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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ 22/84 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अमृतप्रवाह भाष्य—साधुसङ्ग जिस प्रकारसे ‘अन्वय’ अर्थात् प्रत्यक्षरूपमें वैष्णव-आचार है, असत्-सङ्गत्याग भी ‘व्यतिरेक’ अर्थात् अप्रत्यक्षरूपमें वैष्णव-आचार है। ‘असत्’—दो प्रकारका है; स्त्रीसङ्गी अर्थात् स्त्रीके प्रति आसक्त व्यक्ति एक प्रकारका ‘असाधु’ और ‘श्रीकृष्ण-अभक्त’ व्यक्ति—दूसरे प्रकारका ‘असाधु’ है। शुद्धभक्त इन दो प्रकारके असत्सङ्ग-त्यागमें विशेष रूपसे प्रयत्न करेंगे॥ 84॥ अनुभाष्य—अवैष्णवसङ्गका परित्याग ही वैष्णवोंका एकमात्र सदाचार है। ‘अवैष्णव’ कहनेसे ‘स्त्रीसङ्गी’ और ‘श्रीकृष्ण-अभक्त’,-इन दो श्रेणियोंके लोगोंको ही समझना चाहिये। स्त्रीसङ्ग दो प्रकारका है—‘वैधधर्मपर’ स्त्रीसङ्ग, जिसपर वर्णाश्रम-धर्म प्रतिष्ठित है और ‘अवैध’ स्त्रीसङ्ग, जो-अधर्मपर है और जिसके फलस्वरूप वर्णाश्रमधर्मके नियम भङ्ग होनेके कारण कर्मफल हेतु नरकादिकी प्राप्ति होती है। संसारमें पापपरायण व्यक्ति कदापि ‘वैष्णव’ नहीं कहे जा सकते। ‘धर्म’ ‘अर्थ’ और ‘काम’-नामक त्रिवर्ग स्त्रीसङ्गरूपी अवैष्णवाचारमें आबद्ध है। ‘मोक्ष’-नामक चतुर्थवर्ग स्त्रीसङ्गसे उत्पन्न नहीं होनेपर भी श्रीकृष्ण-विमुखताके कारण मोक्षाभिलाषी होनेपर स्त्रीसङ्गीकी अपेक्षा अधिक अवैष्णव और तुच्छ है। मायावादी और मायाविलासी,-दोनोंका सङ्ग ही वैष्णवता अथवा भक्तिनाशका कारण है। मायावादी मुक्तिकामी हैं अर्थात् वे मोक्षफलभोगकी कामनासे आत्माके उत्कर्षके लिये जड़भोगोंका त्याग करते हैं। और स्त्रीसङ्गी भोगी हैं। दोनों ही अपनी-अपनी जड़ेन्द्रियोंकी तुष्टिके लिये प्रयास करते हैं। वे श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्यान्य फलोंका अन्वेषण करनेवाले कपटतायुक्त होनेके कारण ‘श्रीकृष्णदास’ नहीं हैं॥ 84॥ अमृतानुकणा—“साधुसङ्गके प्रति कितना आदर उत्पन्न हुआ है, उसको जाननेका एकमात्र उपाय है, असत्सङ्ग-त्यागके प्रति हमारी कितना औदासीन्य (उदासीनता) या अनादर है। इसलिये असत्सङ्ग-त्यागको भी एक वैष्णव-सदाचारके मध्यमें गिना गया है, क्योंकि अवैष्णवोंका सम्पूर्णरूपसे अनादर या अनात्मबुद्धि नहीं आने तक वैष्णवमें आत्मीय-ज्ञान होनेकी आशा नहीं है। जिस परिमाणमें अवैष्णवमें परायेकी बुद्धि होगी, उसी परिमाणमें वैष्णवमें अपना माननेकी बुद्धि आयेगी। वास्तवमें यदि वैष्णवके साथ सम्बन्धयुक्त होनेकी इच्छा है, तब अवैष्णवके प्रति ममताको सबसे पहले त्याग करना होगा।”—“ततो दुःसङ्गमुत्सृज्य सत्सु सज्जेत बुद्धिमान्।” (भाः 11/26/26) ‘दुःसङ्ग’—स्त्रीसङ्ग और अभक्तसङ्ग, इन दो प्रकारका है। “इन्द्रियोंके द्वारा भोगकी जानेवाली वस्तुमात्र ही स्त्री है। उसके प्रति सम्पूर्णरूपसे प्रीति अथवा अभिनिवेश या ध्यान अथवा चित्तमें उसका सम्पूर्णरूपसे आधिपत्य करवा देनेका नाम ही ‘सङ्ग’ है। जीवकी इन्द्रियभोग्य सभी वस्तुएँ ही जड़ और अचेतन हैं। स्त्रीदेहधारी ही हो अथवा पुरुषदेहधारी ही हो, सभीकी देह जड़ है—इसलिये वह स्त्री ही है। स्त्रीदेहधारी अथवा पुरुषदेहधारी जीव जब भोगबुद्धि लेकर जड़देहमें अभिनिविष्ट होता है, तब वह स्त्रीसङ्गी होता है। अपनेमें श्रीकृष्ण-स्त्री (श्रीकृष्णशक्ति) या दृश्य (श्रीकृष्णके द्वारा दिखनेवाली वस्तु) होनेका अभिमान जहाँपर है, वहाँ स्त्रीसङ्ग नहीं है। पुरुष-अभिमान तथा द्रष्टा-अभिमान (में देखनेवाला हूँ, ऐसा अभिमान) रहनेपर ही स्त्रीसङ्ग होता है। भोक्ता-अभिमानके द्वारा भोग्य-ज्ञानसे दर्शन ही स्त्री-दर्शन है। जहाँ गुरु-दर्शन है, वहाँ स्त्री-दर्शन नहीं है। श्रीकृष्णवस्तुका (अर्थात् सभी वस्तुओंके भोक्ता एकमात्र श्रीकृष्ण हैं, ऐसा) दर्शन होनेपर फिर स्त्रीका (सभी वस्तुओंमें भोग्य होनेका) दर्शन नहीं रहता। जीवमात्र ही श्रीकृष्णशक्ति या श्रीकृष्णस्त्री है, इसलिये वह भोग्य नहीं है और त्याज्य भी नहीं है, परन्तु सेव्य है। श्रीपुरुषोत्तमके साथ सम्बन्धयुक्त होनेपर तुच्छ अधम-पुरुषत्व अभिमान दूर होकर स्त्री-दर्शनसे मुक्ति प्राप्त होती है।” “स्त्री-जातिको घृणा करके कोई कभी भी स्त्रीसङ्गसे 350 ।

बाइसवाँ अध्याय 22/84-87 ]

अपनी रक्षा नहीं कर सकता। उसमें केवल द्वेष अथवा तुच्छ-ज्ञान करनेसे आसक्ति और भी अधिक बढ़ जाती है। घृणा आसक्तिकी ही एक दिशा है। आसक्तिकी अपेक्षा घृणासे और भी अधिक अभिनिवेश होता है। आकार अर्थात् रूप दर्शन करते ही यह आसक्ति अथवा घृणा आ जाती है। भोग्य-ज्ञान करके बादमें घृणा या उपेक्षा करनेपर विपरीत चिन्ताके द्वारा प्रबल स्त्रीसङ्गी अवश्य ही होना होगा। कृत्रिम उपायसे स्त्रीसङ्ग या स्त्री-दर्शनसे मुक्ति नहीं हो सकती। शरणागत होकर ही श्रीकृष्णदास अभिमान जाग्रत होनेपर यह स्त्री-दर्शन दूर होगा। भोगनेत्रोंसे दर्शन करनेपर भोग्यका ही दर्शन होता है। इसलिये साधु-शास्त्र कानोंके द्वारा दर्शन करनेके लिये कहते हैं। 'श्रुति'के अनुगत होकर दर्शन करनेपर सेवोन्मुख शरणागत कानोंके द्वारा दर्शन करनेसे ही ठीक दर्शन होगा। ('स्त्रीसङ्ग घृणित'—दैनिक नदिया प्रकाश)। असत्सङ्गको अवश्य ही त्याग करना चाहिये। अभक्त कौन हैं? जो भगवान्‌के अनुगत नहीं हैं, वे ही अभक्त हैं। ज्ञानवादी पुरुष कभी भी भगवान्‌के अनुगत नहीं हैं। वे मनमें विचार करते हैं,-'मैं भी ज्ञानके बलसे भगवान्‌के समान हो जाऊँगा। ज्ञानके बलसे ही भगवान्‌की ब्रह्मता है और ज्ञानके बलसे मैं भी ब्रह्म हो जाऊँगा।' इसलिये ज्ञानवादियोंकी समस्त चेष्टाएँ ही भगवान्‌से स्वाधीन होती हैं। आत्मज्ञानी और प्राकृत-ज्ञानी लोग भी श्रीभगवान्‌की कृपाकी अपेक्षा नहीं करते। इसलिये ज्ञानीमात्र ही अभक्त हैं। यद्यपि कुछ ज्ञानी लोग साधनकालमें भक्तिको स्वीकार करते हैं, किन्तु वे सिद्धिकालमें भक्तिको विसर्जन कर देते हैं। इसलिये जो ज्ञानवादमें आसक्त हैं, उनकी अभक्तोंमें ही गणना की गयी है। कर्मवादी पुरुष भी भक्त नहीं हैं, इसलिये वे भी अभक्त हैं। श्रीकृष्णकृपा पानेके लिये यदि कोई कर्म करता है, तब उस कर्मका नाम 'भक्ति' है। जो कर्म, प्राकृत-फल या बहिर्मुख ज्ञान प्रदान करते हैं, वे कर्म भगवद्विमुख हैं। अपने स्वार्थके लिये किये गये कर्मोंको ही कर्म कहते हैं। इसलिये कर्मी व्यक्तियोंको भी अभक्त कहा जाता है।” “योगीगण भी कहींपर ज्ञानके फल कैवल्य-मोक्ष और कहींपर कर्मके फल विभूति (ऐश्वर्य) का अनुसन्धान करते हैं। इसलिये उनको भी अभक्त ही कहा गया है। अनेक देवोंके पूजकोंकी भी अनन्य शरणागति नहीं होनेसे उनको भी अभक्त कहा गया है। जो केवल शुष्क न्यायादिके विचारमें आसक्त हैं, वे भी भगवद्- बहिर्मुख हैं। जो इस प्रकार सिद्धान्त करते हैं कि, 'भगवान् एक काल्पनिक तत्त्वमात्र हैं, उनकी तो बात कहने योग्य नहीं है।' जिनको विषयोंमें आसक्त होकर भगवान्‌को स्मरण करनेके लिये समय नहीं मिलता, वे भी अभक्तोंके मध्यमें गिने जाते हैं। इन सब अभक्तोंका सङ्ग करनेसे अति अल्प समयमें बुद्धिनाश हो जाता है और उनके समान-प्रवृत्ति आकर हृदयमें बैठ जाती है। यदि किसीमें शुद्धभक्ति पानेकी वासना है, तो उसे विशेष रूपसे सतर्क रहते हुए अभक्त-सङ्ग परित्याग करना चाहिये।' ('सङ्गत्याग'—श्रील भक्तिविनोद ठाकुर) ॥ 84 ॥ स्त्री-सङ्ग और स्त्री-सङ्गीके सङ्गका भयानक परिणाम :- श्रीमद्भागवत (3/31/33-35)में— सत्यं शौचं दया मौनं बुद्धिर्हीः श्रीर्यशः क्षमा। शमो दमो भगश्चेति यत्सङ्गाद्याति संक्षयम् ॥ 85 ॥ तेष्वशान्तेषु मूढेषु खण्डितात्मस्वसाधुषु। सङ्गं न कुर्याच्छोच्येषु योषित्क्रीडामृगेषु च ॥ 86 ॥ न तथास्य भवेन्मोहो बन्धश्चान्यप्रसङ्गतः। योषित्सङ्गाद्यथा पुंसो यथा तत्सङ्गिसङ्गतः ॥ 87 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 85-87 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सत्य, पवित्रता, दया, मौन, बुद्धि, लज्जा, श्री, यश, क्षमा, शम, दम और ऐश्वर्य आदि सब कुछ ही जिनके सङ्गसे क्षय हो जाता है, उन शोचनीय आत्मविनाशकारी अशान्त मूर्ख स्त्री-क्रीड़ा- । 351

