श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1773, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबाइसवाँ अध्याय कथासार-इस बाइसवें अध्यायमें श्रीमन्महाप्रभुने अभिधेय-तत्त्वका वर्णन किया है। महाप्रभुने सर्वप्रथम जीवका तत्त्व, बादमें भक्तिकी श्रेष्ठता और केवल-ज्ञानयोगादिकी अकर्मण्यता एवं भक्ति ही समस्त जीवोंका कर्त्तव्य है, इन सबकी व्याख्या की तथा ज्ञानियोंका मुक्त होनेका अभिमान वृथा है, उसे भी दिखलाया। भुक्ति-मुक्ति-सिद्धिकी कामनाओंका परित्याग करके शुद्ध भक्तियोगसे अभीष्ट अथवा प्रयोजनादि सब कुछ सिद्ध होता है। यद्यपि किसी व्यक्तिके भजनकालमें वे सब कामनाएँ अज्ञानतावशतः कुछ जुड़ी रहती हैं, तथापि श्रीकृष्ण उन्हें दूर करके उस व्यक्तिको शुद्धभक्ति प्रदान करते हैं। महाजनोंकी कृपाके बिना भक्तिका उदय नहीं होता, इसलिये साधुसङ्ग ही आवश्यक कर्त्तव्य है। श्रद्धा ही अनन्यभक्तिमें अधिकार प्रदान करती है। इसके बाद महाप्रभुने उसका और अनन्यभक्तोंके वर्गोंके भेद एवं वैष्णवोंके सभी स्वभावोंका वर्णन किया। स्त्रीसङ्ग और अभक्त-सङ्ग ही असत्सङ्ग है। इन दोनोंका परित्याग करके, वर्णाश्रमकी आसक्तिको छोड़कर श्रीकृष्णके शरणागत होना चाहिये। शरणागतिके छः लक्षणोंकी भी व्याख्या हुई है। साधनभक्ति-वैधी और रागानुगाके भेदसे दो प्रकारकी है। वैधीभक्तिके चौंसठ अङ्ग ही प्रधान हैं; उनमेंसे अन्तिम पाँच अङ्ग ही अत्यन्त बलवान हैं। भक्तिके एक अङ्ग अथवा अनेक अङ्गोंके साधनसे भी फल प्राप्त होता है। ज्ञान-वैराग्य-योगादि कभी भी भक्तिके अङ्ग नहीं है; अहिंसा, यम, नियमादिके लिये कोई पृथक् चेष्टा नहीं करनी पड़ती; वे भक्तिके साथ-साथ ही रहते हैं। रागानुगा भक्ति-रागात्मिका-भक्तिकी ही अनुगामिनी है। ब्रजवासियोंकी रागात्मिका भक्ति ही मुख्य है। रागात्मिका भक्तिके लक्षण बतलाकर महाप्रभुने उसके बाद रागानुगा-भक्तिके साधन-लक्षणोंको बतलाया। -(अमृतप्रवाह भाष्य) कलियुग पावनावतारी प्रेमदाता महाप्रभुको प्रणाम :- वन्दे श्रीकृष्णचैतन्यदेवं तं करुणार्णवम्। कलावप्यतिगूढेयं भक्तिर्येन प्रकाशिता ॥ 1 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिनके द्वारा कलिकालमें भी अतिगूढ़ भक्ति प्रकाशित हुई है, उन करुणाके सागर श्रीकृष्णचैतन्यदेवकी मैं वन्दना करता हूँ॥ 1 ॥ अनुभाष्य- कलौ (धर्मरहिते तर्काश्रितविवादमये युगे) अपि येन (महाप्रभुणा) अतिगूढ़ा (धर्मबहुले सत्यत्रेताद्वापरयुगे सद्धर्मज्ञैरप्यज्ञाता) इयं भक्तिः (हेतुरहिता कृष्णसेवा) प्रकाशिता (साधारण्ये प्रचारिता), तं करुणार्णवं (जीवदयासागरं) श्रीकृष्णचैतन्यदेवम् अहं वन्दे। श्लोक-भावानुवाद-धर्मरहित तर्कप्रधान विवादमय कलियुगमें भी जिन्होंने अतिगूढ़ अर्थात् जो धर्मप्रधान सत्य-त्रेता-द्वापर युगमें केवल सद्धर्मको जाननेवालोंको ही ज्ञात थी, ऐसी अहैतुकी श्रीकृष्णसेवा लक्षणमयी भक्तिका साधारण जीवोंमें प्रचार किया, उन जीवोंके प्रति दयाके सागर श्रीकृष्णचैतन्यदेवकी मैं वन्दना करता हूँ॥ 1 ॥ जय जय श्रीकृष्णचैतन्य नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ 2 ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, श्रीनित्यानन्द । 327