भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1795, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1795

बाइसवाँ अध्याय 22/80-84 ] भी उक्त कल्पलताकी क्रमशः ऊपरवाली शाखाओंमें और-भी सब उत्तरोत्तर आस्वादन और वैशिष्ट्यसे युक्त 'स्नेह', 'मान', 'प्रणय', 'राग', 'अनुराग', 'महाभाव'-नामक विराजमान फलोंको प्राप्त नहीं करते। इसका कारण यह है उनके आस्वादनजनित उष्णता, शीतलता और सम्मर्दनको सहनेकी योग्यता साधककी देहमें नहीं है। बादमें स्वरूपानुबन्धी सिद्धदेह प्राप्त करके नित्यसिद्ध रागात्मिक भगवत्पार्षद गुरुवर्गोंके सङ्गके द्वारा ही साधनसिद्ध भक्तोंमें क्रमशः स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग, भाव और महाभाव सभी उदित होते हैं॥80॥ सुकृति-फलसे साधुसङ्ग, उसके फलस्वरूप श्रीकृष्णभक्ति :- श्रीमद्भागवत (10/51/53)में- भवापवर्गो भ्रमते यदा भवे- ज्जनस्य तर्ह्यच्युत सत्समागमः। सत्सङ्गमो यर्हि तदैव सद्गतौ परावरेशे त्वयि जायते रतिः॥81॥ अनुवाद-हे अच्युत, संसारमें भ्रमण करते-करते जब भवसागरसे पार होनेका फल उपस्थित होता है, तब यदि जीवको सत्सङ्गकी प्राप्ति होती है, तभी उसकी सद्गति और परमेश्वर-स्वरूप आपमें रति उत्पन्न होती है॥81॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 22/46 संख्या देखें॥81॥ सत्सङ्ग ही परमधन :- श्रीमद्भागवत (11/2/30)में- अत आत्यन्तिकं क्षेमं पृच्छामो भवतोऽनघाः। संसारेऽस्मिन् क्षणार्द्धोऽपि सत्सङ्गः सेवधिर्नृणाम्॥82॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥82॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे निष्पाप ऋषियों, मैं आपसे जीवोंके आत्यन्तिक (सर्वोत्तम) मङ्गलके विषयमें जिज्ञासा कर रहा हूँ, क्योंकि संसारमें आधे क्षणके परिमाणका साधुसङ्ग भी जीवोंके लिये अमूल्य रत्ननिधि है॥82॥ अनुभाष्य-श्रीवसुदेवको श्रीनारद भागवतधर्मके विषयमें सुनाते हुए विदेहराज निमि और नवयोगेन्द्रके संवादका वर्णन कर रहे हैं। महाराज निमि यज्ञ कर रहे हैं, ऐसे समयमें महाभागवत नवयोगेन्द्र दैववश वहाँ उपस्थित हुए, उन्हें देख निमि उनकी यथाविधि पूजा करके कह रहे हैं- (हे) अनघाः, (निष्पापाः, निरवद्याः ऋषयः), अतः (भगवद्-भागवत-दर्शनदुर्लभत्वात्) भवतः (युष्मान्) आत्यन्तिकं (निरतिशयं) क्षेमं (कल्याणं) पृच्छामः ; [यतः] अस्मिन् संसारे (भवे) क्षणार्द्धः (अत्यल्पकालम्) अपि [स्थायी] सत्सङ्गः नृणां (पुंसां) सेवधिः (सर्वफलप्रदः निधिः-निधिलाभे यथानन्दो भवति, तथा परमानन्दः इत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥82॥ श्रीमद्भागवत (3/25/25)- सतां प्रसङ्गान्मम वीर्यसंविदो भवन्ति हृत्कर्णरसायनाः कथाः। तज्जोषणादाश्वपवर्गवर्त्मनि श्रद्धा रतिर्भक्तिरनुक्रमिष्यति ॥83॥ अनुवाद-साधुसङ्गमें हृदय और कानोंको रसपूर्ण लगनेवाली मेरी बलवती कथाओंकी आलोचना होती है। उन-उन कथाओंको श्रवण करते-करते अतिशीघ्र अपवर्ग पथस्वरूप मुझमें पहले श्रद्धा, तत्पश्चात् रति और अन्तमें प्रेमभक्ति उदित होती है॥83॥ अनुभाष्य-आदिलीला 1/60 संख्या देखें॥83॥ वैष्णवका आचार और अवैष्णवका निर्देश :- असत्सङ्गत्‍याग,–एइ वैष्णव-आचार। 'स्त्री-सङ्गी'–एक असाधु, 'कृष्णअभक्त' आर॥84॥ अनुवाद-वैष्णवोंको सदा ही असत्सङ्गका त्याग करना चाहिये, यही वैष्णव-आचार है। असत्सङ्ग दो प्रकारका है-'स्त्री-सङ्गी' अर्थात् स्त्रीके प्रति आसक्त व्यक्ति-एक प्रकारका असाधु है और 'श्रीकृष्ण-अभक्त' व्यक्ति-दूसरे प्रकारका असाधु है॥84॥ । 349

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला) · पृष्ठ 1795, कुल 2549 में से · BharatKosha