[ 22/85-89 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला मृग (स्त्रीके हाथके खिलौने) असाधुओंका सङ्ग कभी भी मत करना। अन्य किसी भी वस्तुसे जीवका ऐसा मोहका बन्धन नहीं होता, जैसा स्त्रीसङ्गसे और स्त्रीसङ्गीके सङ्गसे होता है॥ 85-87॥ अनुभाष्य- भगवान् कपिलदेव देवहूतिको पाप-पुण्यके कारण श्रीकृष्णविमुख स्वरूप-विस्मृत जीवके जन्मसे पूर्व योनि-भ्रमण और गर्भवास-यन्त्रणाका वर्णन करके जन्म होनेके बाद बाल्य, पौगण्ड और यौवन अवस्थामें अनेक प्रकारके इन्द्रियभोगों अथवा स्त्रीसङ्गकी स्पृहा, उसके प्रभाव और कुफलकी बात तीन श्लोकोंमें बतला रहे हैं- यत्सङ्गात् (येषां असतां सङ्गवशात्) सत्यं शौचं दया मौनं बुद्धिः (पारमार्थिकीत्यर्थः) ह्रीः श्रीः (भक्तिसम्पत्) यशः क्षमा शमः दमः भगः (ऐश्वर्यं वैभवं वा) इति संक्षयं (सम्यक् विनाशं) याति (प्राप्नोति), तेषु अशान्तेषु (जड़विषयभोग-लम्पटेषु) मूढेषु असाधुषु खण्डितात्मसु (प्राकृतदेहादौ अप्राकृतात्मबुद्धिषु) योषित्क्रीड़ा-मृगेषु (स्त्रीणां क्रीड़ामृगाः एकान्त-वशीभूताः तेषु स्त्रैणेषु) शोच्येषु (दुःखाश्रयेषु) असाधुषु (अवैष्णवेषु) सङ्गं न कुर्यात्। अस्य (पुंसः) यथा योषित्सङ्गात् (जड़भोक्तृबुद्धया भोग्य-सहवासेन), यथा [च] तत्सङ्गिसङ्गतः (योषिद्भोक्तॄणां रक्त-शुक्रमय-देहादौ आत्मबुद्धीनां वा सहवासेन), मोहः (बुद्धिनाशः) बन्धः (भवबन्धः) च भवेत्, तथा अन्यप्रसङ्गतः न भवेत्। श्लोक-भावानुवाद-जिन असत् लोगोंके सङ्गसे सत्य, पवित्रता, दया, मौन, बुद्धि (पारमार्थिक), लज्जा, श्री (भक्तिरूपी सम्पत्ति), यश, क्षमा, शम, दम और ऐश्वर्य आदि सब कुछ ही सम्पूर्णरूपसे नष्ट हो जाता है, उन जड़विषयभोग-लम्पट मूर्ख देहात्मबुद्धिवाले स्त्री-क्रीड़ा-मृग (स्त्रीके सम्पूर्ण वशीभूत) असाधुओंका सङ्ग कभी भी मत करना। अन्य किसी भी वस्तुसे जीवका ऐसा मोहका बन्धन नहीं होता, जैसा स्त्रीसङ्गसे (जड़भोगबुद्धिसे स्त्रीके भोग और सहवाससे) और स्त्रीसङ्गीके (स्त्रीभोगकामी जिसकी रक्त-शुक्रमय देहमें आत्मबुद्धि है, ऐसे व्यक्तिके सङ्गीके) सङ्गसे होता है॥ 85-87॥ हरिविमुख-सङ्गके प्रति भक्तका मनोभाव :- कात्यायनसंहिता-वचन- वरं हुतवहज्वाला-पञ्जरान्तर्व्यवस्थितिः। न शौरिचिन्ताविमुख-जनसंवासवैशसम्॥ 88॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 88॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अग्निकी ज्वालामें और पिञ्जरेमें बन्द होनेसे जो कष्ट होता है, उसे सहन करना तब भी उचित है, किन्तु श्रीकृष्णके चिन्तनसे बहिर्मुख व्यक्तियोंका कष्ट प्रदान करनेवाला सङ्ग कभी भी मत करना। तात्पर्य यह है कि यदि कभी भी आगमें जलकर मरने अथवा कारागारमें बन्द होना पड़े, उसे भी स्वीकार करना, किन्तु श्रीकृष्ण बहिर्मुख लोगोंके साथ सङ्ग मत करना॥ 88॥ अनुभाष्य- हुतवहज्वाला-पञ्जरान्तर्व्यवस्थितिः (प्रज्वलितवह्निश्खिायां पिञ्जरमध्यनिवासः अपि) वरं [प्रार्थनीयः तथापि] शौरिचिन्ताविमुख- जनसंवास-वैशसं (शौरेः कृष्णस्य चिन्तायाः विमुखः जनः तेन सह सम्यक् वासः, स एव वैशसं विपत्पातः) न। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 88॥ विष्णुभक्तिरहित व्यक्तिके प्रति व्यवहारकी विधि :- गोस्वामीपादोक्ति- मा द्राक्षीः क्षीणपुण्यान् क्वचिदपि भगवद्भक्तिहीनान् मनुष्यान्॥ 89॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 89॥ अमृतप्रवाह भाष्य-भगवद्भक्तिविहीन मन्द-भाग्य मनुष्योंको कभी भी मत देखना॥ 89॥ अनुभाष्य- भगवद्भक्तिहीनान् (कृष्णसेवाविहीनान्) क्षीणपुण्यान् (मन्दभाग्यान्) मनुष्यान् क्वचित् (लौकिक-मर्यादौ) अपि मा (न) अद्राक्षीः (पश्येत्)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 89॥ 352 |

Here is the Devanagari text transcribed from the image:

बाइसवाँ अध्याय 22/90 ] परमहंस अथवा निष्किञ्चन वैष्णवका आचरण :- एत सब छाड़ि' आर वर्णाश्रम धर्म। अकिञ्चन हञा लय कृष्णैक-शरण ॥ 90 ॥ अनुवाद - असत्सङ्गका पूर्ण त्याग और वर्णाश्रम धर्मकी उपेक्षा करके अकिञ्चन (सांसारिक आसक्तिरहित) होकर श्रीकृष्णकी शरण ग्रहण करनी चाहिये ॥ 90 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - इन दो प्रकारके असाधुसङ्ग और वर्णाश्रमधर्मकी आसक्तिका परित्याग करके अकिञ्चनभावसे एकमात्र श्रीकृष्णके शरणागत होओ ॥ 90 ॥ अमृतानुकणा-श्रीमन्महाप्रभुके इस वाक्यसे कोई-कोई ऐसा सोचते हैं कि महाप्रभुने वर्णाश्रम विचारको त्याग करनेके लिये कहा है। वे इस प्रसङ्गमें साध्य-साधन विचारके निर्णयके समय श्रीरामानन्द प्रभुके द्वारा कहे गये 'वर्णाश्रम-धर्म'के सम्बन्धमें महाप्रभुकी उक्ति 'एहो बाह्य' और महाप्रभुके द्वारा कहे गये "नाहं विप्रः”- श्लोकको वे उक्त विचारोंको पुष्ट करनेवाला मानते हैं। किन्तु वास्तवमें उसे कभी भी 'सिद्धान्त' नहीं कहा जा सकता। “महाप्रभुकी उक्ति ('एहो बाह्य')का तात्पर्य यह था,-हे रामानन्द ! स्थूल-लिङ्गदेहको नियमित करनेके लिये वर्णाश्रम-धर्म है। यदि कोई केवल उसीसे ही सन्तुष्ट होकर हरिभजन न करे, तब उसको क्या लाभ होगा ? इसलिये वर्णाश्रम-विधि बद्धजीवके एकमात्र शुद्ध-जीवनका उपाय होनेपर भी वह 'बाह्य' है। इसके द्वारा ऐसा सिद्धान्त नहीं करना होगा कि महाप्रभुने वर्णाश्रम-धर्मको दूरसे ही छोड़ देनेकी आज्ञा दी है। यदि ऐसा होता, तब अपनी जीवन-लीलामें गृहस्थ- अवस्थामें गृहस्थ-धर्म और संन्यास-अवस्थामें संन्यास- धर्म सम्पूर्णरूपसे पालन करके वे सभी जीवोंको शिक्षा नहीं देते। जब तक देह है, तब तक वर्णाश्रम-धर्मका आश्रय ग्रहण करना होगा, किन्तु वह सदा भक्तिके सम्पूर्ण अधिकारमें और अधीन रहेगा। वर्णाश्रम-धर्म 'परमधर्म'की नींवस्वरूप है। 'परमधर्म'की (भक्तिकी) परिपक्वता होनेपर उपेयकी (श्रीकृष्णप्रेमकी) प्राप्ति होनेके साथ-साथ उपायका (वर्णाश्रम-धर्मका) क्रमशः अनादर होता है। और देहत्यागके साथ ही उसका त्याग हो जाता है।" “श्रीरामानन्दके द्वारा उद्धृत श्लोकके आखिरमें यह कहा गया है कि 'विष्णुराराध्यते पन्था नान्यत्ततोष- कारणम्।' उससे यह जानना होगा कि वर्णाश्रम-धर्मके आश्रयके अतिरिक्त संसारी जीवका श्रीहरिभजनके अनुकूल जीवन उपायका और कोई मार्ग नहीं है। इसको भक्तजीवन प्राप्त करनेका एकमात्र मार्ग कहा जाता है।" ('साधुवृत्ति'-श्रील भक्तिविनोद ठाकुर)। 'नाहं विप्रः' श्लोक कहनेवाले श्रीमन्महाप्रभुने पुनः स्वयं ही “आमि त' संन्यासी, आमार समदृष्टि धर्म” (अन्त्यलीला 4/179), “आमि त' संन्यासी, आपनारे विरक्त करि मानि” (अन्त्यलीला 5/35), “भिक्षुक संन्यासी आमि निर्जनवासी” (अन्त्यलीला 9/64)- आदिरूपमें पुनः पुनः अपनेको वर्णाश्रमके अन्तर्गत संन्यासी कहकर उन्होंने घोषणा की है। इसलिये यहाँपर महाप्रभुके निज आचरणमें वर्णाश्रम परित्यागका कोई भी दृष्टान्त लक्षित नहीं होता। “चातुर्वर्ण्य मया सृष्टं" (गीता 4/13)-वर्णाश्रम-व्यवस्थाके जो सृष्टा हैं, वे स्वयं ही अवतीर्ण होकर फिर उक्त व्यवस्थाके उल्लङ्घनके उपदेशके द्वारा समस्त लोगोंको भ्रमित नहीं कर सकते। “उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्।” (गीता 3/24) - 'यदि मैं यथाविधि कर्म न करूँ, तब मेरे दृष्टान्तसे ये समस्त लोग भ्रष्ट हो जायेंगे।' “वर्णाश्रम दूर होनेपर मानवका वैज्ञानिक समाज विनष्ट होगा और 'पुनर्मूषिको भव' यह अभिशाप प्राप्त होकर स्वेच्छाचारी म्लेच्छोंके जैसे अवैध जीवनकी सुविधा प्राप्त करेंगे। जहाँ वर्णाश्रम-धर्म नहीं है, वहाँ निष्काम कर्मयोग और उसका साध्य ज्ञानयोग और चरमफलरूप भक्तियोग सुन्दररूपसे आचरित नहीं हो सकता।" (सज्जनतोषणी)। इसलिये श्रीमन्महाप्रभुने आदर्श दिखानेके लिये यथार्थ वर्णाश्रम-धर्मका स्वयं सुन्दररूपसे आचरण करके । 353

[ 22/90-94 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला वर्णाश्रम-व्यवस्थाके वास्तविक तात्पर्यका प्रदर्शन किया है—“चारि वर्णाश्रमी यदि कृष्ण नाहि भजे। स्वकर्म करिते से रौरवे पड़ि' मजे॥”(चै.च. मध्यलीला 22/26) यहाँपर महाप्रभुके “एत सब छाड़ि' आर वर्णाश्रम- धर्म। अकिञ्चन हैया लय कृष्णैकशरण॥” वाक्यमें उनके द्वारा पहले दिये गये उपदेश 'नाहं विप्रः' श्लोककी ही प्रतिध्वनि हुई है। वर्णाश्रमके अन्तर्गत अभिमान या उसके प्रति आसक्ति परमपुरुषार्थ-साधनके क्षेत्रमें नितान्त ही अनावश्यक है। वहाँ स्थूल-लिङ्गदेहगत वर्णाश्रमका परिचय कोई भी कार्य नहीं करता, इसलिये उस-उस अभिमान और उसके प्रति आसक्ति छोड़कर, यहाँ तक कि रूप-धन-विद्याके अभिमानका परित्याग करके अकिञ्चन होकर केवल अपने स्वरूपगत “गोपीभर्तुः पदकमलयोर्दासदासानुदासः” परिचयको ही ग्रहण करना होगा॥90॥ श्रीमद्भगवद्गीता (18/66)में :- सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥91॥ अनुवाद—समस्त धर्मोंका परित्याग करके एकमात्र, मैं जो भगवान् हूँ, मेरे शरणागत होओ। ऐसा करनेपर मैं तुम्हें समस्त पापोंसे मुक्त करूँगा। तुम शोक मत करो॥91॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 8/63 संख्या देखें॥91॥ श्रीकृष्ण ही एकमात्र भजनीय वस्तु :- भक्तवत्सल, कृतज्ञ, समर्थ, वदान्य। हेन कृष्ण छाड़ि' पण्डित नाहि भजे अन्य॥92॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण भक्तवत्सल हैं। वे कृतज्ञ, सर्वसमर्थ और परम उदार हैं। पण्डित व्यक्ति ऐसे श्रीकृष्णको छोड़कर अन्य किसीका भजन नहीं करते॥92॥ अनुभाष्य—भक्तवत्सल, कृतज्ञ, उदार और सामर्थ्यवान् श्रीकृष्णको छोड़ करके कोई भी पण्डित श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्यान्य तुच्छ वस्तुओंका भजन नहीं करते। जो श्रीकृष्णभजन छोड़कर जड़विषयोंके प्रति मुग्ध होते हैं, उनके समान मूर्ख आत्मघाती व्यक्ति अत्यन्त विरले होते हैं अर्थात् वे महामूर्ख होते हैं॥92॥ स्वयं तकको प्रदान कर देनेवाले सर्वात्मा श्रीकृष्ण :- श्रीमद्भागवत (10/48/26)में— कः पण्डितस्त्वदपरं शरणं समीया- द्भक्तप्रियादृतगिरः सुहृदः कृतज्ञात्। सर्वान् ददाति सुहृदो भजतोऽभिकामा- नात्मानमप्युपचयापचयौ न यस्य॥93॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥93॥ अमृतप्रवाह भाष्य—प्रिय, सत्यवादी, सुहृत् और कृतज्ञरूपी [भक्तप्रेमका प्रतिदान करनेवाले] आपको छोड़कर कौन पण्डित दूसरोंके शरणागत होते हैं? आप भजनशील सुहृद् व्यक्तियोंकी समस्त कामनाएँ पूर्ण करते हैं और स्वयं तकको भी दिया करते हैं, परन्तु आपमें ह्रास (कमी) और वृद्धि नहीं होती॥93॥ अनुभाष्य—भगवान् श्रीकृष्णके कुब्जाकी अभीष्ट- वाञ्छाको पूर्ण करके अक्रूरको हस्तिनापुरमें भेजनेकी इच्छासे बलरामजीके साथ उनके घरपर उपस्थित होनेपर, अक्रूर उनकी वन्दना करते-करते स्तव कर रहे हैं,— [यतो भवान्] भजतः (भजनशीलान्) सर्वान् सुहृदः (मित्रान्) अभिकामान् (सर्वतोभावेन कामान्), यस्य (च) उपचयापचयौ (ह्रासवृद्धी) न स्तः, (तादृशम्) आत्मानं (निजविग्रहम्) अपि ददाति, [अतः] भक्तप्रियात् (भक्तवत्सलात्) ऋतगिरः (सत्यवाचः) सुहृदः (बान्धवात्) कृतज्ञात् (भक्तप्रेमप्रतिदानकारिणः) त्वत्तः (त्वां बिना) अपरं शरणं (आश्रयं) कः पण्डितः समीयात् (गच्छेत्)? श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥93॥ उद्धव ही अनन्य-श्रीकृष्ण भजनके प्रमाण :- विज्ञ-जनेर हय यदि कृष्णगुण-ज्ञान। अन्य त्यजि' भजे, ताते उद्धव-प्रमाण॥94॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥94॥ 354 |

