श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1774, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 22/2-7 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, सभी गौरभक्तोंकी जय हो॥२॥ समस्त वेदशास्त्रोंमें श्रीकृष्ण ही 'सम्बन्ध'रूपमें निरूपित :- 'एइ त' कहिलुँ सम्बन्ध-तत्त्वेर विचार। वेदशास्त्रे उपदेशे, कृष्ण—एक सार॥३॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,–“अब तक मैंने तुम्हें सम्बन्ध-तत्त्वके विचारको बतलाया है। वेदशास्त्रोंका यही उपदेश है कि श्रीकृष्ण ही एकमात्र सार हैं॥३॥ श्रीसनातन-शिक्षा—(२) अभिधेय (श्रीकृष्णभक्ति)-वर्णन; अभिधेय ही सम्बन्ध और प्रयोजन-प्रदाता :- एबे कहि, शुन, अभिधेय-लक्षण। याहा हैते पाइ—कृष्ण, कृष्णप्रेमधन॥४॥ अनुवाद—हे सनातन, अब मैं उस अभिधेय-लक्षणके विषयमें बतलाता हूँ, जिससे श्रीकृष्ण और श्रीकृष्णप्रेमधनकी प्राप्ति होती है॥४॥ श्रीकृष्णभक्ति ही अभिधेय :- कृष्णभक्ति—अभिधेय, सर्वशास्त्रे कय। अतएव मुनिगण करियाछे निश्चय॥५॥ अनुवाद—सभी शास्त्र श्रीकृष्णभक्तिको ही अभिधेय (लक्ष्य प्राप्तिका उपाय) बतलाते हैं। इसलिये सभी मुनियोंने भी यही निर्धारित किया है॥५॥ श्रुति-स्मृति-पुराण-पञ्चरात्रमें श्रीकृष्णभक्तिको ही विधिके अनुरूप 'अभिधेय' कहा है :- मुनिवाक्य— श्रुतिर्माता पृष्टा दिशति भवदाराधनविधिं यथा मातुर्वाणी स्मृतिरपि तथा वक्ति भगिनी। पुराणाद्या ये वा सहजनिवहास्ते तदनुगा अतः सत्यं ज्ञातं मुरहर भवानेव शरणम्॥६॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—माता-स्वरूप श्रुतिसे जिज्ञासा करनेपर वे आपकी आराधनाकी विधिका उपदेश देती हैं, स्मृति भी बहन-स्वरूप होकर उसी प्रकार उपदेश देती हैं; पुराणादि भी भाईके रूपमें श्रुतिमाताके अनुगत होकर वही कहते हैं। इसलिये हे मुरहर (मुरारि)! आप ही एकमात्र शरण हैं, इसे मैंने सत्यरूपमें जान लिया है॥६॥ अनुभाष्य— माता (मातृवत् हिताभिलाषिणी जीवपालयित्री) श्रुतिः पृष्टा (जिज्ञासिता सती) भवदाराधनविधिं (कृष्णसेवां) दिशति (आज्ञापयति); यथा मातुः (श्रुतेः) वाणी (कथा), तथा भगिनी (श्रुतिमातृ-लाल्या) स्मृतिः अपि वक्ति (प्रकाशयति, कृष्णभक्तिं कथयति); पुराणाद्याः (पुराणागमादयः) ये वा सहजनिवहाः (सहोदराः), ते (अपि) तदनुगाः (मातृभगिन्योः अनुगामिनः सन्तः कृष्णभक्त्युपदेशपराः); अतः हे मुरहर (मुरारे,) भवान् एव [मम] शरणम् [इति] सत्यं [मया] ज्ञातम्। श्लोक-भावानुवाद—हिताभिलाषिणी माताके समान जीवोंका पालन करनेवाली श्रुति जिज्ञासा करनेपर श्रीकृष्णसेवाकी ही आज्ञा देती हैं। श्रुति-माताके द्वारा लालित स्मृतिरूपी बहन भी माताकी वाणीकी भाँति श्रीकृष्णभक्तिकी बात कहती हैं। पुराण-आगमादि भी भ्राताकी भाँति माता और बहनके अनुगामी होकर श्रीकृष्णभक्तिका ही उपदेश देते हैं। इसलिये हे मुरारि! आप ही मेरी शरण हैं, इसे मैंने सत्यरूपमें जान लिया है॥६॥ श्रीकृष्ण और स्वरूपशक्ति एकात्मा होनेपर भी विलासके लिये परस्पर आलिङ्गित :- अद्वयज्ञान-तत्त्व कृष्ण—स्वयं भगवान्। 'स्वरूप-शक्ति'-रूपे ताँर हय अवस्थान॥७॥ अनुवाद—अद्वयज्ञान-तत्त्व श्रीकृष्ण ही स्वयं भगवान् हैं। अद्वय अर्थात् श्रीकृष्ण और उनकी शक्तिमें भेद नहीं होनेके कारण श्रीकृष्ण अपनेसे अभिन्न स्वरूप-शक्तिके रूपमें भी अवस्थान करते हैं॥७॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्ण-अद्वयज्ञान-तत्त्व हैं। शक्ति और 328 ।