श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1785, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबाइसवाँ अध्याय 22/45-48 ] भक्ति उन्मुखी सुकृतिके फलसे बद्धजीवको सिद्धिकी प्राप्ति :- कोन भाग्ये कारो संसार क्षयोन्मुख हय। साधुसङ्गे तरे, कृष्णे रति उपजाय ॥ 45 ॥ अनुवाद—किसी सौभाग्यसे जब जीवका संसारसे तरनेका समय आता है, तब उसका संसार क्षय होने लगता है और उसे साधुसङ्ग प्राप्त होता है। साधुसङ्गसे उसकी श्रीकृष्णमें रति उत्पन्न हो जाती है॥ 45 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यहाँपर 'भाग्य'-शब्दका अर्थ क्या केवल घटनामात्र है अथवा और कुछ है? भक्तिशास्त्र 'सुकृति'को ही 'भाग्य' कहते हैं। सुकृति तीन प्रकारकी है—भक्ति-उन्मुखी सुकृति, भोग-उन्मुखी सुकृति और मोक्ष-उन्मुखी सुकृति। जो सब कार्य संसारमें शुद्धभक्तिको उत्पन्न करनेवालेके रूपमें स्थिर किये गये हैं, वे सब कार्य भक्ति-उन्मुखी सुकृतिको उत्पन्न करते हैं। जिन सब कार्योंका फल—विषयभोग है, वे सब कार्य ही भोग-उन्मुखी सुकृति प्रदान करनेवाले हैं। जिन सब कार्योंका फल मोक्ष है, वे सब कार्य ही मोक्ष-उन्मुखी सुकृति उत्पन्न करनेवाले हैं। संसारके क्षय होनेपर स्वरूपधर्म श्रीकृष्णभक्तिका उद्घाटन करनेवाली सुकृति जब पुष्ट होकर फलोन्मुखी होती है, तभी भक्त साधुसङ्गमें संसारसे उद्धार प्राप्त करता है और श्रीकृष्णमें उसकी रति उत्पन्न होती है॥ 45 ॥ सुकृतिके फलसे साधुसङ्ग, उसके फलसे भजनमें प्रवृत्ति और अनर्थनिवृत्तिके क्रमसे साधनकी सिद्धि अथवा साध्य श्रीकृष्णप्रेमकी प्राप्ति :- श्रीमद्भागवत (10/51/53)में— भवापवर्गो भ्रवतो यदा भवे- ज्जनस्य तर्ह्यच्युत सत्समागमः। सत्सङ्गमो यर्हि तदैव सद्गतौ परावरेशे त्वयि जायते रतिः॥ 46 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 46 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे अच्युत, संसारमें भ्रमण करते-करते जब भवसागरसे पार होनेका फल उपस्थित होता है, तब यदि जीवको सत्सङ्गकी प्राप्ति होती है, तभी उसकी सद्गति और परमेश्वर-स्वरूप आपमें रति उत्पन्न होती है॥ 46 ॥ अनुभाष्य—कालयवन-दैत्यके पदके आघातसे निद्रासे उठे मुचुकुन्दके दृष्टिपातसे उनको देवताओंसे पूर्वमें प्राप्त वरके प्रभावसे कालयवनके भस्म होनेपर श्रीकृष्ण मुचुकुन्दको वर देनेके लिये उद्यत हुए, तब मुचुकुन्द श्रीकृष्णका स्तव कर रहे हैं— हे अच्युत, भ्रमतः (संसरतः) जनस्य यदा (भगवदनु- कम्पया) भवापवर्गः (भवस्य संसारस्य अपवर्गः अन्तः नाशः) भवेत्, (प्रातःकालः स्यादित्यर्थः), [तदा] सत्समागमः (साधुसङ्गः) भवेत्, यर्हि (यदा) सत्सङ्गमः हि भवेत्, [तदा] एव सद्गतौ (सर्वोत्तम-जनप्राप्ये नित्यपरमपदे) परावरेशे (भगवति कृष्णे) त्वयि रतिः (भक्तिः) जायते [ततो संसारात् मुच्यते इति भावः]॥ श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 46 ॥ श्रीकृष्णकी कृपासे ही गुरुकी कृपाकी प्राप्ति :- कृष्ण यदि कृपा करे कोन भाग्यवाने। गुरु-अन्तर्यामि-रूपे शिखाय आपने॥ 47 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 47 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पूर्वोक्त भक्ति-उन्मुखी-सुकृतिशाली व्यक्तिके निकट यदि कोई महात्मा पुरुष उपस्थित भी न हों, तथापि श्रीकृष्ण अन्तर्यामी-गुरुके रूपमें उसे शुद्धभक्तिकी शिक्षा प्रदान करते हैं॥ 47 ॥ श्रीमद्भागवत (11/29/6) में :- नैवोपयन्त्यपचितिं कवयस्तवेश ब्रह्मायुषापि कृतमृद्धमुदः स्मरन्तः। योऽन्तर्बहिस्तनुभृतामशुभं विधुन्व- न्नाचार्यचैत्यवपुषा स्वगतिं व्यनक्ति॥ 48 ॥ अनुवाद—हे ईश (भगवन्) ! ब्रह्माके समान आयु-प्राप्त । 339