बाइसवाँ अध्याय 22/94-97 ] अनुभाष्य—श्रीकृष्णके गुणोंका ज्ञान होने मात्रसे ही अभिज्ञ (बुद्धिमान) व्यक्ति दूसरोंकी उपासनाको त्याग करके श्रीकृष्णका ही भजन करता है; इस विषयमें उद्धवजी ही प्रमाण हैं॥ 94॥ श्रीकृष्ण-दयाके सागर :- श्रीमद्भागवत (3/2/23)में— अहो बकी यं स्तनकालकूटं जिघांसयापाययदप्यसाध्वी। लेभे गतिं धात्र्युचितां ततोऽन्यं कं वा दयालुं शरणं व्रजेम॥ 95॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 95॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अहो, जिन श्रीकृष्णका वध करनेके लिये इस बकासुरकी बहन पूतनाने दुष्ट-वृत्तियुक्त होकर उन्हें स्तनपर लगाये कालकूट (विष)का पान कराया था और ऐसा करनेपर भी उसने माताके योग्य गतिको प्राप्त किया था, उनके (उन श्रीकृष्णके) अतिरिक्त अन्य किस दयालुके शरणागत हो सकता हूँ?॥ 95॥ अनुभाष्य—महाभागवत श्रील उद्धव श्रीकृष्णके वियोगके कारण शोकाकुल होकर विदुरजीसे श्रीकृष्णकी बाल्यलीला आदिका वर्णन कर रहे हैं,— अहो (आश्चर्य), बकी (पूतना) जिघांसया (हन्तुम् इच्छया अपि) स्तनकालकूटं (स्तनयोः गृहीतं कालकूटं विषं) यं (कृष्णम्) अपाययत्, असाध्वी (कृष्णविरोधिनी दुष्टा दानवी) अपि धात्र्युचितां (पालयित्र्याः स्तनदातृकायाः योग्यां) गतिम् (उत्तमां गतिं) लेभे, ततः (श्रीकृष्णात्) अन्यं (अपरं) कं वा दयालुं (वदान्यं) शरणं व्रजेम (भजेमेत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 95॥ परमहंस या वैष्णव ही श्रीकृष्णके प्रति समर्पितात्मा :- शरणागतेर, अकिञ्चनेर—एकइ लक्षण। तार मध्ये प्रवेशये 'आत्मसमर्पण'॥ 96॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 96॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'अकिञ्चन भक्त' और 'शरणागत भक्त'—इन दोनोंके एक ही लक्षण हैं। इन दोनोंमेंसे शरणागतका 'आत्म-समर्पण'-रूप एक लक्षण अधिक होता है॥ 96॥ छः प्रकारकी शरणागति :- हरिभक्तिविलास (11/417)में उद्धृत वैष्णवतन्त्रवाक्य— आनुकूल्यस्य सङ्कल्पः प्रातिकूल्य-विवर्जनम्। रक्षिष्यतीति विश्वासो गोप्तृत्वे वरणं तथा। आत्मनिक्षेप-कार्पण्ये षड्विधा शरणागतिः॥ 97॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 97॥ अमृतप्रवाह भाष्य—शरणागतिके छः प्रकारके लक्षण—(1) आनुकूल्य-सङ्कल्प अर्थात् 'श्रीकृष्णभक्तिके जो अनुकूल है, उसे मैं अवश्य ही स्वीकार करूँगा'—ऐसा सङ्कल्प; (2) प्रातिकूल्य-विवर्जन अर्थात् 'श्रीकृष्णभक्तिके जो प्रतिकूल है, उसका मैं अवश्य ही वर्जन (त्याग) करूँगा', इस भावनासे त्याग; (3) 'वे मेरी रक्षा करेंगे' अर्थात् 'श्रीकृष्णके अतिरिक्त मेरा और कोई रक्षा करनेवाला नहीं है', यह विश्वास—'अभेद ब्रह्मज्ञानके द्वारा मैं मृत्युसे बच सकता हूँ',—ऐसा विश्वास नहीं, 'श्रीकृष्ण कृपा करके मेरी रक्षा करेंगे',—ऐसा विश्वास; (4) श्रीकृष्णको 'गोप्ता' अथवा 'पालन करनेवाले'के रूपमें वरण करना अर्थात् 'समस्त कर्म करके मैं (कर्मोंके) उन-उन अधिष्ठातृ-देवताके द्वारा पालित होऊँगा',—ऐसे विश्वासको पूर्णरूपसे त्याग करके 'श्रीकृष्ण ही मेरे एकमात्र पालनकर्त्ता हैं और देवताओं तथा मनुष्योंमेंसे कोई भी मेरा पालनकर्त्ता नहीं हैं',—ऐसा अचल विश्वास; (5) आत्मनिक्षेप अर्थात् 'मेरी इच्छा स्वतन्त्र नहीं है, वह—श्रीकृष्णकी इच्छाके परतन्त्र है' ऐसी बुद्धि ही आत्मसमर्पण है, और (6) कार्पण्य अर्थात् स्वयंको दीन-हीन मानना॥ 97॥ अनुभाष्य— आनुकूल्यस्य (कृष्णभजनसहायस्य) सङ्कल्पः (सम्यक् निर्णयः, ग्रहणं वा), प्रातिकूल्यविवर्जनं (कृष्णभजनविरोधिवस्तु-सङ्गत्यागः), । 355

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[ 22/97-98 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला मां रक्षिष्यति इति विश्वासः (दृढ़श्रद्धा,- “क्षेमं विधास्यति स नो भगवान्त्र्यधीशः" इत्यादि प्रकारः), गोप्तृत्वे (प्रभुत्वे, पालयितृत्वे, पतित्वे वा) वरणं (प्रार्थनम् अङ्गीकरणं वा- “त्वां प्रपन्नोऽस्मि शरणं देवदेवं जनार्दनम्। इति यः शरणं प्राप्तस्तं क्लेशादुद्धराम्यहम्॥” इति नारसिंहोक्तप्रकारम्), आत्मनिक्षेपकार्पण्ये (आत्मसमर्पणं “केनापि देवेन हृदिस्थितेन यथा नियुक्तोऽस्मि, तथा करोमि" इति गौतमीतन्त्रोक्तप्रकारं च, स्वीयदैन्यज्ञापकं कार्पण्यं “परमकारुणिको न भवत्परः परमशोच्यतमो न च मत्परः” इत्यादिप्रकारं च-काकुभाषणञ्चेत्यर्थः)- इति षड्विधा शरणागतिः (शरणापत्तिः)। श्लोक-भावानुवाद— [“आनुकूल्यस्य संकल्पः” - जो श्रीकृष्ण भजनमें सहायक है, उसको सम्पूर्ण रूपसे ग्रहण या वैसा सम्पूर्ण निर्णय करना। “प्रातिकूल्य-विवर्जनम्”- श्रीकृष्णभजन-विरोधी वस्तुका सङ्गत्याग। “रक्षिष्यतीति विश्वासः”—'त्रिलोकके अधीश वे भगवान् मेरा मङ्गल विधान करेंगे', इस प्रकारसे दृढ़ श्रद्धा होना। “गोप्तृत्वे वरणम्"-प्रभुरूपमें, पालकरूपमें या पतिरूपमें वरण, अथवा प्रार्थना करना, जैसे नारसिंह-पुराणमें कहा गया है,-'हे भगवन् ! देवदेव जनार्दन ! मैं आपकी शरण ग्रहण करता हूँ'—इस रूपमें यदि मेरे शरणागत होता है, तो मैं उसके समस्त क्लेशोंसे उसका उद्धार करता हूँ। “आत्मनिक्षेप-कार्पण्ये”— आत्मसमर्पण, जैसा गौतमीय-तन्त्रमें कहा गया है, 'हृदयमें स्थित किसी देवके द्वारा मैं जिस प्रकार नियुक्त हुआ हूँ, उस रूपमें कर रहा हूँ'-आदि प्रकार; 'कार्पण्य' अर्थात् जो अपने दैन्यका ज्ञापक है, जैसे 'हे भगवन् ! आपकी अपेक्षा अधिक करुणाशील और कोई नहीं है और मेरी अपेक्षा भी अधिक अधम और कोई नहीं हैं', आदि प्रकारके काकुवाक्य; यह छः प्रकारकी शरणागति अर्थात् शरणापत्ति है।] भक्ति सन्दर्भमें 236 संख्यामें श्रीजीवप्रभु- “अङ्गाङ्गिभेदेन षड्विधा; तत्र 'गोप्तृत्वे वरणम्' एवाङ्गि, शरणागतिशब्देनैकार्थ्यात्; अन्यानि त्वङ्गानि, तत्परिकरत्वात्। तदेवं यस्य सर्वाङ्ग सम्पन्ना शरणापत्तिस्तस्य झटित्येव सम्पूर्णफला; अन्येषां तु यथासम्पत्ति यथाक्रमञ्चेति ज्ञेयम्। तामेतां शरणापत्तिं श्लाघ्यते (भाः 11/19/9 पद्येन) - शरणागतानां सर्वदुःखदूरीकरणं निज-माधुरीणां सर्वतो वर्षश्चात्राभिहितम्।" [अर्थात् “छः प्रकारकी शरणागतिके मध्य अङ्ग-अङ्गी भावको जानना होगा। उसमें 'गोप्तृत्वे वरण' ही अङ्गीस्वरूप है, क्योंकि उसका 'शरणागति'-शब्दके साथ एक ही अर्थका वैशिष्ट्य है और अन्य पाँचको उसका परिकर कहकर अङ्गरूपमें जानना होगा। इस प्रकारसे जिनकी सर्वाङ्गरूपसे शरणागति होती है, उनकी शरणागति शीघ्र ही सम्पूर्ण फलको देनेवाली होती है। अन्य लोगोंकी क्षेत्रमें सम्पत्तिके अनुसारसे (अर्थात् जिस परिमाणमें शरणागति है, उस अनुपातसे) और क्रमानुसारसे उनकी सिद्धि जाननी होगी। इस शरणागतिकी प्रशंसा, जैसे (भाः 11/19/9 श्लोकमें) - 'हे भगवन् ! इस घोर संसारमें त्रितापके द्वारा आक्रान्त सन्तप्त चित्तसे मानवोंके लिये आपकी अमृतराशि-वर्षण करनेवाले चरणकमलयुगल-रूप छत्रके अतिरिक्त अन्य कोई आश्रय नहीं दिखायी देता।' यहाँपर शरणागतके सब दुःखोंको दूर करने और सर्वत्र अपनी माधुरीका वर्षण करना वर्णित हुआ है।”] ॥ 97 ॥ शरणागतका आचरण :- हरिभक्तिविलास (11/418) में उद्धृत वैष्णवतन्त्रवाक्य- तवास्मीति वदन् वाचा तथैव मनसा विदन्। तत्स्थानमाश्रितस्तन्वा मोदते शरणागतः॥ 98 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 98 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - शरणागत व्यक्ति भगवान्की लीला-स्थलीका शरीरके द्वारा आश्रय ग्रहण करके 'हे भगवन्, मैं आपका हूँ, ऐसा मुखसे बोलकर और मनमें जानकर आनन्द प्राप्त किया करता है॥ 98 ॥ अनुभाष्य- शरणागतः (प्रपन्नः) '[अहं] तव [एव] अस्मि' इति वाचा वदन्, तथा एव मनसा विदन् (आत्मानं सेवापरं जानन्) तन्वा (शरीरेण) तत्स्थानं (भगवन्तः भक्तस्य च स्थानम्) आश्रितः (सन्) मोदते (हृष्यति)। 356 ।

बाइसवाँ अध्याय 22/98–102 ]

