शनसे कोई-कोई उन्हें 'प्राकृत' समझते हैं। परन्तु वास्तवमें समस्त प्राकृत वस्तुओंको परित्याग करनेवाले श्रीकृष्णभक्तको ही अतुलनीय श्रेष्ठ और जीवोंके एकमात्र प्रार्थनीय हितैषी जानना चाहिये। उनकी कृपाका भिक्षु बननेसे ही जीवके प्राकृत भोग दूर हो जाते हैं और अप्राकृत श्रीकृष्ण सेवाधिकार प्राप्त होता है॥51॥ शुद्धभक्तके आनुगत्यके बिना श्रीकृष्णप्राप्ति सुदुर्लभ :- श्रीमद्भागवत (5/12/12)में- रहूगणैतत् तपसा न याति न चेज्यया निर्वपणाद् गृहाद्वा। न च्छन्दसा नैव जलाग्निसूर्यै- र्बिना महत्पादरजोऽभिषेकम्॥52॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥52॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे रहूगण, महाजनोंके चरणोंकी 340 ।