श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाइसवाँ अध्याय 22/84-87 ]
अपनी रक्षा नहीं कर सकता। उसमें केवल द्वेष अथवा तुच्छ-ज्ञान करनेसे आसक्ति और भी अधिक बढ़ जाती है। घृणा आसक्तिकी ही एक दिशा है। आसक्तिकी अपेक्षा घृणासे और भी अधिक अभिनिवेश होता है। आकार अर्थात् रूप दर्शन करते ही यह आसक्ति अथवा घृणा आ जाती है। भोग्य-ज्ञान करके बादमें घृणा या उपेक्षा करनेपर विपरीत चिन्ताके द्वारा प्रबल स्त्रीसङ्गी अवश्य ही होना होगा। कृत्रिम उपायसे स्त्रीसङ्ग या स्त्री-दर्शनसे मुक्ति नहीं हो सकती। शरणागत होकर ही श्रीकृष्णदास अभिमान जाग्रत होनेपर यह स्त्री-दर्शन दूर होगा। भोगनेत्रोंसे दर्शन करनेपर भोग्यका ही दर्शन होता है। इसलिये साधु-शास्त्र कानोंके द्वारा दर्शन करनेके लिये कहते हैं। 'श्रुति'के अनुगत होकर दर्शन करनेपर सेवोन्मुख शरणागत कानोंके द्वारा दर्शन करनेसे ही ठीक दर्शन होगा। ('स्त्रीसङ्ग घृणित'—दैनिक नदिया प्रकाश)। असत्सङ्गको अवश्य ही त्याग करना चाहिये। अभक्त कौन हैं? जो भगवान्के अनुगत नहीं हैं, वे ही अभक्त हैं। ज्ञानवादी पुरुष कभी भी भगवान्के अनुगत नहीं हैं। वे मनमें विचार करते हैं,-'मैं भी ज्ञानके बलसे भगवान्के समान हो जाऊँगा। ज्ञानके बलसे ही भगवान्की ब्रह्मता है और ज्ञानके बलसे मैं भी ब्रह्म हो जाऊँगा।' इसलिये ज्ञानवादियोंकी समस्त चेष्टाएँ ही भगवान्से स्वाधीन होती हैं। आत्मज्ञानी और प्राकृत-ज्ञानी लोग भी श्रीभगवान्की कृपाकी अपेक्षा नहीं करते। इसलिये ज्ञानीमात्र ही अभक्त हैं। यद्यपि कुछ ज्ञानी लोग साधनकालमें भक्तिको स्वीकार करते हैं, किन्तु वे सिद्धिकालमें भक्तिको विसर्जन कर देते हैं। इसलिये जो ज्ञानवादमें आसक्त हैं, उनकी अभक्तोंमें ही गणना की गयी है। कर्मवादी पुरुष भी भक्त नहीं हैं, इसलिये वे भी अभक्त हैं। श्रीकृष्णकृपा पानेके लिये यदि कोई कर्म करता है, तब उस कर्मका नाम 'भक्ति' है। जो कर्म, प्राकृत-फल या बहिर्मुख ज्ञान प्रदान करते हैं, वे कर्म भगवद्विमुख हैं। अपने स्वार्थके लिये किये गये कर्मोंको ही कर्म कहते हैं। इसलिये कर्मी व्यक्तियोंको भी अभक्त कहा जाता है।” “योगीगण भी कहींपर ज्ञानके फल कैवल्य-मोक्ष और कहींपर कर्मके फल विभूति (ऐश्वर्य) का अनुसन्धान करते हैं। इसलिये उनको भी अभक्त ही कहा गया है। अनेक देवोंके पूजकोंकी भी अनन्य शरणागति नहीं होनेसे उनको भी अभक्त कहा गया है। जो केवल शुष्क न्यायादिके विचारमें आसक्त हैं, वे भी भगवद्- बहिर्मुख हैं। जो इस प्रकार सिद्धान्त करते हैं कि, 'भगवान् एक काल्पनिक तत्त्वमात्र हैं, उनकी तो बात कहने योग्य नहीं है।' जिनको विषयोंमें आसक्त होकर भगवान्को स्मरण करनेके लिये समय नहीं मिलता, वे भी अभक्तोंके मध्यमें गिने जाते हैं। इन सब अभक्तोंका सङ्ग करनेसे अति अल्प समयमें बुद्धिनाश हो जाता है और उनके समान-प्रवृत्ति आकर हृदयमें बैठ जाती है। यदि किसीमें शुद्धभक्ति पानेकी वासना है, तो उसे विशेष रूपसे सतर्क रहते हुए अभक्त-सङ्ग परित्याग करना चाहिये।' ('सङ्गत्याग'—श्रील भक्तिविनोद ठाकुर) ॥ 84 ॥ स्त्री-सङ्ग और स्त्री-सङ्गीके सङ्गका भयानक परिणाम :- श्रीमद्भागवत (3/31/33-35)में— सत्यं शौचं दया मौनं बुद्धिर्हीः श्रीर्यशः क्षमा। शमो दमो भगश्चेति यत्सङ्गाद्याति संक्षयम् ॥ 85 ॥ तेष्वशान्तेषु मूढेषु खण्डितात्मस्वसाधुषु। सङ्गं न कुर्याच्छोच्येषु योषित्क्रीडामृगेषु च ॥ 86 ॥ न तथास्य भवेन्मोहो बन्धश्चान्यप्रसङ्गतः। योषित्सङ्गाद्यथा पुंसो यथा तत्सङ्गिसङ्गतः ॥ 87 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 85-87 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सत्य, पवित्रता, दया, मौन, बुद्धि, लज्जा, श्री, यश, क्षमा, शम, दम और ऐश्वर्य आदि सब कुछ ही जिनके सङ्गसे क्षय हो जाता है, उन शोचनीय आत्मविनाशकारी अशान्त मूर्ख स्त्री-क्रीड़ा- । 351