श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 98॥ वैष्णव-श्रीकृष्णसे अभिन्न :- शरण लञा करे कृष्णे आत्मसमर्पण। कृष्ण ताँरे करे तत्काले आत्मसम॥ 99॥ **अनुवाद—**जब भक्त श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें पूर्ण शरणागत होकर आत्मसमर्पण करता है, श्रीकृष्ण तुरन्त ही उसे अपने भक्तके रूपमें स्वीकार कर लेते हैं॥ 99॥ श्रीकृष्णकी भाँति वैष्णव भी सच्चिदानन्दमय :- श्रीमद्भागवत (11/29/34)में— मर्त्यो यदा त्यक्तसमस्तकर्मा निवेदितात्मा विचिकीर्षितो मे। तदामृतत्वं प्रतिपद्यमानो मयात्मभूयाय च कल्पते वै॥ 100॥ **अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 100॥ **अमृतप्रवाह भाष्य—**मरणशील जीव जब समस्त कर्मोंका परित्याग करके स्वयंको मेरे (भगवान्के) प्रति सम्पूर्णरूपसे निवेदन करके मेरी इच्छासे क्रिया करता है, तब वह अमृतत्वको (मोक्षको) प्राप्त करता है। इस प्रकार वह मेरे साथ मेरे समान चित्स्वरूप रस-भोग करनेके योग्य होता है॥ 100॥ **अनुभाष्य—**भगवान् श्रीकृष्ण अपने प्रिय भक्तोंमें श्रेष्ठ उद्धवजीको सम्बन्ध-अभिधेय-प्रयोजनतत्त्वका वर्णन करके अन्तमें एकान्त समर्पित आत्मा शुद्धभक्तकी गतिका वर्णन कर रहे हैं,- यदा मर्त्यः (मनुष्यः) त्यक्तसमस्तकर्मा (विरतभोगमोक्षः सन्) मे (मह्यं) निवेदितात्मा (भवति, आत्मसमर्पणं करोतीत्यर्थः), तदा [असौ] मया विचिकीर्षितः (प्रेरितः सन् विशेषेण कर्तुमभिलषितो भवति; ततश्च) अमृतत्वं (मोक्षं) प्रतिपद्यमानः, मया (सह) आत्मभूयाय (मादृशसच्चिदानन्दमयत्वाय) कल्पते (योग्यो भवति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 100॥ (1) साधन भक्तिके लक्षणका वर्णन :- एबे साधनभक्ति-लक्षण शुन, सनातन। याहा हैते पाइ कृष्णप्रेम-महाधन॥ 101॥ **अनुवाद—**हे सनातन, अब तुम उस साधनभक्तिके लक्षण सुनो, जिसके द्वारा श्रीकृष्णप्रेमरूपी महाधनकी प्राप्ति होती है॥ 101॥ साधनकी संज्ञा :- भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/2)— कृतिसाध्या भवेत् साध्यभावा सा साधनाभिधा। नित्यसिद्धस्य भावस्य प्राकट्यं हृदि साध्यता॥ 102॥ **अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 102॥ अमृतप्रवाह भाष्य—“साध्य (साधनीय) भावभक्ति जब इन्द्रियोंके द्वारा साधित होती है, तब उसे 'साधन-भक्ति' कहते हैं। भक्ति ही जीवका नित्यसिद्ध भाव है, उसे हृदयमें प्रकट अवस्थामें लानेका नाम ही 'साध्यता' (साधनयोग्यता) है।” तात्पर्य यह है कि चित्कण-जीवमें स्वाभाविक रूपमें चित्-सूर्यरूप श्रीकृष्णका जो आनन्दकण है, मायाबद्ध होकर वह इस समय प्राय लुप्त है। वह नित्यसिद्ध भाव ही हृदयमें प्रकट करानेके योग्य है। इस (बद्ध) अवस्थामें 'नित्यसिद्ध'-वस्तु ही 'साध्य' हुई है। वही साध्यभावरूपी भक्ति जब बद्धजीवकी इन्द्रियोंके द्वारा साधित होती है, तब उसका ही नाम 'साधन-भक्ति' है॥ 102॥ अनुभाष्य— कृतिसाध्या (कृत्या इन्द्रिय-प्रेरणया साधनीया या) साध्यभावा (साधनीयः भावः यया) सा साधनाभिधा (साधनभक्तिनाम्नी) भवेत्; हृदि (जीवात्म-हृदये) नित्यसिद्धस्य (नित्यवर्त्तमानस्य स्वतःप्रकाशस्य) भावस्य (कृष्णप्रेमभावस्य) प्राकट्यम् (आविष्करणम् एव) साध्यता (साधनयोग्यता)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 102॥ 357

[ 22/103-106 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला साधन भक्तिका स्वरूप और तटस्थ लक्षण :- श्रवणादि-क्रिया—तार 'स्वरूप' लक्षण। 'तटस्थ'-लक्षणे उपजय प्रेमधन ॥ 103 ॥ नित्यसिद्ध निरपेक्ष शुद्ध (अनन्य, केवल अथवा अनुकूल) अभिधेयके द्वारा ही नित्यसिद्ध स्वप्रकाशित शुद्धप्रयोजनकी प्राप्ति :- नित्यसिद्ध कृष्णप्रेम 'साध्य' कभु नय। श्रवणादि-शुद्धचित्ते करये उदय ॥ 104 ॥ साधनभक्तिके भेद—(1) वैधी और (2) रागानुगा :- एइ त' साधनभक्ति—दुइ त' प्रकार। एक 'वैधी भक्ति', 'रागानुगा भक्ति' आर ॥ 105 ॥ (क) वैधीभक्तिका वर्णन और संज्ञा-निर्देश :- रागहीन जन भजे शास्त्रेर आज्ञाय। 'वैधी-भक्ति' बलि' तारे सर्वशास्त्रे गाय ॥ 106 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 103-106 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अनुकूलभावके साथ श्रवण, कीर्तन और स्मरण ही उस भक्तिका 'स्वरूप'-लक्षण है। अन्याभिलाषका त्याग और ज्ञानकर्मके साथ सम्बन्ध- विच्छेद [तटस्थ लक्षण] के द्वारा वह स्वरूप लक्षण 'प्रेमधन' उत्पन्न करता है। श्रीकृष्णप्रेम—नित्यसिद्ध वस्तु है, वह कभी भी (शुद्धभक्तिके अतिरिक्त अन्य किसी अभिधेय से) साध्य नहीं है; केवलमात्र श्रवणादिके द्वारा भली-भाँति शोधित चित्तमें ही उसका उदित होना सम्भव है। इसलिये शुद्ध श्रवण-कीर्तनादि क्रिया ही प्रधानतः साधन-भक्ति है। वह दो प्रकारकी है,—'वैधी' और 'रागानुगा'। जिनके हृदयमें रागका उदय नहीं हुआ, उनकी शास्त्रोंकी आज्ञानुसार जो भजनप्रवृत्ति होती है, वही 'वैधीभक्ति' है॥ 103-106 ॥ अमृतानुकणा—ईश्वरके प्रति जीवका जो प्रेम है, वह जीवका स्वाभाविक नित्य धर्म है। जीव वास्तवमें शुद्ध चिद्-वस्तु और चिद्-धर्मसे गठित है। 'चिद्-स्वरूप जीवका अपना एक विशेष शुद्ध अभिमान था कि 'मैं भगवान्‌का अमुक लक्षणवाला दास हूँ।' उस अभिमानने जीवके चिद्गत शुद्ध अहङ्काररूपमें चिद्-स्वरूपका आश्रय किया हुआ था। चिद्-स्वरूपको आश्रय करके आनन्दकी उपलब्धिके स्थानरूप शुद्धबुद्धि भी थी। अन्य पदार्थों और अन्य जीवों एवं परमपुरुष भगवान्के विषयमें जानकर उसका ज्ञान और ध्यानके उपयोगी मन भी था। जड़बद्ध होनेपर वे चिद्गत वृत्तियाँ जड़सङ्गके प्रभावसे लिङ्ग और स्थूलरूपमें परिणत होकर उन-उन सबके विषयरूप जड़ीय और अशुद्ध वृत्तियाँ प्रकाशित हुई हैं। इसलिये जो-रस चिदाश्रयमें भाव था, वह (जड़ाश्रयमें) विकृत भाव हो गया है। रस एक ही वस्तु है, नित्यावस्थामें नित्यानन्द स्वरूप है और जड़बद्धावस्थामें जड़ानन्द या जड़-दुःखरूपमें प्रकाशमान है।” (चैतन्यशिक्षामृत 7/1) इसलिये, अग्निका ताप देनेका धर्म जिस प्रकार स्वतःसिद्ध है, उसे किसी प्रकारके साधनके द्वारा प्राप्त करनेका कोई प्रयोजन नहीं है—उसी प्रकार विभुके प्रति अणुका आकर्षण तथा श्रीकृष्णके प्रति जीवका प्रेम भी नित्यसिद्ध है, उसकी साध्यरूपमें प्राप्तिका कोई अवकाश नहीं है। श्रीकृष्णविमुखताके कारण ही जीवकी बद्धदशा है, इसलिये श्रीकृष्णोन्मुखता होनेपर ही जीवके श्रीकृष्णदास्यरूप स्वधर्मका उदय होता है। कर्म, ज्ञान, योगादि साधनोंके द्वारा श्रीकृष्णोन्मुखता प्राप्त नहीं होती। केवल भक्ति-उन्मुखी सुकृतिके द्वारा ही प्राप्त शुद्धभक्तके सङ्गसे श्रीहरिके नाम-रूप-गुण-लीलाके निरन्तर श्रवण-कीर्तन-स्मरणके द्वारा ही श्रीकृष्णोन्मुखता प्राप्त करके जीवका सुप्त स्वधर्म जाग्रत होता है। श्रीहरि और श्रीहरिनामादि सब प्रकारसे अभिन्न हैं। इसलिये अनुकूल भावके सहित अर्थात् केवल श्रीकृष्णप्रीतिके उद्देश्यसे साधित हरिनामादि श्रवण-कीर्तन प्रक्रिया ही भक्तिके स्वरूप-लक्षणरूपमें वर्णित हुआ है। उसके द्वारा ही जीवके नित्यधर्मगत भगवत्प्रेम तथा अपने स्वरूपगत 'मैं अमुक लक्षणका भगवद्-दास हूँ'—ऐसा शुद्ध अभिमान जाग्रत होता है। किन्तु इसके मध्य एक विशेष बात यह है कि उक्त श्रवण-कीर्तनादिरूपा 358 |

बाइसवाँ अध्याय 22/103-109 ] भक्तियाजन करते समय युगपत् अर्थात् उसके साथ ही अन्यभिलाष-त्याग और ज्ञान-कर्म-योगादिके सहित सम्बन्धको काटना आदि तटस्थ-लक्षणवाली साधन भक्तिका आश्रय करनेपर ही उक्त स्वरूप-लक्षणवाली भक्ति जीवके निर्मल चित्तमें 'प्रेमधन'को उदय कराती है॥ 103-104॥ श्रीहरिका ही श्रवण, कीर्तन और स्मरण ही विधि :- श्रीमद्भागवत (2/1/5)में- तस्माद्भारत सर्वात्मा भगवान् हरिरीश्वरः। श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च स्मर्त्तव्यश्चेच्छताभयम्॥ 107॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 107॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे भारत (परीक्षित), सर्वात्मा भगवान् ईश्वर हरि अभय प्राप्त करनेके इच्छुक व्यक्तियोंके लिये सर्वदा ही श्रवणीय, कीर्तनीय और स्मरणीय हैं॥ 107॥ अनुभाष्य-'मरणासन्न व्यक्तिके लिये क्या करना कर्त्तव्य है?'-राजा परीक्षितके इस प्रश्नके उत्तरमें श्रील शुकदेव गोस्वामी इस प्रश्नकी विशेषरूपसे प्रशंसा करके पहले गृहमें आसक्त व्यक्तियोंकी बद्धदशाका वर्णन करके उससे मुक्त होनेका उपाय बतला रहे हैं,- हे भारत (भरतवंश्य), तस्मात् (कृष्णविमुखो जीवः स्वनिधनं पश्यन्नपि न पश्यति, अतः कारणात्) अभयं (स्वपराभवाभावं मोक्षम्, आत्मत्राणं वा) इच्छता (द्वितीयाभिनिवेशत्यागमभिलषता जनेन इत्यर्थः) सर्वात्मा (सर्वान्तर्यामी) भगवान् ईश्वरः हरिः (एव) श्रोतव्यः (श्रवणीयः) कीर्तितव्यः (कीर्तनीयः) स्मर्त्तव्यः च (स्मरणीयश्च)। श्लोक-भावानुवाद-हे भरतवंशी! कृष्णविमुख जीव अपनी मृत्युको आता देखकर भी देख नहीं पाता, इसलिये अभय अर्थात् अपने पराभवके अभावके अथवा आत्माके त्राणके इच्छाकारीको (द्वितीयाभिनिवेशके त्यागकी इच्छा करनेवाले व्यक्तिको) सर्वान्तर्यामी भगवान् हरिकी कथाका श्रवण, कीर्तन और स्मरण करना उचित है॥ 107॥ अमृतानुकणिका-इस श्लोककी टीकामें श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुरने इस प्रकार कहा है- सर्वात्मा, भगवान् और ईश्वर-इन तीन विशेषणोंके द्वारा मोक्षाभिसन्धिनी, रागानुगा और वैधी भक्तिको कहा गया है। मोक्षाभिसन्धिनी भक्तिके पक्षमें अभय कहनेसे मोक्ष इच्छाकारी व्यक्तिके पक्षमें सर्वात्मा अर्थात् परमात्मा हरि ही श्रवणीय हैं। रागानुगा भक्तिके पक्षमें अभय अर्थात् निष्कम्प, सर्वप्रकारसे भयशून्य जिस प्रकार हो, उस प्रकारसे अभिलाषी अर्थात् लोभयुक्त पुरुषके पक्षमें भगवान् नन्दनन्दन (श्रीकृष्ण) ही श्रवणीय हैं। वैधी भक्तिके पक्षमें अभय कहनेसे जिनसे कोई भी भय नहीं है, वे ही अभय अर्थात् श्रीहरि ही हैं। आत्माके त्राणके इच्छाकारी व्यक्तिके पक्षमें अभय कहनेसे सबके नियामकरूपसे ईश्वर हरि ही श्रवणीय, कीर्तनीय और स्मरणीय हैं। 'कीर्तितव्यश्च एवं स्मर्त्तव्यश्च'-यहाँ दो 'च-कार'के प्रयोगके द्वारा यह कहा गया है कि श्रवण, कीर्तन और स्मरण एक कालमें ही करना उचित है॥ 107॥ वैधीभक्तिके प्रारम्भमें परमहंसावस्थाको प्राप्त करनेसे पहले दैववर्णाश्रमधर्मका पालन; उसकी उत्पत्ति :- श्रीमद्भागवत (11/5/2-3)में- मुखबाहूरुपादेभ्यः पुरुषस्याश्रमैः सह। चत्वारो जज्ञिरे वर्णा गुणैर्विप्रादयः पृथक् ॥ 108॥ य एषां पुरुषं साक्षादात्म-प्रभवमीश्वरम्। न भजन्त्यवजानन्ति स्थानाद् भ्रष्टाः पतन्त्यधः॥ 109॥ अनुवाद-ब्रह्माके मुखसे 'ब्राह्मण', भुजासे 'क्षत्रिय', जङ्घासे 'वैश्य' और पैरोंसे 'शूद्र'-ये चार वर्ण पृथक् पृथक् आश्रमोंके साथ और अपने वर्णगत गुणोंके साथ उत्पन्न हुए थे। इन चारों वर्णाश्रमियोंमेंसे जो अपने प्रभु भगवान् विष्णुका साक्षात् भजन नहीं करके, अपने-अपने वर्णाश्रमके अहङ्कारके कारण उनके भजनमें अवज्ञा करते हैं, वे अपने स्थानसे भ्रष्ट होकर अधःपतित हो जाते हैं॥ 108-109॥ । 359

