भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1796

[ 22/84 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अमृतप्रवाह भाष्य—साधुसङ्ग जिस प्रकारसे ‘अन्वय’ अर्थात् प्रत्यक्षरूपमें वैष्णव-आचार है, असत्-सङ्गत्याग भी ‘व्यतिरेक’ अर्थात् अप्रत्यक्षरूपमें वैष्णव-आचार है। ‘असत्’—दो प्रकारका है; स्त्रीसङ्गी अर्थात् स्त्रीके प्रति आसक्त व्यक्ति एक प्रकारका ‘असाधु’ और ‘श्रीकृष्ण-अभक्त’ व्यक्ति—दूसरे प्रकारका ‘असाधु’ है। शुद्धभक्त इन दो प्रकारके असत्सङ्ग-त्यागमें विशेष रूपसे प्रयत्न करेंगे॥ 84॥ अनुभाष्य—अवैष्णवसङ्गका परित्याग ही वैष्णवोंका एकमात्र सदाचार है। ‘अवैष्णव’ कहनेसे ‘स्त्रीसङ्गी’ और ‘श्रीकृष्ण-अभक्त’,-इन दो श्रेणियोंके लोगोंको ही समझना चाहिये। स्त्रीसङ्ग दो प्रकारका है—‘वैधधर्मपर’ स्त्रीसङ्ग, जिसपर वर्णाश्रम-धर्म प्रतिष्ठित है और ‘अवैध’ स्त्रीसङ्ग, जो-अधर्मपर है और जिसके फलस्वरूप वर्णाश्रमधर्मके नियम भङ्ग होनेके कारण कर्मफल हेतु नरकादिकी प्राप्ति होती है। संसारमें पापपरायण व्यक्ति कदापि ‘वैष्णव’ नहीं कहे जा सकते। ‘धर्म’ ‘अर्थ’ और ‘काम’-नामक त्रिवर्ग स्त्रीसङ्गरूपी अवैष्णवाचारमें आबद्ध है। ‘मोक्ष’-नामक चतुर्थवर्ग स्त्रीसङ्गसे उत्पन्न नहीं होनेपर भी श्रीकृष्ण-विमुखताके कारण मोक्षाभिलाषी होनेपर स्त्रीसङ्गीकी अपेक्षा अधिक अवैष्णव और तुच्छ है। मायावादी और मायाविलासी,-दोनोंका सङ्ग ही वैष्णवता अथवा भक्तिनाशका कारण है। मायावादी मुक्तिकामी हैं अर्थात् वे मोक्षफलभोगकी कामनासे आत्माके उत्कर्षके लिये जड़भोगोंका त्याग करते हैं। और स्त्रीसङ्गी भोगी हैं। दोनों ही अपनी-अपनी जड़ेन्द्रियोंकी तुष्टिके लिये प्रयास करते हैं। वे श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्यान्य फलोंका अन्वेषण करनेवाले कपटतायुक्त होनेके कारण ‘श्रीकृष्णदास’ नहीं हैं॥ 84॥ अमृतानुकणा—“साधुसङ्गके प्रति कितना आदर उत्पन्न हुआ है, उसको जाननेका एकमात्र उपाय है, असत्सङ्ग-त्यागके प्रति हमारी कितना औदासीन्य (उदासीनता) या अनादर है। इसलिये असत्सङ्ग-त्यागको भी एक वैष्णव-सदाचारके मध्यमें गिना गया है, क्योंकि अवैष्णवोंका सम्पूर्णरूपसे अनादर या अनात्मबुद्धि नहीं आने तक वैष्णवमें आत्मीय-ज्ञान होनेकी आशा नहीं है। जिस परिमाणमें अवैष्णवमें परायेकी बुद्धि होगी, उसी परिमाणमें वैष्णवमें अपना माननेकी बुद्धि आयेगी। वास्तवमें यदि वैष्णवके साथ सम्बन्धयुक्त होनेकी इच्छा है, तब अवैष्णवके प्रति ममताको सबसे पहले त्याग करना होगा।”—“ततो दुःसङ्गमुत्सृज्य सत्सु सज्जेत बुद्धिमान्।” (भाः 11/26/26) ‘दुःसङ्ग’—स्त्रीसङ्ग और अभक्तसङ्ग, इन दो प्रकारका है। “इन्द्रियोंके द्वारा भोगकी जानेवाली वस्तुमात्र ही स्त्री है। उसके प्रति सम्पूर्णरूपसे प्रीति अथवा अभिनिवेश या ध्यान अथवा चित्तमें उसका सम्पूर्णरूपसे आधिपत्य करवा देनेका नाम ही ‘सङ्ग’ है। जीवकी इन्द्रियभोग्य सभी वस्तुएँ ही जड़ और अचेतन हैं। स्त्रीदेहधारी ही हो अथवा पुरुषदेहधारी ही हो, सभीकी देह जड़ है—इसलिये वह स्त्री ही है। स्त्रीदेहधारी अथवा पुरुषदेहधारी जीव जब भोगबुद्धि लेकर जड़देहमें अभिनिविष्ट होता है, तब वह स्त्रीसङ्गी होता है। अपनेमें श्रीकृष्ण-स्त्री (श्रीकृष्णशक्ति) या दृश्य (श्रीकृष्णके द्वारा दिखनेवाली वस्तु) होनेका अभिमान जहाँपर है, वहाँ स्त्रीसङ्ग नहीं है। पुरुष-अभिमान तथा द्रष्टा-अभिमान (में देखनेवाला हूँ, ऐसा अभिमान) रहनेपर ही स्त्रीसङ्ग होता है। भोक्ता-अभिमानके द्वारा भोग्य-ज्ञानसे दर्शन ही स्त्री-दर्शन है। जहाँ गुरु-दर्शन है, वहाँ स्त्री-दर्शन नहीं है। श्रीकृष्णवस्तुका (अर्थात् सभी वस्तुओंके भोक्ता एकमात्र श्रीकृष्ण हैं, ऐसा) दर्शन होनेपर फिर स्त्रीका (सभी वस्तुओंमें भोग्य होनेका) दर्शन नहीं रहता। जीवमात्र ही श्रीकृष्णशक्ति या श्रीकृष्णस्त्री है, इसलिये वह भोग्य नहीं है और त्याज्य भी नहीं है, परन्तु सेव्य है। श्रीपुरुषोत्तमके साथ सम्बन्धयुक्त होनेपर तुच्छ अधम-पुरुषत्व अभिमान दूर होकर स्त्री-दर्शनसे मुक्ति प्राप्त होती है।” “स्त्री-जातिको घृणा करके कोई कभी भी स्त्रीसङ्गसे 350 ।