[ 22/108-124 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य-मध्यलीला 22/27-28 संख्या कृष्णप्रीत्ये भोगत्याग, कृष्णतीर्थे वास। देखें ॥ 108-109 ॥ यावत् निर्वाह-प्रतिग्रह, एकादश्युपवास ॥ 113 ॥ विष्णुस्मृति-उद्दीपक प्रत्येक क्रिया ही 'विधि', धात्र्यश्वत्थ-गो-विप्र-वैष्णव-पूजन। विष्णुस्मृतिविनाशक प्रत्येक क्रिया ही 'निषेध' :- सेवा-नामापराधादि दूरे विसर्जन ॥ 114 ॥ पद्मपुराण-वाक्य (72/100)- अवैष्णव-सङ्ग-त्याग, बहुशिष्य ना करिब। स्मर्त्तव्य सततं विष्णुर्विस्मर्त्तव्यो न जातुचित् । बहुग्रन्थ-कलाभ्यास-व्याख्यान वर्जिब ॥ 115 ॥ सर्वे विधिनिषेधाः स्युरेतयोरेव किङ्कराः ॥ 110 ॥ हानि-लाभे सम, शोकादिर वश ना हइब। अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 110 ॥ अन्यदेव, अन्यशास्त्र निन्दा ना करिब ॥ 116 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'विष्णु सदा ही स्मरणीय हैं, कभी भी विस्मरणीय नहीं हैं' - समस्त प्रकारके विधि विष्णुवैष्णव-निन्दा, ग्राम्यवार्त्ता ना शुनिब। और निषेध इन्हीं दो बातोंके अनुगत हैं। तात्पर्य यह प्राणीमात्रे मनोवाक्ये उद्वेग ना दिब ॥ 117 ॥ है कि शास्त्रोंमें जितनी प्रकारकी 'विधियाँ' उत्पन्न हुई श्रवण, कीर्त्तन, स्मरण, पूजन, वन्दन। हैं और 'निषेध' बतलाये गये हैं, वे सभी उक्त दोनों परिचर्या, दास्य, सख्य, आत्मनिवेदन ॥ 118 ॥ बातोंके आधारपर ही कहे गये हैं। जिसका अवलम्बन करनेसे भगवान् स्मरणपथपर आते हैं, वही कर्त्तव्यके अग्रे नृत्य, गीत, विज्ञप्ति, दण्डवन्नति। रूपमें 'विधि' है; जिस कार्यके द्वारा भगवान्का विस्मरण अभ्युत्थान, अनुव्रज्या, तीर्थगृहे गति ॥ 119 ॥ होता है, वही कार्य ही 'निषेध' है ॥ 110 ॥ परिक्रमा, स्तवपाठ, जप, सङ्कीर्त्तन । अनुभाष्य- धूप-माल्य-गन्ध-महाप्रसाद-भोजन ॥ 120 ॥ विष्णुः सततं स्मर्त्तव्यः, न जातुचित् (कदाचित्) आरात्रिक-महोत्सव-श्रीमूत्तिदर्शन। विस्मर्त्तव्यः- सर्वे विधिनिषेधाः एतयोः (विष्णुस्मरणामस्मरणरुपयोः निजप्रिय-दान, ध्यान, तदीय-सेवन ॥ 121 ॥ विधिनिषेधयोः द्वयोः) एव किङ्कराः (अनुगताः भृत्याः) स्युः (भवेयुः)। 'तदीय'-तुलसी, वैष्णव, मथुरा, भागवत। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 110 ॥ एइ चारिर सेवा हय कृष्णेर अभिमत ॥ 122 ॥ असंख्य वैधी-भक्तिमेंसे चौंसठ भक्तिके अङ्गोंका वर्णन :- कृष्णार्थे अखिलचेष्टा, तत्कृपावलोकन। विविधाङ्ग साधनभक्तिर बहुत विस्तार। जन्म-दिनादि-महोत्सव लञा भक्तगण ॥ 123 ॥ संक्षेपे कहिये किछु साधनाङ्ग-सार ॥ 111 ॥ सर्वथा शरणापत्ति, कार्त्तिकादि-व्रत। अनुवाद-अनेक अङ्गोंवाली साधनभक्तिका बहुत 'चतुःषष्ठि अङ्ग' एइ परम-महत्त्व ॥ 124 ॥ विस्तृत वर्णन है। मैं संक्षेपमें साधनके अङ्गोंका सार बतला रहा हूँ ॥ 111 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 112-124 ॥ गुरुपादाश्रय, दीक्षा, गुरुर सेवन। अमृतप्रवाह भाष्य - (1) गुरुपादाश्रय, (2) दीक्षा सद्धर्म-शिक्षा-पृच्छा, साधुमार्गानुगमन ॥ 112 ॥ अर्थात् मन्त्रदीक्षा, (3) गुरुसेवा, (4) सद्धर्म-शिक्षा और जिज्ञासा, (5) साधुओंके पथका अनुगमन, 360

बाइसवाँ अध्याय 22/112-126 ]

(6) श्रीकृष्णप्रीतिके लिये अपना भोगत्याग, (7) श्रीकृष्ण- तीर्थमें वास, (8) जितना मात्र प्राप्त होनेपर जीवनका निर्वाह होता है, उसी परिमाणमें ग्रहण करना, (9) एकादशीका उपवास और (10) आँवला, पीपल, गो, ब्राह्मण, वैष्णवका सम्मान,-ये दस अङ्ग ही भजनके प्रारम्भिक रूप हैं; एवं (11) सेवापराध और नामापराधका दूरसे ही त्याग, (12) अवैष्णव-सङ्गत्याग, (13) बहुतसे शिष्य नहीं बनाना, (14) बहुतसे ग्रन्थोंमें कला अर्थात् आंशिक अभ्यास और व्याख्यावादका त्याग, (15) हानि और लाभमें समबुद्धि, (16) शोकादिके वशीभूत नहीं होना, (17) अन्य देवता अथवा शास्त्रोंकी अवज्ञा नहीं करना, (18) विष्णु और वैष्णवोंकी निन्दा नहीं सुनना, (19) ग्राम्यवार्त्ता अर्थात् स्त्री-पुरुषकी इन्द्रियतृष्टिमूलक गृहवार्त्ताको नहीं सुनना, (20) प्राणीमात्रके मनमें उद्वेग उत्पन्न नहीं करना, - इन बाकी दस निषेध-लक्षण अङ्गोंका व्यतिरेक-भावसे (वर्जनके रूपसे) अनुष्ठान करना। 'व्यवहारे अकार्पण्य' और 'महारम्भेरे अनुद्यम' - इन दोनोंको भक्तिरसामृतसिन्धुमें इन दस अङ्गोंमें रखा गया है। भक्तिरसामृतसिन्धुमें इस ग्रन्थमें लिखित 'ग्राम्यवार्त्ता मत सुनना'-यह अङ्ग पूर्वोक्त दस अङ्गोंमें उद्धृत नहीं किया गया है। ये बीस अङ्ग ही भजनमन्दिरमें प्रवेश-द्वारस्वरूप हैं। इनमेंसे 'गुरु-पादाश्रय', 'दीक्षा' और 'गुरुसेवा'-ये तीन अङ्ग प्रधान अङ्गोंमें गिने जाते हैं। (1) श्रवण, (2) कीर्त्तन, (3) स्मरण, (4) पूजन, (5) वन्दन, (6) परिचर्या, (7) दास्य, (8) सख्य, (9) आत्म-निवेदन, (10) श्रीविग्रहके आगे नृत्य, (11) गीत-गान, (12) विज्ञप्ति (अपनी प्रार्थना भगवान्‌के सामने रखना), (13) दण्डवत् प्रणाम, (14) अभ्युत्थान अर्थात् भगवान् अथवा भक्तको आते देखकर उठना, (15) अनुव्रज्या अर्थात् भक्त अथवा भगवान्‌के यात्रा करनेपर उनके पीछे-पीछे जाना, (16) तीर्थ और भगवद्-गृहमें (धाममें) जाना, (17) परिक्रमा; (18) स्तवपाठ, (19) जप, (20) सङ्कीर्त्तन, (21) भगवान्‌की प्रसादी धूप और मालाकी गन्धको ग्रहण करना, (22) महाप्रसादका सेवन, (23) आरति आदि महोत्सवोंका दर्शन, (24) श्रीमूर्त्तिका दर्शन, (25) अपनी प्रियवस्तु भगवान्‌को समर्पित करना, (26) ध्यान। तदीय अर्थात् भगवान्‌से अभिन्न वस्तुओंकी सेवा- (27) तुलसी आदिकी सेवा, (28) वैष्णव-सेवा, (29) मथुरा-वास और (30) भागवतका आस्वादन, (31) श्रीकृष्णके लिये समस्त चेष्टाएँ, (32) उनकी कृपाकी प्रतीक्षा, (33) भक्तोंके साथ जन्मदिन (जन्माष्टमी) आदि महोत्सवका पालन, (34) सब प्रकारसे शरणागति, (35) कार्त्तिकादि व्रत, - इन पैंतीस अङ्गोंमें और चार अङ्गोंका योग करना होगा अर्थात् देहमें (1) वैष्णवचिह्न धारण, (2) हरिनामाक्षरधारण, (3) निर्माल्यधारण और (4) चरणामृत पान; - इन चार अङ्गोंको श्रीकविराज गोस्वामीने अर्चनादिके अन्तर्गत स्वीकार किया है। इन चार अङ्गोंके योगसे उनतालीस (39) अङ्ग होते हैं, उनमें (1) साधुसङ्ग (2) नामकीर्त्तन, (3) भागवत-श्रवण, (4) मथुरावास, (5) श्रद्धापूर्वक श्रीमूर्त्तिसेवारूपी अन्य पाँच अङ्गोंका पुनः योग करना होगा। श्रीरूपगोस्वामीने (भःरःसिः पूर्व विभाग, द्वितीय लहरीमें चौंसठ वैधीभक्तिके अङ्गोंके वर्णनके अन्तमें लिखा है, - "अङ्गानां पञ्चकस्यास्य पूर्वविलिखितस्य च। निखिलश्रेष्ठ्यबोधाय पुनरप्यत्र शंसनम्॥", इन पाँच अङ्गोंका योग करनेसे चौवालीस अङ्ग होते हैं। इन चौवालीसको पहले बतलाये गये बीसके साथ योग करनेपर कुल मिलाकर चौंसठ अङ्ग होते हैं। ये भक्तिके चौंसठ-अङ्ग ही शरीर, इन्द्रिय और अन्तःकरणके द्वारा पृथक् पृथक् यजन अथवा उपासना है। इनमेंसे कुछ बिल्कुल ही पृथक् हैं, और कुछ मिश्रित-भाववाले हैं॥ 112-126 ॥ उनमेंसे साधुसङ्गादि पाँच भक्तिके अङ्गोंकी सर्वश्रेष्ठता :- साधुसङ्ग, नामकीर्त्तन, भागवतश्रवण। मथुरावास, श्रीमूर्त्तिर श्रद्धाय सेवन ॥ 125 ॥

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[ 22/125-129 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला उनके आंशिक अनुष्ठानके प्रभावसे ही श्रीकृष्ण-प्रेमका उदय :- सकलसाधन-श्रेष्ठ एइ पञ्च अङ्ग। कृष्णप्रेम जन्माय एइ पाँचरे अल्प सङ्ग ॥ 126 ॥ अनुवाद-साधुसङ्ग, नाम-कीर्तन, भागवत-श्रवण, मथुरावास और श्रीमूर्तिकी श्रद्धापूर्वक सेवा, समस्त प्रकारके साधन-अङ्गोंमें ये पाँच अङ्ग सबसे श्रेष्ठ हैं। इन पाँचोंके अल्प सङ्गसे ही श्रीकृष्णप्रेम उत्पन्न हो जाता है॥ 125-126॥ साधुसङ्ग और भागवत-श्रवण-कीर्तनकी विधि :- भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/90-91)- सजातीयाशये स्निग्धे साधौ सङ्गः स्वतो वरे। श्रीमद्भागवतार्थानामास्वादो रसिकैः सह ॥ 127 ॥ विशेषतः श्रीविग्रहपूजा, श्रीनामसङ्कीर्तन और श्रीधामवासका माहात्म्य :- श्रद्धा विशेषतः प्रीतिः श्रीमूर्तेरङ्घ्रिसेवने। नामसङ्कीर्तनं श्रीमन्मथुराण्डले स्थितिः॥ 128 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 127-128 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-समजातीय वासनाके द्वारा स्निग्ध, किन्तु अपनेसे श्रेष्ठ साधुका सङ्ग करना। ऐसे रसिक साधुओंके साथ श्रीमद्भागवतके अर्थोंका आस्वादन करना। श्रद्धासे श्रीमूर्तिकी पदसेवामें प्रीति, नामसङ्कीर्तन और मथुरामण्डलमें वास करना॥ 127-128 ॥ अनुभाष्य- सजातीयाशये (समजातीयवासनाविशिष्टे) स्निग्धे (गाढ़- विश्रम्भात्मक-स्नेहपरे) स्वतः वरे (श्रेष्ठे) साधौ सङ्गः [कार्यः]। रसिकैः (कृष्णभजनविज्ञैः) सह श्रीमद्भागवतार्थानाम् आस्वादः (कार्यः, तात्पर्यं ग्रहणीयमित्यर्थः-श्रौतमार्ग-भक्तियोगत्यागी वैयाकरणस्य शाब्दिकस्य योषित्सङ्गिगृहव्रतस्य विष्णुवैष्णवविरोधिनः मायावादिनः नामापराधिनः वेषोपजीविनः मन्त्रजीविनः भागवतजीविनः इन्द्रियतर्पणरत-विषयिणश्च "यस्य देवे पराः भक्तिः” इति “भक्त्या भागवतं ग्राह्यं न बुद्ध्या न च टीकया” इति श्रुति-स्मृतिवचनात् तेषां पारमहंस्यशास्त्रार्थ-बोधासम्भवात् ग्रन्थतात्पर्यार्थग्रहणे अनधिकारत्वाच्च)। श्रीमूर्तेरङ्घ्रिसेवने श्रद्धा विशेषतः (विशेषेण) प्रीतिः (बहिःपूजायाम् अर्चने सामान्यतः, ब्रजदम्पत्योः मानससेवायां विशेषतः सार्वकालिकभजनानुरागः), नामसङ्कीर्तनं (नामभजनं), श्रीमन्मथुराण्डले स्थितिः (कृष्णवसतिस्थले अवस्थानम्- श्रीगौरमण्डलभूमौ चिन्तामणिज्ञानं, तदेव मथुरावासः इति श्रीमन्नरोत्तमप्रभुचरणैः प्रेमभक्तिचन्द्रिकायां निर्णीतम्। श्रीगौरविलासभूमि-श्रीमायापुरादिधामवासः श्रीक्षेत्र-दाक्षिणात्य- व्रजमण्डलादिधामवासश्च मथुरावासेन सह अभिन्नो ज्ञेयः। तद्भेदवादिनां तथाकथित-मथुरावासोऽपि प्राकृत-भोगमयः अधोगतिप्रदश्चेति)। श्लोक-भावानुवाद-समजातीयवासनायुक्त गाढ़- विश्रम्भात्मक-स्नेहपर अपनेसे श्रेष्ठ साधुका सङ्ग करना। श्रीकृष्णभजनविज्ञके साथ श्रीमद्भागवतके तात्पर्यको ग्रहण करना। ("यस्य देवे पराः भक्तिः" और "भक्त्या भागवतं ग्राह्यं न बुद्ध्या न च टीकया",-श्रुति-स्मृति वचनोंके अनुसार श्रौतमार्ग-भक्तियोगत्यागी वैयाकरण-पण्डित, श्रुतियोंके विद्वान, स्त्रीसङ्गी गृहव्रतधारी, विष्णु-वैष्णवविरोधी मायावादी, नामापराधी, वेष-मन्त्र-भागवतादिको जीविका बनानेवाले और इन्द्रियभोगमें रत विषयी लोगोंको पारमहंस्य-शास्त्रका अर्थ बोध होना सम्भव नहीं है, उनका ग्रन्थके तात्पर्यार्थको ग्रहण करनेका अधिकार नहीं है।)। श्रद्धासे श्रीमूर्तिकी पदसेवामें विशेष प्रीति (अर्थात् बाहरसे अर्चन सामान्य प्रीति है, सब समय भजनमें अनुरागके साथ व्रजदम्पत्तिकी मानससेवा विशेष प्रीति है), नामभजन और श्रीमथुरामण्डलमें वास करना (श्रीगौरमण्डलभूमिको चिन्तामणि जानकर वहाँ भी वास मथुरावास ही है-ऐसा श्रीमन्नरोत्तमप्रभुने प्रेमभक्तिचन्द्रिकामें निर्णीत किया है। श्रीगौरविलासभूमि अर्थात् श्रीमायापुरादि- धामवास, श्रीक्षेत्र-दक्षिणभारत-व्रजमण्डलादिधामवासको मथुरावासके साथ अभिन्न जानना चाहिये। उनमें भेद माननेवालेका तथाकथित मथुरावास भी प्राकृत-भोगमय है और वह अधोगतिको प्रदान करता है।)॥ 127-128 ॥ भक्तिरसामृत सिन्धु (1/2/238) :- दुरुहाद्भुतवीर्येऽस्मिन् श्रद्धा दूरेऽस्तु पञ्चके। यत्र स्वल्पोऽपि सम्बन्धः सद्धियां भावजन्मने ॥ 129 ॥ 362 |

बाइसवाँ अध्याय 22/129-132 ] अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 129 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सहसा दुर्बोध और अद्भुत शक्तिसम्पन्न अन्तिम पाँच अङ्गोंमें श्रद्धाकी बात तो दूर रहे, अति अल्प सम्बन्ध उत्पन्न होनेपर भी वह निरपराधी व्यक्तिकी भावोत्पत्तिका कारण बन जाता है॥ 129 ॥ अनुभाष्य— अस्मिन् दुरूहाद्भुतवीर्ये (दुःसाध्ये अपूर्वे च प्रभावमये) पञ्चसु (साधुसङ्गाद्यङ्गेषु पञ्चसु) श्रद्धा दूरे अस्तु, यत्र (साधनश्रेष्ठाङ्गपञ्चके) स्वल्पः सम्बन्धः अपि सद्धियां (सद्बुद्धिमतां सुचतुराणां वैष्णवानां) भावजन्मने (भावस्य अभिव्यक्तये समर्थः भवतीति शेषः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 129 ॥ इनमेंसे प्रत्येकके निरन्तर अनुशीलनसे श्रीकृष्णप्रेमकी प्राप्ति :— 'एक' अङ्ग साधे, केह साधे 'बहु' अङ्ग। 'निष्ठा' हैते उपजाय प्रेमेर तरङ्ग ॥ 130 ॥ अनुवाद—यदि कोई (नवधा) भक्तिके केवल किसी एक ही अङ्गका पालन करता है अथवा अनेक अङ्गोंका पालन करता है, उसके द्वारा अनर्थ निवृत्ति होकर निष्ठा उदित होती है और निष्ठासे प्रेम उत्पन्न होता है॥ 130 ॥ अनुभाष्य—भजनानुष्ठानके फलसे जीवकी अनर्थ निवृत्ति होनेसे ही निष्ठा उदित होती है; निष्ठासे प्रेम उत्पन्न होता है ॥ 130 ॥ नवधा भक्तिमेंसे किसीके द्वारा एक अङ्गके और किसीके द्वारा सभी अङ्गोंके अनुशीलनसे सिद्धि या भगवत्प्रेमकी प्राप्ति :— 'एक' अङ्गे सिद्धि पाइल बहु भक्तगण। अम्बरीषादि भक्तरे 'बहु' अङ्ग-साधन ॥ 131 ॥ अनुवाद—नवधा भक्तिके किसी एक अङ्गका पालन करनेसे बहुतसे भक्तोंको सिद्धिकी प्राप्ति हुई है। अम्बरीषादि भक्तों ने बहुतसे अङ्गोंका साधन किया था और उन्हें सिद्धि प्राप्त हुई थी॥ 131 ॥ नवधा भक्तिके एक-एक अङ्गके अनुशीलनमें रत भक्तोंके नाम :— पद्यावली (53) और भःरःसिः (1/2/263)में— श्रीविष्णोः श्रवणे परीक्षिदभवद्वैयासकिः कीर्त्तने प्रह्लादः स्मरणे तदङ्घ्रिभजने लक्ष्मीः पृथुः पूजने। अक्रूरस्त्वभिवन्दने कपिपतिर्दास्येऽथ सख्येऽर्जुनः सर्वस्वात्मनिवेदने बलिरभूत् कृष्णाप्तिरेषां परम् ॥ 132 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 132 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—राजा परीक्षितने श्रीविष्णुकी कथा-श्रवणसे, शुकदेवने उसके कीर्त्तनसे, प्रह्लादने उसके स्मरणसे, लक्ष्मीने उनके चरणकमलोंकी सेवासे, पृथु राजाने उनके पूजनसे, अक्रूरने उनकी वन्दनासे, कपिपति हनुमानने उनके दास्यसे, अर्जुनने उनके सख्यसे और बलिने उन्हें सर्वस्व और आत्मनिवेदनसे श्रेष्ठरूपमें श्रीकृष्णको प्राप्त किया था॥ 132 ॥ अनुभाष्य— परीक्षित् (विष्णुरातः) श्रीविष्णोः श्रवणे (श्रीमद्भागवतोक्त- कृष्णनामरूपगुणलीला-श्रवणे), वैयासकिः (ब्रह्मरातः शुकदेवः) कीर्त्तने (श्रीहरिकथात्मक श्रीमद्भागवत-कीर्त्तने), प्रह्लादः [विष्णोः] स्मरणे [शुद्धान्तःकरणत्वात्], लक्ष्मीः तदङ्घ्रिभजने (नारायण-पादपद्मसेवने), पृथुः [विष्णोः] पूजने (अर्चने), अक्रूरः तु [यादवस्य] अभिवन्दने, कपिपतिः (हनुमान्) दास्ये (रामकैङ्कर्ये), अर्जुनः [कृष्णेन सह] सख्ये, बलिः (प्रह्लाद-पौत्रः) सर्वस्वात्मनिवेदने (आत्मसमर्पणे) परं (केवलं निष्ठितः) अभूत्; एषां (हरिजनानाम्) [एकैकाङ्गनिष्ठया एव] कृष्णाप्तिः (कृष्णलाभः अभूत्)। श्लोक-भावानुवाद—परीक्षितने श्रीमद्भागवतमें उक्त श्रीकृष्णनामरूपगुणलीलाके श्रवणसे, शुकदेवने श्रीहरि- कथात्मक श्रीमद्भागवतके कीर्त्तनसे, प्रह्लादने शुद्धान्तःकरणसे विष्णु-स्मरणसे, लक्ष्मीने श्रीनारायण-चरणकमलोंके सेवनसे, पृथुने विष्णुके अर्चनसे, अक्रूरने यदुकुलश्रेष्ठ श्रीकृष्णके अभिवन्दनसे, कपिपति हनुमान्ने श्रीरामके कैङ्कर्यसे, । 363

[ 22/132-136 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अर्जुनने श्रीकृष्णके साथ सख्यभावसे, प्रह्लाद-पौत्र बलिने आत्मसमर्पणसे श्रीकृष्णकी परम प्राप्ति की है। इन भक्तोंने एक-एक अङ्गमें निष्ठासे ही श्रीकृष्णकी प्राप्ति की है॥ 132॥ श्रीअम्बरीषका सभी इन्द्रियोंके द्वारा श्रीकृष्णानुशीलन :- श्रीमद्भागवत (9/4/18-20)में- स वै मनः कृष्णपदारविन्दयो- र्वचांसि वैकुण्ठगुणानुवर्णने। करौ हरेर्मन्दिरमार्जनादिषु श्रुतिञ्चकाराच्युत-सत्कथोदये॥ 133 ॥ मुकुन्दलिङ्गालयदर्शने दृशौ तद्भृत्यगात्रस्पर्शोऽङ्गसङ्गमम्। घ्राणञ्च तत्पादसरोजसौरभे श्रीमत्तुलस्या रसनां तदर्पिते॥ 134 ॥ पादौ हरेः क्षेत्रपदानुसर्पणे शिरो हृषीकेश-पदाभिवन्दने। कामञ्च दास्ये न तु कामकाम्यया यथोत्तमश्लोकजनाश्रया रतिः॥ 135 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 133-135॥ अनुभाष्य- विष्णुरात परीक्षितके द्वारा महाभागवत ब्राह्मण-गुरु अम्बरीषके अप्राकृत श्रीकृष्णसेवामय चरित्रके सम्बन्धमें जिज्ञासा करनेपर श्रील शुकदेव गोस्वामी अम्बरीषकी सभी इन्द्रियोंके द्वारा हृषीकेशकी सेवा-वृत्तिका वर्णन कर रहे हैं,- उत्तमःश्लोकजनाश्रया (हरिजनानुगता) रतिः (अभिरुचिः) यथा [भवेत्, तथा] सः अम्बरीषः कृष्णपदारविन्दयोः (कृष्णपादपद्मयोः) मनः, वैकुण्ठगुणानुवर्णने (हरिगुणमहिमकथने) वचांसि (वाक्यानि), हरेः मन्दिरमार्जनादिषु (भगवदालय-वैष्णवचरण- नीराजन-धौति-लेपनादिकर्माणि शङ्खचक्राद्यूर्ध्वपुण्ड्र वा) करौ (भुजौ), अच्युतसत्कथोदये (अच्युतस्य विष्णोः सत्कथानाम् उदये) श्रुतिं (कर्णद्वयं), मुकुन्दलिङ्गालयदर्शने (कृष्णस्य लिङ्गानाम् अर्चानाम् आलयानि मन्दिराणि तेषां दर्शने) दृशौ (नेत्रे), तद्भृत्यगात्रस्पर्शे (हरिजनशरीरस्पर्शने) अङ्गसङ्गमम् (त्वचा उत्तमाङ्गस्पर्शनं), श्रीमत्तुलस्याः (श्रीमत्याः तुलस्याः) तत्पादसरोजसौरभे (भगवच्चरणपद्मेन यत् सौरभं तस्मिन् गन्धे) घ्राणं (नासिकां), तदर्पिते (तस्मै कृष्णाय निवेदिते महाप्रसादादौ) रसनां (जिह्वां), हरेः क्षेत्रपदानुसर्पणे (धामपरिक्रमादौ) पादौ, हृषीकेशपदाभिवन्दने (गोविन्दचरणप्रणमनादौ) शिरः (मस्तकं), दास्ये (भगवदुपयुक्तस्रग्गन्धवासोऽलङ्कारादीनां महाप्रसादत्वेन स्वीकारे) कामं च न तु कामकाम्यया (भोगेच्छया), चकार (नियुक्तवान्)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 133-135॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अम्बरीष राजाने अपने मनको श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें, अपनी वाणीको वैकुण्ठ- गुणानुवर्णनमें, अपने दोनों हाथोंको हरिमन्दिर मार्जनादिमें और अपने कानोंको श्रीकृष्णकथा श्रवणमें और श्रीकृष्णकी श्रीमूर्त्ति दर्शनमें अपने दोनों नेत्रोंको, श्रीकृष्ण दासोंके शरीरके स्पर्शमें अपने अङ्गोंको, श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी सुगन्धको सूंघनेमें अपनी नासिकाको, श्रीकृष्णको अर्पित तुलसीके आस्वादनमें अपनी जिह्वाको, श्रीकृष्णक्षेत्रमें अनुगमनमें अपने दोनों चरणोंको, हृषीकेशके चरणोंमें प्रणतिके लिये अपने मस्तकको, कामरहित दास्यमें अपने 'काम'को इस प्रकार नियुक्त किया था कि उससे श्रीकृष्णभक्तोंमें आश्रययोग्य रति उदित होती है॥133-135॥ ऐकान्तिक शरणागत भक्त श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य किसीके भी द्वारा बाध्य नहीं :- काम-त्यजि' कृष्ण भजे शास्त्र-आज्ञा मानि'। देव-ऋषि-पितृदिगेर कभु नहे ऋणी॥ 136 ॥ अनुवाद-जो समस्त प्रकारकी कामनाओंको छोड़कर शास्त्रकी आज्ञा मानकर केवल श्रीकृष्णका भजन करता है, वह देवताओं, ऋषियों, पितरों आदिका कभी भी ऋणी नहीं होता॥ 136 ॥ अनुभाष्य-देवऋण, ऋषिऋण, पितृऋण, भूतऋण और मनुष्यऋण,-ये पाँच ऋण पाँच प्रकारके यज्ञोंके द्वारा चुकाये जाते हैं। “अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञस्तु 364 |

बाइसवाँ अध्याय 22/136-140 ] तर्पणम्। होमो दैवो बलिर्भौतो नृयज्ञोऽतिथिपूजनम्॥" होमके द्वारा देवयज्ञ, अध्यापनके द्वारा ब्रह्मयज्ञ अथवा ऋषि-यज्ञ, तर्पणके द्वारा पितृयज्ञ, बलिके द्वारा भूतयज्ञ और अतिथि पूजाके द्वारा नृयज्ञ (मनुष्ययज्ञ) सम्पन्न होता है॥136॥ वैधी भक्तिके अधिकारीके लिये पाँच प्रकारके यज्ञादि कर्मकाण्डकी अनावश्यकता :- श्रीमद्भागवत (11/5/41)में- देवर्षिभूताप्तनॄणां पितॄणां न किङ्करो नायमृणी च राजन्। सर्वात्मना यः शरणं शरण्यं गतो मुकुन्दं परिहृत्य कर्त्तम्॥137॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥137॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो सांसारिक कर्त्तव्योंको पूर्णरूपसे त्याग करके सम्पूर्णरूपमें शरण लेने योग्य श्रीमुकुन्दके शरणागत हुए हैं, हे राजन्, वे देवताओं, ऋषियों, अन्य प्राणियों, आत्मीयजनों, मनुष्यों, पितरोंके ऋणी नहीं रह जाते। तात्पर्य यह है कि मनुष्य जन्म लेनेके साथ ही इन सबके ऋणोंसे ऋणी बन जाता है और शास्त्रोंके मतानुसार बहुत प्रकारके कर्त्तव्यानुष्ठानके द्वारा इन सब ऋणोंको चुकाता है। किन्तु जो समस्त प्रकारकी कामनाओंका परित्याग करके श्रीकृष्णके चरणोंमें शरणागत होता है, उसके ये सब ऋण उपयुक्त कर्मानुष्ठान नहीं करनेपर भी चुक जाते हैं॥137॥ अनुभाष्य-श्रीनारदने श्रीवसुदेवसे भागवतधर्मका वर्णन करते हुए विदेहराज निमि और नवयोगेन्द्रके संवादका वर्णन किया था। पहले आठ योगेन्द्रोंके द्वारा क्रमशः राजा निमिके प्रश्नोंका उत्तर देनेके करभाजन ऋषि निमिको भगवान् विष्णुके चार युगावतारोंके वर्ण-भेद और उपासना-भेद तथा भारतके विभिन्न स्थानोंपर भविष्यमें वैष्णवोंके आविर्भावका वर्णन करके अन्तमें श्रीकृष्णके एकान्त शरणागतोंकी महिमाको निम्नलिखित दो श्लोकोंमें बतला रहे हैं,- हे राजन् यः (जनः) कर्त्तं (भेदं, कृत्यं स्वधर्मं वा) परिहृत्य (परित्यज्य) सर्वात्मना (कायेन मनसा वाचा) शरण्यं (सर्वाश्रयं) मुकुन्दं शरणं गतः, (सः) अयं देवर्षिभूताप्तनॄणां (देवानाम् ऋषीणां भूतानाम् आप्तानां पोष्य-कुटुम्बिनां नॄणां) पितॄणां न किङ्करः (बाध्यः) न ऋणी च [अतः भक्तिमार्गाश्रितस्य फलकामि-कर्मिवत् पञ्चयज्ञानुष्ठानस्यावश्यकता नास्त्येवेत्यर्थः]। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। [इसलिये भक्तिमार्गके आश्रितको फलकामी कर्मियोंकी भाँति पञ्च-यज्ञोंके अनुष्ठानकी आवश्यकता नहीं है-यह अर्थ है]॥137॥ वैष्णव कभी भी पापी नहीं होता अथवा पापी कभी भी वैष्णव नहीं हो सकता :- विधि-धर्म छाड़ि' भजे कृष्णेर चरण। निषिद्ध पापाचारे तार कभु नहे मन॥138॥ दैववश साधकसे पाप होनेपर भी श्रीकृष्णकी कृपासे उसकी सम्पूर्ण पाप-निवृत्ति :- अज्ञाने वा हय यदि 'पाप' उपस्थित। कृष्ण ताँरे शुद्ध करे, ना कराय प्रायश्चित॥139॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥138-139॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो वैदिक विधिके अन्तर्गत सभी प्रकारके धर्मोंका पूर्ण त्याग करके निष्किञ्चन होकर भजन करता है, उसकी स्वाभाविक रूपसे किसी निषिद्ध पापाचारमें मति नहीं होती, यदि किसी कारणसे पाप उपस्थित भी होता है अर्थात् पाप कार्य हो जाता है, श्रीकृष्ण उससे कोई प्रायश्चित कराये बिना ही शुद्ध कर देते हैं॥138-139॥ अन्तर्यामी-चैत्यगुरुरूपमें पाप-शोधन :- श्रीमद्भागवत (11/5/42)में- स्वपादमूलं भजतः प्रियस्य त्यक्तान्यभावस्य हरिः परेशः। विकर्म यच्चोत्पतितं कथञ्चित् धुनोति सर्वं हृदि सन्निविष्टः॥140॥ । 365

[ 22/140–142 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

[बायाँ स्तम्भ]

अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 140 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो अन्यभावको पूर्णरूपसे त्याग करके स्वयं श्रीहरिके चरणकमलोंका भजन करते हैं, श्रीकृष्णके प्रिय उन व्यक्तियोंके द्वारा यदि कभी पापका आचरण होता है, तो परमेश्वर श्रीहरि उनके हृदयमें वास करते हुए उनके उस पापको विनष्ट कर देते हैं॥ 140 ॥ अनुभाष्य— स्वपादमूलं (निजपादपल्लवं) भजतः (सेवनकारिणः) प्रियस्य (प्रेमवतः) त्यक्तान्यभावस्य (त्यक्तः भगवतः हरेः शुद्धनिष्कामसेवनात् अन्यस्मिन् देहादौ देवान्तरे वा भावः येन तस्य, अनन्यभक्तिपरायणस्य तस्य) कथञ्चित् (प्रमादिना) विकर्म (निषिद्धं कर्म) उत्पतितं (दुर्दैवात् अनुष्ठितं भवेत्) [तत् अपि] सर्वं परेशः हरिः हृदि सन्निविष्टः (अन्तर्यामिरूपेण स्थितः) धुनोति (विनाशयति)। श्लोक-भावानुवाद—भगवान् श्रीहरिके चरणकमलोंकी सेवा करनेवाले प्रिय भक्त जो उनकी शुद्ध निष्कामसेवाके अतिरिक्त अन्य देहादि और देवताओंके प्रति भावोंको त्यागकर अनन्यभक्तिपरायण हैं, उनसे कभी प्रमादवश दुर्भाग्यसे कोई निषिद्ध कर्म हो जाता है, तो परमेश्वर श्रीहरि अन्तर्यामी रूपमें स्थित रहकर उनके उस पापका विनाश कर देते हैं॥ 140 ॥ मनोधर्म ज्ञान और वैराग्य कभी भी आत्मधर्म भक्तिके अङ्ग नहीं, भक्तिके अनुगामी दो पुत्र मात्र :— ज्ञान-वैराग्यादि—भक्तिर कभु नहे 'अङ्ग'। अहिंस-यम-नियमादि बुले कृष्णभक्त-सङ्ग॥ 141 ॥ अनुवाद—ज्ञान-वैराग्यादि कभी भी 'भक्ति'के अङ्ग नहीं हैं। अहिंसा-यम-नियमादि सद्गुण स्वयं ही श्रीकृष्ण- भक्तके साथ चलते हैं॥ 141 ॥ अनुभाष्य—अनेक लोग भ्रान्तिवशतः सोचते हैं कि ज्ञान और कर्मके लिये वैराग्य ही शुद्धभक्तिका सोपान (सीढ़ी) है, वास्तवमें ऐसा निश्चित रूपमें नहीं है। ज्ञान अथवा कर्मसे उत्पन्न वैराग्य निज-स्वरूपको लक्ष्य


[दायाँ स्तम्भ]

नहीं करता और यह अनित्य-अवस्थाका परिणामशील एक धर्म है, इसलिये वह नित्य श्रीकृष्णदास्यका अङ्ग नहीं है। कर्म और ज्ञानका फल परिणामशील अनित्य- अनुभूतिका एक विकार है एवं भोग और मोक्ष ही उसकी परिणति हैं, इसलिये नित्यभक्तिके साथ उसका कोई भी सम्बन्ध नहीं है। ज्ञान अथवा वैराग्य परित्यक्त होनेपर (छोड़नेपर) ही शुद्धभक्ति हो सकती है। श्रीकृष्णभक्त स्वभावसे ही हिंसाशून्य, संयमशाली और नियमोंमें रत रहते हैं। उन्हें इन सब गुणोंको अर्जित नहीं करना पड़ता॥ 141 ॥ भक्तिके बिना ज्ञान-वैराग्यसे श्रेयलाभ नहीं होता :— श्रीमद्भागवत (11/20/31)— तस्मान्मद्भक्तियुक्तस्य योगिनो वै मदात्मनः। न ज्ञानं न च वैराग्यं प्रायः श्रेयो भवेदिह ॥ 142 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 142 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मेरे प्रति भक्तियुक्त, मुझमें एकान्तिक चित्तवाले प्रिय योगीके लिये ज्ञानचेष्टा और वैराग्यचेष्टा प्रायः ही श्रेयस्कर नहीं होती। तात्पर्य यह है कि भक्ति स्वाभावतः स्वतन्त्र है; ज्ञान-वैराग्य-योगादि प्राथमिक अवस्थामें उसके लिये किञ्चित् उपयोगी होनेपर भी भक्तिके अङ्गोंमें नहीं गिने जाते॥ 142 ॥ अनुभाष्य—श्रीमद् उद्धवने श्रीकृष्णसे विधि और निषेधात्मक भगवद्-आज्ञारूप वेदवाक्योंसे जीवोंकी भोग-बुद्धिकी उत्पत्ति, पुनः उन्हीं वेदवाक्योंके द्वारा ही भोगबुद्धिके विनाशके विषयमें श्रवण करके उनसे जीवकी बुद्धि-भ्रान्ति अथवा मोहको दूर करनेके उपायकी जिज्ञासा की। भगवान्ने सर्वप्रथम कर्म, ज्ञान और भक्तिमार्गके तारतम्य (छोटे-बड़े होनेका) वर्णन करनेके बाद भक्तिकी सर्वश्रेष्ठताका वर्णन किया,— तस्मात् (भक्तेः सर्वोपाधि-विनिर्मुक्तत्वात्) वै (निश्चितं) मद्भक्तियुक्तस्य मदात्मनः (मयि कृष्णे आत्मा मनः यस्य तस्य) योगिनः (भक्तियोगयुक्तस्य जनस्य) इह न ज्ञानं, न च वैराग्यं प्रायः श्रेयः (निःश्रेयसकारणं) भवेत्।

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बाइसवाँ अध्याय 22/142-148 ] [बायाँ स्तम्भ] श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 142 ॥ शुद्धभक्त दूसरोंको उद्वेग नहीं देते :- स्कन्दपुराणके वचन- एते न ह्यद्भुता व्याध तवाहिंसादयो गुणाः। हरिभक्तौ प्रवृत्ता ये न ते स्युः परतापिनः ॥ 143 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 143 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे व्याध, तुममें जो अहिंसादि गुण उत्पन्न हुए हैं, वह अद्भुत नहीं है, क्योंकि, जो हरिभक्तिमें प्रवृत्त होता है, वह दूसरोंको कष्ट देनेवाला नहीं होता ॥ 143 ॥ अनुभाष्य- हे व्याध, तव एते अहिंसादयः गुणाः अद्भुताः (असाधारणाः) न; हि (यतः) ये (जनाः) हरिभक्तौ (कृष्णभजने) प्रवृत्ताः (अनुरताः), ते (भक्ताः) परतापिनः (अपरद्रोहपराः) न स्युः (भवन्ति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 143 ॥ (ख) रागानुगा-भक्तिका वर्णन :- वैधीभक्ति-साधनेर कहिलुँ विवरण। रागानुगा-भक्तिर लक्षण शुन, सनातन ॥ 144 ॥ अनुवाद-हे सनातन, यहाँ तक मैंने वैधीभक्तिके साधनके विषयमें बतलाया। अब तुम रागानुगा-भक्तिके लक्षण सुनो ॥ 144 ॥ रागात्मिका और रागानुगा-भक्तिका परिचय :- रागात्मिका-भक्ति-'मुख्या' व्रजवासि-जने। तार अनुगत भक्तिर 'रागानुगा'-नामे ॥ 145 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 145 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-व्रजवासी भक्तोंकी जो रागस्वरूपा (रागात्मिका) भक्ति है, वही मुख्य है अर्थात् वैसी भक्ति और कहीं भी नहीं है। व्रजवासियोंके अनुगत होकर जो भक्ति विद्यमान रहती है, उसका नाम ही रागानुगा भक्ति है ॥ 145 ॥ [दायाँ स्तम्भ] रागात्मिका-भक्तिकी संज्ञा :- भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/272)- इष्टे स्वारसिकी रागः परमाविष्टता भवेत्। तन्मयी या भवेद्भक्तिः सात्र रागात्मिकोदिता ॥ 146 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 146 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-इष्टवस्तुमें स्वाभाविकी और परमाविष्टतामयी जो सेवनवृत्ति है, उसका नाम 'राग' है; श्रीकृष्णभक्ति तन्मयी (वैसी रागमयी) होनेपर 'रागात्मिका' नामसे कही जाती है ॥ 146 ॥ अनुभाष्य- इष्टे (अभीष्टवस्तुनि या) स्वारसिकी (स्वीय-सिद्धरसोपयोगिनी स्वाभाविकी गाढ़तृष्णामयीत्यर्थः) परमाविष्टता (तदभिनिवेशमयी सेवनप्रवृत्तिः सा,) रागः भवेत्। तन्मयी (एवम्विध रागमयी) या भक्तिः भवेत्, अत्र (शुद्धभक्तिसाहित्ये) सा 'रागात्मिका' उदिता (कथिता)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 146 ॥ रागात्मिका-भक्तिके 'स्वरूप' और 'तटस्थ' लक्षण- 'गाढ़तृष्णा' और 'आविष्टता' :- इष्टे 'गाढ़-तृष्णा'-रागेर स्वरूप-लक्षण। इष्टे 'आविष्टता'-तटस्थ-लक्षण कथन ॥ 147 ॥ रागमयी भक्तिर हय 'रागात्मिका' नाम। ताहा शुनि' लुब्ध हय कोन भाग्यवान् ॥ 148 ॥ अनुवाद-इष्ट-वस्तुमें 'गाढ़-तृष्णा'-रागका स्वरूप- लक्षण है और इष्ट-वस्तुमें 'आविष्टता'को तटस्थ लक्षण कहा जाता है। रागमयी भक्तिका नाम ही 'रागात्मिका' भक्ति है। उसके विषयमें सुनकर किसी भाग्यवान्‌को ही लोभ होता है ॥ 147-148 ॥ अनुभाष्य-अपने आनुकूल्य-विषय अर्थात् अभीष्ट वस्तुमें गाढ़-तृष्णारूपी राग ही मुख्य अर्थात् स्वरूप- लक्षण है। कार्यके द्वारा जिसका ज्ञान होता है, उसे तटस्थ-लक्षण कहते हैं, वही यहाँपर अभीष्ट वस्तुमें आविष्टता है ॥ 147-148 ॥ । 367

[ 22/148–149 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला रागानुगा-भक्तकी प्रकृति अथवा लक्षण :- लोभे व्रजवासीर भावे करे अनुगति। शास्त्रयुक्ति नाहि माने—रागानुगार प्रकृति ॥ 149 ॥ अनुवाद—व्रजवासियोंके भावोंके प्रति लुब्ध होकर जो उनके भावोंका अनुगमन करता है, वह रागानुग भक्त शास्त्र-वचनों और युक्तियोंकी अपेक्षा नहीं करता, यही रागानुग भक्तका स्वभाव है॥ 149 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'अनुगति'—अनुगमन॥ 149 ॥ अनुभाष्य—व्रजवासियोंके भावोंके प्रति लुब्ध होकर उनके भावों और इच्छाओंका अनुगमन करना ही रागानुग भक्तोंकी स्वाभाविकी प्रवृत्ति होती है। जातरुचि भक्त स्वाभाविक रूपमें ही शास्त्रकी युक्तियोंमें सुनिपुण होते हैं, उनकी नित्यसिद्ध रुचिके विरुद्धमें अन्य व्यक्तिके द्वारा शास्त्रयुक्तिको प्रदर्शित करनेपर भी वे उसे स्वीकार नहीं करते। जानने योग्य बात यह है कि प्राकृत-सहजिया आदि कुपथ-आश्रित सम्प्रदायके लोग वास्तवमें अजातरुचि होनेपर भी रागानुगाभिमानमें भक्तिग्रन्थोंकी चर्चा और श्रीरूपानुग पथका परित्याग करके अवैध-स्त्रीलम्पट और मूर्खजनोंके योग्य सांसारिक रुचिको ही बढ़ाकर अपना सर्वनाश किया करते हैं। वे वञ्चित और दुर्भागे हैं॥ 149 ॥ अमृतानुकणा—'प्रीति या आनन्दके वशीभूत होकर ही जीव अपने-अपने कार्योंमें प्रवृत्त होते हैं। पण्डितगण इस प्रीतिको चित्त और विषयका बन्धनसूत्र बतलाते हैं। प्रीतिरूप बन्धनसूत्र विषयके जिस अंशका आश्रय करके रहता है, उसका नाम 'रञ्जकता धर्म' है और चित्तके जिस अंशको आश्रय करके रहता है, उसका नाम 'राग' है। विषयके नाम, रूप, गुण और क्रियागत जो सौन्दर्य या चमत्कारिता है, उसको 'रञ्जकता धर्म' कहते हैं। विचार करनेसे पूर्व ही विषयके सौन्दर्यको देखते ही चित्त जिस प्रवृत्तिके द्वारा उस पदार्थकी ओर दौड़ता है, वही 'राग' है। रागकार्यमें विचारकी आवश्यकता नहीं रहनेपर पण्डितगण उसको 'सिद्धवृत्तिस्वरूप' कहते हैं। राग जिस वस्तुके प्रति धावित होता है, उसको उसका 'इष्टविषय' कहते हैं। नित्य और अनित्य भेदसे रागके इष्टविषय दो प्रकारके हैं। नित्य इष्टविषयके प्रति राग जब धावित होता है, तब उसको 'वैकुण्ठराग' और अनित्य इष्टविषयके प्रति जब धावित होता है, तब उसको 'जड़राग' कहा जाता है। जीवके चित्तमें स्थित राग एक ही तत्त्व होनेके कारण वैकुण्ठराग और जड़रागमें विषयकी भिन्नता है, रागकी भिन्नता नहीं है।" ('रागरहस्य'—साप्ताहिक 'गौड़ीय' 3रा वर्ष 38 संख्या) जड़राग विद्यमान होनेपर कर्त्तव्य बुद्धिके द्वारा अर्थात् शास्त्रविधि और युक्तिसे प्रेरित होकर जो इष्टसाधन प्रणाली है, उसका नाम 'वैधीभक्ति' है। जबतक 'रति'का उदय नहीं होता है, तबतक वैधी भक्तिमें अधिकार है। रतिके उदय होनेपर वह 'वैकुण्ठराग'में पर्यवसित होता है। वैकुण्ठराग उसके इष्टविषयके वैशिष्ट्यके अनुसार ऐश्वर्यपर और माधुर्यपर भेदसे दो प्रकारका होता है। व्रजवासियोंका श्रीकृष्णके प्रति जो राग है, वह केवल माधुर्यपर और ऐश्वर्यगन्धविहीन है। श्रीकृष्णके प्रति उनके उस रागमें आत्मसुखकी इच्छाकी गन्धमात्र भी नहीं रहती और तारतम्यके अनुसारसे वह सर्वश्रेष्ठ है। इसलिये व्रजवासियोंके परम, विशुद्ध वैकुण्ठरागको ही मुख्यत: 'रागात्मिका भक्ति' कहा जाता है। उस विषयमें शास्त्रके वर्णनको श्रवणकर उनके रागके प्रति जो लोभ उत्पन्न होता है (अर्थात् किसी विशेष रागमें लोभमात्र उत्पन्न होता है, परन्तु स्वयं वह विशेष राग उत्पन्न नहीं होता), उसके द्वारा जो भक्ति होती है, उसको 'रागानुगा भक्ति' कहते हैं। वहाँपर शास्त्रविधि और युक्तिके विषयमें उपयुक्त ज्ञान रहनेपर भी वह उक्त भक्तिका उत्तेजक नहीं है, परन्तु यथार्थ विषयमें लोभ ही उसका उत्तेजक है। “ततश्च तादृशलोभोवतो भक्तस्य लोभनीय-तद्भाव- प्राप्त्युपाय-जिज्ञासायां सत्यां शास्त्रयुक्त्यपेक्षा स्यात्। यथा दुग्धादिषु लोभे सति कथं मे दुग्धादिकं भवेदिति तदुपायजिज्ञासायां तदभिज्ञाप्तजन-कृतोपदेशवाक्यापेक्षा 368 |

बाइसवाँ अध्याय 22/148-150 ] स्यात्।” (रागवर्त्म-चन्द्रिका) - बादमें इस प्रकार लोभसे युक्त भक्त जब श्रीकृष्ण परिकरोंके भावप्राप्तिके उपायोंके जिज्ञासु होते हैं, तब उस अवस्थामें शास्त्र और उसके अनुकूल युक्तिकी व्यवस्था देखी जाती है। जैसे, किसी व्यक्तिको यदि दूध पीनेके लिये लोभ हुआ है, तब किस प्रकारसे दूध प्राप्त होगा, इस उपायको जाननेके लिये उसमें जिज्ञासा उत्पन्न होती है और उस समय उस व्यक्तिके लिये एक विश्वसनीय जानकार व्यक्तिके द्वारा उपदेश-वाक्यकी अपेक्षा देखी जाती है। उसी प्रकार भावके लिये लोभी व्यक्तियोंके लिये भी शास्त्रमें कहे गये उपदेशोंकी अपेक्षा दिखलायी देती है। इसलिये लोभ उत्पत्तिके लिये यद्यपि शास्त्रादिकी कोई अपेक्षा नहीं है, तथापि अभीष्ट भावके पानेके लिये शास्त्रोंके उपदेशकी अवश्य ही अपेक्षा है, ऐसा जानना होगा। इसलिये वैधी साधनभक्तिके जो समस्त अङ्ग हैं, रागानुगा भक्ति उन सभी अङ्गोंको स्वीकार करती है। “वस्तुतस्तु लोभ-प्रवर्तितं विधिमार्गेण सेवनमेव रागमार्ग उच्यते, विधिप्रवर्तितं विधिमार्गेण सेवनञ्च विधिमार्ग इति। विधिविनाभूतं सेवनं तु श्रुतिस्मृतिर्यादिवाक्यादुत्पातप्रापकमेव।” (रागवर्त्म चन्द्रिका) - वस्तुतः लोभके द्वारा प्रवृत्त होनेपर विधिमार्गके अनुसार सेवा ही 'रागमार्ग'रूपमें कही गयी है और शास्त्रविधि-हेतु अर्थात् कर्त्तव्यबुद्धिसे प्रवृत्त होनेपर विधिमार्गमें जो सेवा है, उसे 'विधिमार्ग' कहा गया है। किन्तु शास्त्रविधिके बिना सेवा भक्तिरसामृतसिन्धु ग्रन्थमें उल्लिखित “श्रुति-स्मृति-पुराणादि-पञ्चरात्र-विधिं बिना। ऐकान्तिकी हरेर्भक्तिरुत्पातायैव कल्पते।” - इस वाक्यके अनुसार वह उत्पातका कारण होती है। “रागभक्तगण जातरुचि हैं-उनकी स्वभावतः ही शास्त्रयुक्तिमें सुनिपुणता होती है। अजातरुचि व्यक्तिका शास्त्रसिद्धान्तमें सम्पूर्ण अनिपुण और उच्छृङ्खल होकर रागानुगाका अभिमान करना कपटतामात्र है। इस कपटमयी प्राकृत-अभिनिवेशमयी रुचिको रागमयी भक्तिमें लोभ नहीं समझना चाहिये, क्योंकि वह वास्तवमें सम्भोग- स्पृहासे दोषयुक्त है। वैधीभक्तिके द्वारा चित्त निर्मल होनेपर यदि अहैतुक हरि-गुरु-वैष्णव-कृपासे किसी सौभाग्यवानमें रागमय लोभ स्वतः प्रकाशित होता है, तभी उसका रागानुगा भक्तिमें अधिकार उत्पन्न होता है। कोई कृत्रिमरूपसे इच्छा करनेपर या गानके बलसे रागानुगा भक्त नहीं हो सकता। मूर्खता, उच्छ्र कल्पना, निषिद्धाचार, शास्त्र-उल्लंघन या व्यभिचार- रागानुगा भक्ति या लोभमयी श्रद्धा नहीं है। पुरुषाभिमानी व्यक्ति रागभजन नहीं कर सकता। महत् व्यक्तिकी कृपा होनेपर ही यह पुरुषाभिमान दूर होता है और श्रीपुरुषोत्तमकी प्रकृति होनेका अभिमान जाग्रत होता है। अनर्थ सङ्कुचित होनेपर निर्मल आत्मा या शुद्धजीवस्वरूपमें जो स्वतःसिद्ध रागमय सेवा-भाव प्रकाशित होता है, उसमें अपने-अपने शुद्धस्वरूपके रसभेदसे रागात्मिक व्रजवासियोंके नित्यसिद्ध-भावके प्रति रागानुगा निष्ठा प्रकट होती है। तब श्रीगुरुकृपाके बलसे परम सौभाग्यवान् साधकोंका अपना-अपना स्वरूप प्रकाशित होता है। इसमें कल्पनाका, कृत्रिमताका या अन्य किसी प्रकारके उद्देश्यका स्थान नहीं है। जिनका हृदय निर्गुण है, उन्हींकी निर्गुण व्रजजनोंके आनुगत्यमें रुचि उत्पन्न होती है।” (विधि और राग-दैनिक नदिया प्रकाश) ॥148-149॥ रागानुगा-भक्तिकी संज्ञा :- भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/268)- विराजन्तीमभिव्यक्तां व्रजवासिजनादिषु। रागात्मिकामनुसृता या सा रागानुगोच्यते ॥ 150 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 150 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-व्रजवासिजनोंमें अभिव्यक्तरूपमें रागात्मिका-भक्ति विराजमान है। उस भक्तिकी अनुसृता (अनुगता) जो भक्ति है, वही 'रागानुगा' भक्ति है ॥ 150 ॥ अनुभाष्य- या व्रजवासिजनादिषु अभिव्यक्तां (सुप्रकाशितां यथा स्यात् तथा) विराजन्तीं (शोभमानां) रागात्मिकां (नित्यसिद्ध- व्रजजन-स्वभावगतां) भक्तिम् अनुसृता (अनुगता), सा 'रागानुगा" उच्यते। । 369